श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| यः पठेच्छृणुयाद्वापि संसारशमनं नरः।<br><br>स याति ब्रह्मसायुज्यं नात्र कार्या विचारणा ॥ १५७ | सदा उपदेश करना चाहिये। जो मनुष्य इस संसाररूपी विषका नाश करनेवाले आख्यानको पढ़ता अथवा सुनता है, वह ब्रह्मसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १५४-१५७॥॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे संसारविषकथनं नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'संसारविषकथन' नामक छियासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८६ ॥
सत्तासीवाँ अध्याय
सनकादि मुनीश्वरोंको शिवज्ञानका उपदेश
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
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| निशम्य ते महाप्राज्ञाः कुमाराद्याः पिनाकिनम्।<br>प्रोचुः प्रणम्य वै भीताः प्रसन्नं परमेश्वरम्॥ १<br><br>एवं चेदनया देव्या हैमवत्या महेश्वर।<br>क्रीडसे विविधैर्भोगैः कथं वक्तुमिहार्हसि॥ २ | यह सुनकर कुमार आदि उन महाबुद्धिमान् मुनियोंने भयभीत होकर प्रसन्न पिनाकधारी परमेश्वरको प्रणाम करके उनसे कहा—'हे महेश्वर! यदि ऐसा है, तो आप इन देवी पार्वतीके साथ अनेकविध भोगोंके द्वारा क्रीड़ा क्यों करते हैं; कृपा करके यह बतायें' ॥ १-२ ॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| एवमुक्तः प्रहस्येशः पिनाकी नीललोहितः।<br>प्राह तामम्बिकां प्रेक्ष्य प्रणिपत्य स्थितान् द्विजान्॥ ३ | [हे ऋषियो!] ऐसा कहे जानेपर पिनाकधारी नीललोहित ईश्वरने हँसकर उन अम्बिकाकी ओर देखकर वहाँ स्थित द्विजोंने प्रणाम करके उनसे कहा— |
| बन्धमोक्षौ न चैवेह मम स्वेच्छाशरीरिणः।<br>अकर्ताज्ञः पशुर्जीवो विभुर्भोक्ता ह्यणुः पुमान्॥ ४ | 'अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाले मेरे लिये न बन्धन है, न मोक्ष है। मैं सर्वव्यापी, कर्तृत्वरहित तथा सर्वज्ञ हूँ; जबकि यह जीव अणुरूप, भोक्ता तथा अज्ञ है। |
| मायी च मायया बद्धः कर्मभिर्युज्यते तु सः।<br>ज्ञानं ध्यानं च बन्धश्च मोक्षो नास्त्यात्मनो द्विजाः॥ ५ | जो मायी है, वह मायासे सकाम कर्मद्वारा बँधा हुआ है और वह कर्मोंसे लिप्त है। हे द्विजो! आत्माके लिये ज्ञान, ध्यान, बन्धन तथा मोक्ष नहीं हैं। |
| यदैवं मयि विद्वान् यस्तस्यापि न च सर्वतः।<br>एषा विद्या ह्यहं वेद्यः प्रज्ञैषा च श्रुतिः स्मृतिः॥ ६ | जो विद्वान् मुझमें ऐसा अनुभव कर लेता है, उसके लिये भी ये सब नहीं होते हैं। ये [पार्वती] विद्या हैं और मैं वेद्य हूँ। ये प्रज्ञा, श्रुति तथा स्मृति हैं। |
| धृतिरेषा मया निष्ठा ज्ञानशक्तिः क्रिया तथा।<br>इच्छाख्या च तथा ह्याज्ञा द्वे विद्ये न च संशयः॥ ७ | ये मेरे द्वारा प्रतिष्ठित धृति, निष्ठा, ज्ञानशक्ति, क्रिया, इच्छा तथा आज्ञा हैं। ये (परा-अपरा) दोनों विद्याएँ हैं; इसमें सन्देह नहीं है। |
| न ह्येषा प्रकृतिर्जैवी विकृतिश्च विचारतः।<br>विकारो नैव मायैषा सदसद्व्यक्तिवर्जिता॥ ८ | ये जीवसम्बन्धी प्रकृति नहीं हैं। विचार किया जाय, तो ये विकृति भी नहीं हैं। विकार नहीं हैं; ये माया हैं, जो सत्-असत्से रहित अर्थात् अनिर्वचनीय हैं। |
| पुरा ममाज्ञा मद्द्वक्त्रात्समुत्पन्ना सनातनी।<br>पञ्चवक्त्रा महाभागा जगतामभयप्रदा॥ ९ | पूर्वकालमें लोगोंको अभय प्रदान करनेवाली, महाभाग्यवती तथा पाँच मुखवाली |