भारतकोश
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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
४३८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दुःख प्राप्त होता है॥ ४३-४५॥
श्रमार्थमाश्रमश्चापि वर्णानां परमार्थतः ।<br>आश्रमैर्न च देवेश्च यज्ञः सांख्यैर्व्रतैस्तथा ॥ ४६<br>उग्रैस्तपोभिर्विविधैर्दानैर्नानाविधैरपि ।<br>न लभन्ते तथात्मानं लभन्ते ज्ञानिनः स्वयम् ॥ ४७<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन चरेत्पाशुपतव्रतम् ।<br>भस्मशायी भवेन्नित्यं व्रते पाशुपते बुधः ॥ ४८<br>पञ्चार्थज्ञानसम्पन्नः शिवतत्त्वे समाहितः ।<br>कैवल्यकरणं योगविधिकर्माच्छिदं बुधः ॥ ४९<br>पञ्चार्थयोगसम्पन्नो दुःखान्तं व्रजते सुधीः ।वस्तुतः समस्त वर्णोंके आश्रम भी श्रमके कारण दुःख ही देते हैं। लोग आश्रमों, देवों, यज्ञों, सांख्यों, व्रतों, विविध कठोर तपों तथा अनेक प्रकारके दानोंसे भी आत्मतत्त्व नहीं प्राप्त करते; अपितु ज्ञानवान् लोग स्वतः प्राप्त कर लेते हैं, अतः पूर्ण प्रयत्नसे पाशुपतव्रत करना चाहिये। बुद्धिमान्‌को पाशुपतव्रतमें स्थित होकर नित्य भस्मशायी होना चाहिये। सद्योजातादि पाँच मन्त्रोंके अर्थ-ज्ञानसे सम्पन्न तथा शिवतत्त्वमें समाहित बुद्धिमान् व्यक्तिको मुक्तिदायक तथा कर्मका नाश करनेवाले पाशुपत योगका आश्रय लेना चाहिये। पंचार्थयोगसे युक्त विद्वान् दुःखके अन्तको प्राप्त होता है॥ ४६-४९ १/२ ॥
परया विद्यया वेद्यं विदन्त्यपरया न हि ॥ ५०<br>द्वे विद्ये वेदितव्ये हि परा चैवापरा तथा ।<br>अपरा तत्र ऋग्वेदो यजुर्वेदो द्विजोत्तमाः ॥ ५१<br>सामवेदस्तथाथर्वो वेदः सर्वार्थसाधकः ।<br>शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्द एव च ॥ ५२<br>ज्योतिषं चापरा विद्या पराक्षरमिति स्थितम् ।<br>तददृश्यं तदग्राह्यमगोत्रं तदवर्णकम् ॥ ५३<br>तदचक्षुस्तदश्रोत्रं तदपाणि अपादकम् ।<br>तदजातमभूतं च तदशब्दं द्विजोत्तमाः ॥ ५४<br>अस्पर्शं तदरूपं च रसगन्धविवर्जितम् ।<br>अव्ययं चाप्रतिष्ठं च तन्नित्यं सर्वगं विभुम् ॥ ५५<br>महान्तं तद् बृहत्तञ्च तदजं चिन्मयं द्विजाः ।<br>अप्राणममनस्कं च तदस्निग्धमलोहितम् ॥ ५६<br>अप्रमेयं तदस्थूलमदीर्घं तदनुल्बणम् ।<br>अह्रस्वं तदपारं च तदानन्दं तदच्युतम् ॥ ५७<br>अनपावृतमद्वैतं तदनन्तमगोचरम् ।<br>असवृतं तदात्मैकं परा विद्या न चान्यथा ॥ ५८भक्तजन परा विद्यासे ही ज्ञान प्राप्त करते हैं, अपरा विद्यासे नहीं। परा तथा अपरा—ये दो प्रकारकी विद्याएँ कही गयी हैं। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, सभी अर्थोंको सिद्ध करनेवाला अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—ये अपरा विद्या हैं। परा विद्या अक्षररूपमें स्थित है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वह अदृश्य, अग्राह्य, गोत्ररहित, वर्णरहित, नेत्र-कान-हाथ-पैर आदिसे रहित, अजात, अभूत तथा शब्दविहीन है। हे द्विजो! वह स्पर्शरहित, रूपरहित, रस-गन्धहीन, अव्यय, आधारहीन, नित्य, सर्वगामी, सर्वशक्तिशाली, महान्, बृहत्, अज तथा चित्स्वरूप है। वह प्राणरहित, मनरहित, स्नेहरहित तथा अलोहित है। वह अप्रमेय, अस्थूल, अदीर्घ तथा अनुल्बण है। वह अह्रस्व, अपार आनन्दमय एवं अच्युत है। वह अनपावृत, अद्वैत, अनन्त, अगोचर, आवरणरहित तथा आत्मस्वरूप है; उस पराविद्याका अन्य प्रकारसे वर्णन नहीं किया जा सकता है॥ ५०-५८॥
परापरेति कथिते नैवेह परमार्थतः ।<br>अहमेव जगत्सर्वं मय्येव सकलं जगत् ॥ ५९<br>मत्त उत्पद्यते तिष्ठन्मयि मय्येव लीयते ।<br>मत्तो नान्यदितीक्षेत मनोवाक्पाणिभिस्तथा ॥ ६०<br>सर्वमात्मनि सम्पश्येत्सच्चासच्च समाहितः ।<br>सर्वं ह्यात्मनि सम्पश्यन्न बाह्ये कुरुते मनः ॥ ६१जो परा तथा अपरा विद्याएँ कही गयी हैं; वे परमार्थकी दृष्टिसे नहीं हैं। वास्तवमें मैं ही सम्पूर्ण जगत् हूँ; मुझमें ही सम्पूर्ण जगत् स्थित है। यह जगत् मुझसे ही उत्पन्न होता है, मुझमें ही स्थित रहता है और [अन्तमें] मुझमें ही विलीन हो जाता है। मुझसे पृथक् कुछ नहीं है—ऐसा मन, वचन तथा कर्मसे अनुभव करना चाहिये। एकाग्रचित्त होकर सत् तथा असत् सब कुछ
[ अध्याय ८६ ]पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा४३१
श्लोकअर्थ
आत्मामें ही देखना चाहिये; आत्मामें ही सब कुछ देखनेवाला [साधक] अपने मनको बाह्य जगत्‌में आसक्त नहीं करता है॥ ५९—६१॥
अधोदृष्ट्या वितस्त्यां तु नाभ्यामुपरि तिष्ठति।<br>हृदयं तद्विजानीयाद्विश्वस्यायतनं महत्॥ ६२<br><br>हृदयस्यास्य मध्ये तु पुण्डरीकमवस्थितम्।<br>धर्मकन्दसमुद्भूतं ज्ञाननालं सुशोभनम्॥ ६३<br><br>ऐश्वर्याष्टदलं श्वेतं परं वैराग्यकर्णिकम्।<br>छिद्राणि च दिशो यस्य प्राणाद्याश्च प्रतिष्ठिताः॥ ६४नाभिसे बारह अंगुल ऊपर अधोमुख हृत्कमल-स्थित है; उसे विश्वका महान् गृह समझना चाहिये। इस हृदयके मध्यमें कमल विराजमान है; जो धर्मरूपी कन्दसे उत्पन्न, ज्ञानरूपी नालवाला, अत्यन्त सुन्दर, आठ सिद्धिरूप अष्ट दलसे युक्त और श्वेत तथा उत्तम वैराग्यरूपी कर्णिकावाला है एवं जिसके छिद्र प्राणवायुरूपी दिशाओंके रूपमें प्रतिष्ठित हैं॥ ६२—६४॥
प्राणाद्यैश्चैव संयुक्तः पश्यते बहुधा क्रमात्।<br>दशप्राणवहा नाड्यः प्रत्येकं मुनिपुङ्गवाः॥ ६५<br><br>द्विसप्ततिसहस्त्राणि नाड्यः सम्परिकीर्तिताः।<br>नेत्रस्थं जाग्रतं विद्यात्कण्ठे स्वप्नं समादिशेत्॥ ६६<br><br>सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्धनि स्थितम्।<br>जाग्रे ब्रह्मा च विष्णुश्च स्वप्ने चैव यथाक्रमात्॥ ६७<br><br>ईश्वरस्तु सुषुप्ते तु तुरीये च महेश्वरः।<br>वदन्त्येवमथान्येऽपि समस्तकरणैः पुमान्॥ ६८<br><br>वर्तमानस्तदा तस्य जाग्रदित्यभिधीयते।<br>मनोबुद्धिरहङ्कारं चित्तं चेति चतुष्टयम्॥ ६९<br><br>यदा व्यवस्थितस्त्वेतैः स्वप्न इत्यभिधीयते।<br>करणानि विलीनानि यदा स्वात्मनि सुव्रताः॥ ७०<br><br>सुषुप्तः करणैर्भिन्नस्तुरीयः परिकीर्त्यते।<br>परस्तुरीयातीतोऽसौ शिवः परमकारणम्॥ ७१प्राण आदिसे युक्त होनेपर साधक बहुत रूपोंमें इसे क्रमसे देख सकता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! प्रत्येक नाड़ी दस प्राणोंका वहन करती है; कुल बहत्तर हजार नाड़ियाँ बतायी गयी हैं। जाग्रत् [अवस्था]-को नेत्रमें स्थित जानना चाहिये और स्वप्नको कण्ठमें स्थित जानना चाहिये। इसी प्रकार सुषुप्तको हृदयमें स्थित तथा तुरीयको सिरमें स्थित जानना चाहिये। क्रमके अनुसार जाग्रत्-अवस्थामें ब्रह्मा, स्वप्नावस्थामें विष्णु, सुषुप्तावस्थामें ईश्वर (शिव) तथा तुरीयावस्थामें महेश्वर प्रतिष्ठित रहते हैं। अन्य लोग ऐसा भी कहते हैं कि जब मनुष्य सभी इन्द्रियोंके द्वारा संयमित रहता है, तब उसकी जाग्रत्-अवस्था कही जाती है। मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त—यह अन्तःकरणचतुष्टय है; इनके द्वारा जब मनुष्य व्यवस्थित रहता है, तब उसकी स्वप्नावस्था कही जाती है। हे सुव्रतो! जब मनुष्यकी इन्द्रियाँ उसकी आत्मामें विलीन हो जाती हैं, तब उसकी सुषुप्तावस्था कही जाती है। इन्द्रियोंसे अतीत मनुष्य तुरीय-अवस्थावाला कहा जाता है। [जगत्‌के] परम कारण तथा परस्वरूप ये शिव तुरीयसे भी अतीत हैं॥ ६५—७१॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिश्च तुरीयं चाधिभौतिकम्।<br>आध्यात्मिकं च विप्रेन्द्राश्चाधिदैविकमुच्यते॥ ७२<br><br>तत्सर्वमहमेवेति वेदितव्यं विजानता।<br>बुद्धीन्द्रियाणि विप्रेन्द्रास्तथा कर्मेन्द्रियाणि च॥ ७३<br><br>मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेति चतुष्टयम्।<br>अध्यात्मं पृथगेवेदं चतुर्दशविधं स्मृतम्॥ ७४हे विप्रेन्द्रो! जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीयके पश्चात् अब मैं आधिभौतिक, आध्यात्मिक तथा आधिदैविक स्वरूपका वर्णन करूँगा; यह सब मैं ही हूँ—ऐसा बुद्धिमान्‌को जानना चाहिये। मन-बुद्धि-अहंकार-चित्त—यह चतुर्वर्ग, [पाँच] ज्ञानेन्द्रियाँ और [पाँच] कर्मेन्द्रियाँ—ये पृथक् रूपसे चौदह आध्यात्मिक पदार्थ
४४०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
द्रष्टव्यं चैव श्रोतव्यं घ्रातव्यं च यथाक्रमम्।<br>रसितव्यं मुनिश्रेष्ठाः स्पर्शितव्यं तथैव च॥ ७५<br>मन्तव्यं चैव बोद्धव्यमहङ्कर्तव्यमेव च।<br>तथा चेतयितव्यं च वक्तव्यं मुनिपुङ्गवाः॥ ७६<br>आदातव्यं च गन्तव्यं विसर्गायितमेव च।<br>आनन्दितव्यमित्येते ह्याधिभूतमनुक्रमात्॥ ७७<br>आदित्योऽपि दिशश्चैव पृथिवी वरुणस्तथा।<br>वायुश्चन्द्रस्तथा ब्रह्मा रुद्रः क्षेत्रज्ञ एव च॥ ७८<br>अग्निरिन्द्रस्तथा विष्णुर्मित्रो देवः प्रजापतिः।<br>आधिदैविकमेवं हि चतुर्दशविधं क्रमात्॥ ७९कहे गये हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! हे मुनिपुंगवो! जो भी देखनेयोग्य, सुननेयोग्य, सूँघनेयोग्य, स्वाद लेनेयोग्य, स्पर्श करनेयोग्य, चिन्तन करनेयोग्य, जाननेयोग्य, गर्व करनेयोग्य, चेतनाके योग्य, बोलनेयोग्य, ग्रहण करनेयोग्य, गमन करनेयोग्य, छोड़नेयोग्य तथा आनन्दके योग्य हैं—ये सब क्रमसे आधिभौतिक हैं। सूर्य, दिशाएँ, पृथ्वी, वरुण, वायु, चन्द्र, ब्रह्मा, रुद्र, क्षेत्रज्ञ, अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र और देव प्रजापति—ये चौदह क्रमसे आधिदैविक हैं॥ ७२—७९॥
राज्ञी सुदर्शना चैव जिता सौम्या यथाक्रमम्।<br>मोघा रुद्रामृता सत्या मध्यमा च द्विजोत्तमाः॥ ८०<br>नाडी राशिशुका चैव असुरा चैव कृत्तिका।<br>भास्वती नाड्यश्चैताश्चतुर्दश निबन्धनाः॥ ८१<br>वायवो नाडिमध्यस्था वाहकाश्च चतुर्दश।<br>प्राणो व्यानस्त्वपानश्च उदानश्च समानकः॥ ८२<br>वैरम्भश्च तथा मुख्यो ह्यन्तर्यामः प्रभञ्जनः।<br>कूर्मकश्च तथा श्येनः श्वेतः कृष्णस्तथानिलः॥ ८३<br>नाग इत्येव कथिता वायवश्च चतुर्दश।हे श्रेष्ठ द्विजो! राज्ञी, सुदर्शना, जिता, सौम्या, मोघा, रुद्रा, अमृता, सत्या, मध्यमा, नाड़ी, राशिशुका, असुरा, कृत्तिका और भास्वती—ये चौदह निबन्धन नाड़ियाँ हैं। नाड़ियोंके मध्य चौदह वाहक वायु स्थित हैं। प्राण, व्यान, अपान, उदान, समान, वैरम्भ, मुख्य अन्तर्याम, प्रभंजन, कूर्म, श्येन, श्वेत, कृष्ण, अनिल तथा नाग—ये चौदह वायु कहे गये हैं॥ ८०—८३ १/२॥
यश्चक्षुष्वथ द्रष्टव्ये तथादित्ये च सुव्रताः॥ ८४<br>नाड्यां प्राणे च विज्ञाने त्वानन्दे च यथाक्रमम्।<br>हृद्याकाशे य एतस्मिन् सर्वस्मिन्नन्तरे परः॥ ८५<br>आत्मा एकश्च चरति तमुपासीत मां प्रभुम्।<br>अजरं तमनन्तं च अशोकममृतं ध्रुवम्॥ ८६<br>चतुर्दशविधेष्स्वेव सञ्चरत्येक एव सः।<br>लीयन्ते तानि तत्रैव यदन्यं नास्ति वै द्विजाः॥ ८७<br>एक एव हि सर्वज्ञः सर्वेशस्त्वेक एव सः।<br>एष सर्वाधिपो देवस्त्वन्तर्यामी महाद्युतिः॥ ८८<br>उपास्यमानः सर्वस्य सर्वसौख्यः सनातनः।<br>उपास्यति न चैवेह सर्वसौख्यं द्विजोत्तमाः॥ ८९<br>उपास्यमानो वेदैश्च शास्त्रैर्नानाविधैरपि।<br>न वैष वेदशास्त्राणि सर्वज्ञो यास्यति प्रभुः॥ ९०हे सुव्रतो! नेत्रोंमें, द्रष्टव्य पदार्थोंमें, सूर्यमें, नाड़ीमें, प्राणमें, विज्ञानमें, आनन्दमें, हृदयाकाशमें तथा इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें जो एकमात्र आत्माके रूपमें संचरण करता है, उस मुझ अजर, अनन्त, शोकरहित, अमृतस्वरूप तथा अटल प्रभुकी उपासना करनी चाहिये। एकमात्र वह ही चौदहों प्रकारकी नाड़ियोंमें संचरण करता है और हे द्विजो! वे सब उसीमें लीन हो जाते हैं; क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। एकमात्र वह ही सर्वज्ञ है और एकमात्र वह ही सर्वेश्वर है। वह सबका स्वामी, देवता, अन्तर्यामी तथा महाज्योतिसे युक्त है। हे उत्तम द्विजो! सभी प्रकारका सुख देनेवाले सनातन परमात्मा सभीके द्वारा उपासना किये जानेपर स्वयं सर्वसौख्यकी अपेक्षा नहीं करते। वेदों तथा नानाविध शास्त्रोंसे उपासित होकर उन सर्वज्ञ प्रभुको वेद-शास्त्र आदिकी अपेक्षा नहीं रहती॥ ८४—९०॥
अस्यैवान्नमिदं सर्वं न सोऽन्नं भवति स्वयं।<br>स्वात्मना रक्षितं चाद्यादन्नभूतं न कुत्रचित्॥ ९१<br>सर्वत्र प्राणिनामन्नं प्राणिनां ग्रन्थिरस्म्यहम्।<br>प्रशास्ता नयनश्चैव पञ्चात्मा स विभागशः॥ ९२यह सारा जगत् इस आत्माका भोग्य है और वह आत्मा स्वयं भोग्य नहीं होता है अर्थात् वह भोक्ता है। अपने द्वारा रक्षित अन्न (भोग)-को वह भोगता है और जीवोंके भोग्यको कभी नहीं भोगता। मैं सभी प्राणियोंका अन्न हूँ, मैं प्राणियोंकी [प्राणापानरूप] ग्रन्थि हूँ, मैं ही

