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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

| ४२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एते ज्योतींषि प्रोक्तानि विद्वद्भिर्ब्राह्मणैस्तथा।<br>प्रसार्य पादौ न जपेत्कुकुटासन एव च॥ १६०<br><br>अनासनः शयानो वा रथ्यायां शूद्रसन्निधौ।<br>रक्तभूम्यां च खट्वायां न जपेज्जापकस्तथा॥ १६१<br><br>आसनस्थो जपेत्सम्यक् मन्त्रार्थगतमानसः।<br>कौशेयं व्याघ्रचर्म वा चैलंतौलमथापि वा॥ १६२<br><br>दारवं तालपर्णं वा आसनं परिकल्पयेत्।<br>त्रिसन्ध्यं तु गुरोः पूजा कर्तव्या हितमिच्छता॥ १६३चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, तारे—ये विद्वान् ब्राह्मणोंके द्वारा ज्योतिर्गण कहे गये हैं॥ १५७-१५९<sup></sup>/<sub></sub><br>पैरोंको फैलाकर अथवा कुक्कुट आसनमें बैठकर जप नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार जापकको बिना आसनके, लेटे हुए, मार्गपर, शूद्रके पास, रक्तभूमिपर अथवा चारपाईपर जप नहीं करना चाहिये। आसनपर बैठकर मनमें मन्त्रके अर्थका चिन्तन करते हुए भली-भाँति जप करना चाहिये। रेशमी वस्त्र, व्याघ्रचर्म, वस्त्र, रूई, लकड़ी अथवा ताड़के पत्तेका आसन बनाना चाहिये॥ १६०—१६२<sup></sup>/<sub></sub>
यो गुरुः स शिवः प्रोक्तो यः शिवः स गुरुः स्मृतः।<br>यथा शिवस्तथा विद्या यथा विद्या तथा गुरुः॥ १६४<br><br>शिवविद्या गुरोस्तस्माद्भक्त्या च सदृशं फलम्।<br>सर्वदेवमयो देवि सर्वशक्तिमयो हि सः॥ १६५<br><br>सगुणो निर्गुणो वापि तस्याज्ञां शिरसा वहेत्।<br>श्रेयोऽर्थी यस्तु गुर्वाज्ञां मनसापि न लङ्घयेत्॥ १६६<br><br>गुर्वाज्ञापालकः सम्यक् ज्ञानसम्पत्तिमश्नुते।<br>गच्छंस्तिष्ठन् स्वपन् भुञ्जन् यद्यत्कर्म समाचरेत्॥ १६७<br><br>समक्षं यदि तत्सर्वं कर्तव्यं गुर्वनुज्ञया।<br>गुरोर्देवसमक्षं वा न यथेष्टासनो भवेत्॥ १६८अपना हित चाहनेवालेको तीनों सन्ध्याओंमें गुरुकी पूजा करनी चाहिये। जो गुरु हैं, वे शिव कहे गये हैं और जो शिव हैं, वे गुरु कहे गये हैं। जैसे शिव हैं, वैसे ही विद्या; जैसी विद्या वैसे ही गुरु होते हैं। शिवविद्या उन गुरुसे ही ग्रहण की जा सकती है और भक्तिके द्वारा अनुकूल फल प्राप्त होता है। हे देवि! वे [गुरु] सर्वदेवस्वरूप तथा सर्वशक्तिस्वरूप हैं। गुरु सगुण हों अथवा निर्गुण—उनकी आज्ञाको शिरोधार्य करना चाहिये। जो कल्याणका इच्छुक है, उसे मनसे भी गुरुकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। पूर्णरूपसे गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला [शिष्य] ज्ञानसम्पदा प्राप्त करता है। चलते हुए, बैठते हुए, सोते हुए अथवा खाते हुए [शिष्य] जो भी कर्म यदि गुरुके समक्ष करे, वह समस्त कार्य उनकी आज्ञासे ही करना चाहिये॥ १६३—१६७<sup></sup>/<sub></sub>
गुरुर्देवो यतः साक्षात्तद्गृहं देवमन्दिरम्।<br>पापिनां च यथासङ्गात्तत्पापैः पतनं भवेत्॥ १६९<br><br>तद्वदाचार्यसङ्गेन तद्धर्मफलभाग्भवेत्।<br>यथैव वह्निसम्पर्कान्मलं त्यजति काञ्चनम्॥ १७०<br><br>तथैव गुरुसम्पर्कात्पापं त्यजति मानवः।<br>यथा वह्निसमीपस्थो घृतकुम्भो विलीयते॥ १७१<br><br>तथा पापं विलीयेत आचार्यस्य समीपतः।<br>यथा प्रज्वलितो वह्निर्विष्ठां काष्ठं च निर्दहेत्॥ १७२गुरुदेवके समक्ष इच्छानुसार आसनपर नहीं बैठना चाहिये; क्योंकि गुरु साक्षात् देवता हैं और उनका घर देवमन्दिर है। जिस प्रकार पापियोंकी संगतिके कारण उनके पापोंसे [व्यक्तिका] पतन हो जाता है, उसी प्रकार गुरुकी संगतिसे [व्यक्ति] उनके धर्मफलका भागी होता है। जैसे सुवर्ण अग्निके सम्पर्कसे अपने मैलका त्याग करता है, वैसे ही मनुष्य गुरुके सम्पर्कसे पापका त्याग करता है। जैसे अग्निके समीप स्थित कुम्भका घृत पिघल जाता है, वैसे ही आचार्य (गुरु)-के सम्पर्कसे [मनुष्यका] पाप विलीन हो जाता है। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि मल तथा काष्ठको जला डालती है, उसी प्रकार प्रसन्न

अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४२१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गुरुस्तुष्टो दहत्येवं पापं तन्मन्त्रतेजसा।<br>ब्रह्मा हरस्तथा रुद्रो देवाश्च मुनयस्तथा॥ १७३हुए गुरु अपने मन्त्रके तेजसे [शिष्यके] पापको भस्म कर देते हैं॥ १६८–१७२ १/२॥
कुर्वन्त्यनुग्रहं तुष्टा गुरौ तुष्टे न संशयः।<br>कर्मणा मनसा वाचा गुरोः क्रोधं न कारयेत्॥ १७४गुरुके प्रसन्न रहनेपर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सभी देवता तथा मुनि भी [उस व्यक्तिपर] प्रसन्न होकर कृपा करते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। मन, वचन तथा कर्मसे गुरुको क्रोधित नहीं करना चाहिये; उनके क्रोधसे आयु, लक्ष्मी (वैभव), ज्ञान और सत्कर्म दग्ध हो जाते हैं। जो लोग उन्हें कुपित करते हैं, उनके यज्ञ, जप तथा अन्य अनुष्ठान व्यर्थ हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १७३–१७५ १/२॥
तस्य क्रोधेन दह्यन्ते आयुः श्रीर्ज्ञानसत्क्रियाः।<br>तत्क्रोधं ये करिष्यन्ति तेषां यज्ञाश्च निष्फलाः॥ १७५
जपान्द्यनियमश्चैव नात्र कार्या विचारणा।<br>गुरोर्विरुद्धं यद्वाक्यं न वदेत्सर्वयत्नतः॥ १७६पूर्ण प्रयत्नपूर्वक गुरुके विरुद्ध कुछ भी वचन नहीं बोलना चाहिये; यदि कोई अज्ञानवश ऐसा बोलता है, तो वह रौरव नरकमें पड़ता है। हे देवि! मन, धन, वचन तथा कर्मसे गुरुको कभी झूठा सिद्ध नहीं करना चाहिये। उनका दुर्गुण कहनेपर व्यक्ति सौ दुर्गुणोंसे युक्त हो जाता है और उनका गुण कहनेपर सभी गुणोंका फल मिलता है। गुरुने आदेश दिया हो अथवा नहीं, सर्वदा उनका हित तथा प्रिय करना चाहिये; गुरु सामने हों अथवा परोक्षमें हों, उनका कार्य करना चाहिये। मन, वचन, शरीर तथा कर्मसे गुरुका हित तथा प्रिय करना चाहिये। ऐसा न करनेवाला नरकमें गिरता है और वहाँ जाकर वहींपर विचरण करता रहता है। अतः सर्वदा उनकी उपासना तथा वन्दना करनी चाहिये। पास रहते हुए भी गुरुसे आज्ञा लेकर तथा उनकी ओर मुख न करके बोलना चाहिये। ऐसा आचारवान्, भक्ति-सम्पन्न, नित्य जप करनेवाला तथा गुरुका प्रिय करनेवाला [शिष्य] इस मन्त्रका विनियोग करनेके योग्य होता है॥ १७६–१८२ १/२॥
वदेद्यदि महामोहाद्रौरवं नरकं व्रजेत्।<br>चित्तेनैव च वित्तेन तथा वाचा च सुव्रताः*॥ १७७
मिथ्या न कारयेद्देवि क्रियया च गुरोः सदा।<br>दुर्गुणे ख्यापिते तस्य नैर्गुण्यशतभागभवेत्॥ १७८
गुणे तु ख्यापिते तस्य सार्वगुण्यफलं भवेत्।<br>गुरोर्हितं प्रियं कुर्यादादिष्टो वा न वा सदा॥ १७९
असमक्षं समक्षं वा गुरोः कार्यं समाचरेत्।<br>गुरोर्हितं प्रियं कुर्यान्मनोवाक्कायकर्मभिः॥ १८०
कुर्वन् पतत्यधो गत्वा तत्रैव परिवर्तते।<br>तस्मात्स सर्वदोपास्यो वन्दनीयश्च सर्वदा॥ १८१
समीपस्थोऽप्यनुज्ञाप्य वदेत्तद्विमुखो गुरुम्।<br>एवमाचारवान् भक्तो नित्यं जपपरायणः॥ १८२
गुरुप्रियकरो मन्त्रं विनियोक्तुं ततोऽर्हति।<br>विनियोगं प्रवक्ष्यामि सिद्धमन्त्रप्रयोजनम्॥ १८३[हे देवि!] अब मैं सिद्धमन्त्रके प्रयोजनस्वरूप विनियोगको बताऊँगा; विनियोग न जाननेवालेका वह मन्त्र प्रभावहीन हो जाता है। जिसका जिस कार्यके साथ विशेष रूपसे संयोजन किया जाय, उसे विनियोग कहा गया है। यह इस लोकमें तथा परलोकमें फल प्रदान करता है। विनियोगसे आयु, आरोग्य, शरीरकी नित्यता, राज्य, ऐश्वर्य, उत्तम ज्ञान, स्वर्ग तथा मोक्ष—ये सब
दौर्बल्यं याति तन्मन्त्रं विनियोगमजानतः।<br>यस्य येन वियुञ्जीत कार्येण तु विशेषतः॥ १८४
विनियोगः स विज्ञेय ऐहिकामुष्मिकं फलम्।<br>विनियोगजमायुष्यमारोग्यं तनुनित्यता॥ १८५
राज्यैश्वर्यं च विज्ञानं स्वर्गो निर्वाण एव च।<br>प्रोक्षणं चाभिषेकं च अघमर्षणमेव च॥ १८६

