श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| अध्याय ८८ ] पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप | ४५३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नवमासोषितश्चापि योनिच्छिद्रादवाङ्मुखः।<br>ततः स्वकर्मभिः पापैर्निरयं सम्प्रपद्यते॥ ५८<br><br>असिपत्रवनं चैव शाल्मलिच्छेदनं तथा।<br>ताडनं भक्षणं चैव पूयशोणितभक्षणम्॥ ५९<br><br>यथा ह्यापस्तु संछिन्नाः संश्लेषमुपयान्ति वै।<br>तथा छिन्नाश्च भिन्नाश्च यातनास्थानमागताः॥ ६०<br><br>एवं जीवास्तु तैः पापैस्तप्यमानाः स्वयंकृतैः।<br>प्राप्नुयुः कर्मभिः शेषैर्दुःखं वा यदि वेतरत्॥ ६१ | स्थानमें पड़ा रहता है। नौ महीनेतक गर्भमें रहनेके बाद वह शिशु नीचेकी ओर मुख किये हुए योनिमार्गसे बाहर निकलता है। इसके पश्चात् अपने पापमय कर्मोंके कारण नरकमें गिरता है; असिपत्रवन तथा शाल्मलिछेदन नामक नरकमें उसका ताड़न तथा भक्षण किया जाता है और उसे पीव तथा रक्तका भक्षण करना पड़ता है। जैसे गर्म किये जानेपर जल श्लेष्मायुक्त (बुलबुलायुक्त) हो जाता है, वैसे ही जीव यातनास्थानको प्राप्त करके छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। इस प्रकार जीव अपने द्वारा किये गये उन पापोंसे तप्त होते हैं; वे अपने अवशिष्ट कर्मोंके अनुसार दुःख या सुख प्राप्त करते हैं॥ ५७-६१॥ |
| एकेनैव तु गन्तव्यं सर्वमुत्सृज्य वै जनम्।<br>एकेनैव तु भोक्तव्यं तस्मात्सुकृतमाचरेत्॥ ६२<br><br>न ह्येनं प्रस्थितं कश्चिद् गच्छन्तमनुगच्छति।<br>यदनेन कृतं कर्म तदेनमनुगच्छति॥ ६३ | सभीलोगोंको छोड़कर जीवको अकेला ही जाना पड़ता है और अकेला ही भोगना पड़ता है; अतः उत्तम आचरण करना चाहिये। [मृत्युके पश्चात्] प्रस्थान करनेवाले इस जीवके पीछे-पीछे कोई भी नहीं जाता है; इस जीवके द्वारा जो कर्म किया गया होता है, वही इसके साथ जाता है॥ ६२-६३॥ |
| ते नित्यं यमविषयेषु सम्प्रवृत्ताः<br>क्रोशन्तः सततमनिष्टसम्प्रयोगैः।<br>शुष्यन्ते परिगतवेदनाशरीरा<br>बह्वीभिः सुभृशमनन्तयातनाभिः॥ ६४ | वे जीव [यमलोकमें] निरन्तर अनिष्ट दण्डोंके द्वारा कराहते हुए नित्य यमविषयोंमें प्रवृत्त रहते हैं; अनेक प्रकारकी बड़ी-बड़ी अनन्त यातनाओंके द्वारा वेदनाओंसे घिरे हुए शरीरवाले वे जीव शोकसन्तप्त रहते हैं॥ ६४॥ |
| कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते।<br>तदभ्यासो हरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत्॥ ६५<br><br>अनादिमान् प्रबन्धः स्यात्पूर्वकर्मणि देहिनः।<br>संसारं तामसं घोरं षड्विधं प्रतिपद्यते॥ ६६<br><br>मानुष्यात्पशुभावश्च पशुभावान्मृगो भवेत्।<br>मृगत्वात्पक्षिभावश्च तस्माच्चैव सरीसृपः॥ ६७<br><br>सरीसृपत्वाद् गच्छेद्वै स्थावरत्वं न संशयः।<br>स्थावरत्वे पुनः प्राप्ते यावदुन्मिषते जनः॥ ६८<br><br>कुलालचक्रवद् भ्रान्तस्तत्रैव परिवर्तते।<br>इत्येवं हि मनुष्यादिः संसारस्थावरान्तिकः॥ ६९ | व्यक्ति मन, वाणी तथा कर्मद्वारा बार-बार जो भी आचरण करता है, वही अभ्यास बनकर इसे उधर ही ले जाता है, अतः [सर्वदा] शुभाचरण करना चाहिये। जीवात्माका पूर्वकर्ममें अनादि दृढ़बन्धन है, उसीसे जीव घोर तामसिक षड्विध संसारको प्राप्त होता है। जीव मनुष्ययोनिसे पशुभावको प्राप्त होता है और पशुभावसे वह मृग होता है, पुनः वह मृगजन्मसे पक्षीका जन्म और पक्षीसे सरीसृप (रेंगनेवाला जन्तु) होता है, इसके बाद वह सरीसृपसे स्थावरत्वको प्राप्त होता है; इसमें सन्देह नहीं है। पुनः स्थावररूप प्राप्त होनेपर जबतक जीव पुनः मनुष्ययोनि नहीं प्राप्त कर |
| ४५४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| विज्ञेयस्तामसो नाम तत्रैव परिवर्तते।<br>सात्त्विकश्चापि संसारो ब्रह्मादिः परिकीर्तितः॥ ७०<br><br>पिशाचान्तः स विज्ञेयः स्वर्गस्थानेषु देहिनाम्।<br>ब्राह्मे तु केवलं सत्त्वं स्थावरे केवलं तमः॥ ७१<br><br>चतुर्दशानां स्थानानां मध्ये विष्टम्भकं रजः।<br>मर्मसु च्छिद्यमानेषु वेदनार्तस्य देहिनः॥ ७२<br><br>ततस्तत्परमं ब्रह्म कथं विप्रः स्मरिष्यति।<br>संसारः पूर्वधर्मस्य भावनाभिः प्रणोदितः॥ ७३<br><br>मानुषं भजते नित्यं तस्माद्ध्यानं समाचरेत्।<br>चतुर्दशविधं ह्येतद् बुद्ध्वा संसारमण्डलम्॥ ७४ | लेता, तबतक कुम्हारके चाककी भाँति वह एक ही स्थानपर चक्कर लगाता रहता है। इस प्रकार मनुष्ययोनिसें प्रारम्भ होकर स्थावरयोनितकके इस संसारको तामस जानना चाहिये। ब्रह्मासे प्रारम्भ करके पिशाचतकके संसारको सात्त्विक कहा गया है; इसे देहधारियोंके लिये स्वर्गस्थानमें जानना चाहिये। ब्राह्म जीवनमें केवल सत्त्व, स्थावरमें केवल तम और चौदह स्थानोंके मध्यमें वेदनासे व्याकुल प्राणीके मर्मस्थानोंका वेधन करनेवाला रज विद्यमान है। ऐसी स्थितिमें विप्र उस परम ब्रह्मको कैसे याद कर सकेगा। पूर्व धर्मकी भावनाओंसे प्रेरित होकर यह संसार सदा मनुष्य-योनिसे युक्त रहता है; अतः ध्यान [अवश्य] करना चाहिये॥ ६५-७३ १/२॥ | | नित्यं समारभेद्वर्मं संसारभयपीडितः।<br>ततस्तरति संसारं क्रमेण परिवर्तितः॥ ७५<br><br>तस्माच्च सततं युक्तो ध्यानतत्परयुञ्जकः।<br>तथा समारभेदद्योगं यथात्मानं स पश्यति॥ ७६ | इस संसारमण्डलको चौदह भुवनस्वरूप जानकर संसारभयसे पीड़ित प्राणीको सदा धर्मका आचरण करना चाहिये; तब वह क्रमसे परिवर्तित होकर इस संसारको पार कर लेता है। अतएव निरन्तर ध्यानमग्न होकर योगीको योगका आचरण करना चाहिये, जिससे वह आत्म-साक्षात्कार कर ले॥ ७४-७६॥ | | एष आपः परं ज्योतिरेष सेतुरनुत्तमः।<br>विवृत्या ह्येष सम्भेदाद्भूतानां चैव शाश्वतः॥ ७७<br><br>तदेनं सेतुमात्मानमग्निं वै विश्वतोमुखम्।<br>हृदिस्थं सर्वभूतानामुपासीत महेश्वरम्॥ ७८<br><br>तथान्तःसंस्थितं देवं स्वशक्त्या परिमण्डितम्।<br>अष्टधा चाष्टधा चैव तथा चाष्टविधेन च॥ ७९<br><br>सृष्ट्यर्थं संस्थितं वह्निं सङ्क्षिप्य च हृदि स्थितम्।<br>ध्यात्वा यथावद्देवेशं रुद्रं भुवननायकम्॥ ८०<br><br>हुत्वा पञ्चाहुतीः सम्यक् तच्चिन्तागतमानसः।<br>वैश्वानरं हृदिस्थं तु यथावदनुपूर्वशः॥ ८१<br><br>आपः पूताः सकृत्प्राश्य तूष्णीं हुत्वा ह्युपाविशन्।<br>प्राणायेति ततस्तस्य प्रथमा ह्याहुतिः स्मृता॥ ८२ | सभी जीवोंमें सम्भेद तथा पार्थक्य होनेपर भी ये [शिव] परम ज्योति (सर्वात्मस्वरूप) हैं, ये ही संसारसागरके जलस्वरूप हैं और ये ही उत्तम तथा शाश्वत सेतु भी हैं। अतः सभी प्राणियोंके हृदयमें स्थित इन आत्मस्वरूप, सेतुस्वरूप तथा सभी ओर मुखवाले अग्निस্বরূপ महेश्वरकी उपासना करनी चाहिये। अपनी शक्तिके साथ अन्तःकरणमें स्थित, [पृथ्वी आदि] आठ प्रकारसे, [भव आदि] आठ रूपोंमें तथा वामदेव आदि आठ विग्रहोंके रूपमें विद्यमान रहनेवाले और सृष्टिके लिये अग्निको संक्षिप्त करके हृदयमें विराजमान देवदेवेश लोकनायक भगवान् रुद्रका ध्यान करके उनके चित्तमें मनको लगाकर हृदयमें स्थित वैश्वानरको भली-भाँति क्रमशः पाँच आहुतियाँ देनी चाहिये। शान्तचित्त होकर बैठ करके एक बार पवित्र जलसे आचमन करके आहुति देनी चाहिये। 'प्राणाय स्वाहा' |
| अध्याय ८८] पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप | ४५५ |
|---|---|
| अपानाय द्वितीया च व्यानायेति तथा परा।<br>उदानाय चतुर्थी स्यात्समानायेति पञ्चमी ॥ ८३<br><br>स्वाहाकारैः पृथग् हुत्वा शेषं भुञ्जीत कामतः।<br>अपः पुनः सकृत्प्राश्य आचम्य हृदयं स्पृशेत् ॥ ८४ | पहली आहुति कही गयी है। दूसरी आहुति 'अपानाय स्वाहा', तीसरी 'व्यानाय स्वाहा', चौथी 'उदानाय स्वाहा' और पाँचवीं आहुति 'समानाय स्वाहा' है। इस प्रकार स्वाहाकारके द्वारा पृथक्-पृथक् आहुति देकर शेषान्नको यथेष्ट ग्रहण करना चाहिये, तत्पश्चात् एक बार जलसे प्राशन तथा पुनः आचमन करके हृदयका स्पर्श करना चाहिये ॥ ८३-८४ ॥ |
| प्राणानां ग्रन्थिरस्यात्मा रुद्रो ह्यात्मा विशान्तकः।<br>रुद्रो वै ह्यात्मनः प्राण एवमाप्याययेत्स्वयम् ॥ ८५<br><br>प्राणे निविष्टो वै रुद्रस्तस्मात्प्राणमयः स्वयम्।<br>प्राणाय चैव रुद्राय जुहोत्यमृतमुत्तमम् ॥ ८६<br><br>शिवाविशेह मामीश स्वाहा ब्रह्मात्मने स्वयम्।<br>एवं पञ्चाहुतीश्चैव श्राद्धे कुर्वीत शासनात् ॥ ८७ | आप रुद्र ही प्राणोंकी ग्रन्थि हैं, रुद्र ही आत्मा हैं, अहंकार-देवतारूप आप ही दुःखका नाश करनेवाले हैं और रुद्र ही जीवके प्राण हैं—इस प्रकार [कहकर] स्वयंको तृप्त करना चाहिये। रुद्र प्राणमें निविष्ट हैं, अतः रुद्र स्वयं प्राणस्वरूप हैं। प्राणको तथा रुद्रको उत्तम अमृत समर्पित करना चाहिये; हे शिव! हे ईश! आप मुझमें प्रवेश करें, साक्षात् ब्रह्मात्माको स्वाहा—इस प्रकार श्राद्धके अवसरपर शास्त्रानुसार पाँच आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये ॥ ८५-८७ ॥ |
