श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४२५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सदाचारी जपेन्नित्यं ध्यायन् भद्रं समश्नुते।<br>सदाचारं प्रवक्ष्यामि सम्यक् धर्मस्य साधनम्॥ १२७<br><br>यस्मादाचारहीनस्य साधनं निष्फलं भवेत्।<br>आचारः परमो धर्म आचारः परमं तपः॥ १२८<br><br>आचारः परमा विद्या आचारः परमा गतिः।<br>सदाचारवतां पुंसां सर्वत्राप्यभयं भवेत्॥ १२९ | विधिक्रमको जानकर सदाचारी [मनुष्य] नित्य जप करता हुआ तथा शिवका ध्यान करता हुआ कल्याण प्राप्त करता है॥ १२६१/२॥<br><br>[हे देवि!] अब मैं धर्मके साधनस्वरूप सदाचारका सम्यक् वर्णन करूँगा; क्योंकि आचारहीन [व्यक्ति]-का साधन निष्फल हो जाता है। आचार सर्वश्रेष्ठ धर्म है, आचार परम तप है, आचार परम विद्या है और आचार परम गति है। जिस तरह सदाचारी मनुष्योंको सभी जगह अभय रहता है; उसी तरह आचारीहीनोंको सर्वत्र भय ही रहता है॥ १२७-१२९१/२॥ |
| तद्वदाचारहीनानां सर्वत्रैव भयं भवेत्।<br>सदाचारेण देवत्वमृषित्वं च वरानने॥ १३०<br><br>उपयान्ति कुयोनित्वं तद्वदाचारलङ्घनात्।<br>आचारहीनः पुरुषो लोके भवति निन्दितः॥ १३१<br><br>तस्मात्संसिद्धिमन्विच्छन् सम्यगाचारवान् भवेत्।<br>दुर्वृत्तो शुद्धिभूयिष्ठो पापीयाञ्ज्ञानदूषकः॥ १३२ | हे वरानने! जो सदाचारका पालन करते हैं, वे देवत्व तथा ऋषित्व प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार जो आचारका उल्लंघन करते हैं, वे कुत्सित योनि प्राप्त करते हैं। आचारसे विहीन पुरुष संसारमें निन्दित होता है, अतः सिद्धिकी इच्छा रखनेवालेको पूर्णरूपसे आचारवान् होना चाहिये। महान् शुद्धिसे युक्त होता हुआ भी दुराचारी व्यक्ति पापी तथा ज्ञानको दूषित करनेवाला होता है॥ १३०-१३२॥ |
| वर्णाश्रमविधानोक्तं धर्मं कुर्वीत यत्नतः॥ १३३<br><br>यस्य यद्विहितं कर्म तत्कुर्वन् मत्प्रियः सदा।<br>सन्ध्योपासनशीलः स्यात्सायं प्रातः प्रसन्नधीः॥ १३४<br><br>उदयास्तमयात्पूर्वमारभ्य विधिना शुचिः।<br>कामान्मोहाद्भयाल्लोभात्सन्ध्यां नातिक्रमेद् द्विजः॥ १३५<br><br>सन्ध्यातिक्रमणाद्विप्रो ब्राह्मण्यत्पतते यतः। | वर्णाश्रम-विधानके अनुसार बताये गये धर्मका यत्नपूर्वक पालन करना चाहिये। जिसका जो कर्म विहित है, उसे करनेवाला सर्वदा मुझे प्रिय है। प्रसन्नचित्त होकर प्रातः तथा सायंकाल सन्ध्योपासन करना चाहिये। द्विजको चाहिये कि सूर्योदय तथा सूर्यास्तके पूर्व आरम्भ करके पवित्र होकर विधिपूर्वक सन्ध्या करे और काम, मोह, भय तथा लोभके कारण सन्ध्याका उल्लंघन न करे; क्योंकि सन्ध्याका उल्लंघन करनेसे विप्र ब्राह्मणत्वसे पतित हो जाता है॥ १३३-१३५१/२॥ |
| असत्यं न वदेत्किञ्चिन्न सत्यं च परित्यजेत्॥ १३६<br><br>यत्सत्यं ब्रह्म इत्याहुरसत्यं ब्रह्मदूषणम्।<br>अनृतं परुषं शाठ्यं पैशुन्यं पापहेतुकम्॥ १३७<br><br>परदारान् परद्रव्यं परहिंसां च सर्वदा।<br>क्वचिच्चापि न कुर्वीत वाचा च मनसा तथा॥ १३८ | कुछ भी असत्य नहीं बोलना चाहिये और सत्यका त्याग नहीं करना चाहिये। सत्यको ब्रह्म कहा गया है; असत्य ब्रह्मको दूषित करनेवाला है। असत्य, कठोर वचन, शठता तथा परनिन्दा—ये पापके कारण हैं। वाणी तथा मनसे भी परायी स्त्री तथा पराये धनका हरण और परहिंसा कभी भी नहीं करनी चाहिये॥ १३६-१३८॥ |
| शूद्रान्नं यातयामान्नं नैवेद्यं श्राद्धमेव च।<br>गणान्नं समुदायान्नं राजान्नं च विवर्जयेत्॥ १३९ | शूद्रके अन्न, बासी अन्न, [शिवका] नैवेद्य, श्राद्धके अन्न, अनेक लोगोंके अधिकारवाले अन्न, समुदायविशेषके |