* सुव्रताः—यह सम्बोधन सूतजीद्वारा ऋषियोंके लिये प्रयुक्त है।

४३०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्नाने च सन्ध्ययोश्चैव कुर्यादेकादशेन वै।<br>शुचिः पर्वतमारुह्य जपेल्लक्षमन्द्वितः॥ १८७<br><br>महानद्यां द्विलक्षं तु दीर्घमायुरवाप्नुयात्।<br>दूर्वाङ्कुरास्तिला वाणी गुडूची घुटिका तथा॥ १८८प्राप्त होते हैं॥ १८३-१८४ १/२॥<br><br>स्नानमें तथा [प्रातः-सायं] दोनों सन्ध्याओंमें ग्यारह बार पंचाक्षरमन्त्रसे प्रोक्षण, अभिषेक तथा अघमर्षण करना चाहिए। जो शुद्ध होकर पर्वतपर चढ़कर आलस्यरहित हो एक लाख बार मन्त्रका जप करता है अथवा किसी महानदीके तटपर दो लाख बार जप करता है, वह दीर्घ आयु प्राप्त करता है॥ १८६-१८७ १/२॥
तेषां तु दशसाहस्रं होममायुष्यवर्धनम्।<br>अश्वत्थवृक्षमाश्रित्य जपेल्लक्षद्वयं सुधीः॥ १८९<br><br>शनैश्चरदिने स्पृष्ट्वा दीर्घायुष्यं लभेन्नरः।<br>शनैश्चरदिनेऽश्वत्थं पाणिभ्यां संस्पृशेत्सुधीः॥ १९०दूर्वांकुर, तिल, वाणी, गुरुच और घुटिका—इनका दस हजार होम आयुकी वृद्धि करनेवाला होता है। बुद्धिमान्‌को चाहिये कि पीपलके वृक्षका आश्रय लेकर दो लाख जप करे। शनिवारको पीपल वृक्षका स्पर्श करके मनुष्य दीर्घ आयु प्राप्त करता है। बुद्धिमान्‌को शनैश्चरके दिन [अपने] दोनों हाथोंसे पीपलके वृक्षका स्पर्श करना चाहिये और एक सौ आठ बार [मन्त्रका] जप करना चाहिये; यह भी अकाल मृत्युको दूर करनेवाला होता है॥ १८८-१९० १/२॥
जपेदष्टोत्तरशतं सोऽपमृत्युहरो भवेत्।<br>आदित्याभिमुखो भूत्वा जपेल्लक्षमनन्यधीः॥ १९१<br><br>अर्कैरष्टशतं नित्यं जुह्वन् व्याधेर्विमुच्यते।<br>समस्तव्याधिशान्त्यर्थं पलाशसमिधैर्नरः॥ १९२<br><br>हुत्वा दशसहस्रं तु निरोगी मनुजो भवेत्।<br>नित्यमष्टशतं जप्त्वा पिबेदम्भोऽर्कसन्निधौ॥ १९३सूर्यकी ओर मुख करके एकाग्रचित्त होकर एक लाख जप करना चाहिये; अर्ककी समिधाओंसे प्रतिदिन एक सौ आठ होम करनेवाला [व्यक्ति] रोगसे मुक्त हो जाता है। मनुष्यको समस्त रोगोंके शमनके लिये पलाश-समिधाओंसे होम करना चाहिये; इससे दस हजार होम करके मनुष्य रोगरहित हो जाता है। प्रतिदिन एक सौ आठ बार जप करके सूर्यके समक्ष जल पीना चाहिये; ऐसा करनेवाला एक महीनेमें ही सभी उदर-सम्बन्धी रोगोंसे मुक्त हो जाता है॥ १९१-१९३ १/२॥
औदर्यैर्व्याधिभिः सर्वैर्मासैनेकेन मुच्यते।<br>एकादशेन भुञ्जीयादन्नं चैवाभिमन्त्रितम्॥ १९४<br><br>भक्ष्यं चान्यत्तथा पेयं विषमप्यमृतं भवेत्।<br>जपेल्लक्षं तु पूर्वाह्ने हुत्वा चाष्टशतेन वै॥ १९५<br><br>सूर्यं नित्यमुपस्थाय सम्यगारोग्यमाप्नुयात्।<br>नदीतोयेन सम्पूर्णं घटं संस्पृश्य शोभनम्॥ १९६<br><br>जप्त्वायुतं च तत्स्नानाद्रोगाणां भेषजं भवेत्।ग्यारह बार मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके अन्न तथा अन्य भक्ष्य-पेय पदार्थ ग्रहण करना चाहिये; इससे विष भी अमृत हो जाता है। प्रतिदिन पूर्वाह्नमें एक सौ आठ आहुति देकर तथा सूर्योपस्थान करके एक लाख जप करना चाहिये; ऐसा करनेवाला पूर्ण आरोग्य प्राप्त करता है। नदीके जलसे भरे हुए सुन्दर घड़ेको स्पर्श करते हुए दस हजार जप करनेसे तथा उसी जलसे स्नान करनेसे सभी रोगोंकी चिकित्सा हो जाती है॥ १९४-१९६ १/२॥
अष्टाविंशज्जपित्वान्नमश्नीयादन्वहं शुचिः॥ १९७<br><br>हुत्वा च तावत्पालाशैरेवं वारोग्यमश्नुते।<br>चन्द्रसूर्यग्रहे पूर्वमुपोष्य विधिना शुचिः॥ १९८पवित्र होकर प्रतिदिन अट्ठाईस बार [मन्त्रका] जप करके अन्न ग्रहण करना चाहिये और बादमें उतनी

अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा [४३१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यावद्ग्रहणमोक्षं तु तावन्नद्यां समाहितः।<br>जपेत्समुद्रगामिन्यां विमोक्षे ग्रहणस्य तु॥ १९९<br><br>अष्टोत्तरसहस्रेण पिबेद् ब्राह्मीरसं द्विजाः।<br>ऐहिकां लभते मेधां सर्वशास्त्रधरां शुभाम्॥ २००ही पलाश-समिधाओंसे हवन करनेसे [व्यक्ति] आरोग्य प्राप्त करता है। चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहणके अवसरपर पवित्र होकर विधिपूर्वक उपवास करके जबतक ग्रहणका मोक्ष हो, तबतक किसी समुद्रगामिनी नदीमें एकाग्रचित्त होकर जप करना चाहिये और हे द्विजो! ग्रहणके समाप्त होनेपर एक हजार आठ मन्त्रका जप करके ब्राह्मीरसका पान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला सभी शास्त्रोंको धारण करनेवाली कल्याणमयी लौकिक प्रतिभा प्राप्त करता है और उसकी वाणी अतिमानुषी होकर देवी सरस्वतीकी वाणीके तुल्य हो जाती है॥ १९७-२०० १/२॥
सारस्वती भवेद्देवी तस्य वागतिमानुषी।<br>ग्रहनक्षत्रपीडासु जपेद्भक्त्यायुतं नरः॥ २०१<br><br>हुत्वा चाष्टसहस्रं तु ग्रहपीडां व्यपोहति।<br>दुःस्वप्नदर्शने स्नात्वा जपेद्वै चायुतं नरः॥ २०२ग्रह तथा नक्षत्रके कारण कष्ट होनेपर मनुष्य भक्तिपूर्वक दस हजार जप करके तथा आठ हजार आहुति देकर ग्रहपीडासे मुक्त हो जाता है। दुःस्वप्न देखनेपर स्नान करके मनुष्यको दस हजार जप करना चाहिये; इसके बाद घृतकी एक सौ आठ आहुति देनेसे उसे शीघ्र ही शान्ति प्राप्त होगी॥ २०१-२०२ १/२॥
घृतेनाष्टशतं हुत्वा सद्यः शान्तिर्भविष्यति।<br>चन्द्रसूर्यग्रहे लिङ्गं समभ्यर्च्य यथाविधि॥ २०३<br><br>यत्किञ्चित्प्रार्थयेद्देवि जपेदयुतमादरात्।<br>सन्निधावस्य देवस्य शुचिः संयतमानसः॥ २०४चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहणके समय विधिपूर्वक लिङ्गका पूजन करके शुद्ध तथा एकाग्रचित्त होकर इन महादेवके समीप आदरपूर्वक दस हजार जप करना चाहिये; हे देवि! वह मनुष्य जो कुछ भी माँगता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २०३-२०४ १/२॥
सर्वान् कामानवाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः।<br>गजानां तुरगाणां तु गोजातीनां विशेषतः॥ २०५<br><br>व्याध्यागमे शुचिर्भूत्वा जुहुयात्समिधाहुतिम्।<br>मासमभ्यर्च्य विधिनायुतं भक्तिसमन्वितः॥ २०६हाथियों, घोड़ों तथा विशेषकर गोजातिके पशुओंमें रोग उत्पन्न होनेपर शुद्ध होकर तथा भक्तियुक्त होकर विधिपूर्वक महीनेभर पूजन करके समिधाकी दस हजार आहुति देनेसे उन पशुओंके रोगकी शान्ति तथा उनकी वृद्धि होती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २०५-२०६ १/२॥
तेषामृद्धिश्च शान्तिश्च भविष्यति न संशयः।<br>उत्पाते शत्रुबाधायां जुहुयादयुतं शुचिः॥ २०७<br><br>पालाशसमिधैर्देवि तस्य शान्तिर्भविष्यति।<br>आभिचारिकबाधायामेतद्देवि समाचरेत्॥ २०८हे देवि! उपद्रव तथा शत्रुबाधा उत्पन्न होनेपर जो [व्यक्ति] पवित्र होकर पलाशकी समिधाओंसे दस हजार होम करता है; उसकी शान्ति होती है। हे देवि! आभिचारिक बाधामें भी ऐसा ही करना चाहिये; ऐसा करनेसे उसकी शक्ति प्रकट होती है और शत्रुको पीड़ा उत्पन्न होती है।
प्रत्यग् भवति तच्छक्तिः शत्रोः पीडा भविष्यति।<br>विद्वेषणार्थं जुहुयाद् वैभीतसमिधाष्टकम्॥ २०९<br><br>अक्षरप्रातिलोम्येन आर्द्रेण रुधिरेण वा।<br>विषेण रुधिराभ्यक्तो विद्वेषणकरं नृणाम्॥ २१०विद्वेषणके लिये बहेड़ेकी समिधाओंसे आठ आहुति डालनी चाहिये; अथवा रुधिरसे स्नान करके विपरीत अक्षरसे मन्त्रका जप करते हुए गीले
४३२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रायश्चित्तं प्रवक्ष्यामि सर्वपापविशुद्धये।<br>पापशुद्ध्यर्था सम्यक् कर्तुमभ्युद्यतो नरः ॥ २११<br><br>पापशुद्ध्यर्थतः सम्यग् ज्ञानसम्पत्तिहेतुकी।<br>पापशुद्धिर्न चेत्पुंसः क्रियाः सर्वाश्च निष्फलाः ॥ २१२<br><br>ज्ञानं च हीयते तस्मात्कर्तव्यं पापशोधनम्।रक्तसे या विषसे होम करना चाहिये; यह मनुष्योंके लिये विद्वेषणकारी है॥ २०७-२१०॥<br><br>[हे देवि!] अब मैं समस्त पापोंसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्तका वर्णन करूँगा। मनुष्यको पापशुद्धि करनेहेतु पूर्णरूपसे प्रयत्नशील होना चाहिये; क्योंकि सम्यक् पापशुद्धि ज्ञान-सम्पदाका मूल कारण होती है। यदि पापशुद्धि नहीं होती है, तो मनुष्यकी सभी क्रियाएँ व्यर्थ हो जाती हैं और उसका ज्ञान क्षीण होता रहता है, इसलिये पापका शोधन [अवश्य] करना चाहिये॥ २११-२१२ १/२ ॥
विद्यालक्ष्मीविशुद्ध्यर्थं मां ध्यात्वाञ्जलिना शुभे ॥ २१३<br><br>शिवेनैकादशेनाद्भिर्भिषिञ्चेत्समन्ततः ।<br>अष्टोत्तरशतेनैव स्नायात्पापविशुद्धये ॥ २१४<br><br>सर्वतीर्थफलं तच्च सर्वपापहरं शुभम्।<br>सन्ध्योपासनविच्छेदे जपेदष्टशतं नरः ॥ २१५<br><br>विड्वराहैश्च चाण्डालैर्दुर्जनैः कुक्कुटैरपि।<br>स्पृष्टमन्नं न भुञ्जीत भुक्त्वा चाष्टशतं जपेत् ॥ २१६हे शुभे! विद्या तथा लक्ष्मीकी विशुद्धिके लिये अंजलिमें जल लेकर मेरा ध्यान करके ग्यारह बार शिव-मन्त्रका जप करके उस जलसे अभिषेक करना चाहिये। पाप-शोधनके लिये एक सौ आठ बार मन्त्रका जप करके स्नान करना चाहिये; यह सभी तीर्थोंका फल देनेवाला, सभी पापोंको दूर करनेवाला तथा कल्याणकारक है। सन्ध्योपासनके छूट जानेपर मनुष्यको एक सौ आठ बार मन्त्रका जप करना चाहिये। सुअर, चाण्डाल, दुर्जन तथा कुक्कुटका स्पर्श किया हुआ अन्न नहीं खाना चाहिये और खा लेनेपर एक सौ आठ बार मन्त्रका जप करना चाहिये॥ २१३-२१६॥
ब्रह्महत्याविशुद्ध्यर्थं जपेल्लक्षायुतं नरः ।<br>पातकानां तदर्धं स्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥ २१७<br><br>उपपातकदुष्टानां तदर्धं परिकीर्तितम्।<br>शेषाणामपि पापानां जपेत्पञ्चसहस्रकम् ॥ २१८ब्रह्महत्याके शोधनके लिये मनुष्यको सौ हजार करोड़ बार मन्त्रका जप करना चाहिये, अन्य बड़े पापोंके शोधनके लिये उसका आधा जप होना चाहिये; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। उपपातक शोधनके लिये उसका आधा जप करना बताया गया है। शेष [छोटे] पापोंकी शुद्धिके लिये भी पाँच हजार बार मन्त्रको जपना चाहिये॥ २१७-२१८॥
आत्मबोधपरं गुह्यं शिवबोधप्रकाशकम्।<br>शिवः स्यात्स जपेन्मन्त्रं पञ्चलक्षमनाकुलः ॥ २१९<br><br>पञ्चवायुजयं भद्रे प्राप्नोति मनुजः सुखम्।<br>जपेच्च पञ्चलक्षं तु विगृहीतेन्द्रियः शुचिः ॥ २२०<br><br>पञ्चेन्द्रियाणां विजयो भविष्यति वरानने।<br>ध्यानयुक्तो जपेद्यस्तु पञ्चलक्षमनाकुलः ॥ २२१जो शान्त होकर आत्मबोध करानेवाले, गोपनीय तथा शिवज्ञानको प्रकाशित करनेवाले इस मन्त्रका पाँच लाख जप करता है, वह [साक्षात्] शिव हो जाता है और हे भद्रे! वह मनुष्य सुखपूर्वक पाँचों वायुपर विजय प्राप्त कर लेता है। हे सुमुखि! जो शुद्ध होकर इन्द्रियोंको वशमें करके पाँच लाख मन्त्र जप करता है, वह पाँचों

अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४३३


श्लोकअर्थ
विषयाणां च पञ्चानां जयं प्राप्नोति मानवः।<br>चतुर्थं पञ्चलक्षं तु यो जपेद्भक्तिसंयुतः॥ २२२इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर लेता है। जो शान्त होकर ध्यानमग्न हो पाँच लाख बार मन्त्रका जप करता है, वह पाँचों विषयोंपर विजय प्राप्त करता है। जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर चौथी बार इस मन्त्रको पाँच लाख बार जपता है, वह इस लोकमें [पृथ्वी आदि] पंचभूतोंपर विजय प्राप्त कर लेता है॥ २१९—२२२ १/२ ॥
भूतानामिह पञ्चानां विजयं मनुजो लभेत्।<br>चतुर्लक्षं जपेद्यास्तु मनः संयम्य यत्नतः॥ २२३<br><br>सम्यग्विजयमाप्नोति करणानां वरानने।<br>पञ्चविंशतिलक्षाणां जपेन कमलानने॥ २२४<br><br>पञ्चविंशतितत्त्वानां विजयं मनुजो लभेत्।<br>मध्यरात्रेति निर्वाते जपेदयुतमादरात्॥ २२५<br><br>ब्रह्मसिद्धिमवाप्नोति व्रतेनानेन सुन्दरि।<br>जपेल्लक्षमनालस्यो निर्वाते ध्वनिवर्जिते॥ २२६<br><br>मध्यरात्रे च शिवयोः पश्यत्येव न संशयः।<br>अन्धकारविनाशश्च दीपस्येव प्रकाशनम्॥ २२७<br><br>हृदयान्तर्बहिर्वापि भविष्यति न संशयः।<br>सर्वसम्पत्समुद्ध्यर्थं जपेदयुतमात्मवान्॥ २२८<br><br>सबीजसम्पुटं मन्त्रं शतलक्षं जपेच्छुचिः।<br>मत्सायुज्यमवाप्नोति भक्तिमान् किमतः परम्॥ २२९हे वरानने! जो [अपने] मनको नियन्त्रित करके प्रयत्नपूर्वक चार लाख बार मन्त्रका जप करता है, वह [मन, बुद्धि आदि] अन्तःकरणोंपर पूर्णरूपसे विजय प्राप्त कर लेता है। हे कमलमुखि! पचीस लाख बार मन्त्रके जपसे मनुष्य पचीस तत्त्वोंपर विजय प्राप्त कर लेता है। हे सुन्दरि! जो मध्यरात्रिमें वातरहित स्थानमें आदरपूर्वक दस हजार जप करता है, वह इस व्रतके द्वारा ब्रह्मसिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो [मनुष्य] आलस्यरहित होकर मध्यरात्रिमें वातशून्य तथा ध्वनिरहित स्थानमें एक लाख बार जप करता है, वह शिव तथा पार्वतीका दर्शन कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है। उस समय अन्धकारका विनाश हो जाता है और हृदयके बाहर तथा भीतर दीपककी भाँति प्रकाश हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। आत्मज्ञको सभी प्रकारकी सम्पदा तथा समृद्धिके लिये मन्त्रका दस हजार जप करना चाहिये। [हे देवि!] जो पवित्र तथा भक्तियुक्त होकर बीजके सम्पुटसहित मन्त्रका सौ लाख (एक करोड़) जप करता है, वह मेरा सायुज्य प्राप्त कर लेता है; इससे बढ़कर [फल] क्या हो सकता है!॥ २२३—२२९॥
इति ते सर्वमाख्यातं पञ्चाक्षरविधिक्रमम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि स याति परमां गतिम्॥ २३०<br><br>श्रावयेच्च द्विजाञ्छुद्धान् पञ्चाक्षरविधिक्रमम्।<br>दैवे कर्मणि पित्र्ये वा शिवलोके महीयते॥ २३१[हे देवि!] मैंने तुम्हें पंचाक्षरमन्त्रके जपकी सम्पूर्ण विधि बता दी। जो इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह परम गति प्राप्त करता है। जो देवकर्म अथवा पितृकर्ममें शुद्ध ब्राह्मणोंको पंचाक्षर विधिके क्रमका श्रवण कराता है, वह शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ २३०-२३१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चाक्षरमाहात्म्यं नाम पञ्चाशीतितमोऽध्यायः॥ ८५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पंचाक्षरमाहात्म्य' नामक पचासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८५॥

८६- पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा

४३४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग ]


छियासीवाँ अध्याय

पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>जपाच्छ्रेष्ठतमं प्राहुर्ब्राह्मणा दग्धकिल्बिषाः।<br>विरक्तानां प्रबुद्धानां ध्यानयज्ञं सुशोभनम्॥ १<br><br>तस्माद्वदस्व सूताद्य ध्यानयज्ञमशेषतः।<br>विस्तरात्सर्वयत्नेन विरक्तानां महात्मनाम्॥ २**ऋषिगण बोले—**दग्ध पापवाले ब्राह्मणोंने विरक्त ज्ञानियोंके उत्तम ध्यानयज्ञको जपसे श्रेष्ठ कहा है; अतः हे सूतजी! अब आप विरक्त महात्माओंके ध्यानयज्ञके विषयमें पूर्णरूपसे विस्तारपूर्वक पूर्णप्रयत्नके साथ [हमलोगोंको] बताइये॥ १-२॥
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा मुनीनां दीर्घसत्रिणाम्।<br>रुद्रेण कथितं प्राह गुहां प्राप्य महात्मनाम्॥ ३<br><br>संहृत्य कालकूटाख्यं विषं वै विश्वकर्मणा।दीर्घ कालतक यज्ञ करनेवाले उन ऋषियोंका वचन सुनकर सूतजीने वह सारा वृत्तान्त कहा, जिसे विश्वकी रचना करनेवाले रुद्रने कालकूट नामक विषको निष्क्रिय करके [मेरुपर्वतकी] गुफामें आकर महात्माओंको बताया था॥ ३ १/२॥
सूत उवाच<br>गुहां प्राप्य सुखासीनं भवान्या सह शङ्करम्॥ ४<br><br>मुनयः संशितात्मानः प्रणेमुस्तं गुहाश्रयम्।<br>अस्तुवंश्च ततः सर्वे नीलकण्ठमुमापतिम्॥ ५<br><br>अत्युग्रं कालकूटाख्यं संहृतं भगवंस्त्वया।<br>अतः प्रतिष्ठितं सर्वं त्वया देव वृषध्वज॥ ६सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] गुफामें पहुँचकर पार्वतीके साथ सुखपूर्वक बैठे हुए उन शंकरको महात्मा मुनियोंने प्रणाम किया। उसके बाद उन सभीने गुफामें विराजमान उमापति [भगवान्] नीलकण्ठकी स्तुति की और कहा—हे भगवन्! आपने अति भयंकर कालकूट नामक विषको निष्क्रिय कर दिया; अतः हे देव! हे वृषध्वज! आपके द्वारा ही सब कुछ प्रतिष्ठित है॥ ४-६॥
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा भगवान्नीललोहितः।<br>प्रहसन् प्राह विश्वात्मा सनन्दनपुरोगमान्॥ ७<br><br>किमनेन द्विजश्रेष्ठा विषं वक्ष्ये सुदारुणम्।<br>संहरेत्तद्विषं यस्तु स समर्थो ह्यनेन किम्॥ ८<br><br>न विषं कालकूटाख्यं संसारो विषमुच्यते।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन संहरेत सुदारुणम्॥ ९उनका वह वचन सुनकर विश्वात्मा भगवान् नीललोहित सनन्दन आदि [मुनियों]-से हँसते हुए कहने लगे—हे श्रेष्ठ द्विजो! यह [विष] क्या है! मैं अति भयंकर विषके विषयमें बताऊँगा, जो इस [कालकूट] विषको भी निष्क्रिय कर देता है, वह [परम] समर्थ है; यह कालकूट विष कौन-सी चीज है। कालकूट नामक विष [वास्तवमें] विष नहीं है, बल्कि संसार ही विष कहा जाता है। अतः पूर्ण प्रयत्नसे इस संसाररूपी अत्यन्त भीषण विषको नष्ट करना चाहिये अर्थात् संसारमें मिथ्यात्वका भाव रखना चाहिये॥ ७-९॥
संसारो द्विविधः प्रोक्तः स्वाधिकारानुरूपतः।<br>पुंसां सम्मूढचित्तानामसङ्क्षीणः सुदारुणः॥ १०अपने अधिकारके अनुसार यह संसार दो प्रकारका कहा गया है; मूढ़चित्तवाले मनुष्योंके लिये यह असंक्षीण (क्षय न होनेवाला) तथा अत्यन्त भयंकर है। हे सुव्रतो!
ईषणारागदोषेण सर्गो ज्ञानेन सुव्रताः।<br>तद्वशादेव सर्वेषां धर्माधर्मौ न संशयः॥ ११यह सृष्टि इच्छा तथा रागजनित दोषके कारण है; इसका
अध्याय ८६ ]पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा४३५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
असन्निकृष्टे त्वर्थेऽपि शास्त्रं तच्छ्रवणात्सताम्।<br>बुद्धिमुत्पादयत्येव संसारे विदुषां द्विजाः॥ १२<br><br>तस्माद् दृष्टानुश्रविकं दुष्टमित्युभयात्मकम्।<br>सन्त्यजेत्सर्वयत्नेन विरक्तः सोऽभिधीयते॥ १३ज्ञान होनेपर संसार बाधित हो जाता है। उन्हीं (ईषणा और ज्ञान)-के वशमें होनेसे ही सभी लोगोंकी धर्म तथा अधर्ममें प्रवृत्ति होती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ १०-११॥<br><br>हे ब्राह्मणो! पारलौकिक पदार्थके प्रत्यक्ष न रहनेपर भी शास्त्रके द्वारा उसके विषयमें श्रवण कर लेनेसे उसमें सज्जनों तथा विद्वानोंकी प्रवृत्ति हो जाती है। अतः जो इहलौकिक तथा पारलौकिक—इन दोनों पदार्थोंको हेय समझकर पूर्ण प्रयत्नसे इनका परित्याग कर देता है; वह विरक्त कहा जाता है॥ १२-१३॥
शास्त्रमित्युच्यतेऽभागं श्रुतेः कर्मसु तद् द्विजाः।<br>मूर्धानं ब्रह्मणः सारं ऋषीणां कर्मणः फलम्॥ १४हे द्विजो! श्रुतिप्रतिपादित सकाम कर्मोंमें, जिसमें सबकी प्रवृत्ति है तथा वेदके मस्तकस्वरूप एवं मन्त्र-द्रष्टा ऋषियोंके सारस्वरूप निष्कामकर्मफलको प्रतिपादित करनेवाला जो अध्यात्मशास्त्र है, वही शास्त्र कहा जाता है॥ १४॥
ननु स्वभावः सर्वेषां कामो दृष्टो न चान्यथा।<br>श्रुतिः प्रवर्तिका तेषामिति कर्मण्यतद्विदः॥ १५जो श्रुतिके रहस्यको नहीं जानते हैं, वे ही ऐसा कहते हैं कि चूँकि सभी लोगोंका स्वभाव कामनामूलक दिखायी देता है, अतः श्रुति सकामकर्मकी ही प्रवर्तिका है॥ १५॥
निवृत्तिलक्षणो धर्मः समर्थनामिहोच्यते।<br>तस्मादज्ञानमूलो हि संसारः सर्वदेहिनाम्॥ १६<br><br>कला संशोषमायाति कर्मणान्यस्वभावतः।<br>सकलस्त्रिविधो जीवो ज्ञानहीनस्त्वविद्यया॥ १७वास्तविक रूपमें विरक्त जनोंके लिये निष्कामकर्मका प्रतिपादन करनेमें ही श्रुतिका तात्पर्य है, अतः सभी देहधारियोंके लिये संसार अज्ञानमूलक है। वेदोक्त निष्कामकर्मके द्वारा जीवभाव क्षीण होता है। अविद्यासे उत्पन्न जो अज्ञान है, उसके कारण सकामकर्मके वशीभूत तीन प्रकारका जीवभाव दृढ़ होता है॥ १६-१७॥
नारकी पापकृत्स्वर्गी पुण्यकृत्पुण्यगौरवात्।<br>व्यतिमिश्रेण वै जीवश्चतुर्धा संव्यवस्थितः॥ १८<br><br>उद्बिज्जः स्वेदजश्चैव अण्डजो वै जरायुजः।<br>एवं व्यवस्थितो देही कर्मणाज्ञो ह्यनिर्वृतः॥ १९पापकर्म करनेवाला नारकी होता है, पुण्यकर्म करनेवाला अपने पुण्यकी महिमाके कारण स्वर्गी होता है और पाप-पुण्यकर्मके मिश्रणवाला जीव उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज तथा जरायुज—इन चार रूपोंमें व्यवस्थित होता है। इस प्रकारसे व्यवस्थित वह अज्ञानी जीव अपने कर्मके कारण [संसारचक्रसे] मुक्त नहीं हो पाता है॥ १८-१९॥
प्रजया कर्मणा मुक्तिर्धनेन च सतां न हि।<br>त्यागेनैकेन मुक्तिः स्यात्तदभावाद् भ्रमत्यसौ॥ २०सन्तान, कर्म तथा धनसे सज्जनोंकी मुक्ति नहीं होती है; एकमात्र त्यागके द्वारा ही मुक्ति प्राप्त होती है और उसके अभावके कारण यह जीव भ्रमण करता रहता है। इस प्रकार अज्ञानके दोषके कारण तथा अनेक
एवमज्ञानदोषेण नानाकर्मवशेन च।<br>षट्कौशिकं समुद्भूतं भजत्येष कलेवरम्॥ २१
४३६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| गर्भे दुःखान्यनेकानि योनिमार्गे च भूतले।<br>कौमारे यौवने चैव वार्धके मरणेऽपि वा॥ २२<br><br>विचारतः सतां दुःखं स्त्रीसंसर्गादिभिर्द्विजाः।<br>दुःखेनैकेन वै दुःखं प्रशाम्यन्तीह दुःखिनः॥ २३<br><br>न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।<br>हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्धते॥ २४ | कर्मोंके वशीभूत होनेके कारण यह जीव छः कोशों (स्नायु, अस्थि, मज्जा, त्वचा, मांस, रक्त)-से निर्मित इस शरीरको धारण करता है॥ २०-२१॥<br><br>गर्भमें, योनिमार्गमें, पृथ्वीतलपर, कुमारावस्थामें, युवावस्थामें, वृद्धावस्थामें और मृत्युके समय प्राणीको अनेक दुःख होते हैं। हे द्विजो! विचारपूर्वक देखा जाय तो स्त्रीसंसर्ग आदिसे ही सज्जनोंको दुःख उत्पन्न होता है; वे एक दुःखसे दूसरे दुःखको शान्त करना चाहते हैं और दुःखी होते रहते हैं। विषयोंके उपभोगसे कामकी शान्ति कभी नहीं होती है; जैसे हविसे अग्नि बढ़ती है, वैसे ही वह [वासना] निरन्तर बढ़ती ही जाती है॥ २२-२४॥ | | तस्माद्विचारतो नास्ति संयोगादपि वै नृणाम्।<br>अर्थानामर्जनेऽप्येवं पालने च व्यये तथा॥ २५<br><br>पैशाचे राक्षसे दुःखं याक्षे चैव विचारतः।<br>गान्धर्वे च तथा चान्द्रे सौम्यलोके द्विजोत्तमाः॥ २६<br><br>प्राजापत्ये तथा ब्राह्मे प्राकृते पौरुषे तथा।<br>क्षयसातिशयाद्यैस्तु दुःखैर्दुःखानि सुव्रताः॥ २७<br><br>तानि भाग्यान्यशुद्धानि सन्त्यजेच्च धनानि च।<br>तस्मादष्टगुणं भोगं तथा षोडशधा स्थितम्॥ २८<br><br>चतुर्विंशत्प्रकारेण संस्थितं चापि सुव्रताः।<br>द्वात्रिंशद्भेदमनघाश्चत्वारिंशद्गुणं पुनः॥ २९<br><br>तथाष्टचत्वारिंशच्च षट्पञ्चाशत्प्रकारतः।<br>चतुःषष्टिविधं चैव दुःखमेव विवेकिनः॥ ३० | अतः विचार किया जाय तो मनुष्योंको विषयोंके प्राप्त होनेपर भी सुख नहीं प्राप्त होता है। धनके अर्जनमें, उसकी सुरक्षा करनेमें तथा व्ययमें भी दुःख है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! विचार करनेपर देखा जाय, तो पिशाचलोक, राक्षसलोक, यक्षलोक, गन्धर्वलोक, चन्द्रलोक, बुधलोक, प्रजापतिलोक, ब्राह्मलोक और प्रकृतिलोक तथा पुरुषलोकमें भी भोगोंके नाशकी सम्भावनासे तथा एक-दूसरेसे श्रेष्ठ होनेके कारण ईर्ष्याजन्य दुःखोंसे वे भी दुःखी ही रहते हैं। अतः हे सुव्रतो! भाग्यसे प्राप्त अशुद्ध भोगों तथा अशुद्ध धनोंका त्याग कर देना चाहिये; हे सुव्रतो! चाहे वह भोग (सुख) आठ प्रकारका हो, अथवा सोलह प्रकारका हो, अथवा चौबीस प्रकारका हो, अथवा बत्तीस प्रकारका हो, अथवा चालीस प्रकारका हो, अथवा अड़तालीस प्रकारका हो, अथवा छप्पन प्रकारका हो अथवा चौंसठ प्रकारका हो, * विवेकयुक्त व्यक्तिके लिये भोग दुःखरूप ही होता है॥ २५-३०॥ | | पार्थिवं च तथाप्यं च तैजसं च विचारतः।<br>वायव्यं च तथा व्योम मानसं च यथाक्रमम्॥ ३१<br><br>आभिमानिकमप्येवं बौद्धं प्राकृतमेव च।<br>दुःखमेव न सन्देहो योगिनां ब्रह्मवादिनाम्॥ ३२<br><br>गौणं गणेश्वराणां च दुःखमेव विचारतः।<br>आदौ मध्ये तथा चान्ते सर्वलोकेषु सर्वदा॥ ३३ | विचार किया जाय तो पृथ्वीसम्बन्धी, जलसम्बन्धी, अग्निसम्बन्धी, वायुसम्बन्धी, आकाशसम्बन्धी, मनसम्बन्धी, अहंकारसम्बन्धी, बुद्धिसम्बन्धी तथा प्रकृतिसम्बन्धी भोग भी ब्रह्मवादी योगियोंके लिये दुःख ही हैं; इसमें सन्देह नहीं है। विचारपूर्वक देखा जाय, तो गणेश्वरोंके गुण |


