श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ८६] पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ४३७
| संस्कृत | हिन्दी |
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| वर्तमानानि दुःखानि भविष्याणि यथातथम्।<br>दोषदुष्टेषु देशेषु दुःखानि विविधानि च॥ ३४<br><br>न भावयन्त्यतीतानि ह्यज्ञाने ज्ञानमानिनः।<br>क्षुद्व्याधेः परिहारार्थं न सुखायान्नमुच्यते॥ ३५<br><br>यथेतेरेषां रोगाणामौषधं न सुखाय तत्।<br>शीतोष्णवातवर्षाद्यैस्तत्तत्कालेषु देहिनाम्॥ ३६<br><br>दुःखमेव न सन्देहो न जानन्ति ह्यपण्डिताः। | भी [वास्तवमें] दुःख ही हैं। समस्त लोकोंमें प्रारम्भ, मध्य तथा अन्तमें सर्वदा दुःख ही है। वास्तवमें वर्तमानमें भी दुःख है और भविष्यमें भी दुःख होंगे। दोषोंसे ग्रस्त सभी देशोंमें अनेक प्रकारके दुःख हैं; अपनेको ज्ञानी समझनेवाले [कुछ लोग] अज्ञानके कारण अतीतका स्मरण नहीं करते हैं। जिस प्रकार औषधि रोगोंके उपचारके लिये होती है; न कि सुखके लिये, उसी प्रकार आहारको भूखरूपी रोगको दूर करनेके लिये बताया गया है, न कि सुखके लिये। शीत, ताप, वायु, वर्षा आदिके द्वारा उन-उन कालोंमें शरीरधारियोंको दुःख ही होता है, इसमें सन्देह नहीं है; किंतु अज्ञानी लोग इसे नहीं समझ पाते हैं॥ ३१—३६ १/२॥ |
| स्वर्गेऽप्येवं मुनिश्रेष्ठा ह्यविशुद्धक्षयादिभिः॥ ३७<br><br>रोगैर्नानाविधैर्ग्रस्ता रागद्वेषभयादिभिः।<br>छिन्नमूलतरुर्यद्वद्वशः पतति क्षितौ॥ ३८<br><br>पुण्यवृक्षक्षयात्तद्वद् गां पतन्ति दिवौकसः।<br>दुःखाभिलाषनिष्ठानां दुःखभोगादिसम्पदाम्॥ ३९<br><br>अस्मात्तु पततां दुःखं कष्टं स्वर्गाद्दिवौकसाम्।<br>नरके दुःखमेवात्र नरकाणां निषेवणात्॥ ४०<br><br>विहिताकरणाच्चैव वर्णिनां मुनिपुङ्गवाः॥ ४१ | हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी प्रकार स्वर्गमें भी लोग पुण्यके क्षय आदि दुःखोंसे तथा राग, द्वेष, भय आदि नानाविध रोगोंसे ग्रस्त होते हैं। जैसे जड़से कटा हुआ वृक्ष विवश होकर पृथ्वीपर गिर जाता है, वैसे ही स्वर्गमें रहनेवाले भी पुण्यरूपी वृक्षके क्षय होनेसे पृथ्वीपर पुनः आ जाते हैं। दुःखमय कामनाओंसे युक्त तथा दुःखमय भोगसम्पदासे परिपूर्ण स्वर्गवासी [देवताओं]-को भी इस स्वर्गसे पतित होनेपर दुःख तथा कष्ट ही होता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! शास्त्रोचित कर्मोंको न करनेसे विभिन्न वर्णके लोगोंको नरकोंमें पड़नेके कारण वहाँ दुःख ही भोगना पड़ता है॥ ३७—४१॥ |
| यथा मृगो मृत्युभयस्य भीतो<br>उच्छिन्नवासो न लभेत निद्राम्।<br>एवं यतिर्ध्यानपरो महात्मा<br>संसारभीतो न लभेत निद्राम्॥ ४२ | जैसे उजड़े हुए निवासवाला मृग मृत्युसे भयभीत होकर निद्रा ग्रहण नहीं कर पाता, उसी प्रकार ध्यानपरायण महात्मा संन्यासी संसारसे भयभीत होकर निद्रा ग्रहण नहीं कर पाता अर्थात् प्रमादरहित होकर सर्वथा सजग रहता है॥ ४२॥ |
| कीटपक्षिमृगाणां च पशूनां गजवाजिनाम्।<br>दृष्टमेवासुखं तस्मात्त्यजतः सुखमुत्तमम्॥ ४३ | कीटों, पक्षियों, मृगों, घोड़ा-हाथी आदि पशुओंमें भी [सर्वदा] दुःख ही देखा गया है; अतः भोगका त्याग करनेवालेको उत्तम सुख प्राप्त होता है। |
| वैमानिकानामप्येवं दुःखं कल्पाधिकारिणाम्।<br>स्थानाभिमानिनां चैव मन्वादीनां च सुव्रताः॥ ४४ | हे सुव्रतो! वैमानिक देवताओं और कल्पोंके अधिकारी तथा अपने पदका अभिमान करनेवाले मनु आदिको भी दुःख प्राप्त होता है। |
| देवानां चैव दैत्यानामन्योन्यविजिगीषया।<br>दुःखमेव नृपाणां च राक्षसानां जगतत्रये॥ ४५ | तीनों लोकोंमें एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छाके कारण देवताओं तथा दैत्योंको और राजाओं तथा राक्षसोंको भी |