अध्याय ८६ ] पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ४४१


श्लोकहिन्दी अर्थ
अन्नमयोऽसौ भूतात्मा चाद्यते ह्यन्नमुच्यते।<br>प्राणमयश्चेन्द्रियात्मा सङ्कल्पात्मा मनोमयः ॥ ९३<br><br>कालात्मा सोम एवेह विज्ञानमय उच्यते।<br>सदानन्दमयो भूत्वा महेशः परमेश्वरः॥ ९४<br><br>सोऽहमेवं जगत्सर्वं मय्येव सकलं स्थितम्।<br>परतन्त्रं स्वतन्त्रेऽपि तदभावाद्विचारतः॥ ९५सबपर शासन करनेवाला, सबको ले जानेवाला और विभागपूर्वक [पंचकोशरूप] पंचातमा हूँ। जो ग्रहण किया जाता है, वह अन्न कहा जाता है। वह भूतात्मा अन्नमयकोश है, इन्द्रियात्मा प्राणमयकोश है, संकल्पात्मा मनोमयकोश है और सोमस्वरूप कालात्मा विज्ञानमयकोश कहा जाता है। सर्वदा आनन्दमग्न होकर महेश परमेश्वर आनन्दमयकोशके रूपमें विद्यमान हैं। वह पंचकोश मैं ही हूँ; विचारपूर्वक देखा जाय, तो उस जगत्‌के अभावके कारण परतन्त्ररूप सम्पूर्ण जगत् मुझ स्वतन्त्रमें ही स्थित है॥ ९१—९५॥
एकत्वमपि नास्त्येव द्वैतं तत्र कुतस्त्वहो।<br>एवं नास्त्यथ मर्त्यं च कुतोऽमृतमजोद्भवः ॥ ९६<br><br>नान्तःप्रज्ञो बहिःप्रज्ञो न चोभयगतस्तथा।<br>न प्रज्ञानघनस्त्वेवं न प्राज्ञो ज्ञानपूर्वकः ॥ ९७<br><br>विदितं नास्ति वेद्यं च निर्वाणं परमार्थतः।<br>निर्वाणं चैव कैवल्यं निःश्रेयसमनामयम्॥ ९८<br><br>अमृतं चाक्षरं ब्रह्म परमात्मा परापरम्।<br>निर्विकल्पं निराभासं ज्ञानं पर्यायवाचकम्॥ ९९<br><br>प्रसन्नं च यदेकाग्रं तदा ज्ञानमिति स्मृतम्।<br>अज्ञानमितरत्सर्वं नात्र कार्या विचारणा॥ १००एकत्व भी नहीं है, तब द्वैत कैसे हो सकता है? इसी प्रकार कोई मर्त्य नहीं है। तब वे अजोद्भव भी अमर कैसे होंगे? इस प्रकार वह न अन्तःप्रज्ञ है, न बहिःप्रज्ञ है, न दोनों प्रकारकी प्रज्ञावाला है, न प्रज्ञानघन है और न तो ज्ञानसम्पन्न प्राज्ञ ही है। वस्तुतः वह ब्रह्म न विदित है, न वेद्य (जाननेयोग्य) है और न तो निर्वाणस्वरूप है। निर्वाण, कैवल्य, निःश्रेयस, अनामय, अमृत, अक्षर, ब्रह्म, परमात्मा, परापर, निर्विकल्प, निराभास और ज्ञान—ये पर्यायवाची हैं। जिसके अन्तःकरणमें एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म स्थित है तथा जो समरस है, जब वह प्रसन्न तथा एकाग्र होता है, वह ज्ञानस्वरूप कहा जाता है, इसके अतिरिक्त सब कुछ अज्ञान है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ९६—१००॥
इत्थं प्रसन्नं विज्ञानं गुरुसम्पर्कजं ध्रुवम्।<br>रागद्वेषानृतक्रोधं कामतृष्णादिभिः सदा॥ १०१<br><br>अपरामृष्टमद्यैव विज्ञेयं मुक्तिदं त्विदम्।<br>अज्ञानमलपूर्वात्वात्पुरुषो मलिनः स्मृतः॥ १०२इस प्रकार पूर्ण ज्ञान निश्चित रूपसे गुरुके सान्निध्यसे उत्पन्न होता है। यह राग, द्वेष, मिथ्या, क्रोध, काम, तृष्णा आदिसे सदा रहित होता है; इसे मुक्ति देनेवाला जानना चाहिये। अज्ञान-मलसे युक्त रहनेके कारण पुरुष मलिन कहा गया है; उस [अज्ञानमल]-के नाशसे ही मुक्ति होती है, अन्यथा करोड़ों जन्मोंमें भी मुक्ति नहीं मिल सकती॥ १०१-१०२ १/२॥
तत्क्षयाद्धि भवेन्मुक्तिर्नान्यथा जन्मकोटिभिः।<br>ज्ञानमेकं विना नास्ति पुण्यपापपरिक्षयः॥ १०३<br><br>ज्ञानमेवाभ्यसेत्तस्मान्मुक्त्यर्थं ब्रह्मवित्तमाः।<br>ज्ञानाभ्यासाद्धि वै पुंसां बुद्धिर्भवति निर्मला॥ १०४<br><br>तस्मात्सदाभ्यसेज्ज्ञानं तन्निष्ठस्तत्परायणः।<br>ज्ञानेनैकेन तृप्तस्य त्यक्तसङ्गस्य योगिनः॥ १०५एकमात्र ज्ञानके बिना पाप तथा पुण्यका क्षय नहीं होता है, अतः हे श्रेष्ठ ब्रह्मवादियो! मुक्तिके लिये ज्ञानका [निरन्तर] अभ्यास करना चाहिये। ज्ञानके अभ्याससे ही मनुष्योंकी बुद्धि निर्मल होती है, अतः उसके प्रति निष्ठावान् तथा तत्पर होकर सदा ज्ञानका
४४२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कर्तव्यं नास्ति विप्रेन्द्रा अस्ति चेत्तत्त्वविन्न च।<br>इह लोके परे चापि कर्तव्यं नास्ति तस्य वै॥ १०६<br><br>जीवन्मुक्तो यतस्तस्माद् ब्रह्मवित्परमार्थतः।<br>ज्ञानाभ्यासरतो नित्यं ज्ञानतत्त्वार्थवित्स्वयम्॥ १०७अभ्यास करना चाहिये। हे श्रेष्ठ विप्रो! एकमात्र ज्ञानसे सन्तुष्ट मुक्तसंग (आसक्तिरहित) योगीके लिये कुछ भी करणीय नहीं रह जाता है; यदि है तो वह तत्त्वज्ञानी नहीं है। इस लोकमें तथा परलोकमें उसके लिये कुछ भी करनेयोग्य नहीं रहता है। चूँकि वह जीवन्मुक्त है, अतः वास्तविक रूपसे ब्रह्मवेत्ता है। ज्ञानके अभ्यासमें संलग्न तथा ज्ञानतत्त्वार्थविद् स्वयं कर्तव्योंके अभ्यासका त्याग करके ज्ञानको ही प्राप्त होता है॥ १०३–१०७ १/२ ॥
कर्तव्याभ्यासमुत्सृज्य ज्ञानमेवाधिगच्छति।<br>वर्णाश्रमाभिमानी यस्त्यक्तक्रोधो द्विजोत्तमाः॥ १०८<br><br>अन्यत्र रमते मूढः सोऽज्ञानी नात्र संशयः।<br>संसारहेतुरज्ञानं संसारस्तनुसङ्ग्रहः॥ १०९हे श्रेष्ठ द्विजो! जो अपने वर्णाश्रमपर गर्व करनेवाला है तथा क्रोधका त्याग कर चुका है, किंतु मूढ़ होकर ज्ञानातिरिक्त अन्य साधनोंमें सुखका अनुभव करता है। वह अज्ञानी है; इसमें सन्देह नहीं है। अज्ञान ही संसारका कारण है; शरीर धारण करना ही संसार है। ज्ञान मोक्षका हेतु है; मुक्त [व्यक्ति] अपनेमें ही अवस्थित रहता है॥ १०८–१०९ १/२ ॥
मोक्षहेतुस्तथा ज्ञानं मुक्तः स्वात्मन्यवस्थितः।<br>अज्ञाने सति विप्रेन्द्राः क्रोधाद्या नात्र संशयः॥ ११०<br><br>क्रोधो हर्षस्तथा लोभो मोहो दम्भो द्विजोत्तमाः।<br>धर्माधर्मौ हि तेषां च तद्वशात्तनुसङ्ग्रहः॥ १११<br><br>शरीरे सति वै क्लेशः सोऽविद्यां सन्त्यजेद् बुधः।<br>अविद्यां विद्यया हित्वा स्थितस्यैव च योगिनः॥ ११२<br><br>क्रोधाद्या नाशमायान्ति धर्माधर्मौ च वै द्विजाः।<br>तत्क्षयाच्च शरीरेण न पुनः सम्प्रयुज्यते॥ ११३हे श्रेष्ठ विप्रो! अज्ञान रहनेपर क्रोध आदि उत्पन्न होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। हे उत्तम द्विजो! क्रोध, हर्ष, लोभ, मोह, दम्भ, धर्म, अधर्म लोगोंको होता है और उनके कारण शरीर धारण करना पड़ता है और शरीर रहनेपर क्लेश अवश्य होता है, अतः बुद्धिमान्‌को चाहिये कि अज्ञानका त्याग कर दे। हे द्विजो! विद्या (ज्ञान)-के द्वारा अविद्या (अज्ञान)-को नष्ट करके स्थित हुए योगीके क्रोध आदि तथा धर्म-अधर्म [स्वयं] नष्ट हो जाते हैं। उनका नाश हो जानेसे पुनः शरीरसे प्राणीका संयोग नहीं होता है, वह संसारसे मुक्त हो जाता है और तीनों प्रकारके तापोंसे रहित हो जाता है॥ ११०–११३ १/२ ॥
स एव मुक्तः संसाराद्दुःखत्रयविवर्जितः।<br>एवं ज्ञानं विना नास्ति ध्यानं ध्यातुर्द्विजर्षभाः॥ ११४<br><br>ज्ञानं गुरोर्हि सम्पर्कान्न वाचा परमार्थतः।<br>चतुर्व्यूहमिति ज्ञात्वा ध्याता ध्यानं समभ्यसेत्॥ ११५<br><br>सहजागन्तुकं पापमस्थिवागुद्भवं तथा।<br>ज्ञानाग्निर्दहते क्षिप्रं शुष्केन्धनमिवानलः॥ ११६हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार ज्ञानके बिना ध्यान करनेवालेका ध्यान सिद्ध नहीं होता है, वास्तवमें ज्ञान गुरुके सम्पर्कसे ही होता है, केवल शब्दसे नहीं। चतुर्व्यूह (तैजस, विश्व, प्राज्ञ, तुरीय)-का ज्ञान करके ध्यान करनेवालेको ध्यानका अभ्यास करना चाहिये। ज्ञानरूपी अग्नि सहज, आगन्तुक और अस्थि (शरीर) तथा वाणीसे होनेवाले पापको उसी प्रकार शीघ्र जला डालती है, जैसे

