भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४५२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| पवनो हि यथाग्राह्यो विचरन् सर्वमूर्तिषु।<br>पुरि शेते सुदुर्ग्राह्यस्तस्मात्पुरुष उच्यते॥ ४६ | अविनाशी तथा सर्वात्मा परब्रह्मका ध्यान करनेवाला है, वह मोहको प्राप्त नहीं होता है॥ ४३-४५॥<br>जिस प्रकार सभी प्राणियोंके भीतर विचरण करता हुआ भी वायु अग्राह्य है, ठीक उसी तरह देहमें स्थित होते हुए भी परमात्मा सुदुर्ग्राह्य है। वह देहरूपी पुरमें शयन करता है, अतः पुरुष कहा जाता है॥ ४६॥ | | अथ चेल्लुप्तधर्मा तु सावशेषैः स्वकर्मभिः।<br>ततस्तु ब्रह्मगर्भे वै शुक्रशोणितसंयुते॥ ४७<br><br>स्त्रीपुंसोः सम्प्रयोगे हि जायते हि ततः प्रभुः।<br>ततस्तु गर्भकालेन कललं नाम जायते॥ ४८<br><br>कालेन कललं चापि बुद्बुदं सम्प्रजायते।<br>मृत्पिण्डस्तु यथा चक्रे चक्रावर्तेन पीडितः॥ ४९<br><br>हस्ताभ्यां क्रियमाणस्तु बिम्बत्वमनुगच्छति।<br>एवमाध्यात्मिकैर्युक्तो वायुना सम्प्रपूरितः॥ ५० | पुण्यफलके भोगके अनन्तर लुप्त धर्मवाला जीव अपने अवशिष्ट कर्मोंके साथ पुनः ब्राह्मणयोनिमें जन्म लेता है। स्त्री-पुरुषके संयोग होनेके अनन्तर शुक्र तथा रक्तके मिलनेपर गर्भकी उत्पत्ति होती है, पुनः वह कललके रूपमें हो जाता है और कुछ समय बाद वह कलल भी बुलबुला बन जाता है। जिस प्रकार मिट्टीका पिण्ड घूमते हुए चाकपर कुम्हारके हाथोंसे आकार प्राप्त करता है, वैसे ही यह जीव पंचमहाभूतोंसे युक्त होकर तथा वायुसे पूरित होकर आकार प्राप्त करता है॥ ४७-५०॥ | | यदि योनिं विमुञ्चामि तत्प्रपद्ये महेश्वरम्।<br>यावद्धि वैष्णवो वायुर्जातमात्रं न संस्पृशेत्॥ ५१<br><br>तावत्कालं महादेवमर्चयामीति चिन्तयेत्।<br>जायते मानुषस्तत्र यथारूपं यथावयः॥ ५२ | गर्भमें जीव सोचता है कि यदि मैं गर्भसे निकलूँगा, तो महेश्वरकी शरणमें जाऊँगा और उत्पन्न होनेपर जबतक वैष्णव वायु अर्थात् माया मेरा स्पर्श नहीं करेगी, तबतक मैं महादेवका अर्चन करूँगा। इस प्रकार जीव अपने रूप तथा वयके अनुसार अर्थात् अपने प्रारब्धके अनुसार मनुष्य बनता है॥ ५१-५२॥ | | वायुः सम्भवते खात्तु वाताद्भवति वै जलम्।<br>जलात्सम्भवति प्राणः प्राणाच्छुक्रं विवर्धते॥ ५३<br><br>रक्तभागास्त्रयस्त्रिंशद्रेतोभागाश्चतुर्दश ।<br>भागतोऽर्धफलं कृत्वा ततो गर्भो निषिच्यते॥ ५४<br><br>ततस्तु गर्भसंयुक्तः पञ्चभिर्वायुभिर्वृतः।<br>पितुः शरीरात्प्रत्यङ्गं रूपमस्योपजायते॥ ५५<br><br>ततोऽस्य मातुराहारात्पीतलीढप्रवेशनात्।<br>नाभिदेशेन वै प्राणास्ते ह्याधारा हि देहिनाम्॥ ५६ | आकाशसे वायु उत्पन्न होता है, वायुसे जल उत्पन्न होता है, जलसे प्राण होता है और प्राणसे शुक्र बढ़ता है। रक्तके तैंतीस भाग तथा शुक्रके चौदह भाग मिश्रित होते हैं; उन दोनोंके भागसे आधे जातीफलके सदृश देह प्राप्त करके गर्भकी वृद्धि होती है। तत्पश्चात् गर्भसे युक्त जीव पाँच वायुओंसे घिर जाता है। पिताके शरीरसे इसके अंग-प्रत्यंग तथा रूपका विकास होता है और माताके आहारसे नाभिदेशसे पीये गये तथा चूसे गये रस आदिके प्रवेशसे जीवका पोषण होता है। वे प्राण (वायु) देहधारियोंके आधार हैं॥ ५३-५६॥ | | नवमासात्परिक्लिष्टः संवेष्टितशिरोधरः।<br>वेष्टितः सर्वगात्रैश्च अपर्याप्तप्रवेशनः॥ ५७ | नौ महीनेतक शिशु बहुत कष्टमें रहता है, उसकी गर्दन नाभिनालसे लिपटी रहती है, उसका सम्पूर्ण शरीर संकुचित रहता है, वह गर्भमें अपर्याप्त (सीमित) |