* अष्टगुणयुक्त पार्थिव आदि सुखभोग (ऐश्वर्य)-से लेकर चौंसठ प्रकारके सुखभोग (ऐश्वर्य) इसी लिङ्गपुराणके पूर्वभाग अध्याय ९ में विस्तारसे बताये गये हैं।

अध्याय ८६] पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ४३७

संस्कृतहिन्दी
वर्तमानानि दुःखानि भविष्याणि यथातथम्।<br>दोषदुष्टेषु देशेषु दुःखानि विविधानि च॥ ३४<br><br>न भावयन्त्यतीतानि ह्यज्ञाने ज्ञानमानिनः।<br>क्षुद्व्याधेः परिहारार्थं न सुखायान्नमुच्यते॥ ३५<br><br>यथेतेरेषां रोगाणामौषधं न सुखाय तत्।<br>शीतोष्णवातवर्षाद्यैस्तत्तत्कालेषु देहिनाम्॥ ३६<br><br>दुःखमेव न सन्देहो न जानन्ति ह्यपण्डिताः।भी [वास्तवमें] दुःख ही हैं। समस्त लोकोंमें प्रारम्भ, मध्य तथा अन्तमें सर्वदा दुःख ही है। वास्तवमें वर्तमानमें भी दुःख है और भविष्यमें भी दुःख होंगे। दोषोंसे ग्रस्त सभी देशोंमें अनेक प्रकारके दुःख हैं; अपनेको ज्ञानी समझनेवाले [कुछ लोग] अज्ञानके कारण अतीतका स्मरण नहीं करते हैं। जिस प्रकार औषधि रोगोंके उपचारके लिये होती है; न कि सुखके लिये, उसी प्रकार आहारको भूखरूपी रोगको दूर करनेके लिये बताया गया है, न कि सुखके लिये। शीत, ताप, वायु, वर्षा आदिके द्वारा उन-उन कालोंमें शरीरधारियोंको दुःख ही होता है, इसमें सन्देह नहीं है; किंतु अज्ञानी लोग इसे नहीं समझ पाते हैं॥ ३१—३६ १/२॥
स्वर्गेऽप्येवं मुनिश्रेष्ठा ह्यविशुद्धक्षयादिभिः॥ ३७<br><br>रोगैर्नानाविधैर्ग्रस्ता रागद्वेषभयादिभिः।<br>छिन्नमूलतरुर्यद्वद्वशः पतति क्षितौ॥ ३८<br><br>पुण्यवृक्षक्षयात्तद्वद् गां पतन्ति दिवौकसः।<br>दुःखाभिलाषनिष्ठानां दुःखभोगादिसम्पदाम्॥ ३९<br><br>अस्मात्तु पततां दुःखं कष्टं स्वर्गाद्दिवौकसाम्।<br>नरके दुःखमेवात्र नरकाणां निषेवणात्॥ ४०<br><br>विहिताकरणाच्चैव वर्णिनां मुनिपुङ्गवाः॥ ४१हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी प्रकार स्वर्गमें भी लोग पुण्यके क्षय आदि दुःखोंसे तथा राग, द्वेष, भय आदि नानाविध रोगोंसे ग्रस्त होते हैं। जैसे जड़से कटा हुआ वृक्ष विवश होकर पृथ्वीपर गिर जाता है, वैसे ही स्वर्गमें रहनेवाले भी पुण्यरूपी वृक्षके क्षय होनेसे पृथ्वीपर पुनः आ जाते हैं। दुःखमय कामनाओंसे युक्त तथा दुःखमय भोगसम्पदासे परिपूर्ण स्वर्गवासी [देवताओं]-को भी इस स्वर्गसे पतित होनेपर दुःख तथा कष्ट ही होता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! शास्त्रोचित कर्मोंको न करनेसे विभिन्न वर्णके लोगोंको नरकोंमें पड़नेके कारण वहाँ दुःख ही भोगना पड़ता है॥ ३७—४१॥
यथा मृगो मृत्युभयस्य भीतो<br>उच्छिन्नवासो न लभेत निद्राम्।<br>एवं यतिर्ध्यानपरो महात्मा<br>संसारभीतो न लभेत निद्राम्॥ ४२जैसे उजड़े हुए निवासवाला मृग मृत्युसे भयभीत होकर निद्रा ग्रहण नहीं कर पाता, उसी प्रकार ध्यानपरायण महात्मा संन्यासी संसारसे भयभीत होकर निद्रा ग्रहण नहीं कर पाता अर्थात् प्रमादरहित होकर सर्वथा सजग रहता है॥ ४२॥
कीटपक्षिमृगाणां च पशूनां गजवाजिनाम्।<br>दृष्टमेवासुखं तस्मात्त्यजतः सुखमुत्तमम्॥ ४३कीटों, पक्षियों, मृगों, घोड़ा-हाथी आदि पशुओंमें भी [सर्वदा] दुःख ही देखा गया है; अतः भोगका त्याग करनेवालेको उत्तम सुख प्राप्त होता है।
वैमानिकानामप्येवं दुःखं कल्पाधिकारिणाम्।<br>स्थानाभिमानिनां चैव मन्वादीनां च सुव्रताः॥ ४४हे सुव्रतो! वैमानिक देवताओं और कल्पोंके अधिकारी तथा अपने पदका अभिमान करनेवाले मनु आदिको भी दुःख प्राप्त होता है।
देवानां चैव दैत्यानामन्योन्यविजिगीषया।<br>दुःखमेव नृपाणां च राक्षसानां जगतत्रये॥ ४५तीनों लोकोंमें एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छाके कारण देवताओं तथा दैत्योंको और राजाओं तथा राक्षसोंको भी
४३८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दुःख प्राप्त होता है॥ ४३-४५॥
श्रमार्थमाश्रमश्चापि वर्णानां परमार्थतः ।<br>आश्रमैर्न च देवेश्च यज्ञः सांख्यैर्व्रतैस्तथा ॥ ४६<br>उग्रैस्तपोभिर्विविधैर्दानैर्नानाविधैरपि ।<br>न लभन्ते तथात्मानं लभन्ते ज्ञानिनः स्वयम् ॥ ४७<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन चरेत्पाशुपतव्रतम् ।<br>भस्मशायी भवेन्नित्यं व्रते पाशुपते बुधः ॥ ४८<br>पञ्चार्थज्ञानसम्पन्नः शिवतत्त्वे समाहितः ।<br>कैवल्यकरणं योगविधिकर्माच्छिदं बुधः ॥ ४९<br>पञ्चार्थयोगसम्पन्नो दुःखान्तं व्रजते सुधीः ।वस्तुतः समस्त वर्णोंके आश्रम भी श्रमके कारण दुःख ही देते हैं। लोग आश्रमों, देवों, यज्ञों, सांख्यों, व्रतों, विविध कठोर तपों तथा अनेक प्रकारके दानोंसे भी आत्मतत्त्व नहीं प्राप्त करते; अपितु ज्ञानवान् लोग स्वतः प्राप्त कर लेते हैं, अतः पूर्ण प्रयत्नसे पाशुपतव्रत करना चाहिये। बुद्धिमान्‌को पाशुपतव्रतमें स्थित होकर नित्य भस्मशायी होना चाहिये। सद्योजातादि पाँच मन्त्रोंके अर्थ-ज्ञानसे सम्पन्न तथा शिवतत्त्वमें समाहित बुद्धिमान् व्यक्तिको मुक्तिदायक तथा कर्मका नाश करनेवाले पाशुपत योगका आश्रय लेना चाहिये। पंचार्थयोगसे युक्त विद्वान् दुःखके अन्तको प्राप्त होता है॥ ४६-४९ १/२ ॥
परया विद्यया वेद्यं विदन्त्यपरया न हि ॥ ५०<br>द्वे विद्ये वेदितव्ये हि परा चैवापरा तथा ।<br>अपरा तत्र ऋग्वेदो यजुर्वेदो द्विजोत्तमाः ॥ ५१<br>सामवेदस्तथाथर्वो वेदः सर्वार्थसाधकः ।<br>शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्द एव च ॥ ५२<br>ज्योतिषं चापरा विद्या पराक्षरमिति स्थितम् ।<br>तददृश्यं तदग्राह्यमगोत्रं तदवर्णकम् ॥ ५३<br>तदचक्षुस्तदश्रोत्रं तदपाणि अपादकम् ।<br>तदजातमभूतं च तदशब्दं द्विजोत्तमाः ॥ ५४<br>अस्पर्शं तदरूपं च रसगन्धविवर्जितम् ।<br>अव्ययं चाप्रतिष्ठं च तन्नित्यं सर्वगं विभुम् ॥ ५५<br>महान्तं तद् बृहत्तञ्च तदजं चिन्मयं द्विजाः ।<br>अप्राणममनस्कं च तदस्निग्धमलोहितम् ॥ ५६<br>अप्रमेयं तदस्थूलमदीर्घं तदनुल्बणम् ।<br>अह्रस्वं तदपारं च तदानन्दं तदच्युतम् ॥ ५७<br>अनपावृतमद्वैतं तदनन्तमगोचरम् ।<br>असवृतं तदात्मैकं परा विद्या न चान्यथा ॥ ५८भक्तजन परा विद्यासे ही ज्ञान प्राप्त करते हैं, अपरा विद्यासे नहीं। परा तथा अपरा—ये दो प्रकारकी विद्याएँ कही गयी हैं। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, सभी अर्थोंको सिद्ध करनेवाला अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—ये अपरा विद्या हैं। परा विद्या अक्षररूपमें स्थित है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वह अदृश्य, अग्राह्य, गोत्ररहित, वर्णरहित, नेत्र-कान-हाथ-पैर आदिसे रहित, अजात, अभूत तथा शब्दविहीन है। हे द्विजो! वह स्पर्शरहित, रूपरहित, रस-गन्धहीन, अव्यय, आधारहीन, नित्य, सर्वगामी, सर्वशक्तिशाली, महान्, बृहत्, अज तथा चित्स्वरूप है। वह प्राणरहित, मनरहित, स्नेहरहित तथा अलोहित है। वह अप्रमेय, अस्थूल, अदीर्घ तथा अनुल्बण है। वह अह्रस्व, अपार आनन्दमय एवं अच्युत है। वह अनपावृत, अद्वैत, अनन्त, अगोचर, आवरणरहित तथा आत्मस्वरूप है; उस पराविद्याका अन्य प्रकारसे वर्णन नहीं किया जा सकता है॥ ५०-५८॥
परापरेति कथिते नैवेह परमार्थतः ।<br>अहमेव जगत्सर्वं मय्येव सकलं जगत् ॥ ५९<br>मत्त उत्पद्यते तिष्ठन्मयि मय्येव लीयते ।<br>मत्तो नान्यदितीक्षेत मनोवाक्पाणिभिस्तथा ॥ ६०<br>सर्वमात्मनि सम्पश्येत्सच्चासच्च समाहितः ।<br>सर्वं ह्यात्मनि सम्पश्यन्न बाह्ये कुरुते मनः ॥ ६१जो परा तथा अपरा विद्याएँ कही गयी हैं; वे परमार्थकी दृष्टिसे नहीं हैं। वास्तवमें मैं ही सम्पूर्ण जगत् हूँ; मुझमें ही सम्पूर्ण जगत् स्थित है। यह जगत् मुझसे ही उत्पन्न होता है, मुझमें ही स्थित रहता है और [अन्तमें] मुझमें ही विलीन हो जाता है। मुझसे पृथक् कुछ नहीं है—ऐसा मन, वचन तथा कर्मसे अनुभव करना चाहिये। एकाग्रचित्त होकर सत् तथा असत् सब कुछ
[ अध्याय ८६ ]पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा४३१
श्लोकअर्थ
आत्मामें ही देखना चाहिये; आत्मामें ही सब कुछ देखनेवाला [साधक] अपने मनको बाह्य जगत्‌में आसक्त नहीं करता है॥ ५९—६१॥
