श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ४४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| इत्येवं खेचराः सिद्धा जजल्पुः प्रीतमानसाः।<br>यदावलोक्य तान् सर्वान् प्रसादादनयाम्बिका ॥ २४<br>तदा तिष्ठन्ति सायुज्यं प्राप्तास्ते खेचराः प्रभोः॥ २५ | उत्पन्न किया है। ये देवी अम्बिका रुद्रकी आज्ञाके रूपमें विराजमान हैं; मुक्ति इन्हींसे प्राप्त होती है—ऐसा आकाशचारी सिद्धोंने प्रसन्नचित्त होकर कहा है। जब वे [शिव] इन आज्ञारूपी अम्बिकाके साथ स्थित होकर उन सबको कृपापूर्वक देखते हैं, तब वे आकाशचारी सिद्धगण प्रभुका सायुज्य प्राप्त कर लेते हैं और सदाके लिये उसीमें स्थित हो जाते हैं॥ २३—२५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मुनिमोहशमनं नाम सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मुनिमोहशमन' नामक सत्तासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८७ ॥
अट्ठासीवाँ अध्याय
पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>केन योगेन वै सूत गुणप्राप्तिः सतामिह।<br>अणिमादिगुणोपेता भवन्त्येवेह योगिनः।<br>तत्सर्वं विस्तरात्सूत वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १ | **ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! किस योगसे सज्जनोंको इस लोकमें मोक्षकी प्राप्ति होती है और योगिजन अणिमा आदि गुणोंसे युक्त होते हैं? हे सूतजी! इस समय आप विस्तारपूर्वक यह सब बतायें॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि योगं परमदुर्लभम्।<br>पञ्चधा संस्मरेदादौ स्थाप्य चित्ते सनातनम्॥ २<br>कल्पयेच्चासनं पद्मं सोमसूर्याग्निसंयुतम्।<br>षड्विंशच्छक्तिसंयुक्तमष्टधा च द्विजोत्तमाः॥ ३<br>ततः षोडशधा चैव पुनर्द्वादशधा द्विजाः।<br>स्मरेच्च तत्तथा मध्ये देव्या देवमुमापतिम्॥ ४<br>अष्टशक्तिसमायुक्तमष्टमूर्तिमजं प्रभुम्।<br>ताभिश्चाष्टविधा रुद्राश्चतुःषष्टिविधाः पुनः॥ ५<br>शक्तयश्च तथा सर्वा गुणाष्टकसमन्विताः।<br>एवं स्मरेत्क्रमेणैव लब्ध्वा ज्ञानमनुत्तमम्॥ ६<br>एवं पाशुपतं योगं मोक्षसिद्धिप्रदायकम्।<br>तस्याणिमादयो विप्रा नान्यथा कर्मकोटिभिः॥ ७ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] अब मैं परम दुर्लभ योगका वर्णन करूँगा। सबसे पहले चित्तमें सनातन शिवको स्थापित करके उनके [सद्योजात आदि] पाँच रूपोंका स्मरण करना चाहिये और हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! चन्द्र-सूर्य-अग्निसे युक्त तथा छब्बीस शक्तियोंसे समन्वित अष्टदलकमल, उसके ऊपर षोडशदल-कमल, पुनः उसके ऊपर द्वादशदलकमलरूप आसनकी भावना करनी चाहिये। तदनन्तर हे द्विजो! उसके मध्यमें देवीके साथ आठ शक्तियोंसहित अष्टमूर्ति, अजन्मा, ऐश्वर्यमय भगवान् उमापतिका स्मरण करना चाहिये। उन शक्तियोंके साथ आठ रुद्र और आठों सिद्धियोंसे सम्पन्न सभी चौंसठ शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं—ऐसा क्रमसे स्मरण करना चाहिये। हे विप्रो! इस प्रकार उत्तम ज्ञान प्राप्त करके जो मोक्षसिद्धि प्रदान करनेवाले पाशुपतयोगको करता है, उसे अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं; अन्यथा करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं मिल सकतीं॥ २—७॥ |
| तत्राष्टगुणमैश्वर्यं योगिनां समुदाहृतम्।<br>तत्सर्वं क्रमयोगेन ह्युच्यमानं निबोधत॥ ८ | हे मुनियो! योगियोंका आठ गुणोंसे युक्त ऐश्वर्य |