| पुरुषोऽसि पुरे शेषे त्वमङ्गुष्ठप्रमाणतः।<br>आश्रितश्चैव चाङ्गुष्ठमीशः परमकारणम् ॥ ८८<br><br>सर्वस्य जगतश्चैव प्रभुः प्रीणातु शाश्वतः।<br>त्वं देवानामसि ज्येष्ठो रुद्रस्त्वं च पुरो वृषा ॥ ८९<br><br>मृदुस्त्वमन्नमस्मभ्यमेतदस्तु हुतं तव।<br>इत्येवं कथितं सर्वं गुणप्राप्तिविशेषतः ॥ ९० | आप पुरुष हैं; आप शरीरमें अँगूठेके परिमाणमें विराजमान हैं। अँगूठेके बराबर होते हुए भी आप ईश्वर परम कारणस्वरूप हैं। सम्पूर्ण जगत्के स्वामी तथा सनातन प्रभु प्रसन्न हों। आप देवताओंमें ज्येष्ठ हैं, आप रुद्र हैं, आप प्रथम इन्द्र थे, आप हमारे लिये कल्याणकारी हों और [हमारे द्वारा] ग्रहण किया गया यह अन्न आपके लिये आहुतिस्वरूप हो ॥ ८८-८९½ ॥ |
| योगाचारः स्वयं तेन ब्रह्मणा कथितः पुरा।<br>एवं पाशुपतं ज्ञानं ज्ञातव्यं च प्रयत्नतः ॥ ९१<br><br>भस्मस्नायी भवेन्नित्यं भस्मलिप्तः सदा भवेत्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान् ॥ ९२<br><br>दैवे कर्मणि पित्र्ये वा स याति परमां गतिम् ॥ ९३ | [हे ऋषियो!] इस प्रकार मैंने विशेषरूपसे अणिमादि-गुणप्राप्ति-सम्बन्धी सबकुछ कह दिया। पूर्वकालमें स्वयं ब्रह्माने इस योगविद्याको कहा था। इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक पाशुपतविद्याका ज्ञान करना चाहिये, नित्य भस्म-स्नान करना चाहिये और सदा भस्म लगाना चाहिये। जो [व्यक्ति] देवपूजन या पितृकर्म (श्राद्ध)-के अवसरपर इसे पढ़ता है या सुनता है या श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह परमगति प्राप्त करता है ॥ ९०-९३ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽणिमाद्यष्टसिद्धिद्विगुणसंसारप्राणाग्नौ होमादिवर्णनं नामाष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अणिमा आदि आठ सिद्धि-त्रिगुणसंसारप्राणाग्निमें होमादिका वर्णन' नामक अट्ठासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८८ ॥
८९- सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन
४५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
नवासीवाँ अध्याय
सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि शौचाचारस्य लक्षणम्।<br>यदनुष्ठाय शुद्धात्मा प्रेत्य गतिमाप्नुयात्॥ १<br>ब्रह्मणा कथितं पूर्वं सर्वभूतहिताय वै।<br>सङ्क्षेपात्सर्ववेदार्थं सञ्चयं ब्रह्मवादिनाम्॥ २<br>उदयार्थं तु शौचानां मुनीनामुत्तमं पदम्।<br>यस्तत्राथाप्रमत्तः स्यात्स मुनिर्नार्वासीदति॥ ३ | [हे ऋषियो!] अब मैं इसके बाद शौचाचारका लक्षण बताऊँगा, जिसे करके शुद्ध अन्तःकरणवाला [व्यक्ति] परलोकमें जाकर [उत्तम] गति प्राप्त करता है। पूर्वकालमें ब्रह्माने सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये इसे कहा था। यह संक्षिप्त रूपमें सभी वेदोंका सार है, ब्रह्मवादियोंकी निधि है, आचरणके उत्थानके लिये उपयोगी है और मुनियोंका उत्तम पद है। जो इसे करनेमें सदा सावधान रहता है, वह मुनि है और वह दुःखित नहीं होता है॥ १–३॥ |
| मानावमानौ द्वावेतौ तावेवाहुर्विषामृते।<br>अवमानोऽमृतं तत्र सन्मानो विषमुच्यते॥ ४<br>गुरोरपि हिते युक्तः स तु संवत्सरं वसेत्।<br>नियमेष्वप्रमत्तस्तु यमेषु च सदा भवेत्॥ ५<br>प्राप्यानुज्ञां ततश्चैव ज्ञानयोगमनुत्तमम्।<br>अविरोधेन धर्मस्य चरेत पृथिवीमिमाम्॥ ६ | मान तथा अपमान—ये विष तथा अमृत कहे गये हैं। उनमें अपमान अमृत तथा सम्मान विष कहा जाता है। शिष्यको चाहिये कि गुरुके हितमें संलग्न रहकर एक वर्षतक उनके पास निवास करे, नियमों तथा यमोंमें सदा सावधान रहे और उनसे उत्तम ज्ञानयोग ग्रहण करके पुनः आज्ञा लेकर धर्मका विरोध न करते हुए इस पृथ्वीपर विचरण करे॥ ४–६॥ |
| चक्षुःपूतं चरेन्मार्गं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।<br>सत्यपूतं वदेद्वाक्यं मनःपूतं समाचरेत्॥ ७<br>मत्स्यगृह्यस्य यत्पापं षण्मासाभ्यन्तरे भवेत्।<br>एकाहं तत्समं ज्ञेयमपूतं यज्जलं भवेत्॥ ८<br>अपूतोदकपाने तु जपेच्च शतपञ्चकम्।<br>अघोरलक्षणं मन्त्रं ततः शुद्धिमवाप्नुयात्॥ ९<br>अथवा पूजयेच्छम्भुं घृतस्नानादिविस्तरैः।<br>त्रिधा प्रदक्षिणीकृत्य शुद्ध्यते नात्र संशयः॥ १० | भलीभाँति नेत्रसे देखकर मार्गपर चलना चाहिये, वस्त्रसे पवित्र किये गये अर्थात् छाने हुए जलको पीना चाहिये, सत्यसे पवित्र वचन बोलना चाहिये और मनसे पवित्र प्रतीत होनेवाले आचरणको करना चाहिये। मत्स्य ग्रहण करनेवालेको छः महीनोंमें जो पाप लगता है, उसे एक दिन अपवित्र जलके पानसे होनेवाले पापके बराबर जानना चाहिये। अपवित्र जलका पान कर लेनेपर पाँच सौ बार अघोर मन्त्रका जप करना चाहिये; उससे व्यक्ति शुद्धि प्राप्त कर लेता है; अथवा घृतस्नान आदि विस्तृत उपचारोंसे शिवकी पूजा करनी चाहिये, इसके बाद उनकी तीन बार प्रदक्षिणा करके वह शुद्ध हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ७–१०॥ |
| आतिथ्यश्राद्धयज्ञेषु न गच्छेदद्योगवित्क्वचित्।<br>एवं ह्यहिंसको योगी भवेदिति विचारितम्॥ ११<br>वह्नौ विधूमेऽत्यङ्गारे सर्वस्मिन् भुक्तवज्जने।<br>चरेत्तु मतिमान् भैक्ष्यं न तु तेष्वेव नित्यशः॥ १२ | योगवेत्ताको आतिथ्य, श्राद्ध तथा [सोम आदि] यज्ञमें कहीं नहीं जाना चाहिये; इस प्रकार योगी अहिंसक हो सकता है—यह भलीभाँति निर्णीत बात है। बुद्धिमान्को चाहिये कि अग्निके धूमरहित तथा |
अध्याय ८९ ] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथैनमवमन्यन्ते परे परिभवन्ति च।<br>तथा युक्तं चरेद्भैक्ष्यं सतां धर्ममदूषयन् ॥ १३ | अंगाररहित हो जानेपर अर्थात् अग्निके शीतल हो जानेपर और सभीलोगोंके भोजन कर चुकनेपर [उस घरमें] भिक्षा प्राप्त करे एवं उन घरोंमें प्रतिदिन भिक्षा ग्रहण न करे, अन्यथा दूसरे लोग अपमान करेंगे तथा निन्दा करेंगे। अतः सज्जनोंके धर्मको दूषित न करते हुए उचित भिक्षा प्राप्त करनी चाहिये॥ ११-१३॥ |
| भैक्ष्यं चरेद्वनस्थेषु यायावरगृहेषु च।<br>श्रेष्ठा तु प्रथमा हीयं वृत्तिरस्योपजायते ॥ १४<br><br>अत ऊर्ध्वं गृहस्थेषु शीलीनेषु चरेद् द्विजाः।<br>श्रद्दधानेषु दान्तेषु श्रोत्रियेषु महात्मसु ॥ १५<br><br>अत ऊर्ध्वं पुनश्चापि अदुष्टापतितेषु च।<br>भैक्ष्यचर्या हि वर्णेषु जघन्या वृत्तिरुच्यते ॥ १६ | वनमें रहनेवालोंके यहाँ तथा यायावरोंके घरोंमें भिक्षा माँगनी चाहिये। यह योगीकी सर्वश्रेष्ठ वृत्ति होती है। हे ब्राह्मणो! इसके बाद श्रेष्ठ आचारवाले, दानशील, श्रद्धालु, श्रोत्रिय तथा महात्मा गृहस्थोंके यहाँ भिक्षा प्राप्त करनी चाहिये। इसके बाद दुष्टतारहित तथा अपतित लोगोंके यहाँ भी भिक्षा ग्रहण करे, किंतु सभी वर्णोंके यहाँ भिक्षा माँगना जघन्य वृत्ति कही जाती है॥ १४-१६॥ |
| भैक्ष्यं यवागूस्तक्रं वा पयो यावकमेव च।<br>फलमूलादि पक्वं वा कणपिण्याकसक्तवः ॥ १७<br><br>इत्येते वै मया प्रोक्ता योगिनां सिद्धिवर्धनाः।<br>आहारास्तेषु सिद्धेषु श्रेष्ठं भैक्ष्यमिति स्मृतम् ॥ १८ | यवागू, मट्ठा, दूध, यावक (जौसे बना भोजन), पके हुए फल-मूल, टूटे हुए अनाज, तिल और सत्तू भिक्षामें ग्रहण करना चाहिये। [हे ऋषियो!] मैंने योगियोंकी सिद्धिकी वृद्धि करनेवाले उन आहारोंको बता दिया; उनके प्राप्त हो जानेपर इसे श्रेष्ठ भिक्षा कहा गया है॥ १७-१८॥ |
| अब्बिन्दुं यः कुशाग्रेण मासि मासि समश्नुते।<br>न्यायतो यश्चरेद्भैक्ष्यं पूर्वोक्तात्स विशिष्यते ॥ १९<br><br>जरामरणगर्भेभ्यो भीतस्य नरकादिषु।<br>एवं दाययते तस्मात्तद्भैक्ष्यमिति संस्मृतम् ॥ २० | जो [व्यक्ति] प्रत्येक महीनेमें कुशाके अग्र भागसे जलबिन्दु ग्रहण करता है और न्यायपूर्वक भिक्षाटन करता है; वह पूर्वमें कहे गये [भिक्षार्थी]-से श्रेष्ठ होता है। वृद्धावस्था, मृत्यु, गर्भवास तथा नरक आदिसे भयभीत संन्यासीकी भिक्षा दायभागके समान है, इसीलिये इसे भैक्ष्य कहा जाता है॥ १९-२०॥ |
| दधिभक्षाः पयोभक्षा ये चान्ये जीवक्षीणाकाः।<br>सर्वे ते भैक्ष्यभक्षस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २१<br><br>भस्मशायी भवेन्नित्यं भिक्षाचारी जितेन्द्रियः।<br>य इच्छेत्परमं स्थानं व्रतं पाशुपतं चरेत् ॥ २२ | जो दही तथा दूधका सेवन करनेवाले हैं और जो अन्य लोग [कृच्छ्र आदि व्रतोंके द्वारा] शरीरको क्षीण करनेवाले हैं; वे सब भिक्षावृत्तिवालेकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। जो परम पद चाहता है, उसे नित्य भस्ममें शयन करना चाहिये, भिक्षाटन करना चाहिये, इन्द्रियोंको वशमें रखना चाहिये और पाशुपतव्रत करना चाहिये॥ २१-२२॥ |
| योगिनां चैव सर्वेषां श्रेष्ठं चान्द्रायणं भवेत्।<br>एकं द्वे त्रीणि चत्वारि शक्तितो वा समाचरेत् ॥ २३ | चान्द्रायणव्रत सभी योगियोंके लिये उत्तम होता है। [अपनी] शक्तिके अनुसार इसे एक, दो, तीन |