अधोदृष्ट्या वितस्त्यां तु नाभ्यामुपरि तिष्ठति।<br>हृदयं तद्विजानीयाद्विश्वस्यायतनं महत्॥ ६२<br><br>हृदयस्यास्य मध्ये तु पुण्डरीकमवस्थितम्।<br>धर्मकन्दसमुद्भूतं ज्ञाननालं सुशोभनम्॥ ६३<br><br>ऐश्वर्याष्टदलं श्वेतं परं वैराग्यकर्णिकम्।<br>छिद्राणि च दिशो यस्य प्राणाद्याश्च प्रतिष्ठिताः॥ ६४नाभिसे बारह अंगुल ऊपर अधोमुख हृत्कमल-स्थित है; उसे विश्वका महान् गृह समझना चाहिये। इस हृदयके मध्यमें कमल विराजमान है; जो धर्मरूपी कन्दसे उत्पन्न, ज्ञानरूपी नालवाला, अत्यन्त सुन्दर, आठ सिद्धिरूप अष्ट दलसे युक्त और श्वेत तथा उत्तम वैराग्यरूपी कर्णिकावाला है एवं जिसके छिद्र प्राणवायुरूपी दिशाओंके रूपमें प्रतिष्ठित हैं॥ ६२—६४॥
प्राणाद्यैश्चैव संयुक्तः पश्यते बहुधा क्रमात्।<br>दशप्राणवहा नाड्यः प्रत्येकं मुनिपुङ्गवाः॥ ६५<br><br>द्विसप्ततिसहस्त्राणि नाड्यः सम्परिकीर्तिताः।<br>नेत्रस्थं जाग्रतं विद्यात्कण्ठे स्वप्नं समादिशेत्॥ ६६<br><br>सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्धनि स्थितम्।<br>जाग्रे ब्रह्मा च विष्णुश्च स्वप्ने चैव यथाक्रमात्॥ ६७<br><br>ईश्वरस्तु सुषुप्ते तु तुरीये च महेश्वरः।<br>वदन्त्येवमथान्येऽपि समस्तकरणैः पुमान्॥ ६८<br><br>वर्तमानस्तदा तस्य जाग्रदित्यभिधीयते।<br>मनोबुद्धिरहङ्कारं चित्तं चेति चतुष्टयम्॥ ६९<br><br>यदा व्यवस्थितस्त्वेतैः स्वप्न इत्यभिधीयते।<br>करणानि विलीनानि यदा स्वात्मनि सुव्रताः॥ ७०<br><br>सुषुप्तः करणैर्भिन्नस्तुरीयः परिकीर्त्यते।<br>परस्तुरीयातीतोऽसौ शिवः परमकारणम्॥ ७१प्राण आदिसे युक्त होनेपर साधक बहुत रूपोंमें इसे क्रमसे देख सकता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! प्रत्येक नाड़ी दस प्राणोंका वहन करती है; कुल बहत्तर हजार नाड़ियाँ बतायी गयी हैं। जाग्रत् [अवस्था]-को नेत्रमें स्थित जानना चाहिये और स्वप्नको कण्ठमें स्थित जानना चाहिये। इसी प्रकार सुषुप्तको हृदयमें स्थित तथा तुरीयको सिरमें स्थित जानना चाहिये। क्रमके अनुसार जाग्रत्-अवस्थामें ब्रह्मा, स्वप्नावस्थामें विष्णु, सुषुप्तावस्थामें ईश्वर (शिव) तथा तुरीयावस्थामें महेश्वर प्रतिष्ठित रहते हैं। अन्य लोग ऐसा भी कहते हैं कि जब मनुष्य सभी इन्द्रियोंके द्वारा संयमित रहता है, तब उसकी जाग्रत्-अवस्था कही जाती है। मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त—यह अन्तःकरणचतुष्टय है; इनके द्वारा जब मनुष्य व्यवस्थित रहता है, तब उसकी स्वप्नावस्था कही जाती है। हे सुव्रतो! जब मनुष्यकी इन्द्रियाँ उसकी आत्मामें विलीन हो जाती हैं, तब उसकी सुषुप्तावस्था कही जाती है। इन्द्रियोंसे अतीत मनुष्य तुरीय-अवस्थावाला कहा जाता है। [जगत्‌के] परम कारण तथा परस्वरूप ये शिव तुरीयसे भी अतीत हैं॥ ६५—७१॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिश्च तुरीयं चाधिभौतिकम्।<br>आध्यात्मिकं च विप्रेन्द्राश्चाधिदैविकमुच्यते॥ ७२<br><br>तत्सर्वमहमेवेति वेदितव्यं विजानता।<br>बुद्धीन्द्रियाणि विप्रेन्द्रास्तथा कर्मेन्द्रियाणि च॥ ७३<br><br>मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेति चतुष्टयम्।<br>अध्यात्मं पृथगेवेदं चतुर्दशविधं स्मृतम्॥ ७४हे विप्रेन्द्रो! जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीयके पश्चात् अब मैं आधिभौतिक, आध्यात्मिक तथा आधिदैविक स्वरूपका वर्णन करूँगा; यह सब मैं ही हूँ—ऐसा बुद्धिमान्‌को जानना चाहिये। मन-बुद्धि-अहंकार-चित्त—यह चतुर्वर्ग, [पाँच] ज्ञानेन्द्रियाँ और [पाँच] कर्मेन्द्रियाँ—ये पृथक् रूपसे चौदह आध्यात्मिक पदार्थ
४४०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
द्रष्टव्यं चैव श्रोतव्यं घ्रातव्यं च यथाक्रमम्।<br>रसितव्यं मुनिश्रेष्ठाः स्पर्शितव्यं तथैव च॥ ७५<br>मन्तव्यं चैव बोद्धव्यमहङ्कर्तव्यमेव च।<br>तथा चेतयितव्यं च वक्तव्यं मुनिपुङ्गवाः॥ ७६<br>आदातव्यं च गन्तव्यं विसर्गायितमेव च।<br>आनन्दितव्यमित्येते ह्याधिभूतमनुक्रमात्॥ ७७<br>आदित्योऽपि दिशश्चैव पृथिवी वरुणस्तथा।<br>वायुश्चन्द्रस्तथा ब्रह्मा रुद्रः क्षेत्रज्ञ एव च॥ ७८<br>अग्निरिन्द्रस्तथा विष्णुर्मित्रो देवः प्रजापतिः।<br>आधिदैविकमेवं हि चतुर्दशविधं क्रमात्॥ ७९कहे गये हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! हे मुनिपुंगवो! जो भी देखनेयोग्य, सुननेयोग्य, सूँघनेयोग्य, स्वाद लेनेयोग्य, स्पर्श करनेयोग्य, चिन्तन करनेयोग्य, जाननेयोग्य, गर्व करनेयोग्य, चेतनाके योग्य, बोलनेयोग्य, ग्रहण करनेयोग्य, गमन करनेयोग्य, छोड़नेयोग्य तथा आनन्दके योग्य हैं—ये सब क्रमसे आधिभौतिक हैं। सूर्य, दिशाएँ, पृथ्वी, वरुण, वायु, चन्द्र, ब्रह्मा, रुद्र, क्षेत्रज्ञ, अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र और देव प्रजापति—ये चौदह क्रमसे आधिदैविक हैं॥ ७२—७९॥
राज्ञी सुदर्शना चैव जिता सौम्या यथाक्रमम्।<br>मोघा रुद्रामृता सत्या मध्यमा च द्विजोत्तमाः॥ ८०<br>नाडी राशिशुका चैव असुरा चैव कृत्तिका।<br>भास्वती नाड्यश्चैताश्चतुर्दश निबन्धनाः॥ ८१<br>वायवो नाडिमध्यस्था वाहकाश्च चतुर्दश।<br>प्राणो व्यानस्त्वपानश्च उदानश्च समानकः॥ ८२<br>वैरम्भश्च तथा मुख्यो ह्यन्तर्यामः प्रभञ्जनः।<br>कूर्मकश्च तथा श्येनः श्वेतः कृष्णस्तथानिलः॥ ८३<br>नाग इत्येव कथिता वायवश्च चतुर्दश।हे श्रेष्ठ द्विजो! राज्ञी, सुदर्शना, जिता, सौम्या, मोघा, रुद्रा, अमृता, सत्या, मध्यमा, नाड़ी, राशिशुका, असुरा, कृत्तिका और भास्वती—ये चौदह निबन्धन नाड़ियाँ हैं। नाड़ियोंके मध्य चौदह वाहक वायु स्थित हैं। प्राण, व्यान, अपान, उदान, समान, वैरम्भ, मुख्य अन्तर्याम, प्रभंजन, कूर्म, श्येन, श्वेत, कृष्ण, अनिल तथा नाग—ये चौदह वायु कहे गये हैं॥ ८०—८३ १/२॥
यश्चक्षुष्वथ द्रष्टव्ये तथादित्ये च सुव्रताः॥ ८४<br>नाड्यां प्राणे च विज्ञाने त्वानन्दे च यथाक्रमम्।<br>हृद्याकाशे य एतस्मिन् सर्वस्मिन्नन्तरे परः॥ ८५<br>आत्मा एकश्च चरति तमुपासीत मां प्रभुम्।<br>अजरं तमनन्तं च अशोकममृतं ध्रुवम्॥ ८६<br>चतुर्दशविधेष्स्वेव सञ्चरत्येक एव सः।<br>लीयन्ते तानि तत्रैव यदन्यं नास्ति वै द्विजाः॥ ८७<br>एक एव हि सर्वज्ञः सर्वेशस्त्वेक एव सः।<br>एष सर्वाधिपो देवस्त्वन्तर्यामी महाद्युतिः॥ ८८<br>उपास्यमानः सर्वस्य सर्वसौख्यः सनातनः।<br>उपास्यति न चैवेह सर्वसौख्यं द्विजोत्तमाः॥ ८९<br>उपास्यमानो वेदैश्च शास्त्रैर्नानाविधैरपि।<br>न वैष वेदशास्त्राणि सर्वज्ञो यास्यति प्रभुः॥ ९०हे सुव्रतो! नेत्रोंमें, द्रष्टव्य पदार्थोंमें, सूर्यमें, नाड़ीमें, प्राणमें, विज्ञानमें, आनन्दमें, हृदयाकाशमें तथा इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें जो एकमात्र आत्माके रूपमें संचरण करता है, उस मुझ अजर, अनन्त, शोकरहित, अमृतस्वरूप तथा अटल प्रभुकी उपासना करनी चाहिये। एकमात्र वह ही चौदहों प्रकारकी नाड़ियोंमें संचरण करता है और हे द्विजो! वे सब उसीमें लीन हो जाते हैं; क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। एकमात्र वह ही सर्वज्ञ है और एकमात्र वह ही सर्वेश्वर है। वह सबका स्वामी, देवता, अन्तर्यामी तथा महाज्योतिसे युक्त है। हे उत्तम द्विजो! सभी प्रकारका सुख देनेवाले सनातन परमात्मा सभीके द्वारा उपासना किये जानेपर स्वयं सर्वसौख्यकी अपेक्षा नहीं करते। वेदों तथा नानाविध शास्त्रोंसे उपासित होकर उन सर्वज्ञ प्रभुको वेद-शास्त्र आदिकी अपेक्षा नहीं रहती॥ ८४—९०॥
अस्यैवान्नमिदं सर्वं न सोऽन्नं भवति स्वयं।<br>स्वात्मना रक्षितं चाद्यादन्नभूतं न कुत्रचित्॥ ९१<br>सर्वत्र प्राणिनामन्नं प्राणिनां ग्रन्थिरस्म्यहम्।<br>प्रशास्ता नयनश्चैव पञ्चात्मा स विभागशः॥ ९२यह सारा जगत् इस आत्माका भोग्य है और वह आत्मा स्वयं भोग्य नहीं होता है अर्थात् वह भोक्ता है। अपने द्वारा रक्षित अन्न (भोग)-को वह भोगता है और जीवोंके भोग्यको कभी नहीं भोगता। मैं सभी प्राणियोंका अन्न हूँ, मैं प्राणियोंकी [प्राणापानरूप] ग्रन्थि हूँ, मैं ही

