भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 452
४५०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| इच्छया तस्य रूपाणि भवन्ति न भवन्ति च।<br>यत्र कामावसायित्वं त्रैलोक्ये सचराचरे॥ २२<br><br>शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चैव मनस्तथा।<br>प्रवर्तन्तेऽस्य चेच्छातो न भवन्ति यथेच्छया॥ २३<br><br>न जायते न म्रियते छिद्यते न च भिद्यते।<br>न दह्यते न मुह्येत लीयते न च लिप्यते॥ २४<br><br>न क्षीयते न क्षरति खिद्यते न कदाचन।<br>क्रियते वा न सर्वत्र तथा विक्रीयते न च॥ २५<br><br>अगन्धरसरूपस्तु अस्पर्शः शब्दवर्जितः।<br>अवर्णो ह्रास्वरश्चैव असवर्णस्तु कर्हिचित्॥ २६<br><br>स भुङ्क्ते विषयांश्चैव विषयैर्न च युज्यते।<br>अणुत्वात्तु परः सूक्ष्मः सूक्ष्मत्वादपवर्गिकः॥ २७ | चराचरसहित त्रिलोकीमें सभी प्राणी उसके वशमें हो जाते हैं। जिसके पास कामावसित्त्व [ऐश्वर्य] होता है, चराचरसहित तीनों लोकोंमें उसके रूप इच्छाके अनुसार बन सकते हैं और नहीं भी बन सकते हैं। शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध, रूप तथा मन उसकी इच्छासे होते हैं और उसकी इच्छाके अनुसार नहीं भी होते हैं। वह कभी भी न उत्पन्न होता है, न मरता है, न कट सकता है, न भेदा जा सकता है, न जलाया जा सकता है, न मूर्च्छित होता है, न आकर्षित होता है, न लिप्त (आसक्त) होता है, न उसका क्षय होता है, वह नष्ट नहीं होता है और न तो खिन्न होता है। वह सर्वत्र न तो कुछ करता है और न तो विकृत ही होता है। वह शब्द, स्पर्श, गन्ध, रस तथा रूपसे रहित होता है। वह सदा अवर्ण, स्वररहित तथा असवर्ण होता है। वह विषयोंका भोग करता है, किन्तु उनसे लिप्त नहीं होता है॥ २०—२६॥ | | व्यापकस्त्वपवर्गाच्च व्यापकात्पुरुषः स्मृतः।<br>पुरुषः सूक्ष्मभावात्तु ऐश्वर्ये परमे स्थितः॥ २८<br><br>गुणोत्तरमथैश्वर्ये सर्वतः सूक्ष्ममुच्यते।<br>ऐश्वर्यं चाप्रतीघातं प्राप्य योगमनुत्तमम्॥ २९<br><br>अपवर्गं ततो गच्छेत्सूक्ष्मं तत्परमं पदम्।<br>एवं पाशुपतं योगं ज्ञातव्यं मुनिपुङ्गवाः॥ ३० | अणुभाववाला होनेके कारण जीव सूक्ष्म है और सूक्ष्म होनेके कारण मुक्तिके योग्य है। मुक्त होनेके कारण व्यापक है और व्यापक होनेके कारण वह पुरुष कहा गया है। सूक्ष्म भाव होनेके कारण वह पुरुष परम ऐश्वर्यमें स्थित होता है। ऐश्वर्योंका गुण क्रमशः सूक्ष्म होता जाता है—ऐसा कहा गया है। अबाधित ऐश्वर्य तथा उत्तम योग प्राप्त करके साधक मुक्ति प्राप्त करता है; वही सूक्ष्म परम पद है॥ २७—२९ १/२॥ | | स्वर्गापवर्गफलदं शिवसायुज्यकारणम्।<br>अथवा गतविज्ञानो रागात्कर्म समाचरेत्॥ ३१<br><br>राजसं तामसं वापि भुक्त्वा तत्रैव मुच्यते।<br>तथा सुकृतकर्मा तु फलं स्वर्गे समश्नुते॥ ३२<br><br>तस्मात्स्थानात्पुनः श्रेष्ठो मानुष्यमुपपद्यते।<br>तस्माद् ब्रह्म परं सौख्यं ब्रह्म शाश्वतमुत्तमम्॥ ३३<br><br>ब्रह्म एव हि सेवेत ब्रह्मैव हि परं सुखम्।<br>परिश्रमो हि यज्ञानां महतार्थेन वर्तते॥ ३४ | हे श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार पाशुपतयोगको जानना चाहिये, जो स्वर्ग तथा मोक्षका फल प्रदान करनेवाला और शिव-सायुज्यका कारण है। विज्ञानरहित व्यक्ति रागके कारण कर्म करता है और राजस अथवा तामस भोग करके वहींपर मुक्त हो जाता है। पुण्यकर्म करनेवाला स्वर्गमें फल प्राप्त करता है; तत्पश्चात् वह श्रेष्ठ प्राणी [पुण्यके क्षीण होनेपर] पुनः मनुष्यलोकमें वापस आता है। अतः ब्रह्म ही परम सुख है और ब्रह्म ही परम शाश्वत है। ब्रह्मकी ही उपासना करनी चाहिये; क्योंकि ब्रह्म ही परम आनन्दस्वरूप है॥ ३०—३३ १/२॥ |

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