भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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| ४२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एते ज्योतींषि प्रोक्तानि विद्वद्भिर्ब्राह्मणैस्तथा।<br>प्रसार्य पादौ न जपेत्कुकुटासन एव च॥ १६०<br><br>अनासनः शयानो वा रथ्यायां शूद्रसन्निधौ।<br>रक्तभूम्यां च खट्वायां न जपेज्जापकस्तथा॥ १६१<br><br>आसनस्थो जपेत्सम्यक् मन्त्रार्थगतमानसः।<br>कौशेयं व्याघ्रचर्म वा चैलंतौलमथापि वा॥ १६२<br><br>दारवं तालपर्णं वा आसनं परिकल्पयेत्।<br>त्रिसन्ध्यं तु गुरोः पूजा कर्तव्या हितमिच्छता॥ १६३चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, तारे—ये विद्वान् ब्राह्मणोंके द्वारा ज्योतिर्गण कहे गये हैं॥ १५७-१५९<sup></sup>/<sub></sub><br>पैरोंको फैलाकर अथवा कुक्कुट आसनमें बैठकर जप नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार जापकको बिना आसनके, लेटे हुए, मार्गपर, शूद्रके पास, रक्तभूमिपर अथवा चारपाईपर जप नहीं करना चाहिये। आसनपर बैठकर मनमें मन्त्रके अर्थका चिन्तन करते हुए भली-भाँति जप करना चाहिये। रेशमी वस्त्र, व्याघ्रचर्म, वस्त्र, रूई, लकड़ी अथवा ताड़के पत्तेका आसन बनाना चाहिये॥ १६०—१६२<sup></sup>/<sub></sub>
यो गुरुः स शिवः प्रोक्तो यः शिवः स गुरुः स्मृतः।<br>यथा शिवस्तथा विद्या यथा विद्या तथा गुरुः॥ १६४<br><br>शिवविद्या गुरोस्तस्माद्भक्त्या च सदृशं फलम्।<br>सर्वदेवमयो देवि सर्वशक्तिमयो हि सः॥ १६५<br><br>सगुणो निर्गुणो वापि तस्याज्ञां शिरसा वहेत्।<br>श्रेयोऽर्थी यस्तु गुर्वाज्ञां मनसापि न लङ्घयेत्॥ १६६<br><br>गुर्वाज्ञापालकः सम्यक् ज्ञानसम्पत्तिमश्नुते।<br>गच्छंस्तिष्ठन् स्वपन् भुञ्जन् यद्यत्कर्म समाचरेत्॥ १६७<br><br>समक्षं यदि तत्सर्वं कर्तव्यं गुर्वनुज्ञया।<br>गुरोर्देवसमक्षं वा न यथेष्टासनो भवेत्॥ १६८अपना हित चाहनेवालेको तीनों सन्ध्याओंमें गुरुकी पूजा करनी चाहिये। जो गुरु हैं, वे शिव कहे गये हैं और जो शिव हैं, वे गुरु कहे गये हैं। जैसे शिव हैं, वैसे ही विद्या; जैसी विद्या वैसे ही गुरु होते हैं। शिवविद्या उन गुरुसे ही ग्रहण की जा सकती है और भक्तिके द्वारा अनुकूल फल प्राप्त होता है। हे देवि! वे [गुरु] सर्वदेवस्वरूप तथा सर्वशक्तिस्वरूप हैं। गुरु सगुण हों अथवा निर्गुण—उनकी आज्ञाको शिरोधार्य करना चाहिये। जो कल्याणका इच्छुक है, उसे मनसे भी गुरुकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। पूर्णरूपसे गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला [शिष्य] ज्ञानसम्पदा प्राप्त करता है। चलते हुए, बैठते हुए, सोते हुए अथवा खाते हुए [शिष्य] जो भी कर्म यदि गुरुके समक्ष करे, वह समस्त कार्य उनकी आज्ञासे ही करना चाहिये॥ १६३—१६७<sup></sup>/<sub></sub>
गुरुर्देवो यतः साक्षात्तद्गृहं देवमन्दिरम्।<br>पापिनां च यथासङ्गात्तत्पापैः पतनं भवेत्॥ १६९<br><br>तद्वदाचार्यसङ्गेन तद्धर्मफलभाग्भवेत्।<br>यथैव वह्निसम्पर्कान्मलं त्यजति काञ्चनम्॥ १७०<br><br>तथैव गुरुसम्पर्कात्पापं त्यजति मानवः।<br>यथा वह्निसमीपस्थो घृतकुम्भो विलीयते॥ १७१<br><br>तथा पापं विलीयेत आचार्यस्य समीपतः।<br>यथा प्रज्वलितो वह्निर्विष्ठां काष्ठं च निर्दहेत्॥ १७२गुरुदेवके समक्ष इच्छानुसार आसनपर नहीं बैठना चाहिये; क्योंकि गुरु साक्षात् देवता हैं और उनका घर देवमन्दिर है। जिस प्रकार पापियोंकी संगतिके कारण उनके पापोंसे [व्यक्तिका] पतन हो जाता है, उसी प्रकार गुरुकी संगतिसे [व्यक्ति] उनके धर्मफलका भागी होता है। जैसे सुवर्ण अग्निके सम्पर्कसे अपने मैलका त्याग करता है, वैसे ही मनुष्य गुरुके सम्पर्कसे पापका त्याग करता है। जैसे अग्निके समीप स्थित कुम्भका घृत पिघल जाता है, वैसे ही आचार्य (गुरु)-के सम्पर्कसे [मनुष्यका] पाप विलीन हो जाता है। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि मल तथा काष्ठको जला डालती है, उसी प्रकार प्रसन्न
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