श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| विज्ञेयस्तामसो नाम तत्रैव परिवर्तते।<br>सात्त्विकश्चापि संसारो ब्रह्मादिः परिकीर्तितः॥ ७०<br><br>पिशाचान्तः स विज्ञेयः स्वर्गस्थानेषु देहिनाम्।<br>ब्राह्मे तु केवलं सत्त्वं स्थावरे केवलं तमः॥ ७१<br><br>चतुर्दशानां स्थानानां मध्ये विष्टम्भकं रजः।<br>मर्मसु च्छिद्यमानेषु वेदनार्तस्य देहिनः॥ ७२<br><br>ततस्तत्परमं ब्रह्म कथं विप्रः स्मरिष्यति।<br>संसारः पूर्वधर्मस्य भावनाभिः प्रणोदितः॥ ७३<br><br>मानुषं भजते नित्यं तस्माद्ध्यानं समाचरेत्।<br>चतुर्दशविधं ह्येतद् बुद्ध्वा संसारमण्डलम्॥ ७४ | लेता, तबतक कुम्हारके चाककी भाँति वह एक ही स्थानपर चक्कर लगाता रहता है। इस प्रकार मनुष्ययोनिसें प्रारम्भ होकर स्थावरयोनितकके इस संसारको तामस जानना चाहिये। ब्रह्मासे प्रारम्भ करके पिशाचतकके संसारको सात्त्विक कहा गया है; इसे देहधारियोंके लिये स्वर्गस्थानमें जानना चाहिये। ब्राह्म जीवनमें केवल सत्त्व, स्थावरमें केवल तम और चौदह स्थानोंके मध्यमें वेदनासे व्याकुल प्राणीके मर्मस्थानोंका वेधन करनेवाला रज विद्यमान है। ऐसी स्थितिमें विप्र उस परम ब्रह्मको कैसे याद कर सकेगा। पूर्व धर्मकी भावनाओंसे प्रेरित होकर यह संसार सदा मनुष्य-योनिसे युक्त रहता है; अतः ध्यान [अवश्य] करना चाहिये॥ ६५-७३ १/२॥ | | नित्यं समारभेद्वर्मं संसारभयपीडितः।<br>ततस्तरति संसारं क्रमेण परिवर्तितः॥ ७५<br><br>तस्माच्च सततं युक्तो ध्यानतत्परयुञ्जकः।<br>तथा समारभेदद्योगं यथात्मानं स पश्यति॥ ७६ | इस संसारमण्डलको चौदह भुवनस्वरूप जानकर संसारभयसे पीड़ित प्राणीको सदा धर्मका आचरण करना चाहिये; तब वह क्रमसे परिवर्तित होकर इस संसारको पार कर लेता है। अतएव निरन्तर ध्यानमग्न होकर योगीको योगका आचरण करना चाहिये, जिससे वह आत्म-साक्षात्कार कर ले॥ ७४-७६॥ | | एष आपः परं ज्योतिरेष सेतुरनुत्तमः।<br>विवृत्या ह्येष सम्भेदाद्भूतानां चैव शाश्वतः॥ ७७<br><br>तदेनं सेतुमात्मानमग्निं वै विश्वतोमुखम्।<br>हृदिस्थं सर्वभूतानामुपासीत महेश्वरम्॥ ७८<br><br>तथान्तःसंस्थितं देवं स्वशक्त्या परिमण्डितम्।<br>अष्टधा चाष्टधा चैव तथा चाष्टविधेन च॥ ७९<br><br>सृष्ट्यर्थं संस्थितं वह्निं सङ्क्षिप्य च हृदि स्थितम्।<br>ध्यात्वा यथावद्देवेशं रुद्रं भुवननायकम्॥ ८०<br><br>हुत्वा पञ्चाहुतीः सम्यक् तच्चिन्तागतमानसः।<br>वैश्वानरं हृदिस्थं तु यथावदनुपूर्वशः॥ ८१<br><br>आपः पूताः सकृत्प्राश्य तूष्णीं हुत्वा ह्युपाविशन्।<br>प्राणायेति ततस्तस्य प्रथमा ह्याहुतिः स्मृता॥ ८२ | सभी जीवोंमें सम्भेद तथा पार्थक्य होनेपर भी ये [शिव] परम ज्योति (सर्वात्मस्वरूप) हैं, ये ही संसारसागरके जलस्वरूप हैं और ये ही उत्तम तथा शाश्वत सेतु भी हैं। अतः सभी प्राणियोंके हृदयमें स्थित इन आत्मस्वरूप, सेतुस्वरूप तथा सभी ओर मुखवाले अग्निस্বরূপ महेश्वरकी उपासना करनी चाहिये। अपनी शक्तिके साथ अन्तःकरणमें स्थित, [पृथ्वी आदि] आठ प्रकारसे, [भव आदि] आठ रूपोंमें तथा वामदेव आदि आठ विग्रहोंके रूपमें विद्यमान रहनेवाले और सृष्टिके लिये अग्निको संक्षिप्त करके हृदयमें विराजमान देवदेवेश लोकनायक भगवान् रुद्रका ध्यान करके उनके चित्तमें मनको लगाकर हृदयमें स्थित वैश्वानरको भली-भाँति क्रमशः पाँच आहुतियाँ देनी चाहिये। शान्तचित्त होकर बैठ करके एक बार पवित्र जलसे आचमन करके आहुति देनी चाहिये। 'प्राणाय स्वाहा' |