अध्याय ८६ ] पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ४४३


श्लोकअर्थ
अग्नि सूखे ईंधनको जला डालती है ॥ ११४-११६ ॥
ज्ञानात्परतरं नास्ति सर्वपापविनाशनम्।<br>अभ्यसेच्च सदा ज्ञानं सर्वसङ्गविवर्जितः ॥ ११७<br><br>ज्ञानिनः सर्वपापानि जीर्यन्ते नात्र संशयः।<br>क्रीडन्नपि न लिप्येत पापैर्नानाविधैरपि ॥ ११८ज्ञानसे बढ़कर पापका नाश करनेवाला अन्य कुछ भी नहीं है, अतः संसारसे आसक्तिरहित होकर ज्ञानका अभ्यास करना चाहिये। ज्ञानीके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। आमोद-प्रमोद करता हुआ भी ज्ञानी व्यक्ति नानाविध पापोंसे लिप्त नहीं होता है ॥ ११७-११८ ॥
ज्ञानं यथा तथा ध्यानं तस्माद्ध्यानं समभ्यसेत्।<br>ध्यानं निर्विषयं प्रोक्तमादौ सविषयं तथा ॥ ११९<br><br>षट्प्रकारं समभ्यस्य चतुःषट्दशभिस्तथा।<br>तथा द्वादशधा चैव पुनः षोडशधा क्रमात् ॥ १२०<br><br>द्विधाभ्यस्य च योगीन्द्रो मुच्यते नात्र संशयः।<br>शुद्धजाम्बूनदाकारं विधूमाङ्गारसन्निभम् ॥ १२१<br><br>पीतं रक्तसितं विद्युत्कोटिकोटिसमप्रभम्।<br>अथवा ब्रह्मरन्ध्रस्थं चित्तं कृत्वा प्रयत्नतः ॥ १२२<br><br>न सितं वासितं पीतं न स्मरेद् ब्रह्मविद्भवेत्।जैसा ज्ञान है, वैसा ही ध्यान भी है, अतः ध्यानका अभ्यास करना चाहिये। ध्यान निर्विषय बताया गया है; जो आदिमें सविषय होता है। चार, छः, दस, बारह तथा सोलह और पुनः दो प्रकारसे—इन छः रूपोंमें क्रमशः अभ्यास करके श्रेष्ठ योगी मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। साधकको विशुद्ध सुवर्णके आकारवाले, धूमरहित अंगारके सदृश, पीले-लाल या श्वेत वर्णवाले, करोड़ों विद्युत्के समान कान्तिवाले आकारमें ध्यान लगाना चाहिये, अथवा चित्तको प्रयत्नपूर्वक ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित करके श्वेत, कृष्ण अथवा पीतवर्णसे रहित ब्रह्मका स्मरण करे; ऐसा ध्यान करनेवाला ब्रह्मवेत्ता होता है ॥ ११९-१२२ १/२ ॥
अहिंसकः सत्यवादी अस्तेयी सर्वयत्नतः ॥ १२३<br><br>परिग्रहविनिर्मुक्तो ब्रह्मचारी दृढव्रतः।<br>सन्तुष्टः शौचसम्पन्नः स्वाध्यायनिरतः सदा ॥ १२४<br><br>मद्भक्तश्चाभ्यसेद्ध्यानं गुरुसम्पर्कजं ध्रुवम्।<br>न बुध्यति तथा ध्याता स्थाप्य चित्तं द्विजोत्तमाः ॥ १२५<br><br>न चाभिमन्यते योगी न पश्यति समन्ततः।<br>न घ्राति न शृणोत्येव लीनः स्वात्मनि यः स्वयम् ॥ १२६<br><br>न च स्पर्शं विजानाति स वै समरसः स्मृतः।पूर्ण प्रयत्नके साथ अहिंसक, सत्यवादी, चौरवृत्तिसे रहित, परिग्रहरहित, ब्रह्मचारी, दृढ़ व्रतवाला, सन्तुष्ट, शुद्धिसे युक्त, सर्वदा स्वाध्यायपरायण और मेरी भक्तिसे युक्त होकर गुरुके सान्निध्यमें ध्यानका अविचल अभ्यास करना चाहिये। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ध्यान-साधना करनेवाला योगी अपने चित्तको स्थिर करके किसी अन्य वस्तुका बोध नहीं करता, उसे कुछ भी भान नहीं होता, वह अपने चारों ओर कुछ नहीं देखता, वह न सूँघता है, न सुनता है और न स्पर्शका ही अनुभव करता है; जिसने स्वयंको पूर्णतः अपनी आत्मामें लीन कर दिया है, वह समरस कहा गया है ॥ १२३-१२६ १/२ ॥
पार्थिवे पटले ब्रह्मा वारितत्त्वे हरिः स्वयम् ॥ १२७<br><br>वाह्नेये कालरुद्राख्यो वायुतत्त्वे महेश्वरः।<br>सुषिरे स शिवः साक्षात्क्रमादेवं विचिन्तयेत् ॥ १२८<br><br>क्षितौ शर्वः स्मृतो देवो ह्यपां भव इति स्मृतः।<br>रुद्र एव तथा वह्नौ उग्रो वायौ व्यवस्थितः ॥ १२९पार्थिव पटलमें ब्रह्मा, जलतत्त्वमें स्वयं विष्णु, अग्नितत्त्वमें कालरुद्र, वायुतत्त्वमें महेश्वर और आकाश तत्त्वमें वे साक्षात् शिव विद्यमान हैं—ऐसा क्रमसे चिन्तन करना चाहिये। शर्व पृथ्वीमें विद्यमान कहे गये हैं। भव देवता जलमें विद्यमान कहे गये हैं। रुद्र

४४४ || श्रीलिङ्गमहापुराण || [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भीमः सुषिरनाकेऽसौ भास्करे मण्डले स्थितः।<br>ईशानः सोमबिम्बे च महादेव इति स्मृतः॥ १३०<br>पुंसां पशुपतिर्देवश्चाष्टधाहं व्यवस्थितः।अग्निमें और उग्र वायुमें प्रतिष्ठित हैं। भीम आकाशमें और ईशान सूर्यके मण्डलमें स्थित हैं। महादेवजी चन्द्रमण्डलमें स्थित कहे गये हैं। पुरुषोंमें भगवान् पशुपति विद्यमान हैं। इस प्रकार मैं आठ रूपोंमें व्यवस्थित हूँ॥ १२७—१३०१/२॥
काठिन्यं यत्तनौ सर्वं पार्थिवं परिगीयते॥ १३१<br>आप्यं द्रवमिति प्रोक्तं वर्णाख्यो वह्निरुच्यते।<br>यत्सञ्चरति तद्वायुः सुषिरं यद् द्विजोत्तमाः॥ १३२<br>तदाकाशं च विज्ञानं शब्दजं व्योमसम्भवम्।<br>तथैव विप्रा विज्ञानं स्पर्शाख्यं वायुसम्भवम्॥ १३३<br>रूपं वाह्नेयमित्युक्तमाप्यं रसमयं द्विजाः।<br>गन्धाख्यं पार्थिवं भूयश्चिन्तयेद्भास्करं क्रमात्॥ १३४<br>नेत्रे च दक्षिणे वामे सोमं हृदि विभुं द्विजाः।<br>आजानु पृथिवीतत्त्वमानाभेर्वारिमण्डलम्॥ १३५<br>आकण्ठं वह्नितत्त्वं स्याल्ललाटान्तं द्विजोत्तमाः।<br>वायव्यं वै ललाटाद्यं व्योमाख्यं वा शिखाग्रकम्॥ १३६<br>हंसाख्यं च ततो ब्रह्म व्योम्नश्चोर्ध्वं ततः परम्।<br>व्योमाख्यो व्योममध्यस्थो ह्ययं प्राथमिकः स्मरेत्॥ १३७शरीरमें जो सम्पूर्ण कठोरता है, वह पृथ्वीतत्त्वमय कही जाती है, आप्य (तरल) पदार्थको जलतत्त्वसे सम्बन्धित कहा गया है। वर्ण (रंग)—को अग्निसे सम्बन्धित कहा जाता है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो शरीरमें संचरण करता है, वह वायुसे सम्बन्धित है। जो शरीरमें अवकाश (रिक्त स्थान) है, वह आकाशतत्त्व है। शब्दसे होनेवाला ज्ञान आकाशसे उत्पन्न होता है; उसी प्रकार हे विप्रो! स्पर्शसे होनेवाला ज्ञान वायुसे उत्पन्न होता है। हे द्विजो! रूपका ज्ञान अग्निसे और रसका ज्ञान जलसे उत्पन्न कहा गया है; गन्धका ज्ञान पृथ्वीसे उत्पन्न होता है। पुनः हे विप्रो! दाहिने नेत्रमें सूर्य, बायें नेत्रमें सोम तथा हृदयमें सर्वव्यापक पुरुषका चिन्तन करना चाहिये। हे द्विजोत्तमो! [देहमें] घुटनोंतक पृथ्वीतत्त्व, नाभिपर्यन्त जल-तत्त्व, कण्ठपर्यन्त वह्नितत्त्व, ललाटपर्यन्त वायुतत्त्व, ललाटाग्र अथवा शिखाग्रमें आकाशतत्त्व, तदनन्तर आकाशसे ऊपर हंससंज्ञक ब्रह्म और व्योमके मध्यमें व्योमसंज्ञक ये शिव स्थित हैं—प्राथमिक ध्याताको इनका ध्यान करना चाहिये॥ १३१—१३७॥
न जीवः प्रकृतिः सत्त्वं रजश्चाथ तमः पुनः।<br>महांस्तथाभिमानश्च तन्मात्राणीन्द्रियाणि च॥ १३८<br>व्योमादीनि च भूतानि नैवेह परमार्थतः।<br>व्याप्य तिष्ठद्यतो विश्वं स्थाणुरित्यभिधीयते॥ १३९<br>उदेति सूर्यो भीतश्च पवते वात एव च।<br>द्योतते चन्द्रमा वह्निर्ज्वलत्यापो वहन्ति च॥ १४०<br>दधाति भूमिराकाशमवकाशं ददाति च।<br>तदाज्ञया ततं सर्वं तस्माद्वै चिन्तयेद् द्विजाः॥ १४१<br>तेनैवाधिष्ठितं तस्मादेतत्सर्वं द्विजोत्तमाः।<br>सर्वरूपमयः शर्व इति मत्वा स्मरेद्भवम्॥ १४२जीव, प्रकृति, सत्त्व, रज, तम, महान् (बुद्धि), अहंकार, पंच तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, आकाश आदि पंच भूत—ये सब यथार्थ रूपमें नहीं हैं। चूँकि विश्वको व्याप्त करके वे शिव स्थित हैं, अतः उन्हें स्थाणु कहा जाता है। उन्हींकी आज्ञासे डरकर सूर्य उगता है, हवा बहती है, चन्द्रमा प्रकाशित होता है, अग्नि जलती है, जल प्रवाहित होता है, भूमि [सबको] धारण करती है और आकाश स्थान देता है; सब कुछ उन्हींसे व्याप्त है, अतः हे द्विजो! उन्हींका चिन्तन करना चाहिये। हे द्विजोत्तमो! उन्हींसे यह सम्पूर्ण जगत् अधिष्ठित है, अतः शर्व सर्वरूपमय हैं—ऐसा मानकर [महेश्वर] भवका स्मरण करना चाहिये॥ १३८—१४२॥

