श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४२७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विमुख होकर जपकर्म तथा [अन्य] शुभ कर्म नहीं करने चाहिये॥ १४९॥ | |
| अग्नौ न तापयेत्पादौ हस्तं पद्भ्यां न संस्पृशेत्।<br>अग्नेर्नोर्ध्व्यमासीत नाग्नौ किञ्चिन्मलं त्यजेत्॥ १५० | अग्निमें पैरोंको तपाना नहीं चाहिये, पैरोंसे हाथका स्पर्श नहीं करना चाहिये, अग्निके ऊपर आसन नहीं बनाना चाहिये और अग्निमें कोई मल (दूषित पदार्थ) नहीं डालना चाहिये॥ १५०॥ |
| न जलं ताडयेत्पद्भ्यां नाम्भस्यङ्गमलं त्यजेत्।<br>मलं प्रक्षालयेत्तीरे प्रक्षाल्य स्नानमाचरेत्॥ १५१ | पैरोंसे जल नहीं उछालना चाहिये, शरीरकी मैलको जलमें नहीं छोड़ना चाहिये; तटपर ही मलको साफ करना चाहिये और उसे साफ करके स्नान करना चाहिये॥ १५१॥ |
| नखाग्रकेशनिर्धूतस्नानवस्त्रघटोदकम् ।<br>अश्रीकरं मनुष्याणामशुद्धं संस्पृशेदयदि॥ १५२ | नाखून तथा केशसे टपकता हुआ जल और स्नानवस्त्रका तथा घटका जल मनुष्योंके लिये श्रेयस्कर नहीं होता है; यदि कोई इसे स्पर्श करता है, तो अशुद्ध हो जाता है॥ १५२॥ |
| अजाश्ववानखरोष्ट्राणां मार्जनात्तृषरेणुकाम्।<br>संस्पृशेदयदि मूढात्मा श्रियं हन्ति हरेरपि॥ १५३ | यदि कोई मूढ़ बुद्धिवाला [मनुष्य] बकरी, कुत्ता, गधा, ऊँट आदिसे उठी हुई धूल और झाड़ू लगानेसे उठी हुई धूलका स्पर्श करता है, तो उसकी लक्ष्मी नष्ट हो जाती है, चाहे वह विष्णु ही क्यों न हों॥ १५३॥ |
| मार्जारश्च गृहे यस्य सोऽप्यन्त्यजसमो नरः।<br>भोजयेद्यस्तु विप्रेन्द्रान् मार्जारान् सन्निधौ यदि॥ १५४<br><br>तच्चाण्डालसमं ज्ञेयं नात्र कार्या विचारणा। | जिसके घरमें बिल्ली रहती है, वह चाण्डालके समान होता है। यदि कोई मनुष्य बिल्लीकी सन्निधिमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, तो उसे चाण्डालके समान जानना चाहिये; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १५४ १/२ ॥ |
| स्फिग्वातं शूर्पवातं च वातं प्राणमुखानिलम्॥ १५५<br><br>सुकृतानि हरन्त्येते संस्पृष्टाः पुरुषस्य तु।<br>उष्णीषी कञ्चुकी नग्नो मुक्तकेशो मलावृतः॥ १५६<br><br>अपवित्रकरोऽशुद्धः प्रलपन्न जपेत्क्वचित्। | दूषित वायु, सूपकी वायु और प्राणियोंके मुखसे निकली हुई वायु—इनका सम्पर्क हो जानेपर ये मनुष्यके पुण्योंको नष्ट कर देते हैं। पगड़ी धारण करके, कंचुक पहनकर, नग्न होकर, केशोंको खोलकर, मैलसे युक्त होकर, अपवित्र हाथसे, अशुद्ध होकर तथा बात-चीत करते हुए कभी भी जप नहीं करना चाहिये॥ १५५-१५६ १/२ ॥ |
| क्रोधो मदः क्षुधा तन्द्रा निष्ठीवनविजृम्भणे॥ १५७<br><br>श्वनीचदर्शनं निद्रा प्रलापास्ते जपद्विषः।<br>एतेषां सम्भवे वापि कुर्यात्सूर्यादिदर्शनम्॥ १५८<br><br>आचम्य वा जपेच्छेषं कृत्वा वा प्राणसंयमम्।<br>सूर्योऽग्निश्चन्द्रमाश्चैव ग्रहनक्षत्रतारकाः॥ १५९ | क्रोध, अहंकार, भूख, आलस्य, थूकना, जम्हाई, कुत्ते तथा नीच व्यक्तिका दर्शन, निद्रा तथा वार्तालाप—ये जपके शत्रु हैं; इनके उत्पन्न होनेपर सूर्य आदिका दर्शन करना चाहिये। पुनः आचमन करके अथवा प्राणायाम करके शेष जप करना चाहिये। सूर्य, अग्नि, |