अध्याय ८६ ] पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ४४१


श्लोकहिन्दी अर्थ
अन्नमयोऽसौ भूतात्मा चाद्यते ह्यन्नमुच्यते।<br>प्राणमयश्चेन्द्रियात्मा सङ्कल्पात्मा मनोमयः ॥ ९३<br><br>कालात्मा सोम एवेह विज्ञानमय उच्यते।<br>सदानन्दमयो भूत्वा महेशः परमेश्वरः॥ ९४<br><br>सोऽहमेवं जगत्सर्वं मय्येव सकलं स्थितम्।<br>परतन्त्रं स्वतन्त्रेऽपि तदभावाद्विचारतः॥ ९५सबपर शासन करनेवाला, सबको ले जानेवाला और विभागपूर्वक [पंचकोशरूप] पंचातमा हूँ। जो ग्रहण किया जाता है, वह अन्न कहा जाता है। वह भूतात्मा अन्नमयकोश है, इन्द्रियात्मा प्राणमयकोश है, संकल्पात्मा मनोमयकोश है और सोमस्वरूप कालात्मा विज्ञानमयकोश कहा जाता है। सर्वदा आनन्दमग्न होकर महेश परमेश्वर आनन्दमयकोशके रूपमें विद्यमान हैं। वह पंचकोश मैं ही हूँ; विचारपूर्वक देखा जाय, तो उस जगत्‌के अभावके कारण परतन्त्ररूप सम्पूर्ण जगत् मुझ स्वतन्त्रमें ही स्थित है॥ ९१—९५॥
एकत्वमपि नास्त्येव द्वैतं तत्र कुतस्त्वहो।<br>एवं नास्त्यथ मर्त्यं च कुतोऽमृतमजोद्भवः ॥ ९६<br><br>नान्तःप्रज्ञो बहिःप्रज्ञो न चोभयगतस्तथा।<br>न प्रज्ञानघनस्त्वेवं न प्राज्ञो ज्ञानपूर्वकः ॥ ९७<br><br>विदितं नास्ति वेद्यं च निर्वाणं परमार्थतः।<br>निर्वाणं चैव कैवल्यं निःश्रेयसमनामयम्॥ ९८<br><br>अमृतं चाक्षरं ब्रह्म परमात्मा परापरम्।<br>निर्विकल्पं निराभासं ज्ञानं पर्यायवाचकम्॥ ९९<br><br>प्रसन्नं च यदेकाग्रं तदा ज्ञानमिति स्मृतम्।<br>अज्ञानमितरत्सर्वं नात्र कार्या विचारणा॥ १००एकत्व भी नहीं है, तब द्वैत कैसे हो सकता है? इसी प्रकार कोई मर्त्य नहीं है। तब वे अजोद्भव भी अमर कैसे होंगे? इस प्रकार वह न अन्तःप्रज्ञ है, न बहिःप्रज्ञ है, न दोनों प्रकारकी प्रज्ञावाला है, न प्रज्ञानघन है और न तो ज्ञानसम्पन्न प्राज्ञ ही है। वस्तुतः वह ब्रह्म न विदित है, न वेद्य (जाननेयोग्य) है और न तो निर्वाणस्वरूप है। निर्वाण, कैवल्य, निःश्रेयस, अनामय, अमृत, अक्षर, ब्रह्म, परमात्मा, परापर, निर्विकल्प, निराभास और ज्ञान—ये पर्यायवाची हैं। जिसके अन्तःकरणमें एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म स्थित है तथा जो समरस है, जब वह प्रसन्न तथा एकाग्र होता है, वह ज्ञानस्वरूप कहा जाता है, इसके अतिरिक्त सब कुछ अज्ञान है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ९६—१००॥
इत्थं प्रसन्नं विज्ञानं गुरुसम्पर्कजं ध्रुवम्।<br>रागद्वेषानृतक्रोधं कामतृष्णादिभिः सदा॥ १०१<br><br>अपरामृष्टमद्यैव विज्ञेयं मुक्तिदं त्विदम्।<br>अज्ञानमलपूर्वात्वात्पुरुषो मलिनः स्मृतः॥ १०२इस प्रकार पूर्ण ज्ञान निश्चित रूपसे गुरुके सान्निध्यसे उत्पन्न होता है। यह राग, द्वेष, मिथ्या, क्रोध, काम, तृष्णा आदिसे सदा रहित होता है; इसे मुक्ति देनेवाला जानना चाहिये। अज्ञान-मलसे युक्त रहनेके कारण पुरुष मलिन कहा गया है; उस [अज्ञानमल]-के नाशसे ही मुक्ति होती है, अन्यथा करोड़ों जन्मोंमें भी मुक्ति नहीं मिल सकती॥ १०१-१०२ १/२॥
तत्क्षयाद्धि भवेन्मुक्तिर्नान्यथा जन्मकोटिभिः।<br>ज्ञानमेकं विना नास्ति पुण्यपापपरिक्षयः॥ १०३<br><br>ज्ञानमेवाभ्यसेत्तस्मान्मुक्त्यर्थं ब्रह्मवित्तमाः।<br>ज्ञानाभ्यासाद्धि वै पुंसां बुद्धिर्भवति निर्मला॥ १०४<br><br>तस्मात्सदाभ्यसेज्ज्ञानं तन्निष्ठस्तत्परायणः।<br>ज्ञानेनैकेन तृप्तस्य त्यक्तसङ्गस्य योगिनः॥ १०५एकमात्र ज्ञानके बिना पाप तथा पुण्यका क्षय नहीं होता है, अतः हे श्रेष्ठ ब्रह्मवादियो! मुक्तिके लिये ज्ञानका [निरन्तर] अभ्यास करना चाहिये। ज्ञानके अभ्याससे ही मनुष्योंकी बुद्धि निर्मल होती है, अतः उसके प्रति निष्ठावान् तथा तत्पर होकर सदा ज्ञानका
४४२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कर्तव्यं नास्ति विप्रेन्द्रा अस्ति चेत्तत्त्वविन्न च।<br>इह लोके परे चापि कर्तव्यं नास्ति तस्य वै॥ १०६<br><br>जीवन्मुक्तो यतस्तस्माद् ब्रह्मवित्परमार्थतः।<br>ज्ञानाभ्यासरतो नित्यं ज्ञानतत्त्वार्थवित्स्वयम्॥ १०७अभ्यास करना चाहिये। हे श्रेष्ठ विप्रो! एकमात्र ज्ञानसे सन्तुष्ट मुक्तसंग (आसक्तिरहित) योगीके लिये कुछ भी करणीय नहीं रह जाता है; यदि है तो वह तत्त्वज्ञानी नहीं है। इस लोकमें तथा परलोकमें उसके लिये कुछ भी करनेयोग्य नहीं रहता है। चूँकि वह जीवन्मुक्त है, अतः वास्तविक रूपसे ब्रह्मवेत्ता है। ज्ञानके अभ्यासमें संलग्न तथा ज्ञानतत्त्वार्थविद् स्वयं कर्तव्योंके अभ्यासका त्याग करके ज्ञानको ही प्राप्त होता है॥ १०३–१०७ १/२ ॥
कर्तव्याभ्यासमुत्सृज्य ज्ञानमेवाधिगच्छति।<br>वर्णाश्रमाभिमानी यस्त्यक्तक्रोधो द्विजोत्तमाः॥ १०८<br><br>अन्यत्र रमते मूढः सोऽज्ञानी नात्र संशयः।<br>संसारहेतुरज्ञानं संसारस्तनुसङ्ग्रहः॥ १०९हे श्रेष्ठ द्विजो! जो अपने वर्णाश्रमपर गर्व करनेवाला है तथा क्रोधका त्याग कर चुका है, किंतु मूढ़ होकर ज्ञानातिरिक्त अन्य साधनोंमें सुखका अनुभव करता है। वह अज्ञानी है; इसमें सन्देह नहीं है। अज्ञान ही संसारका कारण है; शरीर धारण करना ही संसार है। ज्ञान मोक्षका हेतु है; मुक्त [व्यक्ति] अपनेमें ही अवस्थित रहता है॥ १०८–१०९ १/२ ॥
मोक्षहेतुस्तथा ज्ञानं मुक्तः स्वात्मन्यवस्थितः।<br>अज्ञाने सति विप्रेन्द्राः क्रोधाद्या नात्र संशयः॥ ११०<br><br>क्रोधो हर्षस्तथा लोभो मोहो दम्भो द्विजोत्तमाः।<br>धर्माधर्मौ हि तेषां च तद्वशात्तनुसङ्ग्रहः॥ १११<br><br>शरीरे सति वै क्लेशः सोऽविद्यां सन्त्यजेद् बुधः।<br>अविद्यां विद्यया हित्वा स्थितस्यैव च योगिनः॥ ११२<br><br>क्रोधाद्या नाशमायान्ति धर्माधर्मौ च वै द्विजाः।<br>तत्क्षयाच्च शरीरेण न पुनः सम्प्रयुज्यते॥ ११३हे श्रेष्ठ विप्रो! अज्ञान रहनेपर क्रोध आदि उत्पन्न होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। हे उत्तम द्विजो! क्रोध, हर्ष, लोभ, मोह, दम्भ, धर्म, अधर्म लोगोंको होता है और उनके कारण शरीर धारण करना पड़ता है और शरीर रहनेपर क्लेश अवश्य होता है, अतः बुद्धिमान्‌को चाहिये कि अज्ञानका त्याग कर दे। हे द्विजो! विद्या (ज्ञान)-के द्वारा अविद्या (अज्ञान)-को नष्ट करके स्थित हुए योगीके क्रोध आदि तथा धर्म-अधर्म [स्वयं] नष्ट हो जाते हैं। उनका नाश हो जानेसे पुनः शरीरसे प्राणीका संयोग नहीं होता है, वह संसारसे मुक्त हो जाता है और तीनों प्रकारके तापोंसे रहित हो जाता है॥ ११०–११३ १/२ ॥
स एव मुक्तः संसाराद्दुःखत्रयविवर्जितः।<br>एवं ज्ञानं विना नास्ति ध्यानं ध्यातुर्द्विजर्षभाः॥ ११४<br><br>ज्ञानं गुरोर्हि सम्पर्कान्न वाचा परमार्थतः।<br>चतुर्व्यूहमिति ज्ञात्वा ध्याता ध्यानं समभ्यसेत्॥ ११५<br><br>सहजागन्तुकं पापमस्थिवागुद्भवं तथा।<br>ज्ञानाग्निर्दहते क्षिप्रं शुष्केन्धनमिवानलः॥ ११६हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार ज्ञानके बिना ध्यान करनेवालेका ध्यान सिद्ध नहीं होता है, वास्तवमें ज्ञान गुरुके सम्पर्कसे ही होता है, केवल शब्दसे नहीं। चतुर्व्यूह (तैजस, विश्व, प्राज्ञ, तुरीय)-का ज्ञान करके ध्यान करनेवालेको ध्यानका अभ्यास करना चाहिये। ज्ञानरूपी अग्नि सहज, आगन्तुक और अस्थि (शरीर) तथा वाणीसे होनेवाले पापको उसी प्रकार शीघ्र जला डालती है, जैसे