अध्याय ८६ ] पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ४४५


मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
संसारविषतप्तानां ज्ञानध्यानामृतेन वै।<br>प्रतीकारः समाख्यातो नान्यथा द्विजसत्तमाः ॥ १४३<br>ज्ञानं धर्मोद्भवं साक्षाज्ज्ञानाद्वैराग्यसम्भवः।<br>वैराग्यात्परमं ज्ञानं परमार्थप्रकाशकम् ॥ १४४हे श्रेष्ठ द्विजो! ज्ञान-ध्यानरूपी अमृतसे ही संसाररूपी विषसे संतप्त लोगोंका प्रतीकार बताया गया है; अन्यथा नहीं। धर्मसे ज्ञान उत्पन्न होता है, साक्षात् ज्ञानसे वैराग्य उत्पन्न होता है और वैराग्यसे परमार्थप्रकाशक परम ज्ञान उत्पन्न होता है अर्थात् ज्ञानके अनुसार व्यवहारमें प्रवृत्ति होने लगती है॥ १४३-१४४॥
ज्ञानवैराग्ययुक्तस्य योगसिद्धिर्द्विजोत्तमाः।<br>योगसिद्ध्या विमुक्तिः स्यात्सत्त्वनिष्ठस्य नान्यथा ॥ १४५<br>तमोविद्यापदच्छन्नं चित्रं यत्पदमव्ययम्।<br>सत्त्वशक्तिं समास्थाय शिवमभ्यर्चयेद् द्विजाः ॥ १४६हे श्रेष्ठ द्विजो! ज्ञान-वैराग्यसे युक्त [साधक]-को ही योगकी सिद्धि होती है, पुनः योगसिद्धिके द्वारा उस सत्त्वनिष्ठकी मुक्ति हो जाती है; अन्यथा नहीं। हे द्विजो! तम तथा अविद्या पदसे आच्छादित, अद्भुत एवं अविनाशी जो शिवपद है, सत्त्वशक्तिका आश्रय लेकर उसका अर्चन करना चाहिये॥ १४५-१४६॥
यः सत्त्वनिष्ठो मद्भक्तो मदर्चनपरायणः।<br>सर्वतो धर्मनिष्ठश्च सदोत्साही समाहितः ॥ १४७<br>सर्वद्वन्द्वसहो धीरः सर्वभूतहिते रतः।<br>ऋजुस्वभावः सततं स्वस्थचित्तो मृदुः सदा ॥ १४८<br>अमानी बुद्धिमाञ्छान्तस्त्यक्तस्पर्धो द्विजोत्तमाः।<br>सदा मुमुक्षुर्धर्मज्ञः स्वात्मलक्षणलक्षणः ॥ १४९<br>ऋणत्रयविनिर्मुक्तः पूर्वजन्मनि पुण्यभाक्।<br>जरायुक्तो द्विजो भूत्वा श्रद्धया च गुरोः क्रमात् ॥ १५०<br>अन्यथा वापि शुश्रूषां कृत्वा कृत्रिमवर्जितः।<br>स्वर्गलोकमनुप्राप्य भुक्त्वा भोगाननुक्रमात् ॥ १५१<br>आसाद्य भारतं वर्षं ब्रह्मविज्जायते द्विजाः।<br>सम्पर्काज्ज्ञानमासाद्य ज्ञानिनो योगविद्भवेत् ॥ १५२<br>क्रमोऽयं मलपूर्णस्य ज्ञानप्राप्तेर्द्विजोत्तमाः।<br>तस्मादनेन मार्गेण त्यक्तसङ्गो दृढव्रतः ॥ १५३<br>संसारकालकूटाख्यान्मुच्यते मुनिपुङ्गवाः।हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो मेरा भक्त सत्त्वनिष्ठ, मेरी पूजामें लीन रहनेवाला, सब प्रकारसे धर्ममें निष्ठा रखनेवाला, सदा उत्साहसे सम्पन्न, एकाग्रचित्त, सभी द्वन्द्वोंको सहनेवाला, धैर्यशाली, सभी प्राणियोंके हितमें रत, सरल स्वभाववाला, सदा स्वस्थ मनवाला, कोमल चित्तवाला, मानरहित, बुद्धिमान्, शान्त, प्रतिद्वन्द्वितासे रहित, सदा मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला, धर्मज्ञ, आत्माके लक्षणोंको जाननेवाला, तीनों प्रकारके ऋणोंसे मुक्त तथा पूर्वजन्ममें पुण्यशाली होता है; वह द्विज श्रद्धाके साथ पाखण्डरहित होकर गुरुकी सेवा करके वृद्ध होनेपर स्वर्गलोक प्राप्त करके वहाँ क्रमसे सुखोंका भोग करके पुनः भारतवर्षमें जन्म लेकर ब्रह्मवेत्ता होता है और हे द्विजो! ज्ञानीके सम्पर्कसे ज्ञान प्राप्त करके योगवेत्ता होता है। हे श्रेष्ठ द्विजो! अज्ञानीके लिये ज्ञानप्राप्तिकी यही विधि है; अतः हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी मार्गके द्वारा आसक्तिरहित तथा दृढ़ व्रतवाला व्यक्ति संसाररूपी कालकूट (विष)-से मुक्त हो जाता है॥ १४७-१५३ १/२॥
एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं मया युष्माकमच्युतम् ॥ १५४<br>ज्ञानस्यैवेह माहात्म्यं प्रसङ्गादिह शोभनम्।<br>एवं पाशुपतं योगं कथितं त्वीश्वरेण तु ॥ १५५<br>न देयं यस्य कस्यापि शिवोक्तं मुनिपुङ्गवाः।<br>दातव्यं योगिने नित्यं भस्मनिष्ठाय सुप्रियम् ॥ १५६इस प्रकार मैंने आप लोगोंको संक्षेपमें प्रसंगवश ज्ञानका अचल तथा उत्तम माहात्म्य बता दिया। इस पाशुपत योगको [स्वयं] महेश्वरने कहा है। हे श्रेष्ठ मुनियो! शिवके द्वारा कहे गये इस योगको जिस किसीको भी नहीं बताना चाहिये, अपितु भस्मनिष्ठ अर्थात् शिवतत्त्वनिष्ठ योगीको ही इस अत्यन्त प्रिय योगका

८७- सनकादि मुनीश्वरोंको शिवज्ञानका उपदेश

४४६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| यः पठेच्छृणुयाद्वापि संसारशमनं नरः।<br><br>स याति ब्रह्मसायुज्यं नात्र कार्या विचारणा ॥ १५७ | सदा उपदेश करना चाहिये। जो मनुष्य इस संसाररूपी विषका नाश करनेवाले आख्यानको पढ़ता अथवा सुनता है, वह ब्रह्मसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १५४-१५७॥॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे संसारविषकथनं नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'संसारविषकथन' नामक छियासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८६ ॥


सत्तासीवाँ अध्याय

सनकादि मुनीश्वरोंको शिवज्ञानका उपदेश

ऋषय ऊचुःऋषिगण बोले
निशम्य ते महाप्राज्ञाः कुमाराद्याः पिनाकिनम्।<br>प्रोचुः प्रणम्य वै भीताः प्रसन्नं परमेश्वरम्॥ १<br><br>एवं चेदनया देव्या हैमवत्या महेश्वर।<br>क्रीडसे विविधैर्भोगैः कथं वक्तुमिहार्हसि॥ २यह सुनकर कुमार आदि उन महाबुद्धिमान् मुनियोंने भयभीत होकर प्रसन्न पिनाकधारी परमेश्वरको प्रणाम करके उनसे कहा—'हे महेश्वर! यदि ऐसा है, तो आप इन देवी पार्वतीके साथ अनेकविध भोगोंके द्वारा क्रीड़ा क्यों करते हैं; कृपा करके यह बतायें' ॥ १-२ ॥
सूत उवाचसूतजी बोले
एवमुक्तः प्रहस्येशः पिनाकी नीललोहितः।<br>प्राह तामम्बिकां प्रेक्ष्य प्रणिपत्य स्थितान् द्विजान्॥ ३[हे ऋषियो!] ऐसा कहे जानेपर पिनाकधारी नीललोहित ईश्वरने हँसकर उन अम्बिकाकी ओर देखकर वहाँ स्थित द्विजोंने प्रणाम करके उनसे कहा—
बन्धमोक्षौ न चैवेह मम स्वेच्छाशरीरिणः।<br>अकर्ताज्ञः पशुर्जीवो विभुर्भोक्ता ह्यणुः पुमान्॥ ४'अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाले मेरे लिये न बन्धन है, न मोक्ष है। मैं सर्वव्यापी, कर्तृत्वरहित तथा सर्वज्ञ हूँ; जबकि यह जीव अणुरूप, भोक्ता तथा अज्ञ है।
मायी च मायया बद्धः कर्मभिर्युज्यते तु सः।<br>ज्ञानं ध्यानं च बन्धश्च मोक्षो नास्त्यात्मनो द्विजाः॥ ५जो मायी है, वह मायासे सकाम कर्मद्वारा बँधा हुआ है और वह कर्मोंसे लिप्त है। हे द्विजो! आत्माके लिये ज्ञान, ध्यान, बन्धन तथा मोक्ष नहीं हैं।
यदैवं मयि विद्वान् यस्तस्यापि न च सर्वतः।<br>एषा विद्या ह्यहं वेद्यः प्रज्ञैषा च श्रुतिः स्मृतिः॥ ६जो विद्वान् मुझमें ऐसा अनुभव कर लेता है, उसके लिये भी ये सब नहीं होते हैं। ये [पार्वती] विद्या हैं और मैं वेद्य हूँ। ये प्रज्ञा, श्रुति तथा स्मृति हैं।
धृतिरेषा मया निष्ठा ज्ञानशक्तिः क्रिया तथा।<br>इच्छाख्या च तथा ह्याज्ञा द्वे विद्ये न च संशयः॥ ७ये मेरे द्वारा प्रतिष्ठित धृति, निष्ठा, ज्ञानशक्ति, क्रिया, इच्छा तथा आज्ञा हैं। ये (परा-अपरा) दोनों विद्याएँ हैं; इसमें सन्देह नहीं है।
न ह्येषा प्रकृतिर्जैवी विकृतिश्च विचारतः।<br>विकारो नैव मायैषा सदसद्व्यक्तिवर्जिता॥ ८ये जीवसम्बन्धी प्रकृति नहीं हैं। विचार किया जाय, तो ये विकृति भी नहीं हैं। विकार नहीं हैं; ये माया हैं, जो सत्-असत्‌से रहित अर्थात् अनिर्वचनीय हैं।
पुरा ममाज्ञा मद्द्वक्त्रात्समुत्पन्ना सनातनी।<br>पञ्चवक्त्रा महाभागा जगतामभयप्रदा॥ ९पूर्वकालमें लोगोंको अभय प्रदान करनेवाली, महाभाग्यवती तथा पाँच मुखवाली

