श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ८७ ] सनकादि मुनीश्वरोंको शिवज्ञानका उपदेश ४४७
| तामाज्ञां सम्प्रविश्याहं चिन्तयञ्जगतां हितम्।<br>सप्तविंशत्प्रकारेण सर्वं व्याप्यानया शिवः ॥ १०<br>तदाप्रभृति वै मोक्षप्रवृत्तिर्द्विजसत्तमाः। | मेरी यह सनातनी आज्ञा मेरे मुखसे उत्पन्न हुई थी। तब जगत्के कल्याणका चिन्तन करता हुआ मैं शिव उस आज्ञामें प्रविष्ट होकर इनके साथ सत्ताईस तत्त्वोंसे सबको व्याप्त करके स्थित हुआ। हे श्रेष्ठ द्विजो! तभीसे मुक्ति प्रारम्भ हुई॥ ३-१०१/२॥ |
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| सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा तदापश्यद्भवानिं परमेश्वरः॥ ११<br>भवानी च तमालोक्य मायामहरदव्यया।<br>ते मायामलनिर्मुक्ता मुनयः प्रेक्ष्य पार्वतीम्॥ १२<br>प्रीता बभूवुर्मुक्ताश्च तस्मादेषा परा गतिः।<br>उमाशङ्करयोर्भेदो नास्त्येव परमार्थतः॥ १३<br>द्विधासौ रूपमास्थाय स्थित एव न संशयः।<br>यदा विद्वानसङ्गः स्यादाज्ञया परमेष्ठिनः ॥ १४ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] ऐसा कहकर परमेश्वरने भवानीकी ओर देखा और सनातनी भवानीने उन [परमेश्वर]–को देखकर मायाको हटा लिया; तब मायाके मलसे मुक्त हुए वे मुनिगण पार्वतीको देखकर प्रसन्न होकर मुक्त हो गये। अतः ये [पार्वती] ही परागति हैं। वस्तुतः उमा तथा शंकरमें भेद नहीं है; वे [शिव] दो रूप धारण करके स्थित हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ ११-१३१/२॥ |
| तदा मुक्तिः क्षणादेव नान्यथा कर्मकोटिभिः।<br>क्रमोऽविवक्षितो भूतविवृद्धः परमेष्ठिनः ॥ १५<br>प्रसादेन क्षणान्मुक्तिः प्रतिज्ञैषा न संशयः।<br>गर्भस्थो जायमानो वा बालो वा तरुणोऽपि वा ॥ १६<br>वृद्धो वा मुच्यते जन्तुः प्रसादात्परमेष्ठिनः।<br>अण्डजश्चोद्भिज्जो वापि स्वेदजो वापि मुच्यते ॥ १७<br>प्रसादाद्देवदेवस्य नात्र कार्या विचारणा।<br>एष एव जगन्नाथो बन्धमोक्षकरः शिवः ॥ १८ | जब शिवकी मायासे विद्वान् अनासक्त हो जाता है, तब क्षणभरमें [उसकी] मुक्ति हो जाती है; अन्यथा करोड़ों कर्मोंसे भी मुक्ति नहीं होती। ऋषियोंके द्वारा बताया गया मुक्तिक्रम परमेष्ठी शिवके लिये विवक्षित नहीं है। परमेश्वरकी कृपासे क्षणभरमें मुक्ति हो जाती है, यह उनकी प्रतिज्ञा है; इसमें सन्देह नहीं है। परमेष्ठी शिवकी कृपासे जीव मुक्त हो जाता है, चाहे वह गर्भमें स्थित हो, उत्पन्न हो रहा हो, बालक हो, तरुण हो अथवा वृद्ध हो। देवोंके देव [महेश्वर]–के अनुग्रहसे अण्डज, उद्भिज्ज तथा स्वेदज [प्राणी] भी मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १४-१७१/२॥ |
| भूर्भुवःस्वर्महश्चैव जनः साक्षात्तपः स्वयम्।<br>सत्यलोकस्तथाण्डानां कोटिकोटिशतानि च ॥ १९<br>विग्रहं देवदेवस्य तथाण्डावरणाष्टकम्।<br>सप्तद्वीपेषु सर्वेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ २०<br>समुद्रेषु च सर्वेषु वायुस्कन्धेषु सर्वतः।<br>तथान्येषु च लोकेषु वसन्ति च चराचराः ॥ २१<br>सर्वे भवांशजा नूनं गतिस्तेषां स एव वै।<br>सर्वो रुद्रो नमस्तस्मै पुरुषाय महात्मने ॥ २२ | ये जगत्पति शिव ही बन्धन तथा मोक्ष करनेवाले हैं। भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः तथा सत्यम्—ये लोक और करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड तथा अण्डोंके आठों आवरण—ये सब उन देवदेव [महेश्वर]–के विग्रह (शरीर) हैं। सातों द्वीपोंमें, सभी पर्वतोंमें, वनोंमें, समुद्रोंमें, सभी वायुके स्कन्धोंमें तथा अन्य लोकोंमें जो चराचर जीव निवास करते हैं—वे सब शिवके अंशसे उत्पन्न हुए हैं; निश्चित रूपसे इनकी गति वे ही हैं। सब कुछ रुद्र ही हैं। उन महात्मा पुरुषको नमस्कार है॥ १८-२२॥ |
| विश्वं भूतं तथा जातं बहुधा रुद्र एव सः।<br>रुद्राज्ञैषा स्थिता देवी ह्यानया मुक्तिरम्बिका ॥ २३ | उन रुद्रने ही सम्पूर्ण जगत्को तथा सभी जीवोंको |