भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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४२२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं सम्पूज्य विधिवद्यथाशक्ति त्ववञ्चयन्।<br>आददीत गुरोर्मन्त्रं ज्ञानं चैव क्रमेण तु॥ ९१<br><br>एवं तुष्टो गुरुः शिष्यं पूजितं वत्सरोषितम्।<br>शुश्रूषमनहङ्कारमुपवासकृशं शुचिम्॥ ९२इसके बाद सेवक आदि सहित अपने आपको भी समर्पित कर देना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक यथाशक्ति [गुरुकी] पूजा करके निष्कपट भाव रखते हुए [शिष्यको] गुरुसे क्रमपूर्वक मन्त्र तथा ज्ञान ग्रहण करना चाहिये॥ ८६—९१॥
स्नापयित्वा तु शिष्याय ब्राह्मणानपि पूज्य च।<br>समुद्रतीरे नद्यां च गोष्ठे देवालयेऽपि वा॥ ९३<br><br>शुचौ देशे गृहे वापि काले सिद्धिकरे तिथौ।<br>नक्षत्रे शुभयोगे च सर्वदा दोषवर्जिते॥ ९४<br><br>अनुगृह्य ततो दद्याच्छिवज्ञानमनुत्तमम्।<br>स्वरेणोच्चारयेत्सम्येगकान्तेऽपि प्रसन्नधीः॥ ९५<br><br>उच्चार्योच्चारयित्वा तु आचार्यः सिद्धिदः स्वयम्।<br>शिवं चास्तु शुभं चास्तु शोभनोऽस्तु प्रियोऽस्त्विति॥ ९६इस प्रकार सन्तुष्ट गुरु वर्षपर्यन्त पास रहकर सेवामें परायण, अहंकाररहित, उपवाससे दुर्बल शरीरवाले तथा शुद्धियुक्त पूजित शिष्यको स्नान कराकर ब्राह्मणोंकी पूजा करके [किसी] समुद्रतटपर, नदीतटपर, गोशालामें, देवालयमें, पवित्र स्थानमें अथवा घरमें ही सिद्धिकारक समयमें, उत्तम तिथिमें तथा दोषरहित नक्षत्र एवं शुभयोगमें शिष्यपर अनुग्रह करके उसे अत्युत्तम शिवज्ञान प्रदान करे; साथ ही प्रसन्नचित्त होकर एकान्तमें स्वरसे सम्यक् उच्चारण करे। स्वयं उच्चारणकर तथा उच्चारण कराकर मन्त्रदाता आचार्य बोले—[तुम्हारा] कल्याण हो, शुभ हो, कुशल हो, प्रिय हो॥ ९२—९६॥
एवं लब्ध्वा परं मन्त्रं ज्ञानं चैव गुरोस्ततः।<br>जपेन्नित्यं ससङ्कल्पं पुरश्चरणमेव च॥ ९७<br><br>यावज्जीवं जपेन्नित्यमष्टोत्तरसहस्रकम्।<br>अनश्नंस्तत्परो भूत्वा स याति परमां गतिम्॥ ९८इस प्रकार गुरुसे श्रेष्ठ मन्त्र तथा ज्ञान प्राप्त करके नित्य इसका ससंकल्प जप करना चाहिये और पुरश्चरण भी करना चाहिये। जो बिना भोजन किये तत्पर होकर आजीवन नित्य इसका एक हजार आठ बार जप करता है, वह परम गति प्राप्त करता है॥ ९७-९८॥
जपेदक्षरलक्षं वै चतुर्गुणितमादरात्।<br>नक्ताशी संयमी यश्च पौरश्चरणिकः स्मृतः॥ ९९<br><br>पुरश्चरणजापी वा अपि वा नित्यजापकः।<br>अचिरात्सिद्धिकाङ्क्षी तु तयोरन्यतरो भवेत्॥ १००नक्तव्रत करते हुए तथा नियमोंका पालन करते हुए जो श्रद्धापूर्वक मन्त्रकी अक्षरसंख्याका चार लाख गुना जप करता है, उसे पुरश्चरणकर्ता कहा गया है। पुरश्चरणजप करनेवाला अथवा नित्य जप करनेवाला शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है। दोनोंमें किसी एकको अवश्य करना चाहिये॥ ९९-१००॥
यः पुरश्चरणं कृत्वा नित्यजापी भवेन्नरः।<br>तस्य नास्ति समो लोके स सिद्धः सिद्धिदो वशी॥ १०१जो मनुष्य पुरश्चरण करके इसका नित्य जप करनेवाला है, उसके समान लोकमें कोई नहीं है; वह सिद्ध, सिद्धिदाता तथा इन्द्रियजित् होता है॥ १०१॥
आसनं रुचिरं बद्ध्वा मौनी चैकाग्रमानसः।<br>प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि जपेन्मन्त्रमनुत्तमम्॥ १०२सुखदायक आसन लगाकर मौन तथा एकाग्रचित्त होकर पूर्वकी ओर अथवा उत्तरकी ओर मुख करके [इस] सर्वोत्तम मन्त्रका जप करना चाहिये॥ १०२॥
आद्यन्तयोर्जपस्यापि कुर्याद्वै प्राणसंयमान्।<br>तथा चान्ते जपेद्बीजं शतमष्टोत्तरं शुभम्॥ १०३जपके प्रारम्भ और अन्तमें [तीन-तीन] प्राणायाम करना चाहिये और अन्तमें एक सौ आठ बार बीजमन्त्रका