अध्याय ८७ ] सनकादि मुनीश्वरोंको शिवज्ञानका उपदेश ४४७


तामाज्ञां सम्प्रविश्याहं चिन्तयञ्जगतां हितम्।<br>सप्तविंशत्प्रकारेण सर्वं व्याप्यानया शिवः ॥ १०<br>तदाप्रभृति वै मोक्षप्रवृत्तिर्द्विजसत्तमाः।मेरी यह सनातनी आज्ञा मेरे मुखसे उत्पन्न हुई थी। तब जगत्के कल्याणका चिन्तन करता हुआ मैं शिव उस आज्ञामें प्रविष्ट होकर इनके साथ सत्ताईस तत्त्वोंसे सबको व्याप्त करके स्थित हुआ। हे श्रेष्ठ द्विजो! तभीसे मुक्ति प्रारम्भ हुई॥ ३-१०१/२॥
सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा तदापश्यद्भवानिं परमेश्वरः॥ ११<br>भवानी च तमालोक्य मायामहरदव्यया।<br>ते मायामलनिर्मुक्ता मुनयः प्रेक्ष्य पार्वतीम्॥ १२<br>प्रीता बभूवुर्मुक्ताश्च तस्मादेषा परा गतिः।<br>उमाशङ्करयोर्भेदो नास्त्येव परमार्थतः॥ १३<br>द्विधासौ रूपमास्थाय स्थित एव न संशयः।<br>यदा विद्वानसङ्गः स्यादाज्ञया परमेष्ठिनः ॥ १४सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] ऐसा कहकर परमेश्वरने भवानीकी ओर देखा और सनातनी भवानीने उन [परमेश्वर]–को देखकर मायाको हटा लिया; तब मायाके मलसे मुक्त हुए वे मुनिगण पार्वतीको देखकर प्रसन्न होकर मुक्त हो गये। अतः ये [पार्वती] ही परागति हैं। वस्तुतः उमा तथा शंकरमें भेद नहीं है; वे [शिव] दो रूप धारण करके स्थित हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ ११-१३१/२॥
तदा मुक्तिः क्षणादेव नान्यथा कर्मकोटिभिः।<br>क्रमोऽविवक्षितो भूतविवृद्धः परमेष्ठिनः ॥ १५<br>प्रसादेन क्षणान्मुक्तिः प्रतिज्ञैषा न संशयः।<br>गर्भस्थो जायमानो वा बालो वा तरुणोऽपि वा ॥ १६<br>वृद्धो वा मुच्यते जन्तुः प्रसादात्परमेष्ठिनः।<br>अण्डजश्चोद्भिज्जो वापि स्वेदजो वापि मुच्यते ॥ १७<br>प्रसादाद्देवदेवस्य नात्र कार्या विचारणा।<br>एष एव जगन्नाथो बन्धमोक्षकरः शिवः ॥ १८जब शिवकी मायासे विद्वान् अनासक्त हो जाता है, तब क्षणभरमें [उसकी] मुक्ति हो जाती है; अन्यथा करोड़ों कर्मोंसे भी मुक्ति नहीं होती। ऋषियोंके द्वारा बताया गया मुक्तिक्रम परमेष्ठी शिवके लिये विवक्षित नहीं है। परमेश्वरकी कृपासे क्षणभरमें मुक्ति हो जाती है, यह उनकी प्रतिज्ञा है; इसमें सन्देह नहीं है। परमेष्ठी शिवकी कृपासे जीव मुक्त हो जाता है, चाहे वह गर्भमें स्थित हो, उत्पन्न हो रहा हो, बालक हो, तरुण हो अथवा वृद्ध हो। देवोंके देव [महेश्वर]–के अनुग्रहसे अण्डज, उद्भिज्ज तथा स्वेदज [प्राणी] भी मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १४-१७१/२॥
भूर्भुवःस्वर्महश्चैव जनः साक्षात्तपः स्वयम्।<br>सत्यलोकस्तथाण्डानां कोटिकोटिशतानि च ॥ १९<br>विग्रहं देवदेवस्य तथाण्डावरणाष्टकम्।<br>सप्तद्वीपेषु सर्वेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ २०<br>समुद्रेषु च सर्वेषु वायुस्कन्धेषु सर्वतः।<br>तथान्येषु च लोकेषु वसन्ति च चराचराः ॥ २१<br>सर्वे भवांशजा नूनं गतिस्तेषां स एव वै।<br>सर्वो रुद्रो नमस्तस्मै पुरुषाय महात्मने ॥ २२ये जगत्पति शिव ही बन्धन तथा मोक्ष करनेवाले हैं। भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः तथा सत्यम्—ये लोक और करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड तथा अण्डोंके आठों आवरण—ये सब उन देवदेव [महेश्वर]–के विग्रह (शरीर) हैं। सातों द्वीपोंमें, सभी पर्वतोंमें, वनोंमें, समुद्रोंमें, सभी वायुके स्कन्धोंमें तथा अन्य लोकोंमें जो चराचर जीव निवास करते हैं—वे सब शिवके अंशसे उत्पन्न हुए हैं; निश्चित रूपसे इनकी गति वे ही हैं। सब कुछ रुद्र ही हैं। उन महात्मा पुरुषको नमस्कार है॥ १८-२२॥
विश्वं भूतं तथा जातं बहुधा रुद्र एव सः।<br>रुद्राज्ञैषा स्थिता देवी ह्यानया मुक्तिरम्बिका ॥ २३उन रुद्रने ही सम्पूर्ण जगत्को तथा सभी जीवोंको

८८- पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोत्रका स्वरूप

४४८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
इत्येवं खेचराः सिद्धा जजल्पुः प्रीतमानसाः।<br>यदावलोक्य तान् सर्वान् प्रसादादनयाम्बिका ॥ २४<br>तदा तिष्ठन्ति सायुज्यं प्राप्तास्ते खेचराः प्रभोः॥ २५उत्पन्न किया है। ये देवी अम्बिका रुद्रकी आज्ञाके रूपमें विराजमान हैं; मुक्ति इन्हींसे प्राप्त होती है—ऐसा आकाशचारी सिद्धोंने प्रसन्नचित्त होकर कहा है। जब वे [शिव] इन आज्ञारूपी अम्बिकाके साथ स्थित होकर उन सबको कृपापूर्वक देखते हैं, तब वे आकाशचारी सिद्धगण प्रभुका सायुज्य प्राप्त कर लेते हैं और सदाके लिये उसीमें स्थित हो जाते हैं॥ २३—२५॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मुनिमोहशमनं नाम सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मुनिमोहशमन' नामक सत्तासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८७ ॥


अट्ठासीवाँ अध्याय

पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>केन योगेन वै सूत गुणप्राप्तिः सतामिह।<br>अणिमादिगुणोपेता भवन्त्येवेह योगिनः।<br>तत्सर्वं विस्तरात्सूत वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १**ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! किस योगसे सज्जनोंको इस लोकमें मोक्षकी प्राप्ति होती है और योगिजन अणिमा आदि गुणोंसे युक्त होते हैं? हे सूतजी! इस समय आप विस्तारपूर्वक यह सब बतायें॥ १॥
सूत उवाच<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि योगं परमदुर्लभम्।<br>पञ्चधा संस्मरेदादौ स्थाप्य चित्ते सनातनम्॥ २<br>कल्पयेच्चासनं पद्मं सोमसूर्याग्निसंयुतम्।<br>षड्विंशच्छक्तिसंयुक्तमष्टधा च द्विजोत्तमाः॥ ३<br>ततः षोडशधा चैव पुनर्द्वादशधा द्विजाः।<br>स्मरेच्च तत्तथा मध्ये देव्या देवमुमापतिम्॥ ४<br>अष्टशक्तिसमायुक्तमष्टमूर्तिमजं प्रभुम्।<br>ताभिश्चाष्टविधा रुद्राश्चतुःषष्टिविधाः पुनः॥ ५<br>शक्तयश्च तथा सर्वा गुणाष्टकसमन्विताः।<br>एवं स्मरेत्क्रमेणैव लब्ध्वा ज्ञानमनुत्तमम्॥ ६<br>एवं पाशुपतं योगं मोक्षसिद्धिप्रदायकम्।<br>तस्याणिमादयो विप्रा नान्यथा कर्मकोटिभिः॥ ७सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] अब मैं परम दुर्लभ योगका वर्णन करूँगा। सबसे पहले चित्तमें सनातन शिवको स्थापित करके उनके [सद्योजात आदि] पाँच रूपोंका स्मरण करना चाहिये और हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! चन्द्र-सूर्य-अग्निसे युक्त तथा छब्बीस शक्तियोंसे समन्वित अष्टदलकमल, उसके ऊपर षोडशदल-कमल, पुनः उसके ऊपर द्वादशदलकमलरूप आसनकी भावना करनी चाहिये। तदनन्तर हे द्विजो! उसके मध्यमें देवीके साथ आठ शक्तियोंसहित अष्टमूर्ति, अजन्मा, ऐश्वर्यमय भगवान् उमापतिका स्मरण करना चाहिये। उन शक्तियोंके साथ आठ रुद्र और आठों सिद्धियोंसे सम्पन्न सभी चौंसठ शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं—ऐसा क्रमसे स्मरण करना चाहिये। हे विप्रो! इस प्रकार उत्तम ज्ञान प्राप्त करके जो मोक्षसिद्धि प्रदान करनेवाले पाशुपतयोगको करता है, उसे अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं; अन्यथा करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं मिल सकतीं॥ २—७॥
तत्राष्टगुणमैश्वर्यं योगिनां समुदाहृतम्।<br>तत्सर्वं क्रमयोगेन ह्युच्यमानं निबोधत॥ ८हे मुनियो! योगियोंका आठ गुणोंसे युक्त ऐश्वर्य

अध्याय ८८ ] पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप ४४९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अणिमा लघिमा चैव महिमा प्राप्तिरेव च।<br>प्राकाम्यं चैव सर्वत्र ईशित्वं चैव सर्वतः॥ ९<br><br>वशित्वमथ सर्वत्र यत्र कामावसायिता।<br>तच्चापि त्रिविधं ज्ञेयमैश्वर्यं सार्वकामिकम्॥ १०<br><br>सावद्यं निरवद्यं च सूक्ष्मं चैव प्रवर्तते।<br>सावद्यं नाम यत्तत्र पञ्चभूतात्मकं स्मृतम्॥ ११<br><br>इन्द्रियाणि मनश्चैव अहङ्कारश्च यः स्मृतः।<br>तत्र सूक्ष्मप्रवृत्तिस्तु पञ्चभूतात्मिका पुनः॥ १२<br><br>इन्द्रियाणि मनश्चित्तबुद्ध्यहङ्कारसंज्ञितम्।<br>तथा सर्वमयं चैव आत्मस्था ख्यातिरेव च॥ १३<br><br>संयोग एव त्रिविधः सूक्ष्मेष्वेव प्रवर्तते।<br>पुनरष्टगुणश्चापि सूक्ष्मेष्वेव विधीयते॥ १४<br><br>तस्य रूपं प्रवक्ष्यामि यथाह भगवान् प्रभुः।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतेषु यथास्य नियमः स्मृतः॥ १५<br><br>अणिमाद्यं तथाव्यक्तं सर्वत्रैव प्रतिष्ठितम्।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतानां दुष्प्राप्यं समुदाहृतम्॥ १६<br><br>तत्तस्य भवति प्राप्यं प्रथमं योगिनां बलम्।<br>लङ्घनं प्लवनं लोके रूपमस्य सदा भवेत्॥ १७कहा गया है। उन सबको क्रमसे बता रहा हूँ; [आपलोग] सुनिये। अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व तथा कामावसायिता—ये आठ सिद्धियाँ हैं। सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले उस ऐश्वर्यको भी तीन प्रकारका जानना चाहिये; सावद्य, निरवद्य तथा सूक्ष्म—ये तीन प्रकार होते हैं। उनमें जो सावद्य है, वह पंचभूतात्मक कहा गया है। इन्द्रियाँ, मन तथा जो अहंकार कहा गया है—ये निरवद्य ऐश्वर्य हैं। आत्मामें पंचभूतोंकी तन्मात्रारूपा सूक्ष्म प्रवृत्ति ही सूक्ष्म ऐश्वर्य है। इस प्रकार इन्द्रियाँ, मन, चित्त, बुद्धि तथा अहंकार निरवद्य ऐश्वर्य हैं; पंचभूतमय ऐश्वर्य सावद्य नामवाला है और शब्द आदि विषयरूप ऐश्वर्य सूक्ष्म है। तीन प्रकारका यह भेद [अणिमा आदि] सूक्ष्म ऐश्वर्योंमें प्रवृत्त होता है। पुनः आठ गुणोंका भेद भी सूक्ष्म ऐश्वर्योंमें होता है। तीनों लोकोंके सभी प्राणियोंमें सर्वत्र यह अणिमादि अव्यक्त ऐश्वर्य जिस प्रकारसे प्रतिष्ठित है और जैसा इसका नियम बताया गया है—भगवान् प्रभुने इस विषयमें जैसा कहा है, उसके स्वरूपको मैं बताऊँगा। जो ऐश्वर्य त्रिलोकीमें सभी प्राणियोंके लिये दुर्लभ बताया गया है, वह योगियोंके लिये प्राप्त होनेवाला अणिमारूप पहला बल होता है; इसका स्वरूप संसारमें कहीं भी, कभी भी लंघन तथा प्लवन करनेका होता है॥ ८—१७॥
शीघ्रत्वं सर्वभूतेषु द्वितीयं तु पदं स्मृतम्।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतानां महिम्ना चैव वन्दितम्॥ १८<br><br>महित्वं चापि लोकेऽस्मिंस्तृतीयो योग उच्यते।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतेषु यथेष्टगमनं स्मृतम्॥ १९सभी प्राणियोंकी अपेक्षा शीघ्रत्व गुणसे सम्पन्न होना लघिमा नामक दूसरी सिद्धि कही गयी है। तीनों लोकोंमें सभी प्राणियोंमें माहात्म्यबलसे वन्दित तथा पूजित होना इस लोकमें महिमारूप तीसरी सिद्धि कही जाती है। त्रिलोकीमें सभी प्राणियोंके भीतर स्वेच्छासे प्रवेश करना प्राप्ति नामक सिद्धि कही गयी है॥ १८-१९॥
प्राकामान् विषयान् भुङ्क्ते तथाप्रतिहतः क्वचित्।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतानां सुखदुःखं प्रवर्तते॥ २०<br><br>ईशो भवति सर्वत्र प्रविभागेन योगवित्।<br>वश्यानि चास्य भूतानि त्रैलोक्ये सचराचरे॥ २१प्राकाम्य ऐश्वर्यसे युक्त व्यक्ति तीनों लोकोंमें कहीं भी बाधारहित होकर विषयोंका भोग करता है और सभी प्राणियोंको सुख-दुःखमें प्रवृत्त कर सकता है। ईशित्व ऐश्वर्यके द्वारा वह योगवेत्ता यथेष्ट देहधारणके द्वारा सभी जगह स्वामी बन जाता है। वशित्वसे
४५०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| इच्छया तस्य रूपाणि भवन्ति न भवन्ति च।<br>यत्र कामावसायित्वं त्रैलोक्ये सचराचरे॥ २२<br><br>शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चैव मनस्तथा।<br>प्रवर्तन्तेऽस्य चेच्छातो न भवन्ति यथेच्छया॥ २३<br><br>न जायते न म्रियते छिद्यते न च भिद्यते।<br>न दह्यते न मुह्येत लीयते न च लिप्यते॥ २४<br><br>न क्षीयते न क्षरति खिद्यते न कदाचन।<br>क्रियते वा न सर्वत्र तथा विक्रीयते न च॥ २५<br><br>अगन्धरसरूपस्तु अस्पर्शः शब्दवर्जितः।<br>अवर्णो ह्रास्वरश्चैव असवर्णस्तु कर्हिचित्॥ २६<br><br>स भुङ्क्ते विषयांश्चैव विषयैर्न च युज्यते।<br>अणुत्वात्तु परः सूक्ष्मः सूक्ष्मत्वादपवर्गिकः॥ २७ | चराचरसहित त्रिलोकीमें सभी प्राणी उसके वशमें हो जाते हैं। जिसके पास कामावसित्त्व [ऐश्वर्य] होता है, चराचरसहित तीनों लोकोंमें उसके रूप इच्छाके अनुसार बन सकते हैं और नहीं भी बन सकते हैं। शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध, रूप तथा मन उसकी इच्छासे होते हैं और उसकी इच्छाके अनुसार नहीं भी होते हैं। वह कभी भी न उत्पन्न होता है, न मरता है, न कट सकता है, न भेदा जा सकता है, न जलाया जा सकता है, न मूर्च्छित होता है, न आकर्षित होता है, न लिप्त (आसक्त) होता है, न उसका क्षय होता है, वह नष्ट नहीं होता है और न तो खिन्न होता है। वह सर्वत्र न तो कुछ करता है और न तो विकृत ही होता है। वह शब्द, स्पर्श, गन्ध, रस तथा रूपसे रहित होता है। वह सदा अवर्ण, स्वररहित तथा असवर्ण होता है। वह विषयोंका भोग करता है, किन्तु उनसे लिप्त नहीं होता है॥ २०—२६॥ | | व्यापकस्त्वपवर्गाच्च व्यापकात्पुरुषः स्मृतः।<br>पुरुषः सूक्ष्मभावात्तु ऐश्वर्ये परमे स्थितः॥ २८<br><br>गुणोत्तरमथैश्वर्ये सर्वतः सूक्ष्ममुच्यते।<br>ऐश्वर्यं चाप्रतीघातं प्राप्य योगमनुत्तमम्॥ २९<br><br>अपवर्गं ततो गच्छेत्सूक्ष्मं तत्परमं पदम्।<br>एवं पाशुपतं योगं ज्ञातव्यं मुनिपुङ्गवाः॥ ३० | अणुभाववाला होनेके कारण जीव सूक्ष्म है और सूक्ष्म होनेके कारण मुक्तिके योग्य है। मुक्त होनेके कारण व्यापक है और व्यापक होनेके कारण वह पुरुष कहा गया है। सूक्ष्म भाव होनेके कारण वह पुरुष परम ऐश्वर्यमें स्थित होता है। ऐश्वर्योंका गुण क्रमशः सूक्ष्म होता जाता है—ऐसा कहा गया है। अबाधित ऐश्वर्य तथा उत्तम योग प्राप्त करके साधक मुक्ति प्राप्त करता है; वही सूक्ष्म परम पद है॥ २७—२९ १/२॥ | | स्वर्गापवर्गफलदं शिवसायुज्यकारणम्।<br>अथवा गतविज्ञानो रागात्कर्म समाचरेत्॥ ३१<br><br>राजसं तामसं वापि भुक्त्वा तत्रैव मुच्यते।<br>तथा सुकृतकर्मा तु फलं स्वर्गे समश्नुते॥ ३२<br><br>तस्मात्स्थानात्पुनः श्रेष्ठो मानुष्यमुपपद्यते।<br>तस्माद् ब्रह्म परं सौख्यं ब्रह्म शाश्वतमुत्तमम्॥ ३३<br><br>ब्रह्म एव हि सेवेत ब्रह्मैव हि परं सुखम्।<br>परिश्रमो हि यज्ञानां महतार्थेन वर्तते॥ ३४ | हे श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार पाशुपतयोगको जानना चाहिये, जो स्वर्ग तथा मोक्षका फल प्रदान करनेवाला और शिव-सायुज्यका कारण है। विज्ञानरहित व्यक्ति रागके कारण कर्म करता है और राजस अथवा तामस भोग करके वहींपर मुक्त हो जाता है। पुण्यकर्म करनेवाला स्वर्गमें फल प्राप्त करता है; तत्पश्चात् वह श्रेष्ठ प्राणी [पुण्यके क्षीण होनेपर] पुनः मनुष्यलोकमें वापस आता है। अतः ब्रह्म ही परम सुख है और ब्रह्म ही परम शाश्वत है। ब्रह्मकी ही उपासना करनी चाहिये; क्योंकि ब्रह्म ही परम आनन्दस्वरूप है॥ ३०—३३ १/२॥ |

