भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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४३८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दुःख प्राप्त होता है॥ ४३-४५॥
श्रमार्थमाश्रमश्चापि वर्णानां परमार्थतः ।<br>आश्रमैर्न च देवेश्च यज्ञः सांख्यैर्व्रतैस्तथा ॥ ४६<br>उग्रैस्तपोभिर्विविधैर्दानैर्नानाविधैरपि ।<br>न लभन्ते तथात्मानं लभन्ते ज्ञानिनः स्वयम् ॥ ४७<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन चरेत्पाशुपतव्रतम् ।<br>भस्मशायी भवेन्नित्यं व्रते पाशुपते बुधः ॥ ४८<br>पञ्चार्थज्ञानसम्पन्नः शिवतत्त्वे समाहितः ।<br>कैवल्यकरणं योगविधिकर्माच्छिदं बुधः ॥ ४९<br>पञ्चार्थयोगसम्पन्नो दुःखान्तं व्रजते सुधीः ।वस्तुतः समस्त वर्णोंके आश्रम भी श्रमके कारण दुःख ही देते हैं। लोग आश्रमों, देवों, यज्ञों, सांख्यों, व्रतों, विविध कठोर तपों तथा अनेक प्रकारके दानोंसे भी आत्मतत्त्व नहीं प्राप्त करते; अपितु ज्ञानवान् लोग स्वतः प्राप्त कर लेते हैं, अतः पूर्ण प्रयत्नसे पाशुपतव्रत करना चाहिये। बुद्धिमान्‌को पाशुपतव्रतमें स्थित होकर नित्य भस्मशायी होना चाहिये। सद्योजातादि पाँच मन्त्रोंके अर्थ-ज्ञानसे सम्पन्न तथा शिवतत्त्वमें समाहित बुद्धिमान् व्यक्तिको मुक्तिदायक तथा कर्मका नाश करनेवाले पाशुपत योगका आश्रय लेना चाहिये। पंचार्थयोगसे युक्त विद्वान् दुःखके अन्तको प्राप्त होता है॥ ४६-४९ १/२ ॥
परया विद्यया वेद्यं विदन्त्यपरया न हि ॥ ५०<br>द्वे विद्ये वेदितव्ये हि परा चैवापरा तथा ।<br>अपरा तत्र ऋग्वेदो यजुर्वेदो द्विजोत्तमाः ॥ ५१<br>सामवेदस्तथाथर्वो वेदः सर्वार्थसाधकः ।<br>शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्द एव च ॥ ५२<br>ज्योतिषं चापरा विद्या पराक्षरमिति स्थितम् ।<br>तददृश्यं तदग्राह्यमगोत्रं तदवर्णकम् ॥ ५३<br>तदचक्षुस्तदश्रोत्रं तदपाणि अपादकम् ।<br>तदजातमभूतं च तदशब्दं द्विजोत्तमाः ॥ ५४<br>अस्पर्शं तदरूपं च रसगन्धविवर्जितम् ।<br>अव्ययं चाप्रतिष्ठं च तन्नित्यं सर्वगं विभुम् ॥ ५५<br>महान्तं तद् बृहत्तञ्च तदजं चिन्मयं द्विजाः ।<br>अप्राणममनस्कं च तदस्निग्धमलोहितम् ॥ ५६<br>अप्रमेयं तदस्थूलमदीर्घं तदनुल्बणम् ।<br>अह्रस्वं तदपारं च तदानन्दं तदच्युतम् ॥ ५७<br>अनपावृतमद्वैतं तदनन्तमगोचरम् ।<br>असवृतं तदात्मैकं परा विद्या न चान्यथा ॥ ५८भक्तजन परा विद्यासे ही ज्ञान प्राप्त करते हैं, अपरा विद्यासे नहीं। परा तथा अपरा—ये दो प्रकारकी विद्याएँ कही गयी हैं। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, सभी अर्थोंको सिद्ध करनेवाला अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—ये अपरा विद्या हैं। परा विद्या अक्षररूपमें स्थित है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वह अदृश्य, अग्राह्य, गोत्ररहित, वर्णरहित, नेत्र-कान-हाथ-पैर आदिसे रहित, अजात, अभूत तथा शब्दविहीन है। हे द्विजो! वह स्पर्शरहित, रूपरहित, रस-गन्धहीन, अव्यय, आधारहीन, नित्य, सर्वगामी, सर्वशक्तिशाली, महान्, बृहत्, अज तथा चित्स्वरूप है। वह प्राणरहित, मनरहित, स्नेहरहित तथा अलोहित है। वह अप्रमेय, अस्थूल, अदीर्घ तथा अनुल्बण है। वह अह्रस्व, अपार आनन्दमय एवं अच्युत है। वह अनपावृत, अद्वैत, अनन्त, अगोचर, आवरणरहित तथा आत्मस्वरूप है; उस पराविद्याका अन्य प्रकारसे वर्णन नहीं किया जा सकता है॥ ५०-५८॥
परापरेति कथिते नैवेह परमार्थतः ।<br>अहमेव जगत्सर्वं मय्येव सकलं जगत् ॥ ५९<br>मत्त उत्पद्यते तिष्ठन्मयि मय्येव लीयते ।<br>मत्तो नान्यदितीक्षेत मनोवाक्पाणिभिस्तथा ॥ ६०<br>सर्वमात्मनि सम्पश्येत्सच्चासच्च समाहितः ।<br>सर्वं ह्यात्मनि सम्पश्यन्न बाह्ये कुरुते मनः ॥ ६१जो परा तथा अपरा विद्याएँ कही गयी हैं; वे परमार्थकी दृष्टिसे नहीं हैं। वास्तवमें मैं ही सम्पूर्ण जगत् हूँ; मुझमें ही सम्पूर्ण जगत् स्थित है। यह जगत् मुझसे ही उत्पन्न होता है, मुझमें ही स्थित रहता है और [अन्तमें] मुझमें ही विलीन हो जाता है। मुझसे पृथक् कुछ नहीं है—ऐसा मन, वचन तथा कर्मसे अनुभव करना चाहिये। एकाग्रचित्त होकर सत् तथा असत् सब कुछ