अध्याय ८६ ] पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ४४३


श्लोकअर्थ
अग्नि सूखे ईंधनको जला डालती है ॥ ११४-११६ ॥
ज्ञानात्परतरं नास्ति सर्वपापविनाशनम्।<br>अभ्यसेच्च सदा ज्ञानं सर्वसङ्गविवर्जितः ॥ ११७<br><br>ज्ञानिनः सर्वपापानि जीर्यन्ते नात्र संशयः।<br>क्रीडन्नपि न लिप्येत पापैर्नानाविधैरपि ॥ ११८ज्ञानसे बढ़कर पापका नाश करनेवाला अन्य कुछ भी नहीं है, अतः संसारसे आसक्तिरहित होकर ज्ञानका अभ्यास करना चाहिये। ज्ञानीके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। आमोद-प्रमोद करता हुआ भी ज्ञानी व्यक्ति नानाविध पापोंसे लिप्त नहीं होता है ॥ ११७-११८ ॥
ज्ञानं यथा तथा ध्यानं तस्माद्ध्यानं समभ्यसेत्।<br>ध्यानं निर्विषयं प्रोक्तमादौ सविषयं तथा ॥ ११९<br><br>षट्प्रकारं समभ्यस्य चतुःषट्दशभिस्तथा।<br>तथा द्वादशधा चैव पुनः षोडशधा क्रमात् ॥ १२०<br><br>द्विधाभ्यस्य च योगीन्द्रो मुच्यते नात्र संशयः।<br>शुद्धजाम्बूनदाकारं विधूमाङ्गारसन्निभम् ॥ १२१<br><br>पीतं रक्तसितं विद्युत्कोटिकोटिसमप्रभम्।<br>अथवा ब्रह्मरन्ध्रस्थं चित्तं कृत्वा प्रयत्नतः ॥ १२२<br><br>न सितं वासितं पीतं न स्मरेद् ब्रह्मविद्भवेत्।जैसा ज्ञान है, वैसा ही ध्यान भी है, अतः ध्यानका अभ्यास करना चाहिये। ध्यान निर्विषय बताया गया है; जो आदिमें सविषय होता है। चार, छः, दस, बारह तथा सोलह और पुनः दो प्रकारसे—इन छः रूपोंमें क्रमशः अभ्यास करके श्रेष्ठ योगी मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। साधकको विशुद्ध सुवर्णके आकारवाले, धूमरहित अंगारके सदृश, पीले-लाल या श्वेत वर्णवाले, करोड़ों विद्युत्के समान कान्तिवाले आकारमें ध्यान लगाना चाहिये, अथवा चित्तको प्रयत्नपूर्वक ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित करके श्वेत, कृष्ण अथवा पीतवर्णसे रहित ब्रह्मका स्मरण करे; ऐसा ध्यान करनेवाला ब्रह्मवेत्ता होता है ॥ ११९-१२२ १/२ ॥
अहिंसकः सत्यवादी अस्तेयी सर्वयत्नतः ॥ १२३<br><br>परिग्रहविनिर्मुक्तो ब्रह्मचारी दृढव्रतः।<br>सन्तुष्टः शौचसम्पन्नः स्वाध्यायनिरतः सदा ॥ १२४<br><br>मद्भक्तश्चाभ्यसेद्ध्यानं गुरुसम्पर्कजं ध्रुवम्।<br>न बुध्यति तथा ध्याता स्थाप्य चित्तं द्विजोत्तमाः ॥ १२५<br><br>न चाभिमन्यते योगी न पश्यति समन्ततः।<br>न घ्राति न शृणोत्येव लीनः स्वात्मनि यः स्वयम् ॥ १२६<br><br>न च स्पर्शं विजानाति स वै समरसः स्मृतः।पूर्ण प्रयत्नके साथ अहिंसक, सत्यवादी, चौरवृत्तिसे रहित, परिग्रहरहित, ब्रह्मचारी, दृढ़ व्रतवाला, सन्तुष्ट, शुद्धिसे युक्त, सर्वदा स्वाध्यायपरायण और मेरी भक्तिसे युक्त होकर गुरुके सान्निध्यमें ध्यानका अविचल अभ्यास करना चाहिये। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ध्यान-साधना करनेवाला योगी अपने चित्तको स्थिर करके किसी अन्य वस्तुका बोध नहीं करता, उसे कुछ भी भान नहीं होता, वह अपने चारों ओर कुछ नहीं देखता, वह न सूँघता है, न सुनता है और न स्पर्शका ही अनुभव करता है; जिसने स्वयंको पूर्णतः अपनी आत्मामें लीन कर दिया है, वह समरस कहा गया है ॥ १२३-१२६ १/२ ॥
पार्थिवे पटले ब्रह्मा वारितत्त्वे हरिः स्वयम् ॥ १२७<br><br>वाह्नेये कालरुद्राख्यो वायुतत्त्वे महेश्वरः।<br>सुषिरे स शिवः साक्षात्क्रमादेवं विचिन्तयेत् ॥ १२८<br><br>क्षितौ शर्वः स्मृतो देवो ह्यपां भव इति स्मृतः।<br>रुद्र एव तथा वह्नौ उग्रो वायौ व्यवस्थितः ॥ १२९पार्थिव पटलमें ब्रह्मा, जलतत्त्वमें स्वयं विष्णु, अग्नितत्त्वमें कालरुद्र, वायुतत्त्वमें महेश्वर और आकाश तत्त्वमें वे साक्षात् शिव विद्यमान हैं—ऐसा क्रमसे चिन्तन करना चाहिये। शर्व पृथ्वीमें विद्यमान कहे गये हैं। भव देवता जलमें विद्यमान कहे गये हैं। रुद्र

४४४ || श्रीलिङ्गमहापुराण || [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भीमः सुषिरनाकेऽसौ भास्करे मण्डले स्थितः।<br>ईशानः सोमबिम्बे च महादेव इति स्मृतः॥ १३०<br>पुंसां पशुपतिर्देवश्चाष्टधाहं व्यवस्थितः।अग्निमें और उग्र वायुमें प्रतिष्ठित हैं। भीम आकाशमें और ईशान सूर्यके मण्डलमें स्थित हैं। महादेवजी चन्द्रमण्डलमें स्थित कहे गये हैं। पुरुषोंमें भगवान् पशुपति विद्यमान हैं। इस प्रकार मैं आठ रूपोंमें व्यवस्थित हूँ॥ १२७—१३०१/२॥
काठिन्यं यत्तनौ सर्वं पार्थिवं परिगीयते॥ १३१<br>आप्यं द्रवमिति प्रोक्तं वर्णाख्यो वह्निरुच्यते।<br>यत्सञ्चरति तद्वायुः सुषिरं यद् द्विजोत्तमाः॥ १३२<br>तदाकाशं च विज्ञानं शब्दजं व्योमसम्भवम्।<br>तथैव विप्रा विज्ञानं स्पर्शाख्यं वायुसम्भवम्॥ १३३<br>रूपं वाह्नेयमित्युक्तमाप्यं रसमयं द्विजाः।<br>गन्धाख्यं पार्थिवं भूयश्चिन्तयेद्भास्करं क्रमात्॥ १३४<br>नेत्रे च दक्षिणे वामे सोमं हृदि विभुं द्विजाः।<br>आजानु पृथिवीतत्त्वमानाभेर्वारिमण्डलम्॥ १३५<br>आकण्ठं वह्नितत्त्वं स्याल्ललाटान्तं द्विजोत्तमाः।<br>वायव्यं वै ललाटाद्यं व्योमाख्यं वा शिखाग्रकम्॥ १३६<br>हंसाख्यं च ततो ब्रह्म व्योम्नश्चोर्ध्वं ततः परम्।<br>व्योमाख्यो व्योममध्यस्थो ह्ययं प्राथमिकः स्मरेत्॥ १३७शरीरमें जो सम्पूर्ण कठोरता है, वह पृथ्वीतत्त्वमय कही जाती है, आप्य (तरल) पदार्थको जलतत्त्वसे सम्बन्धित कहा गया है। वर्ण (रंग)—को अग्निसे सम्बन्धित कहा जाता है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो शरीरमें संचरण करता है, वह वायुसे सम्बन्धित है। जो शरीरमें अवकाश (रिक्त स्थान) है, वह आकाशतत्त्व है। शब्दसे होनेवाला ज्ञान आकाशसे उत्पन्न होता है; उसी प्रकार हे विप्रो! स्पर्शसे होनेवाला ज्ञान वायुसे उत्पन्न होता है। हे द्विजो! रूपका ज्ञान अग्निसे और रसका ज्ञान जलसे उत्पन्न कहा गया है; गन्धका ज्ञान पृथ्वीसे उत्पन्न होता है। पुनः हे विप्रो! दाहिने नेत्रमें सूर्य, बायें नेत्रमें सोम तथा हृदयमें सर्वव्यापक पुरुषका चिन्तन करना चाहिये। हे द्विजोत्तमो! [देहमें] घुटनोंतक पृथ्वीतत्त्व, नाभिपर्यन्त जल-तत्त्व, कण्ठपर्यन्त वह्नितत्त्व, ललाटपर्यन्त वायुतत्त्व, ललाटाग्र अथवा शिखाग्रमें आकाशतत्त्व, तदनन्तर आकाशसे ऊपर हंससंज्ञक ब्रह्म और व्योमके मध्यमें व्योमसंज्ञक ये शिव स्थित हैं—प्राथमिक ध्याताको इनका ध्यान करना चाहिये॥ १३१—१३७॥
न जीवः प्रकृतिः सत्त्वं रजश्चाथ तमः पुनः।<br>महांस्तथाभिमानश्च तन्मात्राणीन्द्रियाणि च॥ १३८<br>व्योमादीनि च भूतानि नैवेह परमार्थतः।<br>व्याप्य तिष्ठद्यतो विश्वं स्थाणुरित्यभिधीयते॥ १३९<br>उदेति सूर्यो भीतश्च पवते वात एव च।<br>द्योतते चन्द्रमा वह्निर्ज्वलत्यापो वहन्ति च॥ १४०<br>दधाति भूमिराकाशमवकाशं ददाति च।<br>तदाज्ञया ततं सर्वं तस्माद्वै चिन्तयेद् द्विजाः॥ १४१<br>तेनैवाधिष्ठितं तस्मादेतत्सर्वं द्विजोत्तमाः।<br>सर्वरूपमयः शर्व इति मत्वा स्मरेद्भवम्॥ १४२जीव, प्रकृति, सत्त्व, रज, तम, महान् (बुद्धि), अहंकार, पंच तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, आकाश आदि पंच भूत—ये सब यथार्थ रूपमें नहीं हैं। चूँकि विश्वको व्याप्त करके वे शिव स्थित हैं, अतः उन्हें स्थाणु कहा जाता है। उन्हींकी आज्ञासे डरकर सूर्य उगता है, हवा बहती है, चन्द्रमा प्रकाशित होता है, अग्नि जलती है, जल प्रवाहित होता है, भूमि [सबको] धारण करती है और आकाश स्थान देता है; सब कुछ उन्हींसे व्याप्त है, अतः हे द्विजो! उन्हींका चिन्तन करना चाहिये। हे द्विजोत्तमो! उन्हींसे यह सम्पूर्ण जगत् अधिष्ठित है, अतः शर्व सर्वरूपमय हैं—ऐसा मानकर [महेश्वर] भवका स्मरण करना चाहिये॥ १३८—१४२॥