अध्याय ८८] पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप ४५१


भूयो मृत्युवशं याति तस्मान्मोक्षः परं सुखम्।<br>अथवा ध्यानसंयुक्तो ब्रह्मतत्त्वपरायणः॥ ३५<br>न तु च्यावयितुं शक्यो मन्वन्तरशतैरपि।<br>दृष्ट्वा तु पुरुषं दिव्यं विश्वाख्यं विश्वतोमुखम्॥ ३६<br>विश्वपादशिरोग्रीवं विश्वेशं विश्वरूपिणम्।<br>विश्वगन्धं विश्वमाल्यं विश्वाम्बरधरं प्रभुम्॥ ३७यज्ञोंमें बहुत धनके व्ययके साथ ही परिश्रम होता है; उसके बाद भी मनुष्यको मृत्युके वशमें होना पड़ता है, अतः मोक्ष ही परम आनन्द है। विश्व नामवाले, सभी ओर मुख-पैर-सिर-ग्रीवावाले, विश्वके स्वामी, सभी रूपोंवाले, सभी गन्धोंसे युक्त, सम्पूर्ण विश्वको माला तथा वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले (सर्वव्यापक) भगवान् दिव्य पुरुषका दर्शन करके ध्यानयुक्त तथा ब्रह्मतत्त्वपरायण व्यक्तिको सैकड़ों मन्वन्तरोंमें भी [उसके पदसे] च्युत नहीं किया जा सकता है॥ ३४—३७॥
गोभिर्महीं सम्पत्तते पतत्रिणो<br>नैवं भूयो जनयत्येवमेव।<br>कविं पुराणमनुशासितारं<br>सूक्ष्माच्च सूक्ष्मं महतो महान्तम्॥ ३८<br>योगेन पश्येन्न च चक्षुषा पुन-<br>र्निरेन्द्रियं पुरुषं रुक्मवर्णम्।<br>आलिङ्गिनं निर्गुणं चेतनं च<br>नित्यं सदा सर्वगं सर्वसारम्॥ ३९<br>पश्यन्ति युक्त्या ह्यचलप्रकाशं<br>तद्भावितास्तेजसा दीप्यमानम्।<br>अपाणिपादोदरपार्श्वजिह्वो<br>ह्यतीन्द्रियो वापि सुसूक्ष्म एकः॥ ४०<br>पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णो<br>न चास्त्यबुद्धं न च बुद्धिरस्ति।<br>स वेद सर्वं न च सर्ववेद्यं<br>तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥ ४१पुरुषरूप ईश्वर सूर्यकी किरणोंके माध्यमसे पृथ्वीपर पहुँचता है और निरन्तर ही पूर्वसदृश जगत्‌को उत्पन्न करता है; किंतु प्रलयकालमें उत्पन्न नहीं करता। योगी उस कवि, पुरातन, सभीपर शासन करनेवाले, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, महान्‌से भी महान्, इन्द्रियोंसे रहित, स्वर्णके रंगवाले, सर्वरूपमय, निर्गुण, चैतन्यस्वरूप, नित्य सर्वत्र गमन करनेवाले (सर्वव्यापी) तथा सर्वसारस्वरूप पुरुषको योगसे देख सकता है न कि चक्षुसे। उसी ब्रह्ममें लीन रहनेवाले साधक उस अचल प्रकाशवाले तथा अपने तेजसे प्रकाशित प्रभुको योगसे देखते हैं। वह [ब्रह्म] हाथ-पैर-उदर-पार्श्व-जिह्वासे रहित है, इन्द्रियोंसे अतीत है, अत्यन्त सूक्ष्म है तथा अद्वितीय है। वह नेत्ररहित होता हुआ भी देखता है, कानोंसे रहित होता हुआ भी सुनता है और बुद्धिरहित होता हुआ भी सब कुछ जानता है। वह सबको जानता है, किंतु सबके द्वारा वेद्य नहीं है। उसे आदि महान् पुरुष कहा गया है॥ ३८—४१॥
अचेतनां सर्वगतां सूक्ष्मां प्रसवधर्मिणीम्।<br>प्रकृतिं सर्वभूतानां युक्ताः पश्यन्ति योगिनः॥ ४२उनसे युक्त योगिजन सभी प्राणियोंकी प्रकृतिको अचेतन, सर्वव्यापिनी, सूक्ष्म तथा प्रसवधर्मिणी (सृष्टि-उत्पादनकर्त्री)-के रूपमें देखते हैं॥ ४२॥
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।<br>सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ ४३वह [ब्रह्म] सभी ओर हाथ तथा पैरवाला है। वह सभी ओर नेत्र, सिर तथा मुखवाला है। वह सभी ओर कानवाला है तथा संसारमें सभीको व्याप्त करके स्थित है।
युक्तो योगेन चेशानं सर्वतश्च सनातनम्।<br>पुरुषं सर्वभूतानां तं विद्वान्न विमुह्यति॥ ४४योगसे युक्त विद्वान् [व्यक्ति] ईशान, सनातन तथा सभी प्राणियोंके परम पुरुष उन ब्रह्मके विषयमें मोहित नहीं होता
भूतात्मानं महात्मानं परमात्मानमव्ययम्।<br>सर्वात्मानं परं ब्रह्म तद्वै ध्याता न मुह्यति॥ ४५है। जो व्यक्ति सभी प्राणियोंकी आत्मा, महात्मा, परमात्मा,
४५२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| पवनो हि यथाग्राह्यो विचरन् सर्वमूर्तिषु।<br>पुरि शेते सुदुर्ग्राह्यस्तस्मात्पुरुष उच्यते॥ ४६ | अविनाशी तथा सर्वात्मा परब्रह्मका ध्यान करनेवाला है, वह मोहको प्राप्त नहीं होता है॥ ४३-४५॥<br>जिस प्रकार सभी प्राणियोंके भीतर विचरण करता हुआ भी वायु अग्राह्य है, ठीक उसी तरह देहमें स्थित होते हुए भी परमात्मा सुदुर्ग्राह्य है। वह देहरूपी पुरमें शयन करता है, अतः पुरुष कहा जाता है॥ ४६॥ | | अथ चेल्लुप्तधर्मा तु सावशेषैः स्वकर्मभिः।<br>ततस्तु ब्रह्मगर्भे वै शुक्रशोणितसंयुते॥ ४७<br><br>स्त्रीपुंसोः सम्प्रयोगे हि जायते हि ततः प्रभुः।<br>ततस्तु गर्भकालेन कललं नाम जायते॥ ४८<br><br>कालेन कललं चापि बुद्बुदं सम्प्रजायते।<br>मृत्पिण्डस्तु यथा चक्रे चक्रावर्तेन पीडितः॥ ४९<br><br>हस्ताभ्यां क्रियमाणस्तु बिम्बत्वमनुगच्छति।<br>एवमाध्यात्मिकैर्युक्तो वायुना सम्प्रपूरितः॥ ५० | पुण्यफलके भोगके अनन्तर लुप्त धर्मवाला जीव अपने अवशिष्ट कर्मोंके साथ पुनः ब्राह्मणयोनिमें जन्म लेता है। स्त्री-पुरुषके संयोग होनेके अनन्तर शुक्र तथा रक्तके मिलनेपर गर्भकी उत्पत्ति होती है, पुनः वह कललके रूपमें हो जाता है और कुछ समय बाद वह कलल भी बुलबुला बन जाता है। जिस प्रकार मिट्टीका पिण्ड घूमते हुए चाकपर कुम्हारके हाथोंसे आकार प्राप्त करता है, वैसे ही यह जीव पंचमहाभूतोंसे युक्त होकर तथा वायुसे पूरित होकर आकार प्राप्त करता है॥ ४७-५०॥ | | यदि योनिं विमुञ्चामि तत्प्रपद्ये महेश्वरम्।<br>यावद्धि वैष्णवो वायुर्जातमात्रं न संस्पृशेत्॥ ५१<br><br>तावत्कालं महादेवमर्चयामीति चिन्तयेत्।<br>जायते मानुषस्तत्र यथारूपं यथावयः॥ ५२ | गर्भमें जीव सोचता है कि यदि मैं गर्भसे निकलूँगा, तो महेश्वरकी शरणमें जाऊँगा और उत्पन्न होनेपर जबतक वैष्णव वायु अर्थात् माया मेरा स्पर्श नहीं करेगी, तबतक मैं महादेवका अर्चन करूँगा। इस प्रकार जीव अपने रूप तथा वयके अनुसार अर्थात् अपने प्रारब्धके अनुसार मनुष्य बनता है॥ ५१-५२॥ | | वायुः सम्भवते खात्तु वाताद्भवति वै जलम्।<br>जलात्सम्भवति प्राणः प्राणाच्छुक्रं विवर्धते॥ ५३<br><br>रक्तभागास्त्रयस्त्रिंशद्रेतोभागाश्चतुर्दश ।<br>भागतोऽर्धफलं कृत्वा ततो गर्भो निषिच्यते॥ ५४<br><br>ततस्तु गर्भसंयुक्तः पञ्चभिर्वायुभिर्वृतः।<br>पितुः शरीरात्प्रत्यङ्गं रूपमस्योपजायते॥ ५५<br><br>ततोऽस्य मातुराहारात्पीतलीढप्रवेशनात्।<br>नाभिदेशेन वै प्राणास्ते ह्याधारा हि देहिनाम्॥ ५६ | आकाशसे वायु उत्पन्न होता है, वायुसे जल उत्पन्न होता है, जलसे प्राण होता है और प्राणसे शुक्र बढ़ता है। रक्तके तैंतीस भाग तथा शुक्रके चौदह भाग मिश्रित होते हैं; उन दोनोंके भागसे आधे जातीफलके सदृश देह प्राप्त करके गर्भकी वृद्धि होती है। तत्पश्चात् गर्भसे युक्त जीव पाँच वायुओंसे घिर जाता है। पिताके शरीरसे इसके अंग-प्रत्यंग तथा रूपका विकास होता है और माताके आहारसे नाभिदेशसे पीये गये तथा चूसे गये रस आदिके प्रवेशसे जीवका पोषण होता है। वे प्राण (वायु) देहधारियोंके आधार हैं॥ ५३-५६॥ | | नवमासात्परिक्लिष्टः संवेष्टितशिरोधरः।<br>वेष्टितः सर्वगात्रैश्च अपर्याप्तप्रवेशनः॥ ५७ | नौ महीनेतक शिशु बहुत कष्टमें रहता है, उसकी गर्दन नाभिनालसे लिपटी रहती है, उसका सम्पूर्ण शरीर संकुचित रहता है, वह गर्भमें अपर्याप्त (सीमित) |

