श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक | अर्थ |
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| अन्नशुद्धौ सत्त्वशुद्धिर्न मृदा न जलेन वै।<br>सत्त्वशुद्धौ भवेत्सिद्धिस्ततोऽन्नं परिशोधयेत्॥ १४० | लिये निर्मित अन्नका तथा राजाके अन्नका त्याग करना चाहिये। अन्नकी शुद्धिसे अन्तःकरणकी शुद्धि होती है, न कि मिट्टी अथवा जलसे। अन्तःकरणकी पवित्रतासे सिद्धि प्राप्त होती है, अतः अन्नका शोधन करना चाहिये अर्थात् पवित्र अन्न ग्रहण करना चाहिये॥ १३९-१४०॥ |
| राजप्रतिग्रहैर्दग्धान् ब्राह्मणान् ब्रह्मवादिनः ।<br>स्विन्नानामपि बीजानां पुनर्जन्म न विद्यते॥ १४१<br><br>राजप्रतिग्रहो घोरो बुद्ध्वा चादौ विषोपमः।<br>बुधेन परिहर्त्तव्यः श्वमांसं चापि वर्जयेत्॥ १४२ | जैसे भुने हुए बीजोंका अंकुरण नहीं होता है, वैसे ही ब्रह्मवादी ब्राह्मणोंको भी राजाओंके प्रतिग्रहसे दग्ध जानना चाहिये। अर्थात् वे ब्राह्मणत्वसे च्युत हो जाते हैं। राजाओंसे प्रतिग्रह लेना पाप है तथा विषके समान है—प्रारम्भमें ही ऐसा जानकर बुद्धिमान्को इसे ग्रहण नहीं करना चाहिये और कुत्तेके मांसके समान इसका त्याग कर देना चाहिये॥ १४१-१४२॥ |
| अस्नात्वा न च भुञ्जीयादजपोऽग्निमपूज्य च।<br>पर्णपृष्ठे न भुञ्जीयाद्रात्रौ दीपं विना तथा॥ १४३<br><br>भिन्नभाण्डे च रथ्यायां पतितानां च सन्निधौ।<br>शूद्रशेषं न भुञ्जीयात्सहान्नं शिशुकैरपि॥ १४४ | बिना स्नान किये, बिना जप किये तथा बिना अग्निपूजन किये भोजन नहीं करना चाहिये। पत्तेके पृष्ठपर भोजन नहीं करना चाहिये तथा रातमें बिना दीपक जलाये भोजन नहीं करना चाहिये। टूटे हुए पात्रमें, मार्गमें एवं पतितजनोंके समीप भोजन नहीं करना चाहिये। शूद्रोंका छोड़ा हुआ अन्न नहीं खाना चाहिये और शिशुओंके साथ भी भोजन नहीं करना चाहिये॥ १४३-१४४॥ |
| शुद्धान्नं स्निग्धमश्नीयात्संस्कृतं चाभिमन्त्रितम्।<br>भोक्ता शिव इति स्मृत्वा मौनी चैकाग्रमानसः॥ १४५<br><br>आस्येन न पिबेत्तोयं तिष्ठन्नाञ्जलिनापि वा।<br>वामहस्तेन शय्यायां तथैवान्यकरेण वा॥ १४६ | शुद्ध, स्निग्ध (चिकना), पका हुआ तथा अभिमन्त्रित अन्न ग्रहण करना चाहिये; भोजन करनेवाला शिव है—ऐसा समझकर मौन तथा एकाग्रचित्त होकर भोजन करना चाहिये। खड़े-खड़े, अंजुलिसे, मुख लगाकर, बायें हाथसे, शय्यापर तथा दायें हाथसे भी पानी नहीं पीना चाहिये॥ १४५-१४६॥ |
| विभीतकार्ककारञ्जस्नुहिच्छायां न चाश्रयेत्।<br>स्तम्भदीपमनुष्याणामन्येषां प्राणिनां तथा॥ १४७ | बहेड़ा, अर्क (मदार), करंज तथा सेंहुड़के वृक्षकी छायामें शरण नहीं लेना चाहिये। किसी खम्भे, दीप, मनुष्यों तथा अन्य प्राणियोंकी छायामें खड़े नहीं होना चाहिये॥ १४७॥ |
| एको न गच्छेदध्वानं बाहुभ्यां नोत्तरेन्नदीम्।<br>नावरोहेत् कूपादिं नारोहेदुच्चपादपान्॥ १४८ | दूर यात्रापर अकेले नहीं जाना चाहिये, भुजाओंके सहारे तैरकर नदीको पार नहीं करना चाहिये, कूप आदिमें नहीं उतरना चाहिये और लम्बे वृक्षोंपर नहीं चढ़ना चाहिये॥ १४८॥ |
| सूर्याग्निजलदेवानां गुरूणां विमुखः शुभे।<br>न कुर्यादिह कार्याणि जपकर्म शुभानि वा॥ १४९ | हे शुभे! सूर्य, अग्नि, जल, देवता तथा गुरुजनोंके |