४५८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अस्तेयं ब्रह्मचर्यं च अलोभस्त्याग एव च।<br>व्रतानि पञ्च भिक्षूणामहिंसा परमा त्विह॥ २४<br><br>अक्रोधो गुरुशुश्रूषा शौचमाहारलाघवम्।<br>नित्यं स्वाध्याय इत्येते नियमाः परिकीर्तिताः॥ २५ | अथवा चार बार करना चाहिये। भिक्षुओंके लिये ये पाँच व्रत हैं—अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अलोभ, त्याग और परम अहिंसा। क्रोध न करना, गुरुकी सेवा, शुद्धता, आहारकी अल्पता और प्रतिदिन स्वाध्याय—ये नियम बताये गये हैं॥ २३–२५॥ |
| बीजयोनिगुणा वस्तुबन्धः कर्मभिरेव च।<br>यथा द्विप इवारण्ये मनुष्याणां विधीयते॥ २६ | माता-पितासे प्राप्त संस्कार, अपने स्वभाव, धन आदि तथा संचितकर्म—इन सबसे देवताओंके द्वारा मनुष्य वनमें दुर्ग्रह हाथीकी भाँति बन्धनग्रस्त हो जाता है॥ २६॥ |
| देवैस्तुल्याः सर्वयज्ञक्रियास्तु<br>यज्ञाज्जाप्यं ज्ञानमाहुश्च जाप्यात।<br>ज्ञानाद्ध्यानं सङ्गरागादपेतं<br>तस्मिन् प्राप्ते शाश्वतस्योपलम्भः॥ २७ | सभी यज्ञ-क्रियाएँ देवतुल्य (स्वर्ग प्राप्त करानेवाली) हैं। यज्ञसे श्रेष्ठ जपको तथा जपसे श्रेष्ठ ज्ञानको बताया गया है; किंतु आसक्ति तथा रागसे रहित ध्यान ज्ञानसे भी श्रेष्ठ है; उसके प्राप्त हो जानेसे शाश्वत पदकी प्राप्ति हो जाती है॥ २७॥ |
| दमः शमः सत्यमकल्मषत्वं<br>मौनं च भूतेष्वखिलेषु चार्जवम्।<br>अतीन्द्रियं ज्ञानमिदं तथा शिवं<br>प्राहुस्तथा ज्ञानविशुद्धबुद्धयः॥ २८ | ज्ञानसे विशुद्ध बुद्धिवाले लोगोंने इन्द्रियोंके दमन, मनपर नियन्त्रण, सत्य, पापहीनता, मौन, समस्त प्राणियोंके प्रति सरलता और अतीन्द्रिय ज्ञानको शिवस्वरूप बताया है॥ २८॥ |
| समाहितो ब्रह्मपरोऽप्रमादी<br>शुचिस्तथैकान्तरतिर्जितेन्द्रियः।<br>समाप्नुयाद्योगमिमं महात्मा<br>महर्षयश्चैवमनिन्दितामलाः॥ २९ | एकाग्रचित्तवाला, ब्रह्मपरायण, प्रमादरहित, शुद्ध, एकान्तका सेवन करनेवाला तथा जितेन्द्रिय महात्मा ही इस [पाशुपत] योगको प्राप्त कर सकता है—ऐसा निष्कलंक तथा निष्पाप महर्षिगण कहते हैं॥ २९॥ |
| प्राप्यतेऽभिमतान् देशानङ्कुशेन निवारितः।<br>एतन्मार्गेण शुद्धेन दग्धबीजो ह्यकल्मषः॥ ३० | इस शुद्ध योगमार्गरूपी अंकुशसे नियन्त्रित व्यक्ति दग्धबीजवाला तथा पापरहित होकर अभीष्ट फलोंको प्राप्त करता है॥ ३०॥ |
| सदाचाररताः शान्ताः स्वधर्मपरिपालकाः।<br>सर्वान् लोकान् विनिर्जित्य ब्रह्मलोकं व्रजन्ति ते॥ ३१ | जो सदाचारपरायण, शान्त (अन्तःकरणकी वृत्तियोंको निगृहीत कर लेनेवाले) तथा अपने धर्मका पालन करनेवाले हैं, वे सभी लोकोंको जीतकर ब्रह्मलोक चले जाते हैं॥ ३१॥ |
| पितामहेनोपदिष्टो धर्मः साक्षात्सनातनः।<br>सर्वलोकोपकारार्थं शृणुध्वं प्रवदामि वः॥ ३२ | साक्षात् पितामहने सभी लोकोंके उपकारके लिये सनातनधर्मका उपदेश किया था; मैं आपलोगोंको बता रहा हूँ, उसे सुनिये॥ ३२॥ |
| गुरूपदेशयुक्तानां वृद्धानां क्रमवर्तिनाम्।<br>अभ्युत्थानादिकं सर्वं प्रणामं चैव कारयेत्॥ ३३ | गुरुके उपदेशसे युक्त तथा नियमोंका पालन करनेवाले वृद्धजनोंका स्वागत आदि तथा प्रणाम—यह सब करना चाहिये। हे सुव्रतो! तीन बार प्रदक्षिणा करके |
| अष्टाङ्गप्रणिपातेन त्रिधा न्यस्तेन सुव्रताः।<br>त्रिःप्रदक्षिणयोगेन वन्द्यो वै ब्राह्मणो गुरुः॥ ३४ |
अध्याय ८९ ] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ज्येष्ठान्येऽपि च ते सर्वे वन्दनीया विजानता।<br>आज्ञाभङ्गं न कुर्वीत यदीच्छेत्सिद्धिमुत्तमाम्॥ ३५ | आठों अंगोंको पृथ्वीसे स्पर्श करके तीन बार ब्राह्मण गुरुको प्रणाम करना चाहिये। बुद्धिमन्को चाहिये कि जो अन्य ज्येष्ठ लोग हैं, उन सबको प्रणाम करे। यदि कोई उत्तम सिद्धिकी कामना करता है, तो उनकी आज्ञाका उल्लंघन न करे॥ ३३—३५॥ |
| धातुशून्यबिलक्षेत्रक्षुद्रमन्त्रोपजीवनम् ।<br>विषग्रहविडम्बादीन् वर्जयेत्सर्वयत्नतः॥ ३६<br><br>कैतवं वित्तशाठ्यं च पैशुन्यं वर्जयेत्सदा।<br>अतिहासमवष्टम्भं लीलास्वेच्छाप्रवर्तनम्॥ ३७<br><br>वर्जयेत्सर्वयत्नेन गुरूणामपि सन्निधौ।<br>तद्वाक्यप्रतिकूलं च अयुक्तं वै गुरोर्वचः॥ ३८<br><br>न वदेत्सर्वयत्नेन अनिष्टं न स्मरेत्सदा। | धातुवाद, नास्तिकवाद, ऊसर स्थानमें निवास, क्षुद्र-मन्त्रोंका उपयोग, सर्पोंको पकड़ना आदि निन्दनीय कार्योंका पूर्ण प्रयत्नसे परित्याग करना चाहिये। धूर्तता, धनकी कृपणता तथा पिशुनता (परनिन्दा)-का सदा त्याग करना चाहिये। गुरुजनोंके सान्निध्यमें अत्यधिक हँसना, अशिष्टता तथा मनमाना कार्य करना—इन सबका पूर्ण प्रयत्नसे परित्याग करना चाहिये। गुरुकी आज्ञाके प्रतिकूल आचरण नहीं करना चाहिये और पूर्ण प्रयत्नपूर्वक कभी भी उनका अनिष्ट (बुरा) नहीं सोचना चाहिये॥ ३६—३८ १/२॥ |
| यतीनामासनं वस्त्रं दण्डाद्यं पादुके तथा॥ ३९<br><br>माल्यं च शयनस्थानं पात्रं छायां च यत्नतः।<br>यज्ञोपकरणाङ्गं च न स्पृशेद्वै पदेन च॥ ४०<br><br>देवद्रोहं गुरुद्रोहं न कुर्यात्सर्वयत्नतः।<br>कृत्वा प्रमादतो विप्राः प्रणवस्यायुतं जपेत्॥ ४१<br><br>देवद्रोहेगुरुद्रोहात्कोटिमात्रेण शुध्यति।<br>महापातकशुद्ध्यर्थं तथैव च यथाविधि॥ ४२<br><br>पातकी च तदर्धेन शुध्यते वृत्तवान् यदि।<br>उपपातकिनः सर्वे तदर्धेनैव सुव्रताः॥ ४३ | यतियों (संन्यासियों)-के आसन, वस्त्र, दण्ड, खड़ाऊँ, माला, शयनस्थान, पात्र, छाया तथा यज्ञके उपकरणोंको पैरसे कभी नहीं छूना चाहिये। हे विप्रो! देवताओं तथा गुरुजनोंसे द्रोह न हो, इसका पूर्ण प्रयास करना चाहिये; प्रमादवश द्रोह कर लेनेपर प्रणवका दस हजार जप करना चाहिये। [जानबूझकर] गुरुद्रोह तथा देवद्रोह करनेपर एक करोड़ जपके द्वारा [व्यक्ति] शुद्ध होता है। महापातकोंसे शुद्धिके लिये भी वही विधि है, जो इसके लिये है। पातकी यदि चरित्रवान् है, तो वह उसके आधे जपसे शुद्ध हो जाता है। हे सुव्रतो! सभी उपपातकी उसके भी आधे जपसे शुद्ध हो जाते हैं॥ ३९—४३॥ |
| सन्ध्यालोपे कृते विप्रः त्रिरावृत्त्यैव शुद्ध्यति।<br>आह्निकच्छेदने जाते शतमेकमुदाहृतम्॥ ४४ | सन्ध्यावन्दनका लोप करनेपर विप्र इसकी तीन आवृत्ति करके शुद्ध हो जाता है और दैनिक कृत्यका उल्लंघन होनेपर एक सौ बार जप करना बताया गया है॥ ४४॥ |
| लङ्घने समयानां तु अभक्ष्यस्य च भक्षणे।<br>अवाच्यवाचने चैव सहस्राच्छुद्धिरुच्यते॥ ४५ | [नियत] समयका उल्लंघन करनेपर, अभक्ष्य [पदार्थ]-का भक्षण करनेपर और न बोलनेयोग्य वचन बोलनेपर एक हजार जपसे शुद्धि कही जाती है॥ ४५॥ |
| काकोलूककपोतानां पक्षिणामपि घातने।<br>शतमष्टोत्तरं जप्त्वा मुच्यते नात्र संशयः॥ ४६ | कौआ, उल्लू तथा कबूतर पक्षियोंका वध करनेपर |
| ४६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| यः पुनस्तत्त्ववेत्ता च ब्रह्मविद् ब्राह्मणोत्तमः ।<br>स्मरणाच्छुद्धिमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ४७<br><br>नैवमात्मविदामस्ति प्रायश्चित्तानि चोदना ।<br>विश्वस्यैव हि ते शुद्धा ब्रह्मविद्याविदो जनाः ॥ ४८<br><br>योगध्यानैकनिष्ठाश्च निर्लेपाः काञ्चनं यथा ।<br>शुद्धानां शोधनं नास्ति विशुद्धा ब्रह्मविद्यया ॥ ४९<br><br>उद्धृतानुष्णफेनाभिः पूताभिर्वस्त्रचक्षुषा ।<br>अद्भिः समाचरेत्सर्वं वर्जयेत्कलुषोदकम् ॥ ५०<br><br>गन्धवर्णरसैर्दुष्टमशुचिस्थानसंस्थितम् ।<br>पङ्काश्मदूषितं चैव सामुद्रं पल्वलोदकम् ॥ ५१<br><br>सशैवालं तथान्यैर्वा दोषैर्दुष्टं विवर्जयेत् ।<br>वस्त्रशौचान्वितः कुर्यात्सर्वकार्याणि वै द्विजाः ॥ ५२<br><br>नमस्कारादिकं सर्वं गुरुशुश्रूषणादिकम् ।<br>वस्त्रशौचविहीनात्मा ह्यशुचिर्नात्र संशयः ॥ ५३<br><br>देवकार्योपयुक्तानां प्रत्यहं शौचमिष्यते ।<br>इतरेषां हि वस्त्राणां शौचं कार्यं मलागमे ॥ ५४<br><br>वर्जयेत्सर्वयत्नेन वासोऽन्यैर्विधृतं द्विजाः ।<br>कौशेयाविकयो रूक्षैः क्षौमाणां गौरसर्षपैः ॥ ५५<br><br>श्रीफलैरंशुप्ट्टानां कुतपानामरिष्टकैः ।<br>चर्मणां विदलानां च वेत्राणां वस्त्रवन्मतम् ॥ ५६<br><br>वल्कलानां तु सर्वेषां छत्रचामरयोरपि ।<br>चैलवच्छौचमाख्यातं ब्रह्मविद्भिर्मुनीश्वरैः ॥ ५७<br><br>भस्मना शुद्ध्यते कांस्यं क्षारेणायसमुच्यते ।<br>ताम्रमम्लेन वै विप्रास्त्रपुसीसकयोरपि ॥ ५८ | एक सौ आठ बार जप करनेसे [पापसे] मुक्ति हो जाती है; इसमें सन्देह नहीं है। जो तत्त्वज्ञानी, ब्रह्मवेत्ता तथा उत्तम ब्राह्मण है, वह तो केवल [प्रणवके] स्मरणसे शुद्धि प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ४६-४७ ॥<br><br>आत्मज्ञानियोंके लिये प्रायश्चित्त होते ही नहीं हैं; ब्रह्मविद्याको जाननेवाले लोग विश्वके कल्याणके प्रेरक होते हैं, अतः वे [स्वतः] शुद्ध हैं। योगध्यानमें एकनिष्ठ वे लोग निर्लेप (शुद्ध) होते हैं, जैसे सुवर्ण शुद्ध होता है। शुद्ध लोगोंका शोधन नहीं होता है; वे तो ब्रह्मविद्याके द्वारा [पहले ही] शुद्ध होते हैं ॥ ४८-४९ ॥<br><br>नदी आदिसे ग्रहण किये गये, वस्त्र तथा नेत्रसे [भलीभाँति] पवित्र, शीतल तथा फेनरहित जलसे सभी अनुष्ठान करना चाहिये; अशुद्ध जलका प्रयोग नहीं करना चाहिये। गन्ध-रंग-रससे दूषित जल, अपवित्र स्थानमें रखे हुए जल, कीचड़ तथा कंकड़से दूषित जल, समुद्री जल, तालाबके जल, शैवालयुक्त जल और अन्य दोषोंसे विकृत जलका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये ॥ ५०-५१ १/२ ॥<br><br>हे द्विजो! वस्त्रकी शुद्धिसे युक्त होकर नमस्कार आदि तथा गुरुसेवा आदि समस्त कार्य करने चाहिये; वस्त्रशुद्धिसे रहित व्यक्ति निश्चित रूपसे अपवित्र रहता है; इसमें सन्देह नहीं है। देवकार्यमें उपयोग किये जानेवाले वस्त्रोंकी शुद्धि प्रतिदिन आवश्यक है; मैले हो जानेपर अन्य वस्त्रोंकी शुद्धि करनी चाहिये। हे द्विजो! दूसरोंके द्वारा धारण किये गये वस्त्रका पूर्ण प्रयत्नसे त्याग करना चाहिये ॥ ५२-५४ १/२ ॥<br><br>रेशमी तथा ऊनी वस्त्रोंकी शुद्धि [रीठे आदि] रूक्ष पदार्थोंसे, क्षौम (दुकूल) वस्त्रोंकी शुद्धि श्वेत सरसोंसे, स्वर्णकिरणयुक्त वस्त्रोंकी शुद्धि बिल्व फलोंसे, कुशास्तरणों या छाग-कम्बलोंकी शुद्धि मट्ठेके सेचनसे और चमड़े-शणवस्त्रों-बेंतसे बनी वस्तुओंकी शुद्धि सामान्य वस्त्रोंकी भाँति कही गयी है। ब्रह्मवेत्ता मुनीश्वरोंने समस्त वल्कल वस्त्रोंकी तथा छत्र-चामरकी शुद्धि वस्त्रशुद्धिकी भाँति बतायी है। हे विप्रो! कांस्यपात्रकी |
