भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ८८ ] पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप ४४९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अणिमा लघिमा चैव महिमा प्राप्तिरेव च।<br>प्राकाम्यं चैव सर्वत्र ईशित्वं चैव सर्वतः॥ ९<br><br>वशित्वमथ सर्वत्र यत्र कामावसायिता।<br>तच्चापि त्रिविधं ज्ञेयमैश्वर्यं सार्वकामिकम्॥ १०<br><br>सावद्यं निरवद्यं च सूक्ष्मं चैव प्रवर्तते।<br>सावद्यं नाम यत्तत्र पञ्चभूतात्मकं स्मृतम्॥ ११<br><br>इन्द्रियाणि मनश्चैव अहङ्कारश्च यः स्मृतः।<br>तत्र सूक्ष्मप्रवृत्तिस्तु पञ्चभूतात्मिका पुनः॥ १२<br><br>इन्द्रियाणि मनश्चित्तबुद्ध्यहङ्कारसंज्ञितम्।<br>तथा सर्वमयं चैव आत्मस्था ख्यातिरेव च॥ १३<br><br>संयोग एव त्रिविधः सूक्ष्मेष्वेव प्रवर्तते।<br>पुनरष्टगुणश्चापि सूक्ष्मेष्वेव विधीयते॥ १४<br><br>तस्य रूपं प्रवक्ष्यामि यथाह भगवान् प्रभुः।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतेषु यथास्य नियमः स्मृतः॥ १५<br><br>अणिमाद्यं तथाव्यक्तं सर्वत्रैव प्रतिष्ठितम्।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतानां दुष्प्राप्यं समुदाहृतम्॥ १६<br><br>तत्तस्य भवति प्राप्यं प्रथमं योगिनां बलम्।<br>लङ्घनं प्लवनं लोके रूपमस्य सदा भवेत्॥ १७कहा गया है। उन सबको क्रमसे बता रहा हूँ; [आपलोग] सुनिये। अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व तथा कामावसायिता—ये आठ सिद्धियाँ हैं। सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले उस ऐश्वर्यको भी तीन प्रकारका जानना चाहिये; सावद्य, निरवद्य तथा सूक्ष्म—ये तीन प्रकार होते हैं। उनमें जो सावद्य है, वह पंचभूतात्मक कहा गया है। इन्द्रियाँ, मन तथा जो अहंकार कहा गया है—ये निरवद्य ऐश्वर्य हैं। आत्मामें पंचभूतोंकी तन्मात्रारूपा सूक्ष्म प्रवृत्ति ही सूक्ष्म ऐश्वर्य है। इस प्रकार इन्द्रियाँ, मन, चित्त, बुद्धि तथा अहंकार निरवद्य ऐश्वर्य हैं; पंचभूतमय ऐश्वर्य सावद्य नामवाला है और शब्द आदि विषयरूप ऐश्वर्य सूक्ष्म है। तीन प्रकारका यह भेद [अणिमा आदि] सूक्ष्म ऐश्वर्योंमें प्रवृत्त होता है। पुनः आठ गुणोंका भेद भी सूक्ष्म ऐश्वर्योंमें होता है। तीनों लोकोंके सभी प्राणियोंमें सर्वत्र यह अणिमादि अव्यक्त ऐश्वर्य जिस प्रकारसे प्रतिष्ठित है और जैसा इसका नियम बताया गया है—भगवान् प्रभुने इस विषयमें जैसा कहा है, उसके स्वरूपको मैं बताऊँगा। जो ऐश्वर्य त्रिलोकीमें सभी प्राणियोंके लिये दुर्लभ बताया गया है, वह योगियोंके लिये प्राप्त होनेवाला अणिमारूप पहला बल होता है; इसका स्वरूप संसारमें कहीं भी, कभी भी लंघन तथा प्लवन करनेका होता है॥ ८—१७॥
शीघ्रत्वं सर्वभूतेषु द्वितीयं तु पदं स्मृतम्।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतानां महिम्ना चैव वन्दितम्॥ १८<br><br>महित्वं चापि लोकेऽस्मिंस्तृतीयो योग उच्यते।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतेषु यथेष्टगमनं स्मृतम्॥ १९सभी प्राणियोंकी अपेक्षा शीघ्रत्व गुणसे सम्पन्न होना लघिमा नामक दूसरी सिद्धि कही गयी है। तीनों लोकोंमें सभी प्राणियोंमें माहात्म्यबलसे वन्दित तथा पूजित होना इस लोकमें महिमारूप तीसरी सिद्धि कही जाती है। त्रिलोकीमें सभी प्राणियोंके भीतर स्वेच्छासे प्रवेश करना प्राप्ति नामक सिद्धि कही गयी है॥ १८-१९॥
प्राकामान् विषयान् भुङ्क्ते तथाप्रतिहतः क्वचित्।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतानां सुखदुःखं प्रवर्तते॥ २०<br><br>ईशो भवति सर्वत्र प्रविभागेन योगवित्।<br>वश्यानि चास्य भूतानि त्रैलोक्ये सचराचरे॥ २१प्राकाम्य ऐश्वर्यसे युक्त व्यक्ति तीनों लोकोंमें कहीं भी बाधारहित होकर विषयोंका भोग करता है और सभी प्राणियोंको सुख-दुःखमें प्रवृत्त कर सकता है। ईशित्व ऐश्वर्यके द्वारा वह योगवेत्ता यथेष्ट देहधारणके द्वारा सभी जगह स्वामी बन जाता है। वशित्वसे