भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 455
अध्याय ८८ ] पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप४५३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नवमासोषितश्चापि योनिच्छिद्रादवाङ्मुखः।<br>ततः स्वकर्मभिः पापैर्निरयं सम्प्रपद्यते॥ ५८<br><br>असिपत्रवनं चैव शाल्मलिच्छेदनं तथा।<br>ताडनं भक्षणं चैव पूयशोणितभक्षणम्॥ ५९<br><br>यथा ह्यापस्तु संछिन्नाः संश्लेषमुपयान्ति वै।<br>तथा छिन्नाश्च भिन्नाश्च यातनास्थानमागताः॥ ६०<br><br>एवं जीवास्तु तैः पापैस्तप्यमानाः स्वयंकृतैः।<br>प्राप्नुयुः कर्मभिः शेषैर्दुःखं वा यदि वेतरत्॥ ६१स्थानमें पड़ा रहता है। नौ महीनेतक गर्भमें रहनेके बाद वह शिशु नीचेकी ओर मुख किये हुए योनिमार्गसे बाहर निकलता है। इसके पश्चात् अपने पापमय कर्मोंके कारण नरकमें गिरता है; असिपत्रवन तथा शाल्मलिछेदन नामक नरकमें उसका ताड़न तथा भक्षण किया जाता है और उसे पीव तथा रक्तका भक्षण करना पड़ता है। जैसे गर्म किये जानेपर जल श्लेष्मायुक्त (बुलबुलायुक्त) हो जाता है, वैसे ही जीव यातनास्थानको प्राप्त करके छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। इस प्रकार जीव अपने द्वारा किये गये उन पापोंसे तप्त होते हैं; वे अपने अवशिष्ट कर्मोंके अनुसार दुःख या सुख प्राप्त करते हैं॥ ५७-६१॥
एकेनैव तु गन्तव्यं सर्वमुत्सृज्य वै जनम्।<br>एकेनैव तु भोक्तव्यं तस्मात्सुकृतमाचरेत्॥ ६२<br><br>न ह्येनं प्रस्थितं कश्चिद् गच्छन्तमनुगच्छति।<br>यदनेन कृतं कर्म तदेनमनुगच्छति॥ ६३सभीलोगोंको छोड़कर जीवको अकेला ही जाना पड़ता है और अकेला ही भोगना पड़ता है; अतः उत्तम आचरण करना चाहिये। [मृत्युके पश्चात्] प्रस्थान करनेवाले इस जीवके पीछे-पीछे कोई भी नहीं जाता है; इस जीवके द्वारा जो कर्म किया गया होता है, वही इसके साथ जाता है॥ ६२-६३॥
ते नित्यं यमविषयेषु सम्प्रवृत्ताः<br>क्रोशन्तः सततमनिष्टसम्प्रयोगैः।<br>शुष्यन्ते परिगतवेदनाशरीरा<br>बह्वीभिः सुभृशमनन्तयातनाभिः॥ ६४वे जीव [यमलोकमें] निरन्तर अनिष्ट दण्डोंके द्वारा कराहते हुए नित्य यमविषयोंमें प्रवृत्त रहते हैं; अनेक प्रकारकी बड़ी-बड़ी अनन्त यातनाओंके द्वारा वेदनाओंसे घिरे हुए शरीरवाले वे जीव शोकसन्तप्त रहते हैं॥ ६४॥
कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते।<br>तदभ्यासो हरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत्॥ ६५<br><br>अनादिमान् प्रबन्धः स्यात्पूर्वकर्मणि देहिनः।<br>संसारं तामसं घोरं षड्विधं प्रतिपद्यते॥ ६६<br><br>मानुष्यात्पशुभावश्च पशुभावान्मृगो भवेत्।<br>मृगत्वात्पक्षिभावश्च तस्माच्चैव सरीसृपः॥ ६७<br><br>सरीसृपत्वाद् गच्छेद्वै स्थावरत्वं न संशयः।<br>स्थावरत्वे पुनः प्राप्ते यावदुन्मिषते जनः॥ ६८<br><br>कुलालचक्रवद् भ्रान्तस्तत्रैव परिवर्तते।<br>इत्येवं हि मनुष्यादिः संसारस्थावरान्तिकः॥ ६९व्यक्ति मन, वाणी तथा कर्मद्वारा बार-बार जो भी आचरण करता है, वही अभ्यास बनकर इसे उधर ही ले जाता है, अतः [सर्वदा] शुभाचरण करना चाहिये। जीवात्माका पूर्वकर्ममें अनादि दृढ़बन्धन है, उसीसे जीव घोर तामसिक षड्विध संसारको प्राप्त होता है। जीव मनुष्ययोनिसे पशुभावको प्राप्त होता है और पशुभावसे वह मृग होता है, पुनः वह मृगजन्मसे पक्षीका जन्म और पक्षीसे सरीसृप (रेंगनेवाला जन्तु) होता है, इसके बाद वह सरीसृपसे स्थावरत्वको प्राप्त होता है; इसमें सन्देह नहीं है। पुनः स्थावररूप प्राप्त होनेपर जबतक जीव पुनः मनुष्ययोनि नहीं प्राप्त कर