अध्याय ८९] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हैममद्भिः शुभं पात्रं रौप्यपात्रं द्विजोत्तमाः।<br>मण्यश्मशङ्खमुक्तानां शौचं तैजसवत्स्मृतम्॥ ५९<br><br>अग्नेरपां च संयोगादत्यन्तोपहतस्य च।<br>रसानामिह सर्वेषां शुद्धिरुत्प्लवनं स्मृतम्॥ ६० | शुद्धि भस्मसे होती है, लौहपात्रकी शुद्धि क्षारसे, ताँबा-राँगा-सीसेके पात्रकी शुद्धि अम्लसे कही जाती है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! सोने तथा चाँदीके पवित्र पात्र जलसे शुद्ध होते हैं; मणि, पत्थर, शंख तथा मोतीकी शुद्धि भी सुवर्णपात्रकी भाँति कही गयी है। अत्यधिक दूषित पदार्थकी शुद्धि अग्नि तथा जलके संयोगसे होती है। सभी रसोंकी शुद्धि उत्प्लवन-क्रियाद्वारा बतायी गयी है॥ ५५-६०॥ |
| तृणकाष्ठादिवस्तूनां शुभेनाभ्युक्षणं स्मृतम्।<br>उष्णेन वारिणा शुद्धिस्तथा स्रुक्स्रुवयोरपि॥ ६१<br><br>तथैव यज्ञपात्राणां मुशलोलूखलस्य च।<br>शृङ्गास्थिदारुदन्तानां तक्षणेनैव शोधनम्॥ ६२<br><br>संहतानां महाभागा द्रव्याणां प्रोक्षणं स्मृतम्।<br>असंहतानां द्रव्याणां प्रत्येकं शौचमुच्यते॥ ६३ | तृण, काष्ठ आदि वस्तुओंकी शुद्धिहेतु पवित्र जलसे अभ्युक्षण (छिड़काव) बताया गया है और स्रुक्-स्रुवाकी शुद्धि उष्ण जलसे होती है। उसी प्रकार यज्ञपात्रों, मूसल, उलूखल (ओखली), सींग-अस्थि-काष्ठ तथा हाथीदाँतकी बनी वस्तुओंकी शुद्धि तक्षण (छीलने)-से होती है। हे महाभागो! संहत (मिली-जुली) वस्तुओंकी शुद्धिहेतु प्रोक्षण बताया गया है और असंहत (पृथक्) वस्तुओंको अलग-अलग शुद्ध करना बताया गया है॥ ६१-६३॥ |
| अभुक्तराशिधान्यानामेकदेशस्य दूषणे।<br>तावन्मात्रं समुद्धृत्य प्रोक्षयेद्वै कुशाम्भसा॥ ६४<br><br>शाकमूलफलादीनां धान्यवच्छुद्धिरिष्यते।<br>मार्जनोन्मार्जनैर्वेश्म पुनःपाकेन मृन्मयम्॥ ६५<br><br>उल्लेखनेनाञ्जनेन तथा सम्मार्जनेन च।<br>गोनिवासेन वै शुद्धा सेचनेन धरा स्मृता॥ ६६<br><br>भूमिस्थमुदकं शुद्धं वैतृष्ण्यं यत्र गौर्व्रजेत्।<br>अव्याप्तं यदमेध्येन गन्धवर्णरसान्वितम्॥ ६७<br><br>वत्सः शुचिः प्रस्त्रवणे शकुनिः फलपातने।<br>स्वदारास्यं गृहस्थानां रतौ भार्याभिकाङ्क्षया॥ ६८<br><br>हस्ताभ्यां क्षालितं वस्त्रं कारुणा च यथाविधि।<br>कुशाम्बुना सुसम्प्रोक्ष्य गृह्णीयाद्धर्मवित्तमः॥ ६९ | भोजनहेतु अनाजकी राशिके एक भागके दूषित हो जानेपर उतने भागको निकालकर शेष भागका कुशके जलसे प्रोक्षण करना चाहिये। शाक, मूल, फल आदिकी शुद्धि धान्य (अनाज)-की शुद्धिकी भाँति कही जाती है। घरकी शुद्धि मार्जन (जलसेचन) तथा गोबरसे लीपनेसे होती है। मिट्टीका पात्र अग्निमें गर्म करनेसे शुद्ध होता है। भूमिकी शुद्धि खनन (खोदने)-से, गायके गोबरसे लीपनेसे, मलापकरणसे, गायके निवाससे तथा जलके द्वारा सेचनसे बतायी गयी है। भूमिपर ठहरा हुआ जल जो अपवित्र पदार्थसे युक्त न हो तथा गन्ध, वर्ण, रससे युक्त हो, वह गायके द्वारा प्यास बुझनेतक पी लिये जानेपर शुद्ध हो जाता है। बछड़ा गोदोहनके समय शुद्ध होता है और पक्षी [चोंचद्वारा] फल गिरानेके समय शुद्ध होता है। भार्याकी आकांक्षासे रतिके समय गृहस्थोंके लिये पत्नी शुद्ध होती है। धर्मवेत्ताको चाहिये कि धोबीके द्वारा हाथसे धोये गये वस्त्रको विधिपूर्वक कुशके जलसे प्रोक्षित करके धारण करे॥ ६४-६९॥ |
४६२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| पण्यं प्रसारितं चैव वर्णाश्रमविभागशः।<br>शुचिराकरजं तेषां श्वा मृगग्रहणे शुचिः ॥ ७० | खानसे निकालकर विक्रयहेतु फैलायी गयी वस्तुओंमें वर्णाश्रमविभागके अनुसार शुद्धता होती है और [मृगयामें] हरिण आदि पशुओंको पकड़ते समय श्वान शुद्ध होता है॥ ७० ॥ |
| छाया च विप्लुषो विप्रा मक्षिकाद्या द्विजोत्तमाः।<br>रजोभूर्वायुरग्निश्च मेध्यानि स्पर्शने सदा ॥ ७१ | हे द्विजश्रेष्ठो! अनिषिद्ध छाया, वेदपाठके समय मुखसे निकली बूँदें, विप्र, मक्खियाँ, धूल, भूमि, वायु, अग्नि—ये सब स्पर्शके लिये सदा शुद्ध होते हैं। हे विप्रो! सोकर उठनेपर, भोजनके अनन्तर, छींक आनेपर, जल आदि पीनेपर, थूकनेपर और अध्ययनके आदिमें पवित्र होते हुए भी फिरसे आचमन करना चाहिये। अन्य लोगोंके द्वारा किये गये आचमनकी जो बूँदें पैरोंपर पड़ जायें, उन्हें धूलके समान समझना चाहिये; उनसे कोई अशुद्ध नहीं होता है॥ ७१—७३॥ |
| सुप्त्वा भुक्त्वा च वै विप्राः क्षुत्त्वा पीत्वा च वै तथा।<br>ष्ठीवित्वाध्ययनादौ च शुचिरप्याचमेत्पुनः ॥ ७२ | |
| पादौ स्पृशन्ति ये चापि पराचमनबिन्दवः।<br>ते पार्थिवैः समा ज्ञेया न तैरप्रयतो भवेत् ॥ ७३ | |
| कृत्वा च मैथुनं स्पृष्ट्वा पतितं कुक्कुटादिकम्।<br>सूकरं चैव काकादि श्वानमुष्ट्रं खरं तथा ॥ ७४ | मैथुनके अनन्तर, पतितका स्पर्श करके, मुर्गा-सूअर-कौवा-कुत्ता-ऊँट-गधा-यूप, चाण्डाल आदिका स्पर्श करके व्यक्ति स्नानके द्वारा शुद्ध होता है। रजस्वला, प्रसूता तथा शूद्रा स्त्रीका स्पर्श नहीं करना चाहिये। जननाशौच तथा मरणाशौचसे युक्त व्यक्तिको चाहिये कि अपने सम्बन्धियोंकी स्त्रियोंमें रजस्वला स्त्रीको न छुए और छू लेनेपर वह स्नान करके ही शुद्ध होता है॥ ७४—७६॥ |
| यूपं चाण्डालकाद्यांश्च स्पृष्ट्वा स्नानेन शुध्यति।<br>रजस्वलां सूतिकां च न स्पृशेदन्त्यजामपि ॥ ७५ | |
| सूतिकाशौचसंयुक्तः शावाशौचसमन्वितः।<br>संस्पृशेन रजस्तासां स्पृष्ट्वा स्नात्वैव शुध्यति ॥ ७६ | |
| नैवाशौचं यतीनां च वनस्थब्रह्मचारिणाम्।<br>नैष्ठिकानां नृपाणां च मण्डलीनां च सुव्रताः ॥ ७७ | हे सुव्रतो! संन्यासियों, वानप्रस्थियों, नैष्ठिक ब्रह्मचारियों, राजाओं तथा [उनके] मन्त्रियोंको अशौच नहीं लगता है। कार्यमें अवरोध न हो, इसलिये राजाओंको, भ्रमणशील संन्यासियों और ब्राह्मणोंको तथा पतितजनोंके लिये सम्भव न होनेके कारण अशौच नहीं होता है। कुछ भी संचय न करनेवाले ब्राह्मणों, यज्ञके लिये दीक्षित यजमान तथा जिन्हें अशौचकालमें उसकी जानकारी न हुई हो—ऐसे लोगोंकी स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है। |
| ततः कार्यविरोधाद्धि नृपाणां नान्यथा भवेत्।<br>वैखानसानां विप्राणां पतितानामसम्भवात् ॥ ७८ | |
| असञ्चयद्विजानां च स्नानमात्रेण नान्यथा।<br>तथासन्निहितानां च यज्ञार्थं दीक्षितस्य च ॥ ७९ | |
| एकाहाद्यज्ञयाजीनां शुद्धिरुक्ता स्वयम्भुवा।<br>ततस्त्वधीतशाखानां चतुर्भिः सर्वदेहिनाम् ॥ ८० | यज्ञमें दीक्षित ऋत्विजों तथा उनकी वैदिक शाखाका अध्ययन करनेवालोंका अशौच ब्रह्माजीने एक दिनका बताया है। अपने गोत्रसे भिन्न जनोंकी शुद्धि चार दिनोंमें हो जाती है; क्योंकि उनके लिये जननाशौच तथा मरणाशौच तीन दिनोंसे अधिक नहीं होता है। |
| सूतकं प्रेतकं नास्ति त्र्यहादूर्ध्वममुत्र वै।<br>अर्वागेकादशाहान्तं बान्धवानां द्विजोत्तमाः ॥ ८१ | [परिवारमें] मृत्यु हो जानेपर बान्धवोंकी दस दिनोंमें शुद्धि हो जाती |
अध्याय ८९] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४६३
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| स्नानमात्रेण वै शुद्धिर्मरणे समुपस्थिते।<br>तत ऋतुत्रयादर्वागेकाहः परगीयते॥ ८२ | है। जन्मके दस दिनके बाद छः मासके भीतर बालककी मृत्यु होनेपर एक दिनका अशौच होता है। |
| सप्तवर्षात्ततश्चार्वाक् त्रिरात्रं हि ततः परम्।<br>दशाहं ब्राह्मणानां वै प्रथमेऽहनि वा पितुः॥ ८३ | तत्पश्चात् सात वर्षसे छोटे बालककी मृत्यु होनेपर तीन रातका अशौच होता है। सात वर्षसे बड़े उपनीत ब्राह्मण-बालककी मृत्युपर दस दिनका अशौच होता है, किंतु विकल्पसे पिताके लिये एक दिनका भी अशौच बताया गया है, |
