श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [पूर्वभाग |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कनिष्ठा रक्षणीया सा जपकर्मणि शोभने।<br>अङ्गुष्ठेन जपेज्जप्यमन्यैरङ्गुलिभिः सह॥ ११५<br><br>अङ्गुष्ठेन विना कर्म कृतं तदफलं यतः। | [अँगुली] शत्रु का नाश करनेवाली तथा मध्यमा धन प्रदान करनेवाली है। अनामिका शान्ति प्रदान करती है। हे शोभने! जपकर्ममें कनिष्ठा रक्षणीय होती है। अँगूठेसे अन्य अँगुलियोंके साथ मन्त्रका जप करना चाहिये; क्योंकि बिना अँगूठेके जो जपकर्म किया जाता है, वह निष्फल होता है॥ ११४-११५ १/२ ॥ |
| शृणुष्व सर्वयज्ञेभ्यो जपयज्ञो विशिष्यते॥ ११६<br><br>हिंसया ते प्रवर्तन्ते जपयज्ञो न हिंसया।<br>यावन्तः कर्म यज्ञाः स्युः प्रदानानि तपांसि च॥ ११७<br><br>सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्। | [हे देवि!] सुनो, जपयज्ञ सभी यज्ञोंसे श्रेष्ठ है; वे सभी यज्ञ हिंसाके साथ हुआ करते हैं, किंतु जपयज्ञ बिना हिंसाके होता है। जितने भी अनुष्ठान, यज्ञ, दान तथा तप हैं, वे सब [इस] जपयज्ञकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं॥ ११६-११७ १/२ ॥ |
| माहात्म्यं वाचिकस्यैव जपयज्ञस्य कीर्तितम्॥ ११८<br><br>तस्माच्छतगुणोपांशुः सहस्रो मानसः स्मृतः।<br>यदुच्चनीचस्वरितैः शब्दैः स्पष्टपदाक्षरैः॥ ११९<br><br>मन्त्रमुच्चारयेद्वाचा जपयज्ञः स वाचिकः।<br>शनैरुच्चारयेन्मन्त्रमीषदोष्ठौ तु चालयेत्॥ १२०<br><br>किञ्चित्कर्णान्तरं विद्यादुपांशुः स जपः स्मृतः।<br>धिया यदक्षरश्रेण्या वर्णाद्वर्णं पदात्पदम्॥ १२१<br><br>शब्दार्थं चिन्तयेद्भूयः स तूक्तो मानसो जपः।<br>त्रयाणां जपयज्ञानां श्रेयान् स्यादुत्तरोत्तरः॥ १२२<br><br>भवेद्यज्ञविशेषेण वैशिष्ट्यं तत्फलस्य च। | वाचिक जपयज्ञका जो माहात्म्य बताया गया है; उपांशु [जपयज्ञ] उससे सौ गुना और मानस [जपयज्ञ] हजार गुना [फलप्रद] कहा गया है। यदि साधक स्पष्ट पद-अक्षरोंवाले शब्दोंके साथ उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरोंमें वाणीके द्वारा मन्त्रका उच्चारण करता है, तो वह जपयज्ञ वाचिक होता है। यदि साधक धीमे स्वरमें मन्त्रका उच्चारण करता है और कुछ-कुछ ओठोंको चलाता है तथा उसे कुछ-कुछ कानमें सुनायी पड़ता है, तो वह जप उपांशु कहा गया है। यदि साधक मनमें अक्षरसमूहके वर्णसे वर्ण तथा पदसे पद शब्दार्थका बार-बार चिन्तन करता है, तो उस जपको मानस जप कहा गया है। तीनों जपयज्ञोंमें उत्तरोत्तर (बादवाला पहलेकी अपेक्षा) श्रेष्ठ है। यज्ञविशेषसे उसके फलका वैशिष्ट्य होता है॥ ११८-१२२ १/२ ॥ |
| जपेन देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति॥ १२३<br><br>प्रसन्ना विपुलान् भोगान् दद्यान्मुक्तिं च शाश्वतीम्।<br>यक्षरक्षःपिशाचाश्च ग्रहाः सर्वे च भीषणाः।<br>जापिनं नोपसर्पन्ति भयभीताः समन्ततः॥ १२४ | जपके द्वारा नित्य स्तुति किये जाते हुए देवता प्रसन्न हो जाते हैं और प्रसन्न होकर अत्यधिक भोग तथा चिरस्थायी मुक्ति प्रदान करते हैं। यक्ष, राक्षस, पिशाच तथा सभी भयंकर ग्रह जप करनेवालेके पास नहीं जाते और उससे पूर्णरूपसे भयभीत रहते हैं॥ १२३-१२४॥ |
| जपेन पापं शमयेदशेषं<br>यत्तत्कृतं जन्मपरम्परासु।<br>जपेन भोगान् जयते च मृत्युं<br>जपेन सिद्धिं लभते च मुक्तिम्॥ १२५ | मनुष्य जन्म-जन्मान्तरमें जो भी पाप किये रहता है, उसे जपके द्वारा नष्ट कर देता है; जपके द्वारा भोगोंको प्राप्त करता है; मृत्युको जीत लेता है; जपके द्वारा सिद्धि तथा मुक्तिको भी प्राप्त कर लेता है॥ १२५॥ |
| एवं लब्ध्वा शिवं ज्ञानं ज्ञात्वा जपविधिक्रमम्॥ १२६ | इस प्रकार शिवज्ञान प्राप्त करके और जपके |