अध्याय ८८ ] पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप४५३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नवमासोषितश्चापि योनिच्छिद्रादवाङ्मुखः।<br>ततः स्वकर्मभिः पापैर्निरयं सम्प्रपद्यते॥ ५८<br><br>असिपत्रवनं चैव शाल्मलिच्छेदनं तथा।<br>ताडनं भक्षणं चैव पूयशोणितभक्षणम्॥ ५९<br><br>यथा ह्यापस्तु संछिन्नाः संश्लेषमुपयान्ति वै।<br>तथा छिन्नाश्च भिन्नाश्च यातनास्थानमागताः॥ ६०<br><br>एवं जीवास्तु तैः पापैस्तप्यमानाः स्वयंकृतैः।<br>प्राप्नुयुः कर्मभिः शेषैर्दुःखं वा यदि वेतरत्॥ ६१स्थानमें पड़ा रहता है। नौ महीनेतक गर्भमें रहनेके बाद वह शिशु नीचेकी ओर मुख किये हुए योनिमार्गसे बाहर निकलता है। इसके पश्चात् अपने पापमय कर्मोंके कारण नरकमें गिरता है; असिपत्रवन तथा शाल्मलिछेदन नामक नरकमें उसका ताड़न तथा भक्षण किया जाता है और उसे पीव तथा रक्तका भक्षण करना पड़ता है। जैसे गर्म किये जानेपर जल श्लेष्मायुक्त (बुलबुलायुक्त) हो जाता है, वैसे ही जीव यातनास्थानको प्राप्त करके छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। इस प्रकार जीव अपने द्वारा किये गये उन पापोंसे तप्त होते हैं; वे अपने अवशिष्ट कर्मोंके अनुसार दुःख या सुख प्राप्त करते हैं॥ ५७-६१॥
एकेनैव तु गन्तव्यं सर्वमुत्सृज्य वै जनम्।<br>एकेनैव तु भोक्तव्यं तस्मात्सुकृतमाचरेत्॥ ६२<br><br>न ह्येनं प्रस्थितं कश्चिद् गच्छन्तमनुगच्छति।<br>यदनेन कृतं कर्म तदेनमनुगच्छति॥ ६३सभीलोगोंको छोड़कर जीवको अकेला ही जाना पड़ता है और अकेला ही भोगना पड़ता है; अतः उत्तम आचरण करना चाहिये। [मृत्युके पश्चात्] प्रस्थान करनेवाले इस जीवके पीछे-पीछे कोई भी नहीं जाता है; इस जीवके द्वारा जो कर्म किया गया होता है, वही इसके साथ जाता है॥ ६२-६३॥
ते नित्यं यमविषयेषु सम्प्रवृत्ताः<br>क्रोशन्तः सततमनिष्टसम्प्रयोगैः।<br>शुष्यन्ते परिगतवेदनाशरीरा<br>बह्वीभिः सुभृशमनन्तयातनाभिः॥ ६४वे जीव [यमलोकमें] निरन्तर अनिष्ट दण्डोंके द्वारा कराहते हुए नित्य यमविषयोंमें प्रवृत्त रहते हैं; अनेक प्रकारकी बड़ी-बड़ी अनन्त यातनाओंके द्वारा वेदनाओंसे घिरे हुए शरीरवाले वे जीव शोकसन्तप्त रहते हैं॥ ६४॥
कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते।<br>तदभ्यासो हरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत्॥ ६५<br><br>अनादिमान् प्रबन्धः स्यात्पूर्वकर्मणि देहिनः।<br>संसारं तामसं घोरं षड्विधं प्रतिपद्यते॥ ६६<br><br>मानुष्यात्पशुभावश्च पशुभावान्मृगो भवेत्।<br>मृगत्वात्पक्षिभावश्च तस्माच्चैव सरीसृपः॥ ६७<br><br>सरीसृपत्वाद् गच्छेद्वै स्थावरत्वं न संशयः।<br>स्थावरत्वे पुनः प्राप्ते यावदुन्मिषते जनः॥ ६८<br><br>कुलालचक्रवद् भ्रान्तस्तत्रैव परिवर्तते।<br>इत्येवं हि मनुष्यादिः संसारस्थावरान्तिकः॥ ६९व्यक्ति मन, वाणी तथा कर्मद्वारा बार-बार जो भी आचरण करता है, वही अभ्यास बनकर इसे उधर ही ले जाता है, अतः [सर्वदा] शुभाचरण करना चाहिये। जीवात्माका पूर्वकर्ममें अनादि दृढ़बन्धन है, उसीसे जीव घोर तामसिक षड्विध संसारको प्राप्त होता है। जीव मनुष्ययोनिसे पशुभावको प्राप्त होता है और पशुभावसे वह मृग होता है, पुनः वह मृगजन्मसे पक्षीका जन्म और पक्षीसे सरीसृप (रेंगनेवाला जन्तु) होता है, इसके बाद वह सरीसृपसे स्थावरत्वको प्राप्त होता है; इसमें सन्देह नहीं है। पुनः स्थावररूप प्राप्त होनेपर जबतक जीव पुनः मनुष्ययोनि नहीं प्राप्त कर

| ४५४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| विज्ञेयस्तामसो नाम तत्रैव परिवर्तते।<br>सात्त्विकश्चापि संसारो ब्रह्मादिः परिकीर्तितः॥ ७०<br><br>पिशाचान्तः स विज्ञेयः स्वर्गस्थानेषु देहिनाम्।<br>ब्राह्मे तु केवलं सत्त्वं स्थावरे केवलं तमः॥ ७१<br><br>चतुर्दशानां स्थानानां मध्ये विष्टम्भकं रजः।<br>मर्मसु च्छिद्यमानेषु वेदनार्तस्य देहिनः॥ ७२<br><br>ततस्तत्परमं ब्रह्म कथं विप्रः स्मरिष्यति।<br>संसारः पूर्वधर्मस्य भावनाभिः प्रणोदितः॥ ७३<br><br>मानुषं भजते नित्यं तस्माद्ध्यानं समाचरेत्।<br>चतुर्दशविधं ह्येतद् बुद्ध्वा संसारमण्डलम्॥ ७४ | लेता, तबतक कुम्हारके चाककी भाँति वह एक ही स्थानपर चक्कर लगाता रहता है। इस प्रकार मनुष्ययोनिसें प्रारम्भ होकर स्थावरयोनितकके इस संसारको तामस जानना चाहिये। ब्रह्मासे प्रारम्भ करके पिशाचतकके संसारको सात्त्विक कहा गया है; इसे देहधारियोंके लिये स्वर्गस्थानमें जानना चाहिये। ब्राह्म जीवनमें केवल सत्त्व, स्थावरमें केवल तम और चौदह स्थानोंके मध्यमें वेदनासे व्याकुल प्राणीके मर्मस्थानोंका वेधन करनेवाला रज विद्यमान है। ऐसी स्थितिमें विप्र उस परम ब्रह्मको कैसे याद कर सकेगा। पूर्व धर्मकी भावनाओंसे प्रेरित होकर यह संसार सदा मनुष्य-योनिसे युक्त रहता है; अतः ध्यान [अवश्य] करना चाहिये॥ ६५-७३ १/२॥ | | नित्यं समारभेद्वर्मं संसारभयपीडितः।<br>ततस्तरति संसारं क्रमेण परिवर्तितः॥ ७५<br><br>तस्माच्च सततं युक्तो ध्यानतत्परयुञ्जकः।<br>तथा समारभेदद्योगं यथात्मानं स पश्यति॥ ७६ | इस संसारमण्डलको चौदह भुवनस्वरूप जानकर संसारभयसे पीड़ित प्राणीको सदा धर्मका आचरण करना चाहिये; तब वह क्रमसे परिवर्तित होकर इस संसारको पार कर लेता है। अतएव निरन्तर ध्यानमग्न होकर योगीको योगका आचरण करना चाहिये, जिससे वह आत्म-साक्षात्कार कर ले॥ ७४-७६॥ | | एष आपः परं ज्योतिरेष सेतुरनुत्तमः।<br>विवृत्या ह्येष सम्भेदाद्भूतानां चैव शाश्वतः॥ ७७<br><br>तदेनं सेतुमात्मानमग्निं वै विश्वतोमुखम्।<br>हृदिस्थं सर्वभूतानामुपासीत महेश्वरम्॥ ७८<br><br>तथान्तःसंस्थितं देवं स्वशक्त्या परिमण्डितम्।<br>अष्टधा चाष्टधा चैव तथा चाष्टविधेन च॥ ७९<br><br>सृष्ट्यर्थं संस्थितं वह्निं सङ्क्षिप्य च हृदि स्थितम्।<br>ध्यात्वा यथावद्देवेशं रुद्रं भुवननायकम्॥ ८०<br><br>हुत्वा पञ्चाहुतीः सम्यक् तच्चिन्तागतमानसः।<br>वैश्वानरं हृदिस्थं तु यथावदनुपूर्वशः॥ ८१<br><br>आपः पूताः सकृत्प्राश्य तूष्णीं हुत्वा ह्युपाविशन्।<br>प्राणायेति ततस्तस्य प्रथमा ह्याहुतिः स्मृता॥ ८२ | सभी जीवोंमें सम्भेद तथा पार्थक्य होनेपर भी ये [शिव] परम ज्योति (सर्वात्मस्वरूप) हैं, ये ही संसारसागरके जलस्वरूप हैं और ये ही उत्तम तथा शाश्वत सेतु भी हैं। अतः सभी प्राणियोंके हृदयमें स्थित इन आत्मस्वरूप, सेतुस्वरूप तथा सभी ओर मुखवाले अग्निस্বরূপ महेश्वरकी उपासना करनी चाहिये। अपनी शक्तिके साथ अन्तःकरणमें स्थित, [पृथ्वी आदि] आठ प्रकारसे, [भव आदि] आठ रूपोंमें तथा वामदेव आदि आठ विग्रहोंके रूपमें विद्यमान रहनेवाले और सृष्टिके लिये अग्निको संक्षिप्त करके हृदयमें विराजमान देवदेवेश लोकनायक भगवान् रुद्रका ध्यान करके उनके चित्तमें मनको लगाकर हृदयमें स्थित वैश्वानरको भली-भाँति क्रमशः पाँच आहुतियाँ देनी चाहिये। शान्तचित्त होकर बैठ करके एक बार पवित्र जलसे आचमन करके आहुति देनी चाहिये। 'प्राणाय स्वाहा' |