| दशाहं सूतिकाशौचं मातुरप्येवमव्ययाः।<br>अर्वाक् त्रिवर्षात्स्नानेन बान्धवानां पितुः सदा॥ ८४ | माताके लिये तो दस दिनका अशौच रहता ही है। तीन वर्षसे कमके बालककी मृत्युपर बान्धवोंकी शुद्धि स्नानमात्रसे हो जाती है, किंतु पिताकी शुद्धि सदा ही तीन रात्रिके उपरान्त ही होती है। |
| अष्टाब्दादेकरात्रेण शुद्धिः स्याद् बान्धवस्य तु।<br>द्वादशाब्दात्ततश्चार्वाक् त्रिरात्रं स्त्रीषु सुव्रताः॥ ८५ | आठ वर्षसे अधिकके सम्बन्धीकी मृत्यु होनेपर बान्धवोंकी शुद्धि एक दिनमें हो जाती है। हे सुव्रतो! आठ वर्षके बाद बारह वर्षके पहलेतक स्त्रियोंको तीन रातका अशौच होता है। |
| सपिण्डता च पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते।<br>अतिक्रान्ते दशाहे तु त्रिरात्रमशुचिर्भवेत्॥ ८६ | सातवीं पीढ़ीके बाद सपिण्डता समाप्त हो जाती है। दस दिन बीत जानेपर अशौचका ज्ञान होनेपर तीन रातका अशौच होता है। |
| ततः सन्निहितो विप्रश्चार्वाक् पूर्वं तदेव वै।<br>संवत्सरे व्यतीते तु स्नानमात्रेण शुद्ध्यति॥ ८७ | हे विप्रो! छः मासके पहले मृत्युकी जानकारी होनेपर पक्षिणी (दो रात-एक दिन)-का अशौच होता है और उसके बाद एक वर्षसे पहले एक दिनका अशौच होता है। वर्ष व्यतीत हो जानेपर स्नानमात्रसे सपिण्डोंकी शुद्धि हो जाती है॥ ७७–८७॥ |
| स्पृष्ट्वा प्रेतं त्रिरात्रेण धर्मार्थं स्नानमुच्यते।<br>दाहकानां च नेतॄणां स्नानमात्रमबान्धवे॥ ८८ | शवका स्पर्श कर लेनेपर तीन रातमें शुद्धि होती है। धर्मके लिये स्नान ही शुद्धिहेतु कहा जाता है। बान्धव न होनेपर शवका दाह करनेवाले तथा उसे ले जानेवालोंके लिये स्नानमात्र ही विहित है। |
| अनुगम्य च वै स्नात्वा घृतं प्राश्य विशुद्ध्यति।<br>आचार्यमरणे चैव त्रिरात्रं श्रोत्रिये मृते॥ ८९ | शवके साथ [यात्रामें] जानेपर स्नान करके तथा घृतका प्राशन करनेपर व्यक्ति शुद्ध होता है। हे द्विजो! आचार्य तथा श्रोत्रियके मरणमें तीन रातका अशौच होता है। |
| पक्षिणी मातुलानां च सोदराणां च वा द्विजाः।<br>भूपानां मण्डलीनां च सद्यो नीराष्ट्रवासिनाम्॥ ९० | माताके भाइयोंके मरणमें पक्षिणी अशौच होता है और उपकारी जनोंके मरणमें तीन रातका अशौच होता है। राजाओं, सामन्तों तथा देशान्तरवासियोंके मरणमें स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है। |
| केवलं द्वादशाहेन क्षत्रियाणां द्विजोत्तमाः।<br>नाभिषिक्तस्य चाशौचं सम्प्रमादेषु वै रणे॥ ९१ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! क्षत्रियोंका अशौच बारह दिनका होता है। अभिषिक्त राजाके रणमें मरनेपर बान्धवोंको अशौच नहीं होता है। |
| वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्ध्यति।<br>इति सङ्क्षेपतः प्रोक्ता द्रव्यशुद्धिरनुत्तमा॥ ९२ | वैश्य पन्द्रह दिनोंमें और शूद्र एक महीनेमें शुद्ध होता है। [हे विप्रो!] इस |
| ४६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| प्रकार मैंने संक्षेपमें अत्युत्तम द्रव्यशुद्धिका वर्णन कर दिया॥ ८८-९२॥ | |
|---|---|
| अशौचं चानुपूर्व्येण यतीनां नैव विद्यते।<br>त्रेताप्रभृति नारीणां मासि मास्यार्तवं द्विजाः॥ ९३<br><br>कृते सकृद्युगवशाज्जायन्ते वै सहैव तु।<br>प्रयान्ति च महाभागा भार्याभिः कुरवो यथा॥ ९४ | पूर्वकी भाँति यतियोंका अशौच होता ही नहीं है। हे द्विजो! [अब मैं स्त्रियोंके रजोधर्मकी प्रवृत्तिका वर्णन करता हूँ] त्रेता आदि युगमें प्रत्येक मासमें स्त्रियोंको रजोधर्म होता है। युगकी प्रकृतिके अनुसार सत्ययुगमें लोग स्त्रियोंके साथ एक बार सहवास करते थे और सन्तानें उत्पन्न होती थीं, जिस प्रकार भाग्यशाली कुरुवर्षनिवासी करते थे॥ ९३-९४॥ |
| वर्णाश्रमव्यवस्था च त्रेताप्रभृति सुव्रताः।<br>भारते दक्षिणे वर्षे व्यवस्था नेतरेष्वथ॥ ९५<br><br>महावीते सुवीते च जम्बूद्वीपे तथाष्टसु।<br>शाकद्वीपादिषु प्रोक्तो धर्मो वै भारते यथा॥ ९६ | हे सुव्रतो! दक्षिणमें भारतवर्षमें वर्णाश्रम-व्यवस्था त्रेतायुगसे लेकर है; यह व्यवस्था अन्य आठ किंपुरुष आदि वर्षोंमें, महावीतमें तथा सुवीतमें नहीं है। शाकद्वीप आदि द्वीपोंमें भारतके ही समान धर्मकी व्यवस्था बतायी गयी है॥ ९५-९६॥ |
| रसोल्लासा कृते वृत्तिस्त्रेतायां गृहवृक्षजा।<br>सैवार्तवकृताद्दोषाद्रागद्वेषादिभिर्नृणाम् ॥ ९७<br><br>मैथुनात्कामतो विप्रास्तथैव परुषादिभिः।<br>यवाद्याः सम्प्रजायन्ते ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश॥ ९८<br><br>ओषध्यश्च रजदोषाः स्त्रीणां रागादिभिर्नृणाम्।<br>अकालकृष्टा विध्वस्ताः पुनरुत्पादितास्तथा॥ ९९ | सत्ययुगमें लोगोंकी वृत्ति सहज आनन्दकी थी, त्रेतामें गृह, वृक्ष आदिपर आधारित वृत्ति थी। वही वृत्ति बादमें रजोदोषके कारण लोगोंके राग-द्वेषपर आधारित हो गयी। हे विप्रो! कामवश स्त्रीसंग, क्रोध इत्यादि दोषोंके कारण जौ आदि हविष्यान्न एवं औषधियाँ चौदह प्रकारके ग्राम्य तथा वन्य पदार्थोंके रूपमें उत्पन्न होने लगीं; जो अकालमें नष्ट होकर पुनः उत्पन्न होती थीं, इसलिये प्रयत्नपूर्वक रजस्वला स्त्रीसे सम्भाषण आदि नहीं करना चाहिये॥ ९७-९९ १/२॥ |
| तस्मात्सर्वप्रयत्नेन न सम्भाष्या रजस्वला।<br>प्रथमेऽहनि चाण्डाली यथा वर्ज्या तथाङ्गना॥ १००<br><br>द्वितीयेऽहनि विप्रा हि यथा वै ब्रह्मघातिनी।<br>तृतीयेऽह्नि तदर्धेन चतुर्थेऽहनि सुव्रताः॥ १०१<br><br>स्नात्वार्धमासात्संशुद्धा ततः शुद्धिर्भविष्यति।<br>आषोडशात्ततः स्त्रीणां मूत्रवच्छौचमिष्यते॥ १०२ | पहले दिन रजस्वला स्त्री चाण्डालीकी भाँति वर्ज्य होती है। हे विप्रो! दूसरे दिन वह ब्रह्मघातिनीके समान होती है और तीसरे दिन उसके आधे पापसे युक्त रहती है। हे सुव्रतो! चौथे दिन स्नान करके वह आधे महीनेतक देवपूजन आदिके लिये शुद्ध रहती है। पाँचवें दिनसे सोलहवें दिनतक रजोदोष रहनेके कारण स्त्रीस्पर्श आदिकी शुद्धि मूत्रोत्सर्गकी शुद्धिकी तरह कही गयी है। इसके बाद ही उसकी पूर्ण शुद्धि होगी॥ १००-१०२॥ |
| पञ्चरात्रं तथास्पृश्या रजसा वर्तते यदि।<br>सा विंशदिवसादूर्ध्वं रजसा पूर्ववत्तथा॥ १०३ | यदि स्त्री रजोदोषसे युक्त है, तो पाँच रात्रितक वह अस्पृश्य (अगम्य) होती है। बीस दिनके बाद भी वह यदि रजोदोषसे युक्त है, तो वह पूर्वकी भाँति अस्पृश्य होती है॥ १०३॥ |
अध्याय ८९] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४६५
| स्नानं शौचं तथा गानं रोदनं हसनं तथा।<br>यानमभ्यञ्जनं नारी द्यूतं चैवानुलेपनम् ॥ १०४<br><br>दिवास्वप्नं विशेषेण तथा वै दन्तधावनम्।<br>मैथुनं मानसं वापि वाचिकं देवतार्चनम् ॥ १०५<br><br>वर्जयेत्सर्वयत्नेन नमस्कारं रजस्वला।<br>रजस्वलाङ्गनास्पर्शसम्भाषे च रजस्वला ॥ १०६<br><br>सन्त्यागं चैव वस्त्राणां वर्जयेत्सर्वयत्नतः।<br>स्नात्वान्यपुरुषं नारी न स्पृशेत्तु रजस्वला ॥ १०७<br><br>ईक्षयेद्भास्करं देवं ब्रह्मकूर्चं ततः पिबेत्।<br>केवलं पञ्चगव्यं वा क्षीरं वा चात्मशुद्धये ॥ १०८ | रजस्वला स्त्रीको स्नान, शौच, गायन, रोदन, हास-परिहास, यात्रा करना, अभ्यंग, द्यूत, अनुलेपन, विशेष रूपसे दिनमें शयन, दन्तधावन, मैथुन, मन तथा वाणीसे भी देवपूजन, नमस्कार आदिको पूर्णप्रयत्नसे त्याग देना चाहिये। रजस्वलाको चाहिये कि अन्य रजस्वला स्त्रीके अंगस्पर्श तथा उसके साथ बातचीतका त्याग कर दे; उसे पूर्णप्रयत्नके साथ वस्त्र बदलनेका त्याग कर देना चाहिये। रजस्वला स्त्रीको चाहिये कि स्नान करके शुद्ध होनेपर [पतिके अतिरिक्त] अन्य पुरुषका स्पर्श न करे और सूर्यदेवका दर्शन करे। तदनन्तर आत्मशुद्धिके लिये ब्रह्मकूर्च अथवा केवल पंचगव्य अथवा दुग्धका पान करे॥ १०४-१०८॥ |
|---|---|
| चतुर्थ्यां स्त्री न गम्या तु गतोऽल्पायुः प्रसूयते।<br>विद्याहीनं व्रतभ्रष्टं पतितं पारदारिकम् ॥ १०९<br><br>दारिद्र्यार्णवमग्नं च तनयं सा प्रसूयते।<br>कन्यार्थिनैव गन्तव्या पञ्चम्यां विधिवत्पुनः ॥ ११०<br><br>रक्ताधिक्याद्द्भवेन्नारी शुक्राधिक्ये भवेत्पुमान्।<br>समे नपुंसकं चैव पञ्चम्यां कन्यका भवेत् ॥ १११<br><br>षष्ठ्यां गम्या महाभागा सत्पुत्रजननी भवेत्।<br>पुत्रत्वं व्यञ्जयेत्तस्य जातपुत्रो महाद्युतिः ॥ ११२<br><br>पुमिति नरकस्याख्या दुःखं च नरकं विदुः।<br>पुंसस्त्राणान्वितं पुत्रं तथाभूतं प्रसूयते ॥ ११३ | रजोधर्मके चौथे दिन स्त्री गमनके योग्य नहीं होती है; वह स्त्री नष्ट तथा अल्प आयुवाले [पुत्र]-को जन्म देती है। वह विद्यारहित, व्रतसे च्युत, पतित, दूसरोंकी स्त्रियोंके साथ दुराचार करनेवाले तथा दरिद्रताके समुद्रमें डूबे रहनेवाले पुत्रको उत्पन्न करती है। पुत्रीकी कामना करनेवालेको पाँचवें दिन स्त्रीके साथ गमन करना चाहिये। रक्तका आधिक्य होनेपर कन्या होती है, शुक्रका आधिक्य होनेपर पुत्र होता है और दोनोंके समान होनेपर नपुंसक संतान उत्पन्न होती है। पाँचवें दिन सहवास करनेपर कन्या उत्पन्न होती है। छठें दिन यदि स्त्रीके साथ गमन किया जाय, तो वह महाभाग्यवती स्त्री उत्तम पुत्रको उत्पन्न करती है, उसके पुत्रत्वको प्रकट करती है और वह पैदा हुआ पुत्र महातेजस्वी होता है। ‘पुम्’—यह एक नरकका नाम है और नरकको दुःखपूर्ण कहा गया है; वह स्त्री पुम् [नरक]-से त्राण (रक्षा) करनेवाले उस प्रकारके पुत्रको जन्म देती है॥ १०९-११३॥ |