अध्याय ८६ ] पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ४४५


मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
संसारविषतप्तानां ज्ञानध्यानामृतेन वै।<br>प्रतीकारः समाख्यातो नान्यथा द्विजसत्तमाः ॥ १४३<br>ज्ञानं धर्मोद्भवं साक्षाज्ज्ञानाद्वैराग्यसम्भवः।<br>वैराग्यात्परमं ज्ञानं परमार्थप्रकाशकम् ॥ १४४हे श्रेष्ठ द्विजो! ज्ञान-ध्यानरूपी अमृतसे ही संसाररूपी विषसे संतप्त लोगोंका प्रतीकार बताया गया है; अन्यथा नहीं। धर्मसे ज्ञान उत्पन्न होता है, साक्षात् ज्ञानसे वैराग्य उत्पन्न होता है और वैराग्यसे परमार्थप्रकाशक परम ज्ञान उत्पन्न होता है अर्थात् ज्ञानके अनुसार व्यवहारमें प्रवृत्ति होने लगती है॥ १४३-१४४॥
ज्ञानवैराग्ययुक्तस्य योगसिद्धिर्द्विजोत्तमाः।<br>योगसिद्ध्या विमुक्तिः स्यात्सत्त्वनिष्ठस्य नान्यथा ॥ १४५<br>तमोविद्यापदच्छन्नं चित्रं यत्पदमव्ययम्।<br>सत्त्वशक्तिं समास्थाय शिवमभ्यर्चयेद् द्विजाः ॥ १४६हे श्रेष्ठ द्विजो! ज्ञान-वैराग्यसे युक्त [साधक]-को ही योगकी सिद्धि होती है, पुनः योगसिद्धिके द्वारा उस सत्त्वनिष्ठकी मुक्ति हो जाती है; अन्यथा नहीं। हे द्विजो! तम तथा अविद्या पदसे आच्छादित, अद्भुत एवं अविनाशी जो शिवपद है, सत्त्वशक्तिका आश्रय लेकर उसका अर्चन करना चाहिये॥ १४५-१४६॥
यः सत्त्वनिष्ठो मद्भक्तो मदर्चनपरायणः।<br>सर्वतो धर्मनिष्ठश्च सदोत्साही समाहितः ॥ १४७<br>सर्वद्वन्द्वसहो धीरः सर्वभूतहिते रतः।<br>ऋजुस्वभावः सततं स्वस्थचित्तो मृदुः सदा ॥ १४८<br>अमानी बुद्धिमाञ्छान्तस्त्यक्तस्पर्धो द्विजोत्तमाः।<br>सदा मुमुक्षुर्धर्मज्ञः स्वात्मलक्षणलक्षणः ॥ १४९<br>ऋणत्रयविनिर्मुक्तः पूर्वजन्मनि पुण्यभाक्।<br>जरायुक्तो द्विजो भूत्वा श्रद्धया च गुरोः क्रमात् ॥ १५०<br>अन्यथा वापि शुश्रूषां कृत्वा कृत्रिमवर्जितः।<br>स्वर्गलोकमनुप्राप्य भुक्त्वा भोगाननुक्रमात् ॥ १५१<br>आसाद्य भारतं वर्षं ब्रह्मविज्जायते द्विजाः।<br>सम्पर्काज्ज्ञानमासाद्य ज्ञानिनो योगविद्भवेत् ॥ १५२<br>क्रमोऽयं मलपूर्णस्य ज्ञानप्राप्तेर्द्विजोत्तमाः।<br>तस्मादनेन मार्गेण त्यक्तसङ्गो दृढव्रतः ॥ १५३<br>संसारकालकूटाख्यान्मुच्यते मुनिपुङ्गवाः।हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो मेरा भक्त सत्त्वनिष्ठ, मेरी पूजामें लीन रहनेवाला, सब प्रकारसे धर्ममें निष्ठा रखनेवाला, सदा उत्साहसे सम्पन्न, एकाग्रचित्त, सभी द्वन्द्वोंको सहनेवाला, धैर्यशाली, सभी प्राणियोंके हितमें रत, सरल स्वभाववाला, सदा स्वस्थ मनवाला, कोमल चित्तवाला, मानरहित, बुद्धिमान्, शान्त, प्रतिद्वन्द्वितासे रहित, सदा मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला, धर्मज्ञ, आत्माके लक्षणोंको जाननेवाला, तीनों प्रकारके ऋणोंसे मुक्त तथा पूर्वजन्ममें पुण्यशाली होता है; वह द्विज श्रद्धाके साथ पाखण्डरहित होकर गुरुकी सेवा करके वृद्ध होनेपर स्वर्गलोक प्राप्त करके वहाँ क्रमसे सुखोंका भोग करके पुनः भारतवर्षमें जन्म लेकर ब्रह्मवेत्ता होता है और हे द्विजो! ज्ञानीके सम्पर्कसे ज्ञान प्राप्त करके योगवेत्ता होता है। हे श्रेष्ठ द्विजो! अज्ञानीके लिये ज्ञानप्राप्तिकी यही विधि है; अतः हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी मार्गके द्वारा आसक्तिरहित तथा दृढ़ व्रतवाला व्यक्ति संसाररूपी कालकूट (विष)-से मुक्त हो जाता है॥ १४७-१५३ १/२॥
एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं मया युष्माकमच्युतम् ॥ १५४<br>ज्ञानस्यैवेह माहात्म्यं प्रसङ्गादिह शोभनम्।<br>एवं पाशुपतं योगं कथितं त्वीश्वरेण तु ॥ १५५<br>न देयं यस्य कस्यापि शिवोक्तं मुनिपुङ्गवाः।<br>दातव्यं योगिने नित्यं भस्मनिष्ठाय सुप्रियम् ॥ १५६इस प्रकार मैंने आप लोगोंको संक्षेपमें प्रसंगवश ज्ञानका अचल तथा उत्तम माहात्म्य बता दिया। इस पाशुपत योगको [स्वयं] महेश्वरने कहा है। हे श्रेष्ठ मुनियो! शिवके द्वारा कहे गये इस योगको जिस किसीको भी नहीं बताना चाहिये, अपितु भस्मनिष्ठ अर्थात् शिवतत्त्वनिष्ठ योगीको ही इस अत्यन्त प्रिय योगका

८७- सनकादि मुनीश्वरोंको शिवज्ञानका उपदेश

४४६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| यः पठेच्छृणुयाद्वापि संसारशमनं नरः।<br><br>स याति ब्रह्मसायुज्यं नात्र कार्या विचारणा ॥ १५७ | सदा उपदेश करना चाहिये। जो मनुष्य इस संसाररूपी विषका नाश करनेवाले आख्यानको पढ़ता अथवा सुनता है, वह ब्रह्मसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १५४-१५७॥॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे संसारविषकथनं नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'संसारविषकथन' नामक छियासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८६ ॥


सत्तासीवाँ अध्याय

सनकादि मुनीश्वरोंको शिवज्ञानका उपदेश

ऋषय ऊचुःऋषिगण बोले
निशम्य ते महाप्राज्ञाः कुमाराद्याः पिनाकिनम्।<br>प्रोचुः प्रणम्य वै भीताः प्रसन्नं परमेश्वरम्॥ १<br><br>एवं चेदनया देव्या हैमवत्या महेश्वर।<br>क्रीडसे विविधैर्भोगैः कथं वक्तुमिहार्हसि॥ २यह सुनकर कुमार आदि उन महाबुद्धिमान् मुनियोंने भयभीत होकर प्रसन्न पिनाकधारी परमेश्वरको प्रणाम करके उनसे कहा—'हे महेश्वर! यदि ऐसा है, तो आप इन देवी पार्वतीके साथ अनेकविध भोगोंके द्वारा क्रीड़ा क्यों करते हैं; कृपा करके यह बतायें' ॥ १-२ ॥
सूत उवाचसूतजी बोले
एवमुक्तः प्रहस्येशः पिनाकी नीललोहितः।<br>प्राह तामम्बिकां प्रेक्ष्य प्रणिपत्य स्थितान् द्विजान्॥ ३[हे ऋषियो!] ऐसा कहे जानेपर पिनाकधारी नीललोहित ईश्वरने हँसकर उन अम्बिकाकी ओर देखकर वहाँ स्थित द्विजोंने प्रणाम करके उनसे कहा—
बन्धमोक्षौ न चैवेह मम स्वेच्छाशरीरिणः।<br>अकर्ताज्ञः पशुर्जीवो विभुर्भोक्ता ह्यणुः पुमान्॥ ४'अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाले मेरे लिये न बन्धन है, न मोक्ष है। मैं सर्वव्यापी, कर्तृत्वरहित तथा सर्वज्ञ हूँ; जबकि यह जीव अणुरूप, भोक्ता तथा अज्ञ है।
मायी च मायया बद्धः कर्मभिर्युज्यते तु सः।<br>ज्ञानं ध्यानं च बन्धश्च मोक्षो नास्त्यात्मनो द्विजाः॥ ५जो मायी है, वह मायासे सकाम कर्मद्वारा बँधा हुआ है और वह कर्मोंसे लिप्त है। हे द्विजो! आत्माके लिये ज्ञान, ध्यान, बन्धन तथा मोक्ष नहीं हैं।
यदैवं मयि विद्वान् यस्तस्यापि न च सर्वतः।<br>एषा विद्या ह्यहं वेद्यः प्रज्ञैषा च श्रुतिः स्मृतिः॥ ६जो विद्वान् मुझमें ऐसा अनुभव कर लेता है, उसके लिये भी ये सब नहीं होते हैं। ये [पार्वती] विद्या हैं और मैं वेद्य हूँ। ये प्रज्ञा, श्रुति तथा स्मृति हैं।
धृतिरेषा मया निष्ठा ज्ञानशक्तिः क्रिया तथा।<br>इच्छाख्या च तथा ह्याज्ञा द्वे विद्ये न च संशयः॥ ७ये मेरे द्वारा प्रतिष्ठित धृति, निष्ठा, ज्ञानशक्ति, क्रिया, इच्छा तथा आज्ञा हैं। ये (परा-अपरा) दोनों विद्याएँ हैं; इसमें सन्देह नहीं है।
न ह्येषा प्रकृतिर्जैवी विकृतिश्च विचारतः।<br>विकारो नैव मायैषा सदसद्व्यक्तिवर्जिता॥ ८ये जीवसम्बन्धी प्रकृति नहीं हैं। विचार किया जाय, तो ये विकृति भी नहीं हैं। विकार नहीं हैं; ये माया हैं, जो सत्-असत्‌से रहित अर्थात् अनिर्वचनीय हैं।
पुरा ममाज्ञा मद्द्वक्त्रात्समुत्पन्ना सनातनी।<br>पञ्चवक्त्रा महाभागा जगतामभयप्रदा॥ ९पूर्वकालमें लोगोंको अभय प्रदान करनेवाली, महाभाग्यवती तथा पाँच मुखवाली

अध्याय ८७ ] सनकादि मुनीश्वरोंको शिवज्ञानका उपदेश ४४७


तामाज्ञां सम्प्रविश्याहं चिन्तयञ्जगतां हितम्।<br>सप्तविंशत्प्रकारेण सर्वं व्याप्यानया शिवः ॥ १०<br>तदाप्रभृति वै मोक्षप्रवृत्तिर्द्विजसत्तमाः।मेरी यह सनातनी आज्ञा मेरे मुखसे उत्पन्न हुई थी। तब जगत्के कल्याणका चिन्तन करता हुआ मैं शिव उस आज्ञामें प्रविष्ट होकर इनके साथ सत्ताईस तत्त्वोंसे सबको व्याप्त करके स्थित हुआ। हे श्रेष्ठ द्विजो! तभीसे मुक्ति प्रारम्भ हुई॥ ३-१०१/२॥
सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा तदापश्यद्भवानिं परमेश्वरः॥ ११<br>भवानी च तमालोक्य मायामहरदव्यया।<br>ते मायामलनिर्मुक्ता मुनयः प्रेक्ष्य पार्वतीम्॥ १२<br>प्रीता बभूवुर्मुक्ताश्च तस्मादेषा परा गतिः।<br>उमाशङ्करयोर्भेदो नास्त्येव परमार्थतः॥ १३<br>द्विधासौ रूपमास्थाय स्थित एव न संशयः।<br>यदा विद्वानसङ्गः स्यादाज्ञया परमेष्ठिनः ॥ १४सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] ऐसा कहकर परमेश्वरने भवानीकी ओर देखा और सनातनी भवानीने उन [परमेश्वर]–को देखकर मायाको हटा लिया; तब मायाके मलसे मुक्त हुए वे मुनिगण पार्वतीको देखकर प्रसन्न होकर मुक्त हो गये। अतः ये [पार्वती] ही परागति हैं। वस्तुतः उमा तथा शंकरमें भेद नहीं है; वे [शिव] दो रूप धारण करके स्थित हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ ११-१३१/२॥
तदा मुक्तिः क्षणादेव नान्यथा कर्मकोटिभिः।<br>क्रमोऽविवक्षितो भूतविवृद्धः परमेष्ठिनः ॥ १५<br>प्रसादेन क्षणान्मुक्तिः प्रतिज्ञैषा न संशयः।<br>गर्भस्थो जायमानो वा बालो वा तरुणोऽपि वा ॥ १६<br>वृद्धो वा मुच्यते जन्तुः प्रसादात्परमेष्ठिनः।<br>अण्डजश्चोद्भिज्जो वापि स्वेदजो वापि मुच्यते ॥ १७<br>प्रसादाद्देवदेवस्य नात्र कार्या विचारणा।<br>एष एव जगन्नाथो बन्धमोक्षकरः शिवः ॥ १८जब शिवकी मायासे विद्वान् अनासक्त हो जाता है, तब क्षणभरमें [उसकी] मुक्ति हो जाती है; अन्यथा करोड़ों कर्मोंसे भी मुक्ति नहीं होती। ऋषियोंके द्वारा बताया गया मुक्तिक्रम परमेष्ठी शिवके लिये विवक्षित नहीं है। परमेश्वरकी कृपासे क्षणभरमें मुक्ति हो जाती है, यह उनकी प्रतिज्ञा है; इसमें सन्देह नहीं है। परमेष्ठी शिवकी कृपासे जीव मुक्त हो जाता है, चाहे वह गर्भमें स्थित हो, उत्पन्न हो रहा हो, बालक हो, तरुण हो अथवा वृद्ध हो। देवोंके देव [महेश्वर]–के अनुग्रहसे अण्डज, उद्भिज्ज तथा स्वेदज [प्राणी] भी मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १४-१७१/२॥
भूर्भुवःस्वर्महश्चैव जनः साक्षात्तपः स्वयम्।<br>सत्यलोकस्तथाण्डानां कोटिकोटिशतानि च ॥ १९<br>विग्रहं देवदेवस्य तथाण्डावरणाष्टकम्।<br>सप्तद्वीपेषु सर्वेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ २०<br>समुद्रेषु च सर्वेषु वायुस्कन्धेषु सर्वतः।<br>तथान्येषु च लोकेषु वसन्ति च चराचराः ॥ २१<br>सर्वे भवांशजा नूनं गतिस्तेषां स एव वै।<br>सर्वो रुद्रो नमस्तस्मै पुरुषाय महात्मने ॥ २२ये जगत्पति शिव ही बन्धन तथा मोक्ष करनेवाले हैं। भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः तथा सत्यम्—ये लोक और करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड तथा अण्डोंके आठों आवरण—ये सब उन देवदेव [महेश्वर]–के विग्रह (शरीर) हैं। सातों द्वीपोंमें, सभी पर्वतोंमें, वनोंमें, समुद्रोंमें, सभी वायुके स्कन्धोंमें तथा अन्य लोकोंमें जो चराचर जीव निवास करते हैं—वे सब शिवके अंशसे उत्पन्न हुए हैं; निश्चित रूपसे इनकी गति वे ही हैं। सब कुछ रुद्र ही हैं। उन महात्मा पुरुषको नमस्कार है॥ १८-२२॥
विश्वं भूतं तथा जातं बहुधा रुद्र एव सः।<br>रुद्राज्ञैषा स्थिता देवी ह्यानया मुक्तिरम्बिका ॥ २३उन रुद्रने ही सम्पूर्ण जगत्को तथा सभी जीवोंको