अध्याय ८८] पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप४५५
अपानाय द्वितीया च व्यानायेति तथा परा।<br>उदानाय चतुर्थी स्यात्समानायेति पञ्चमी ॥ ८३<br><br>स्वाहाकारैः पृथग् हुत्वा शेषं भुञ्जीत कामतः।<br>अपः पुनः सकृत्प्राश्य आचम्य हृदयं स्पृशेत् ॥ ८४पहली आहुति कही गयी है। दूसरी आहुति 'अपानाय स्वाहा', तीसरी 'व्यानाय स्वाहा', चौथी 'उदानाय स्वाहा' और पाँचवीं आहुति 'समानाय स्वाहा' है। इस प्रकार स्वाहाकारके द्वारा पृथक्-पृथक् आहुति देकर शेषान्नको यथेष्ट ग्रहण करना चाहिये, तत्पश्चात् एक बार जलसे प्राशन तथा पुनः आचमन करके हृदयका स्पर्श करना चाहिये ॥ ८३-८४ ॥
प्राणानां ग्रन्थिरस्यात्मा रुद्रो ह्यात्मा विशान्तकः।<br>रुद्रो वै ह्यात्मनः प्राण एवमाप्याययेत्स्वयम् ॥ ८५<br><br>प्राणे निविष्टो वै रुद्रस्तस्मात्प्राणमयः स्वयम्।<br>प्राणाय चैव रुद्राय जुहोत्यमृतमुत्तमम् ॥ ८६<br><br>शिवाविशेह मामीश स्वाहा ब्रह्मात्मने स्वयम्।<br>एवं पञ्चाहुतीश्चैव श्राद्धे कुर्वीत शासनात् ॥ ८७आप रुद्र ही प्राणोंकी ग्रन्थि हैं, रुद्र ही आत्मा हैं, अहंकार-देवतारूप आप ही दुःखका नाश करनेवाले हैं और रुद्र ही जीवके प्राण हैं—इस प्रकार [कहकर] स्वयंको तृप्त करना चाहिये। रुद्र प्राणमें निविष्ट हैं, अतः रुद्र स्वयं प्राणस्वरूप हैं। प्राणको तथा रुद्रको उत्तम अमृत समर्पित करना चाहिये; हे शिव! हे ईश! आप मुझमें प्रवेश करें, साक्षात् ब्रह्मात्माको स्वाहा—इस प्रकार श्राद्धके अवसरपर शास्त्रानुसार पाँच आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये ॥ ८५-८७ ॥
पुरुषोऽसि पुरे शेषे त्वमङ्गुष्ठप्रमाणतः।<br>आश्रितश्चैव चाङ्गुष्ठमीशः परमकारणम् ॥ ८८<br><br>सर्वस्य जगतश्चैव प्रभुः प्रीणातु शाश्वतः।<br>त्वं देवानामसि ज्येष्ठो रुद्रस्त्वं च पुरो वृषा ॥ ८९<br><br>मृदुस्त्वमन्नमस्मभ्यमेतदस्तु हुतं तव।<br>इत्येवं कथितं सर्वं गुणप्राप्तिविशेषतः ॥ ९०आप पुरुष हैं; आप शरीरमें अँगूठेके परिमाणमें विराजमान हैं। अँगूठेके बराबर होते हुए भी आप ईश्वर परम कारणस्वरूप हैं। सम्पूर्ण जगत्के स्वामी तथा सनातन प्रभु प्रसन्न हों। आप देवताओंमें ज्येष्ठ हैं, आप रुद्र हैं, आप प्रथम इन्द्र थे, आप हमारे लिये कल्याणकारी हों और [हमारे द्वारा] ग्रहण किया गया यह अन्न आपके लिये आहुतिस्वरूप हो ॥ ८८-८९½ ॥
योगाचारः स्वयं तेन ब्रह्मणा कथितः पुरा।<br>एवं पाशुपतं ज्ञानं ज्ञातव्यं च प्रयत्नतः ॥ ९१<br><br>भस्मस्नायी भवेन्नित्यं भस्मलिप्तः सदा भवेत्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान् ॥ ९२<br><br>दैवे कर्मणि पित्र्ये वा स याति परमां गतिम् ॥ ९३[हे ऋषियो!] इस प्रकार मैंने विशेषरूपसे अणिमादि-गुणप्राप्ति-सम्बन्धी सबकुछ कह दिया। पूर्वकालमें स्वयं ब्रह्माने इस योगविद्याको कहा था। इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक पाशुपतविद्याका ज्ञान करना चाहिये, नित्य भस्म-स्नान करना चाहिये और सदा भस्म लगाना चाहिये। जो [व्यक्ति] देवपूजन या पितृकर्म (श्राद्ध)-के अवसरपर इसे पढ़ता है या सुनता है या श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह परमगति प्राप्त करता है ॥ ९०-९३ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽणिमाद्यष्टसिद्धिद्विगुणसंसारप्राणाग्नौ होमादिवर्णनं नामाष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अणिमा आदि आठ सिद्धि-त्रिगुणसंसारप्राणाग्निमें होमादिका वर्णन' नामक अट्ठासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८८ ॥

८९- सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन

४५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग

नवासीवाँ अध्याय

सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन

सूत उवाचसूतजी बोले—
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि शौचाचारस्य लक्षणम्।<br>यदनुष्ठाय शुद्धात्मा प्रेत्य गतिमाप्नुयात्॥ १<br>ब्रह्मणा कथितं पूर्वं सर्वभूतहिताय वै।<br>सङ्क्षेपात्सर्ववेदार्थं सञ्चयं ब्रह्मवादिनाम्॥ २<br>उदयार्थं तु शौचानां मुनीनामुत्तमं पदम्।<br>यस्तत्राथाप्रमत्तः स्यात्स मुनिर्नार्वासीदति॥ ३[हे ऋषियो!] अब मैं इसके बाद शौचाचारका लक्षण बताऊँगा, जिसे करके शुद्ध अन्तःकरणवाला [व्यक्ति] परलोकमें जाकर [उत्तम] गति प्राप्त करता है। पूर्वकालमें ब्रह्माने सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये इसे कहा था। यह संक्षिप्त रूपमें सभी वेदोंका सार है, ब्रह्मवादियोंकी निधि है, आचरणके उत्थानके लिये उपयोगी है और मुनियोंका उत्तम पद है। जो इसे करनेमें सदा सावधान रहता है, वह मुनि है और वह दुःखित नहीं होता है॥ १–३॥
मानावमानौ द्वावेतौ तावेवाहुर्विषामृते।<br>अवमानोऽमृतं तत्र सन्मानो विषमुच्यते॥ ४<br>गुरोरपि हिते युक्तः स तु संवत्सरं वसेत्।<br>नियमेष्वप्रमत्तस्तु यमेषु च सदा भवेत्॥ ५<br>प्राप्यानुज्ञां ततश्चैव ज्ञानयोगमनुत्तमम्।<br>अविरोधेन धर्मस्य चरेत पृथिवीमिमाम्॥ ६मान तथा अपमान—ये विष तथा अमृत कहे गये हैं। उनमें अपमान अमृत तथा सम्मान विष कहा जाता है। शिष्यको चाहिये कि गुरुके हितमें संलग्न रहकर एक वर्षतक उनके पास निवास करे, नियमों तथा यमोंमें सदा सावधान रहे और उनसे उत्तम ज्ञानयोग ग्रहण करके पुनः आज्ञा लेकर धर्मका विरोध न करते हुए इस पृथ्वीपर विचरण करे॥ ४–६॥
चक्षुःपूतं चरेन्मार्गं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।<br>सत्यपूतं वदेद्वाक्यं मनःपूतं समाचरेत्॥ ७<br>मत्स्यगृह्यस्य यत्पापं षण्मासाभ्यन्तरे भवेत्।<br>एकाहं तत्समं ज्ञेयमपूतं यज्जलं भवेत्॥ ८<br>अपूतोदकपाने तु जपेच्च शतपञ्चकम्।<br>अघोरलक्षणं मन्त्रं ततः शुद्धिमवाप्नुयात्॥ ९<br>अथवा पूजयेच्छम्भुं घृतस्नानादिविस्तरैः।<br>त्रिधा प्रदक्षिणीकृत्य शुद्ध्यते नात्र संशयः॥ १०भलीभाँति नेत्रसे देखकर मार्गपर चलना चाहिये, वस्त्रसे पवित्र किये गये अर्थात् छाने हुए जलको पीना चाहिये, सत्यसे पवित्र वचन बोलना चाहिये और मनसे पवित्र प्रतीत होनेवाले आचरणको करना चाहिये। मत्स्य ग्रहण करनेवालेको छः महीनोंमें जो पाप लगता है, उसे एक दिन अपवित्र जलके पानसे होनेवाले पापके बराबर जानना चाहिये। अपवित्र जलका पान कर लेनेपर पाँच सौ बार अघोर मन्त्रका जप करना चाहिये; उससे व्यक्ति शुद्धि प्राप्त कर लेता है; अथवा घृतस्नान आदि विस्तृत उपचारोंसे शिवकी पूजा करनी चाहिये, इसके बाद उनकी तीन बार प्रदक्षिणा करके वह शुद्ध हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ७–१०॥
आतिथ्यश्राद्धयज्ञेषु न गच्छेदद्योगवित्क्वचित्।<br>एवं ह्यहिंसको योगी भवेदिति विचारितम्॥ ११<br>वह्नौ विधूमेऽत्यङ्गारे सर्वस्मिन् भुक्तवज्जने।<br>चरेत्तु मतिमान् भैक्ष्यं न तु तेष्वेव नित्यशः॥ १२योगवेत्ताको आतिथ्य, श्राद्ध तथा [सोम आदि] यज्ञमें कहीं नहीं जाना चाहिये; इस प्रकार योगी अहिंसक हो सकता है—यह भलीभाँति निर्णीत बात है। बुद्धिमान्‌को चाहिये कि अग्निके धूमरहित तथा

अध्याय ८९ ] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४५७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अथैनमवमन्यन्ते परे परिभवन्ति च।<br>तथा युक्तं चरेद्भैक्ष्यं सतां धर्ममदूषयन् ॥ १३अंगाररहित हो जानेपर अर्थात् अग्निके शीतल हो जानेपर और सभीलोगोंके भोजन कर चुकनेपर [उस घरमें] भिक्षा प्राप्त करे एवं उन घरोंमें प्रतिदिन भिक्षा ग्रहण न करे, अन्यथा दूसरे लोग अपमान करेंगे तथा निन्दा करेंगे। अतः सज्जनोंके धर्मको दूषित न करते हुए उचित भिक्षा प्राप्त करनी चाहिये॥ ११-१३॥
भैक्ष्यं चरेद्वनस्थेषु यायावरगृहेषु च।<br>श्रेष्ठा तु प्रथमा हीयं वृत्तिरस्योपजायते ॥ १४<br><br>अत ऊर्ध्वं गृहस्थेषु शीलीनेषु चरेद् द्विजाः।<br>श्रद्दधानेषु दान्तेषु श्रोत्रियेषु महात्मसु ॥ १५<br><br>अत ऊर्ध्वं पुनश्चापि अदुष्टापतितेषु च।<br>भैक्ष्यचर्या हि वर्णेषु जघन्या वृत्तिरुच्यते ॥ १६वनमें रहनेवालोंके यहाँ तथा यायावरोंके घरोंमें भिक्षा माँगनी चाहिये। यह योगीकी सर्वश्रेष्ठ वृत्ति होती है। हे ब्राह्मणो! इसके बाद श्रेष्ठ आचारवाले, दानशील, श्रद्धालु, श्रोत्रिय तथा महात्मा गृहस्थोंके यहाँ भिक्षा प्राप्त करनी चाहिये। इसके बाद दुष्टतारहित तथा अपतित लोगोंके यहाँ भी भिक्षा ग्रहण करे, किंतु सभी वर्णोंके यहाँ भिक्षा माँगना जघन्य वृत्ति कही जाती है॥ १४-१६॥
भैक्ष्यं यवागूस्तक्रं वा पयो यावकमेव च।<br>फलमूलादि पक्वं वा कणपिण्याकसक्तवः ॥ १७<br><br>इत्येते वै मया प्रोक्ता योगिनां सिद्धिवर्धनाः।<br>आहारास्तेषु सिद्धेषु श्रेष्ठं भैक्ष्यमिति स्मृतम् ॥ १८यवागू, मट्ठा, दूध, यावक (जौसे बना भोजन), पके हुए फल-मूल, टूटे हुए अनाज, तिल और सत्तू भिक्षामें ग्रहण करना चाहिये। [हे ऋषियो!] मैंने योगियोंकी सिद्धिकी वृद्धि करनेवाले उन आहारोंको बता दिया; उनके प्राप्त हो जानेपर इसे श्रेष्ठ भिक्षा कहा गया है॥ १७-१८॥
अब्बिन्दुं यः कुशाग्रेण मासि मासि समश्नुते।<br>न्यायतो यश्चरेद्भैक्ष्यं पूर्वोक्तात्स विशिष्यते ॥ १९<br><br>जरामरणगर्भेभ्यो भीतस्य नरकादिषु।<br>एवं दाययते तस्मात्तद्भैक्ष्यमिति संस्मृतम् ॥ २०जो [व्यक्ति] प्रत्येक महीनेमें कुशाके अग्र भागसे जलबिन्दु ग्रहण करता है और न्यायपूर्वक भिक्षाटन करता है; वह पूर्वमें कहे गये [भिक्षार्थी]-से श्रेष्ठ होता है। वृद्धावस्था, मृत्यु, गर्भवास तथा नरक आदिसे भयभीत संन्यासीकी भिक्षा दायभागके समान है, इसीलिये इसे भैक्ष्य कहा जाता है॥ १९-२०॥
दधिभक्षाः पयोभक्षा ये चान्ये जीवक्षीणाकाः।<br>सर्वे ते भैक्ष्यभक्षस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २१<br><br>भस्मशायी भवेन्नित्यं भिक्षाचारी जितेन्द्रियः।<br>य इच्छेत्परमं स्थानं व्रतं पाशुपतं चरेत् ॥ २२जो दही तथा दूधका सेवन करनेवाले हैं और जो अन्य लोग [कृच्छ्र आदि व्रतोंके द्वारा] शरीरको क्षीण करनेवाले हैं; वे सब भिक्षावृत्तिवालेकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। जो परम पद चाहता है, उसे नित्य भस्ममें शयन करना चाहिये, भिक्षाटन करना चाहिये, इन्द्रियोंको वशमें रखना चाहिये और पाशुपतव्रत करना चाहिये॥ २१-२२॥
योगिनां चैव सर्वेषां श्रेष्ठं चान्द्रायणं भवेत्।<br>एकं द्वे त्रीणि चत्वारि शक्तितो वा समाचरेत् ॥ २३चान्द्रायणव्रत सभी योगियोंके लिये उत्तम होता है। [अपनी] शक्तिके अनुसार इसे एक, दो, तीन