| सप्तम्यां चैव कन्यार्थी गच्छेत्सैव प्रसूयते।<br>अष्टम्यां सर्वसम्पन्नं तनयं सम्प्रसूयते ॥ ११४<br><br>नवम्यां दारिकायार्थी दशम्यां पण्डितो भवेत्।<br>एकादश्यां तथा नारीं जनयेत्सैव पूर्ववत् ॥ ११५ | कन्याकी इच्छावालेको सातवीं रात्रिमें गमन करना चाहिये; किंतु वह कन्या वन्ध्या होती है। आठवीं रात्रिमें स्त्री सर्वगुणसम्पन्न पुत्रको जन्म देती है। कन्याकी इच्छावाले व्यक्तिको नौवीं रातमें सहवास करना चाहिये। दसवीं रातमें संभोग करनेपर विद्वान् पुत्र उत्पन्न होता है। ग्यारहवीं रातमें सहवास करनेपर वह स्त्री पूर्वकी |
९०- यतियोंके लिये प्रायश्चित्तनिरूपण
| ४६६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| द्वादश्यां धर्मतत्त्वज्ञं श्रौतस्मार्तप्रवर्तकम्।<br>त्रयोदश्यां जडां नारीं सर्वसङ्करकारिणीम्॥ ११६<br><br>जनयत्यङ्गना यस्मान्न गच्छेत्सर्वयत्नतः।<br>चतुर्दश्यां यदा गच्छेत्सा पुत्रजननी भवेत्॥ ११७<br><br>पञ्चदश्यां च धर्मिष्ठां षोडश्यां ज्ञानपारगम्।<br>स्त्रीणां वै मैथुने काले वामपार्श्वे प्रभञ्जनः॥ ११८<br><br>चरेद्यदि भवेन्नारी पुमांसं दक्षिणे लभेत्।<br>स्त्रीणां मैथुनकाले तु पापग्रहविवर्जिते॥ ११९<br><br>उक्तकाले शुचिर्भूत्वा शुद्धां गच्छेच्छुचिस्मिताम्।<br>इत्येवं सम्प्रसङ्गेन यतीनां धर्मसङ्ग्रहे॥ १२०<br><br>सर्वेषामेव भूतानां सदाचारः प्रकीर्तितः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि सदाचारं शुचिर्नरः॥ १२१<br><br>श्रावयेद्वा यथान्यायं ब्राह्मणान् दग्धकिल्बिषान्।<br>ब्रह्मलोकमनुप्राप्य ब्रह्मणा सह मोदते॥ १२२ | भाँति कन्या उत्पन्न करती है। बारहवें दिन स्त्री धर्मतत्त्वके ज्ञाता तथा श्रुति-स्मृतिके धर्मोंको चलानेवाले पुत्रको उत्पन्न करती है और तेरहवीं रातमें गमन करनेपर मूर्ख तथा वर्णसंकर [दोष] फैलानेवाली कन्या उत्पन्न करती है; अतः पूरे प्रयत्नसे उस दिन स्त्री-सहवास नहीं करना चाहिये। यदि चौदहवीं रातमें गमन किया जाय, तो वह स्त्री पुत्र उत्पन्न करनेवाली होती है। पन्द्रहवीं रातमें गमन करनेपर वह धर्मनिष्ठ कन्याको तथा सोलहवीं रातमें गमन करनेपर ज्ञानमें पारंगत पुत्रको उत्पन्न करती है॥ ११४-११७ १/२॥<br><br>मैथुनके समय यदि स्त्रियोंके बायें पार्श्वमें वायु प्रवाहित होता हो, तो कन्या होती है और दक्षिण पार्श्वमें प्रवाहित हो, तो पुत्र प्राप्त होता है। पापग्रहसे रहित मैथुन-कालमें स्त्रियोंसे सहवास करना चाहिये। ऐसे बताये गये [शुभ] समयमें पवित्र होकर उत्तम मुस्कानवाली भार्याके साथ गमन करना चाहिये॥ ११८-११९ १/२॥<br><br>[हे विप्रो!] इस प्रकार मैंने यतियोंके धर्मसंग्रहमें प्रसंगपूर्वक सभी प्राणियोंके सदाचारका वर्णन कर दिया। जो मनुष्य पवित्र होकर इस सदाचारको विधिपूर्वक पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा दग्ध पापवाले ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करके ब्रह्माके साथ आनन्द करता है॥ १२०-१२२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सदाचारकथनं नामैकोननवतितमोऽध्यायः॥ ८९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सदाचारकथन' नामक नवासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८९॥
नब्बेवाँ अध्याय
यतियोंके लिये प्रायश्चित्तनिरूपण
| सूत उवाच | |
|---|---|
| अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि यतीनामिह निश्चितम्।<br>प्रायश्चित्तं शिवप्रोक्तं यतीनां पापशोधनम्॥ १<br><br>पापं हि त्रिविधं ज्ञेयं वाङ्मनःकायसम्भवम्।<br>सततं हि दिवा रात्रौ येनेदं वेष्ट्यते जगत्॥ २<br><br>तत्कर्मणा विनाप्येष तिष्ठतीति परा श्रुतिः।<br>क्षणमेवं प्रयोज्यं तु आयुष्यं तु विधारणम्॥ ३ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] इसके बाद मैं यतियोंके लिये निश्चित किये गये प्रायश्चित्तका वर्णन करूँगा; शिवके द्वारा कहा गया यह [प्रायश्चित्त] यतियोंके पापका शोधन करनेवाला है॥ १॥<br><br>मन, वाणी तथा शरीरसे होनेवाले पापको तीन प्रकारका जानना चाहिये, जिसके द्वारा दिन-रात निरन्तर यह जगत् व्याप्त है। यति कर्मके बिना भी स्थित रहता है— |
अध्याय १०] यतियोंके लिये प्रायश्चित्तनिरूपण ४६७
| भवेद्योगोऽप्रमत्तस्य योगो हि परमं बलम्।<br>न हि योगात्परं किञ्चिन्नराणां दृश्यते शुभम्॥ ४<br><br>तस्माद्योगं प्रशंसन्ति धर्मयुक्ता मनीषिणः।<br>अविद्यां विद्यया जित्वा प्राप्यैश्वर्यमनुत्तमम्॥ ५<br><br>दृष्ट्वा परावरं धीराः परं गच्छन्ति तत्पदम्। | यह उपनिषद्का कथन है; प्रत्येक क्षणको योगमें प्रयुक्त करना चाहिये; क्योंकि आयु अत्यन्त चलायमान है। प्रमादरहितको ही योग प्राप्त होता है। योग महान् बल है; मनुष्योंके लिये योगसे बढ़कर कल्याणकारी कुछ भी नहीं दिखायी देता है। अतः धर्मयुक्त विद्वान् लोग योगकी प्रशंसा करते हैं। विद्याके द्वारा अविद्याको जीतकर अत्युत्तम ऐश्वर्य प्राप्त करके पुनः ब्रह्म तथा मायाविलासका भली-भाँति विचार करके धीर लोग [शिवनामक] उस परम पदको प्राप्त करते हैं॥ २—५ १/२॥ |
| व्रतानि यानि भिक्षूणां तथैवोपाव्रतानि च॥ ६<br><br>एकैकातिक्रमे तेषां प्रायश्चित्तं विधीयते।<br>उपेत्य तु स्त्रियं कामात्प्रायश्चित्तं विनिर्द्दिशेत्॥ ७<br><br>प्राणायामसमायुक्तं चरेत्सान्तपनं व्रतम्।<br>ततश्चरति निर्देशात्कृच्छ्रं चान्ते समाहितः॥ ८<br><br>पुनराश्रममागत्य चरेद्भिक्षुरतन्द्रितः। | यतियोंके लिये जो व्रत तथा उपव्रत हैं; उनमें प्रत्येकका अतिक्रम (उल्लंघन) होनेपर उनके लिये प्रायश्चित्तका विधान किया गया है। [गृहस्थको भी] कामनापूर्वक स्त्री-गमन करनेपर प्रायश्चित्त करना चाहिये; यतिको प्राणायामयुक्त सान्तपनव्रत करना चाहिये, इसके बाद एकाग्रचित्त होकर नियमानुसार कृच्छ्रव्रत करना चाहिये, तत्पश्चात् अपने आश्रममें लौटकर आलस्यरहित होकर भिक्षुक (यति)-को आचारपूर्वक रहना चाहिये॥ ६—८ १/२॥ |
| न धर्मयुक्तमनृतं हिनस्तीति मनीषिणः॥ ९<br><br>तथापि न च कर्तव्यं प्रसङ्गो ह्येष दारुणः।<br>अहोरात्रोपवासश्च प्राणायामशतं तथा॥ १०<br><br>असद्वादो न कर्तव्यो यतिना धर्मलिप्सुना।<br>परमापद्गतेनापि न कार्यं स्तेयमप्युत॥ ११<br><br>स्तेयादभ्यधिकः कश्चिन्नास्त्यधर्म इति श्रुतिः।<br>हिंसा ह्येषा परा सृष्टा स्तैन्यं वै कथितं तथा॥ १२<br><br>यदेतद्द्रविणं नाम प्राणा ह्येते बहिश्चराः।<br>स तस्य हरते प्राणान् यो यस्य हरते धनम्॥ १३<br><br>एवं कृत्वा सुदुष्टात्मा भिन्नवृत्तो व्रताच्युतः।<br>भूयो निर्वेदमापन्नश्चरेच्चान्द्रायणं व्रतम्॥ १४<br><br>विधिना शास्त्रदृष्टेन संवत्सरमिति श्रुतिः।<br>ततः संवत्सरस्यान्ते भूयः प्रक्षीणकल्मषः।<br>पुनर्निर्वेदमापन्नश्चरेद्भिक्षुरतन्द्रितः ॥ १५ | धर्मार्थ असत्य [किसीको] दूषित नहीं करता है—ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं; फिर भी उसे नहीं करना चाहिये। यह असत्य प्रसंग भयंकर होता है। [यदि यह हो जाता है, तो] एक दिन तथा एक रात उपवास और सौ प्राणायाम इसका प्रायश्चित्त है। धर्मके इच्छुक यतिको असद्वाद नहीं करना चाहिये; बड़ी-से-बड़ी विपत्ति पड़नेपर भी उसे चोरी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि चोरीसे बढ़कर कोई अधर्म नहीं है—ऐसा श्रुति कहती है। चोरीको प्राणवधके समान होनेवाली हिंसाके रूपमें कहा गया है। जो यह धन है, वह मनुष्योंका बाहर विचरण करनेवाला प्राण ही है। जो जिसके धनका हरण करता है, वह मानो उसका प्राण ही हर लेता है। इस [चौर] कर्मको करके वह अत्यन्त दुष्ट मनवाला व्यक्ति आचाररहित तथा व्रतच्युत हो जाता है। उसे फिरसे वैराग्ययुक्त होकर शास्त्रोक्त विधिसे एक वर्षतक चान्द्रायणव्रत करना चाहिये—ऐसा श्रुति कहती है। वर्षके अन्तमें वह पापरहित हो जाता है; इसके बाद यतिको वैराग्ययुक्त होकर आलस्यरहित हो सदाचारका पालन करना चाहिये॥ ९—१५॥ |
| अहिंसा सर्वभूतानां कर्मणा मनसा गिरा।<br>अकामादपि हिंसेत यदि भिक्षुः पशून् कृमीन्॥ १६ | सभी प्राणियोंके प्रति मन, वचन तथा कर्मसे अहिंसा भाव रखना चाहिये। यदि यति अनजानमें भी पशुओं तथा |
९१- आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधनामें प्रणवका माहात्म्य तथा शिवोपासनानिरूपण
