भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ८८] पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप ४५१


भूयो मृत्युवशं याति तस्मान्मोक्षः परं सुखम्।<br>अथवा ध्यानसंयुक्तो ब्रह्मतत्त्वपरायणः॥ ३५<br>न तु च्यावयितुं शक्यो मन्वन्तरशतैरपि।<br>दृष्ट्वा तु पुरुषं दिव्यं विश्वाख्यं विश्वतोमुखम्॥ ३६<br>विश्वपादशिरोग्रीवं विश्वेशं विश्वरूपिणम्।<br>विश्वगन्धं विश्वमाल्यं विश्वाम्बरधरं प्रभुम्॥ ३७यज्ञोंमें बहुत धनके व्ययके साथ ही परिश्रम होता है; उसके बाद भी मनुष्यको मृत्युके वशमें होना पड़ता है, अतः मोक्ष ही परम आनन्द है। विश्व नामवाले, सभी ओर मुख-पैर-सिर-ग्रीवावाले, विश्वके स्वामी, सभी रूपोंवाले, सभी गन्धोंसे युक्त, सम्पूर्ण विश्वको माला तथा वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले (सर्वव्यापक) भगवान् दिव्य पुरुषका दर्शन करके ध्यानयुक्त तथा ब्रह्मतत्त्वपरायण व्यक्तिको सैकड़ों मन्वन्तरोंमें भी [उसके पदसे] च्युत नहीं किया जा सकता है॥ ३४—३७॥
गोभिर्महीं सम्पत्तते पतत्रिणो<br>नैवं भूयो जनयत्येवमेव।<br>कविं पुराणमनुशासितारं<br>सूक्ष्माच्च सूक्ष्मं महतो महान्तम्॥ ३८<br>योगेन पश्येन्न च चक्षुषा पुन-<br>र्निरेन्द्रियं पुरुषं रुक्मवर्णम्।<br>आलिङ्गिनं निर्गुणं चेतनं च<br>नित्यं सदा सर्वगं सर्वसारम्॥ ३९<br>पश्यन्ति युक्त्या ह्यचलप्रकाशं<br>तद्भावितास्तेजसा दीप्यमानम्।<br>अपाणिपादोदरपार्श्वजिह्वो<br>ह्यतीन्द्रियो वापि सुसूक्ष्म एकः॥ ४०<br>पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णो<br>न चास्त्यबुद्धं न च बुद्धिरस्ति।<br>स वेद सर्वं न च सर्ववेद्यं<br>तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥ ४१पुरुषरूप ईश्वर सूर्यकी किरणोंके माध्यमसे पृथ्वीपर पहुँचता है और निरन्तर ही पूर्वसदृश जगत्‌को उत्पन्न करता है; किंतु प्रलयकालमें उत्पन्न नहीं करता। योगी उस कवि, पुरातन, सभीपर शासन करनेवाले, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, महान्‌से भी महान्, इन्द्रियोंसे रहित, स्वर्णके रंगवाले, सर्वरूपमय, निर्गुण, चैतन्यस्वरूप, नित्य सर्वत्र गमन करनेवाले (सर्वव्यापी) तथा सर्वसारस्वरूप पुरुषको योगसे देख सकता है न कि चक्षुसे। उसी ब्रह्ममें लीन रहनेवाले साधक उस अचल प्रकाशवाले तथा अपने तेजसे प्रकाशित प्रभुको योगसे देखते हैं। वह [ब्रह्म] हाथ-पैर-उदर-पार्श्व-जिह्वासे रहित है, इन्द्रियोंसे अतीत है, अत्यन्त सूक्ष्म है तथा अद्वितीय है। वह नेत्ररहित होता हुआ भी देखता है, कानोंसे रहित होता हुआ भी सुनता है और बुद्धिरहित होता हुआ भी सब कुछ जानता है। वह सबको जानता है, किंतु सबके द्वारा वेद्य नहीं है। उसे आदि महान् पुरुष कहा गया है॥ ३८—४१॥
अचेतनां सर्वगतां सूक्ष्मां प्रसवधर्मिणीम्।<br>प्रकृतिं सर्वभूतानां युक्ताः पश्यन्ति योगिनः॥ ४२उनसे युक्त योगिजन सभी प्राणियोंकी प्रकृतिको अचेतन, सर्वव्यापिनी, सूक्ष्म तथा प्रसवधर्मिणी (सृष्टि-उत्पादनकर्त्री)-के रूपमें देखते हैं॥ ४२॥
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।<br>सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ ४३वह [ब्रह्म] सभी ओर हाथ तथा पैरवाला है। वह सभी ओर नेत्र, सिर तथा मुखवाला है। वह सभी ओर कानवाला है तथा संसारमें सभीको व्याप्त करके स्थित है।
युक्तो योगेन चेशानं सर्वतश्च सनातनम्।<br>पुरुषं सर्वभूतानां तं विद्वान्न विमुह्यति॥ ४४योगसे युक्त विद्वान् [व्यक्ति] ईशान, सनातन तथा सभी प्राणियोंके परम पुरुष उन ब्रह्मके विषयमें मोहित नहीं होता
भूतात्मानं महात्मानं परमात्मानमव्ययम्।<br>सर्वात्मानं परं ब्रह्म तद्वै ध्याता न मुह्यति॥ ४५है। जो व्यक्ति सभी प्राणियोंकी आत्मा, महात्मा, परमात्मा,