| ४६८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| कृच्छ्रातिकृच्छ्रं कुर्वीत चान्द्रायणमथापि वा।<br>स्कन्देदिन्द्रियदौर्बल्यात् स्त्रियं दृष्ट्वा यतिर्यदि॥ १७<br><br>तेन धारयितव्या वै प्राणायामास्तु षोडश।<br>दिवा स्कन्नस्य विप्रस्य प्रायश्चित्तं विधीयते॥ १८<br><br>त्रिरात्रमुपवासाश्च प्राणायामशतं तथा।<br>रात्रौ स्कन्नः शुचिः स्नात्वा द्वादशैव तु धारणाः॥ १९<br><br>प्राणायामेन शुद्धात्मा विरजा जायते द्विजाः।<br>एकान्नं मधुमांसं वा अश्रुतान्नं तथैव च॥ २०<br><br>अभोज्यानि यतीनां तु प्रत्यक्षलवणानि च।<br>एकैकातिक्रमात्तेषां प्रायश्चित्तं विधीयते॥ २१<br><br>प्राजापत्येन कृच्छ्रेण ततः पापात्प्रमुच्यते।<br>व्यतिक्रमाश्च ये केचिद्वाङ्मनःकायसम्भवाः॥ २२<br><br>सद्भिः सह विनिश्चित्य यद् ब्रूयुस्तत्समाचरेत्॥ २३<br><br>चरेद्धि शुद्धः समलोष्टकाञ्चनः<br>समस्तभूतेषु च सत्समाहितः।<br>स्थानं ध्रुवं शाश्वतमव्ययं तु<br>परं हि गत्वा न पुनर्हि जायते॥ २४ | कीड़ोंतककी हिंसा कर दे, तो उसे कृच्छ्रातिकृच्छ्र अथवा चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। स्त्रीको देखकर इन्द्रिय-दौर्बल्यके कारण यदि यति स्खलित हो जाता है, तो उसे सोलह बार प्राणायाम करना चाहिये। दिनमें वीर्यस्खलन करनेवाले विप्रके लिये प्रायश्चित्तस्वरूप तीन राततक उपवास और सौ प्राणायामका विधान है। यदि रातमें स्खलन होता है, तो स्नान करके बारह धारणा (प्राणायाम) करनेके अनन्तर वह शुद्ध हो जाता है। हे द्विजो! प्राणायामके द्वारा विप्र शुद्धमनवाला तथा पापसे रहित हो जाता है॥ १६–१९१/२॥<br><br>किसी एक व्यक्तिसे प्राप्त अन्न, मधु (शहद), मांस, बिना पका हुआ भोजन तथा प्रत्यक्ष लवण—ये सभी पदार्थ यतियोंके लिये अभोज्य हैं। इनमें किसी एकका भी उल्लंघन होनेपर उनके लिये प्रायश्चित्तका विधान किया गया है; कृच्छ्रप्राजापत्यव्रतके द्वारा उस पापसे यति छूट जाता है। मन, वाणी तथा शरीरसे जो कोई भी अन्य व्यतिक्रम हो जाय, तो उनके प्रायश्चित्तके लिये सत्पुरुषोंके साथ निर्णय करके वे जो बतायें, उसे करना चाहिये॥ २०–२३॥<br><br>जो शुद्ध मनसे मिट्टीके ढेले तथा सुवर्णमें समान भाव रखता है और सभी प्राणियोंमें ब्रह्मका चिन्तन करता है; वह स्थिर, शाश्वत तथा अविनाशी परम धामको प्राप्त करके पुनः जन्म नहीं ग्रहण करता है॥ २४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे यतिप्रायश्चित्तं नाम नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'यतिप्रायश्चित्त' नामक नब्बेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९० ॥
इक्यानबेवाँ अध्याय
आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधनामें प्रणवका माहात्म्य तथा शिवोपासनानिरूपण
| सूत उवाच<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि अरिष्टानि निबोधत।<br>येन ज्ञानविशेषेण मृत्युं पश्यन्ति योगिनः॥ १<br><br>अरुन्धतीं ध्रुवं चैव सोमच्छायां महापथम्।<br>यो न पश्येन जीवेत्स नरः संवत्सरात्परम्॥ २<br><br>अरश्मिवन्तमादित्यं रश्मिवन्तं च पावकम्।<br>यः पश्यति न जीवेद्वै मासादेकादशात्परम्॥ ३<br><br>वमेन्मूत्रं पुरीषं च सुवर्णं रजतं तथा।<br>प्रत्यक्षमथवा स्वप्ने दशमासान्न जीवति॥ ४ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] इसके बाद मैं अरिष्टों (मृत्युको सूचित करनेवाले चिह्नों)-को बताऊँगा, जिस ज्ञानविशेषसे योगीलोग मृत्युको देखते हैं; आपलोग उन्हें जानिये॥ १॥<br><br>जो मनुष्य अरुन्धती, ध्रुव, सोमछाया (छायापुरुष) तथा आकाशगंगामार्गको नहीं देख पाता है, वह एक वर्षसे अधिक नहीं जीवित रहता है। जो रश्मिरहित सूर्यको तथा रश्मियुक्त अग्निको देखता है, वह ग्यारह महीनेसे अधिक नहीं जीता है। जो प्रत्यक्ष अथवा |
अध्याय ९१] आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधनामें प्रणवका माहात्म्य ४६९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रुक्मवर्णं द्रुमं पश्येद् गन्धर्वनगराणि च।<br>पश्येत्प्रेतपिशाचांश्च नवमासान् स जीवति॥ ५<br><br>अकस्माच्च भवेत्स्थूलो ह्यकस्माच्च कृशो भवेत्।<br>प्रकृतेश्च निवर्तेत चाष्टौ मासांश्च जीवति॥ ६ | स्वप्नमें मूत्र, पुरीष (विष्ठा), सुवर्ण अथवा रजत (चाँदी)-का वमन करता है, वह दस महीनेसे अधिक नहीं जीता है। जो स्वप्नमें सुनहरे वृक्षको देखता है और गन्धर्वनगरों तथा प्रेतपिशाचोंको देखता है, वह नौ महीनेतक जीवित रहता है। जो अकस्मात् स्थूल हो जाता है, अकस्मात् दुर्बल हो जाता है और अपने स्वभावसे दूर हो जाता है, वह आठ महीनेतक जीवित रहता है॥ २–६॥ |
| अग्रतः पृष्ठतो वापि खण्डं यस्य पदं भवेत्।<br>पांसुके कर्दमे वापि सप्तमासान् स जीवति॥ ७<br><br>काकः कपोतो गृध्रो वा निलीयेद्यस्य मूर्धनि।<br>क्रव्यादो वा खगो यस्य षण्मासान्नातिवर्तते॥ ८<br><br>गच्छेद्व्रायसपङ्क्तीभिः पांसुवर्षेण वा पुनः।<br>स्वच्छायां विकृतां पश्येच्चतुः पञ्च स जीवति॥ ९<br><br>अनभ्रे विद्युतं पश्येदक्षिणां दिशमास्थिताम्।<br>उदके धनुरेन्द्रं वा त्रीणि द्वौ वा स जीवति॥ १० | जिसके पैरकी आकृति धूल या कीचड़में सामने या पीछेसे खण्डित दिखायी दे, वह सात महीनेतक जीता है। जिसके सिरपर कौआ, कबूतर, गीध अथवा मांसभक्षी अन्य पक्षी बैठ जाता है, वह छः महीनेसे अधिक नहीं जीता है। जो कौओंकी पंक्तियोंके साथ गमन करता है अथवा धूलवृष्टि (आँधी)-के साथ गमन करता है और अपनी छायाको विकृत देखता है, वह चार-पाँच महीनेतक जीता है। जो मेघरहित आकाशमें विद्युत्को दक्षिण दिशामें स्थित देखता है अथवा जलमें इन्द्रधनुषको देखता है, वह दो अथवा तीन महीनेतक जीवित रहता है॥ ७–१०॥ |
| अप्सु वा यदि वादर्शे यो ह्यात्मानं न पश्यति।<br>अशिरस्कं तथा पश्येन्मासादूर्ध्वं न जीवति॥ ११<br><br>शवगन्धि भवेद् गात्रं वसागन्धमथापि वा।<br>मृत्युर्ह्युपागतस्तस्य अर्धमासान्न जीवति॥ १२<br><br>यस्य वै स्नातमात्रस्य हृदयं परिशुष्यति।<br>धूमं वा मस्तकात्पश्येद्वशहान्न स जीवति॥ १३ | जो जलमें अथवा दर्पणमें अपने प्रतिबिम्बको नहीं देख पाता है और अपनेको सिरविहीन देखता है, वह एक महीनेसे अधिक नहीं जीता है। यदि किसीका शरीर शवकी गन्धवाला अथवा चर्बीकी गन्धवाला हो जाता है, तो उसकी मृत्यु समीप आयी हुई होती है; वह आधे महीनेसे अधिक नहीं जीवित रहता है। स्नान करनेके तुरंत बाद जिसका हृदय सूख जाता है अथवा मस्तकसे धुआँ दिखायी देता है, वह दस दिनसे अधिक नहीं जीता है॥ ११–१३॥ |
| सम्भिन्नो मारुतो यस्य मर्मस्थानानि कृन्तति।<br>अद्भिः स्पृष्टो न हृष्येत तस्य मृत्युरुपस्थितः॥ १४ | प्रवाहमय वायु जिसके मर्मस्थानोंको भेद देता है और जो जलसे स्पृष्ट होकर प्रसन्न नहीं होता है, उसकी मृत्युको उपस्थित समझना चाहिये। |
| ऋक्षवानरयुक्तेन रथेनाशां च दक्षिणाम्।<br>गायन्नृत्यन् व्रजेत्स्वप्ने विद्यान्मृत्युरुपस्थितः॥ १५ | यदि कोई स्वप्नमें ऋक्ष (भालू) तथा बन्दरसे जुते हुए रथसे दक्षिण दिशाकी ओर गाते तथा नाचते हुए यात्रा करता है, तो उसकी मृत्युको उपस्थित समझना चाहिये। |
| कृष्णाम्बरधरा श्यामा गायन्ती वाप्यथाङ्गना।<br>यं नयेद्दक्षिणामाशां स्वप्ने सोऽपि न जीवति॥ १६ | स्वप्नमें काले रंगका वस्त्र धारण किये कृष्ण वर्णवाली |
| ४७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| छिद्रं वा स्वस्य कण्ठस्य स्वप्ने यो वीक्षते नरः।<br>नग्नं वा श्रमणं दृष्ट्वा विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्॥ १७<br><br>आमस्तकतलाद्यस्तु निमज्जेत्पङ्कसागरे।<br>दृष्ट्वा तु तादृशं स्वप्नं सद्य एव न जीवति॥ १८<br><br>भस्माङ्गारांश्च केशांश्च नदीं शुष्कां भुजङ्गमान्।<br>पश्येद्यो दशरात्रं तु न स जीवति तादृशः॥ १९<br><br>कृष्णैश्च विकटैश्चैव पुरुषैरुद्यतायुधैः।<br>पाषाणैस्ताड्यते स्वप्ने यः सद्यो न स जीवति॥ २० | स्त्री गाती हुई जिसे दक्षिण दिशाकी ओर ले जाय, वह भी जीवित नहीं रहता है॥ १४-१६॥<br><br>जो मनुष्य स्वप्नमें अपने कण्ठका छिद्र देखता है अथवा नग्न श्रमण (भिक्षु)-को देखता है, उसे अपनी मृत्युको उपस्थित समझना चाहिये। जो मनुष्य [स्वप्नमें] अपनेको पैरसे मस्तकतक कीचड़के समुद्रमें डूबा हुआ पाता है; वह उस प्रकारके स्वप्नको देखनेपर जीवित नहीं रहता है और शीघ्र ही मर जाता है। जो भस्म, अंगारों, केशों, सूखी नदी तथा सर्पोंको स्वप्नमें देखता है; वह दस राततक जीवित नहीं रह पाता है। जो उठाये हुए शस्त्रोंवाले काले तथा विकट (विकराल) पुरुषोंके द्वारा पत्थरोंसे स्वप्नमें मारा जाता है, वह जीवित नहीं रहता है॥ १७-२०॥ | | सूर्योदये प्रत्यूषसि प्रत्यक्षं यस्य वै शिवाः।<br>क्रोशन्त्यभिमुखं प्रेत्य स गतायुर्भवेन्नरः॥ २१<br><br>यस्य वा स्नातमात्रस्य हृदयं पीड्यते भृशम्।<br>जायते दन्तहर्षश्च तं गतायुषमादिशेत्॥ २२<br><br>भूयो भूयस्त्रसेद्यस्तु रात्रौ वा यदि वा दिवा।<br>दीपगन्धं च नाघ्राति विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्॥ २३<br><br>रात्रौ चेन्द्रधनुः पश्येद्दिवा नक्षत्रमण्डलम्।<br>परनेत्रेषु चात्मानं न पश्येन्न स जीवति॥ २४ | सूर्योदयके समय प्रातःकाल जिसके सामने प्रत्यक्ष आकर सियार रुदन करते हैं, वह मनुष्य समाप्त आयुवाला होता है। स्नान करनेके तुरंत बाद जिसके हृदयमें तीव्र वेदना होती है और दाँतोंमें कम्पन होता है, उसे समाप्त आयुवाला समझना चाहिये। जो मनुष्य दिनमें अथवा रातमें बार-बार भयभीत होता हो और दीपककी गन्धको न सूँघ पाता हो, उसे अपनी मृत्युको उपस्थित जानना चाहिये। जो रातमें इन्द्रधनुषको तथा दिनमें तारामण्डलको देखे और दूसरोंके नेत्रोंमें अपना प्रतिबिम्ब न देख सके; वह जीवित नहीं रहता है॥ २१-२४॥ | | नेत्रमेकं स्रवेद्यस्य कर्णौ स्थानाच्च भ्रश्यतः।<br>वक्रा च नासा भवति विज्ञेयो गतजीवितः॥ २५<br><br>यस्य कृष्णा खरा जिह्वा पद्माभासं च वै मुखम्।<br>गण्डे वा पिण्डिकारक्ते तस्य मृत्युरुपस्थितः॥ २६<br><br>मुक्तकेशो हसंश्चैव गायन्नृत्यंश्च यो नरः।<br>याम्यामभिमुखं गच्छेदन्तं तस्य जीवितम्॥ २७ | जिसके एक नेत्रसे पानी आता हो, दोनों कान अपने स्थानसे खिसके हुए हों और जिसकी नाक टेढ़ी हो गयी हो, उसे समाप्त जीवनवाला समझना चाहिये। जिसकी जीभ काली तथा खुरदुरी हो जाय, मुख पाण्डुरवर्णवाला हो जाय और दोनों गाल खजूर फलके समान रक्तवर्णके हो जायँ, उसकी मृत्यु सन्निकट होती है। जो मनुष्य स्वप्नमें खुले बालोंवाला होकर हँसता हुआ, गाता हुआ तथा नाचता हुआ दक्षिण दिशाकी ओर जाता है, उसका जीवन समाप्त हो जाता है॥ २५-२७॥ | | यस्य श्वेतघनाभासा श्वेतसर्षपसन्निभा।<br>श्वेता च मूर्तिर्ह्यसकृत्तस्य मृत्युरुपस्थितः॥ २८ | जिसका शरीर श्वेत मेघोंकी आभाके समान और |
अध्याय ९१ ] आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधनामें प्रणवका माहात्म्य ४७१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उष्ट्रा वा रासभा वाभियुक्ताः स्वप्ने रथे शुभाः।<br>यस्य सोऽपि न जीवेत्तु दक्षिणाभिमुखो गतः॥ २९<br><br>द्वे वाथ परमेऽरिष्टे एकीभूतः परं भवेत्।<br>घोषं न शृणुयात्कर्णे ज्योतिर्नेत्रे न पश्यति॥ ३०<br><br>श्वभ्रे यो निपतेत्स्वप्ने द्वारं चापि पिधीयते।<br>न चोत्तिष्ठति यः श्वभ्रात्तदन्तं तस्य जीवितम्॥ ३१ | श्वेत सरसोंके समान गौर वर्णका हो जाय, उसकी मृत्यु सन्निकट होती है। जिसके स्वप्नमें रथमें जुते हुए अशुभ ऊँट अथवा गधे दिखायी पड़ें और वह दक्षिण दिशाकी ओर जा रहा हो, वह [व्यक्ति] जीवित नहीं रहता है। जो कानमें ध्वनि न सुन सके और नेत्रमें प्रकाश न देख सके—यदि ये दो बहुत अनिष्टकारी घटनाएँ स्वप्नमें एक साथ घटित हों, तो वह व्यक्ति मृत्युको प्राप्त होता है। जो स्वप्नमें गड्ढेमें गिर पड़े तथा उसका द्वार बन्द हो जाय और वह गड्ढेसे निकल न सके, उसका जीवन समाप्त हो जाता है॥ २८—३१॥ |
| ऊर्ध्वा च दृष्टिर्न च सम्प्रतिष्ठा<br> रक्ता पुनः सम्परिवर्तमाना।<br>मुखस्य शोषः सुशिरा च नाभि-<br> रत्युष्णमूत्रो विषमस्थ एव॥ ३२ | जिसके नेत्र ऊपरकी ओर उलट जायँ, स्थिर हो जायँ, रक्तवर्णके हो जायँ, बार-बार घूमते हों, मुख सूखने लगे, नाभि छिद्रयुक्त हो जाय, मूत्र अत्यधिक गर्म हो; वह संकटग्रस्त होता है अर्थात् उसकी मृत्यु आसन्न होती है॥ ३२॥ |
| दिवा वा यदि वा रात्रौ प्रत्यक्षं यो निहन्यते।<br>हन्तारं न च पश्येच्च स गतायुर्न जीवति॥ ३३<br><br>अग्निप्रवेशं कुरुते स्वप्नान्ते यस्तु मानवः।<br>स्मृतिं नोपलभेच्चापि तदन्तं तस्य जीवितम्॥ ३४<br><br>यस्तु प्रावरणं शुक्लं स्वकं पश्यति मानवः।<br>कृष्णं रक्तमपि स्वप्ने तस्य मृत्युरुपस्थितः॥ ३५ | जो दिनमें अथवा रातमें किसीके द्वारा प्रत्यक्ष रूपसे मारा जाय, किंतु मारनेवालेको देख न सके; वह समाप्त आयुवाला होता है और जीवित नहीं रह पाता है। जो मनुष्य स्वप्नमें अग्निमें प्रवेश करे और स्वप्नके अन्तमें इसका स्मरण न कर सके; उसका जीवन समाप्त हो जाता है। जो मनुष्य स्वप्नमें अपने श्वेत प्रावरण (ओढ़नेके वस्त्र)-को काला तथा लाल देखता है, उसकी मृत्यु सन्निकट होती है॥ ३३—३५॥ |
| अरिष्टे सूचिते देहे तस्मिन् काल उपस्थिते।<br>त्यक्त्वा खेदं विषादं च उपेक्षेद् बुद्धिमान्नरः॥ ३६ | उस मृत्युकालके उपस्थित होनेपर और शरीरमें अरिष्टके सूचित होनेपर बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि खेद तथा विषादका परित्यागकर उपेक्षाभाव धारण करे॥ ३६॥ |
| प्राचीं वा यदि वोदीचीं दिशं निष्क्रम्य वै शुचिः।<br>समेऽतिस्थावरे देशे विविक्ते जन्तुवर्जिते॥ ३७<br><br>उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वा स्वस्थश्चाचान्त एव च।<br>स्वस्तिकेनोपविष्टस्तु नमस्कृत्वा महेश्वरम्॥ ३८<br><br>समकायशिरोग्रीवो धारयन्नावलोकयेत्।<br>यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता॥ ३९ | पूरब या उत्तर दिशामें जाकर पवित्र हो करके किसी समतल, अतिस्थावर (आकाशरहित), एकान्त तथा जन्तुविहीन स्थानमें पूरब या उत्तरकी ओर मुख करके स्वस्तिक आसनमें बैठ जाय और शान्त होकर आचमन करके महेश्वरको प्रणामकर शरीर, सिर तथा गर्दनको सीधा करके धारणा करते हुए किसी वस्तुकी ओर न देखे, जैसे वायुरहित स्थानमें रखे दीपककी लौ विचलित नहीं होती है; इसके लिये यह उपमा बतायी |
| ४७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रागुदक्प्रवणे देशे तथा युञ्जीत शास्त्रवित्।<br>कामं वितर्कं प्रीतिं च सुखदुःखे उभे तथा॥ ४०<br><br>निगृह्य मनसा सर्वं शुक्लं ध्यानमनुस्मरेत्।<br>घ्राणे च रसने नित्यं चक्षुषी स्पर्शने तथा॥ ४१<br>श्रोत्रे मनसि बुद्धौ च तत्र वक्षसि धारयेत्।<br>कालकर्माणि विज्ञाय समूहेष्वेव नित्यशः॥ ४२<br>द्वादशाध्यात्ममित्येवं योगधारणमुच्यते।<br>शतमर्धशतं वापि धारणां मूर्ध्नि धारयेत्॥ ४३<br>खिन्नस्य धारणाद्योगाद्वायुरूर्ध्वं प्रवर्तते।<br>ततश्चापूरयेद्देहमोङ्कारेण समन्वितः॥ ४४ | गयी है॥ ३७-३९॥<br><br>शास्त्रवेत्ताको चाहिये कि पूर्व अथवा उत्तरकी ओर विस्तारवाले स्थानमें ध्यानपरायण होवे। उसे कामना, तर्क, आसक्ति तथा सुख-दुःखको मनसे नियन्त्रित करके पूर्ण विशुद्ध ध्यानमें लीन हो जाना चाहिये। काल तथा कर्मोंको सदा लिङ्गशरीरोंके अन्तर्गत समझकर नाक, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान, मन, बुद्धि तथा हृदयमें धारणा करनी चाहिये। इस प्रकार योगधारणको द्वादशाध्यात्म (बारह अध्यात्म) नामवाला कहा जाता है। सौ अथवा पचास धारणाको सिरमें धारण करना चाहिये। धारणाके अभ्याससे श्रान्त योगीकी वायु ऊपरकी ओर होने लगती है; तब ओंकारसे युक्त होकर शरीरको वायुसे पूर्ण करना चाहिये। इस प्रकार ओंकारमय योगी [अपनेको] ब्रह्ममें लीन करके ब्रह्मसायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ ४०-४४ १/२॥ |
| तथोङ्कारमयो योगी अक्षरे त्वक्षरी भवेत्।<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि ओङ्कारप्राप्तिलक्षणम्॥ ४५<br>एष त्रिमात्रो विज्ञेयो व्यञ्जनं चात्र चेश्वरः।<br>प्रथमा विद्युती मात्रा द्वितीया तामसी स्मृता॥ ४६<br>तृतीयां निर्गुणां चैव मात्रामक्षरगामिनीम्।<br>गान्धारी चैव विज्ञेया गान्धारस्वरसम्भवा॥ ४७<br>पिपीलिकागतिस्पर्शा प्रयुक्ता मूर्ध्नि लक्ष्यते।<br>यथा प्रयुक्त ओङ्कारः प्रतिनिर्याति मूर्धनि॥ ४८<br>तथोङ्कारमयो योगी त्वक्षरे त्वक्षरी भवेत्।<br>प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्मलक्षणमुच्यते॥ ४९<br>अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्। | [हे ऋषियो!] इसके बाद मैं ओंकारकी प्राप्तिका लक्षण बताऊँगा। इसे तीन मात्रावाला जानना चाहिये। इसमें व्यंजनसहित मकार ईश्वर (शिव) है। इसमें पहली मात्रा विद्युती (राजसी) एवं दूसरी मात्रा तामसी कही गयी है। तीसरी मकाररूप अक्षरगामिनी मात्राको सत्त्वगुणरूपवाली जानना चाहिये। इसे गान्धारी नामसे भी जानना चाहिये; क्योंकि यह गान्धारस्वरसे उत्पन्न है और पिपीलिकाकी गतिके स्पर्शके समान सूक्ष्म गतिवाली है तथा यह मूर्धदेशमें लक्षित होती है। जिस प्रकार उच्चारित किया गया ओंकार मूर्धा देशमें गमन करता है, वैसे ही ओंकारमय योगी ब्रह्ममें लीन होकर ब्रह्मसायुज्य प्राप्त कर लेता है। परमेश्वरका वाचक प्रणव ही धनुष है, यह जीवात्मा ही बाण है और परब्रह्म परमेश्वर ही उसके लक्ष्य हैं। तत्परतासे उनकी उपासना करनेवाले प्रमादरहित साधकके द्वारा ही वह लक्ष्य वेधा जा सकता है, इसलिये उस लक्ष्यको वेधकर बाणकी ही भाँति उसमें तन्मय हो जाना चाहिये॥ ४५-४९ १/२॥ |
| ओमित्येकाक्षरं ह्येतद् गुहायां निहितं पदम्॥ ५०<br>ओमित्येतत् त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्त्रयोऽग्नयः।<br>विष्णुक्रमास्त्रयस्त्वेते ऋक्सामानि यजूंषि च॥ ५१ | 'ओम्'—यह एकाक्षर पद गुहा (बुद्धि)-में निहित है। यह 'ओम्' तीनों लोकों, [ऋक्-यजुः-साम] तीनों वेदों, तीनों अग्नियों तथा विष्णुके तीनों पदोंके स्वरूपवाला |