भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग

नवासीवाँ अध्याय

सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन

सूत उवाचसूतजी बोले—
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि शौचाचारस्य लक्षणम्।<br>यदनुष्ठाय शुद्धात्मा प्रेत्य गतिमाप्नुयात्॥ १<br>ब्रह्मणा कथितं पूर्वं सर्वभूतहिताय वै।<br>सङ्क्षेपात्सर्ववेदार्थं सञ्चयं ब्रह्मवादिनाम्॥ २<br>उदयार्थं तु शौचानां मुनीनामुत्तमं पदम्।<br>यस्तत्राथाप्रमत्तः स्यात्स मुनिर्नार्वासीदति॥ ३[हे ऋषियो!] अब मैं इसके बाद शौचाचारका लक्षण बताऊँगा, जिसे करके शुद्ध अन्तःकरणवाला [व्यक्ति] परलोकमें जाकर [उत्तम] गति प्राप्त करता है। पूर्वकालमें ब्रह्माने सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये इसे कहा था। यह संक्षिप्त रूपमें सभी वेदोंका सार है, ब्रह्मवादियोंकी निधि है, आचरणके उत्थानके लिये उपयोगी है और मुनियोंका उत्तम पद है। जो इसे करनेमें सदा सावधान रहता है, वह मुनि है और वह दुःखित नहीं होता है॥ १–३॥
मानावमानौ द्वावेतौ तावेवाहुर्विषामृते।<br>अवमानोऽमृतं तत्र सन्मानो विषमुच्यते॥ ४<br>गुरोरपि हिते युक्तः स तु संवत्सरं वसेत्।<br>नियमेष्वप्रमत्तस्तु यमेषु च सदा भवेत्॥ ५<br>प्राप्यानुज्ञां ततश्चैव ज्ञानयोगमनुत्तमम्।<br>अविरोधेन धर्मस्य चरेत पृथिवीमिमाम्॥ ६मान तथा अपमान—ये विष तथा अमृत कहे गये हैं। उनमें अपमान अमृत तथा सम्मान विष कहा जाता है। शिष्यको चाहिये कि गुरुके हितमें संलग्न रहकर एक वर्षतक उनके पास निवास करे, नियमों तथा यमोंमें सदा सावधान रहे और उनसे उत्तम ज्ञानयोग ग्रहण करके पुनः आज्ञा लेकर धर्मका विरोध न करते हुए इस पृथ्वीपर विचरण करे॥ ४–६॥
चक्षुःपूतं चरेन्मार्गं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।<br>सत्यपूतं वदेद्वाक्यं मनःपूतं समाचरेत्॥ ७<br>मत्स्यगृह्यस्य यत्पापं षण्मासाभ्यन्तरे भवेत्।<br>एकाहं तत्समं ज्ञेयमपूतं यज्जलं भवेत्॥ ८<br>अपूतोदकपाने तु जपेच्च शतपञ्चकम्।<br>अघोरलक्षणं मन्त्रं ततः शुद्धिमवाप्नुयात्॥ ९<br>अथवा पूजयेच्छम्भुं घृतस्नानादिविस्तरैः।<br>त्रिधा प्रदक्षिणीकृत्य शुद्ध्यते नात्र संशयः॥ १०भलीभाँति नेत्रसे देखकर मार्गपर चलना चाहिये, वस्त्रसे पवित्र किये गये अर्थात् छाने हुए जलको पीना चाहिये, सत्यसे पवित्र वचन बोलना चाहिये और मनसे पवित्र प्रतीत होनेवाले आचरणको करना चाहिये। मत्स्य ग्रहण करनेवालेको छः महीनोंमें जो पाप लगता है, उसे एक दिन अपवित्र जलके पानसे होनेवाले पापके बराबर जानना चाहिये। अपवित्र जलका पान कर लेनेपर पाँच सौ बार अघोर मन्त्रका जप करना चाहिये; उससे व्यक्ति शुद्धि प्राप्त कर लेता है; अथवा घृतस्नान आदि विस्तृत उपचारोंसे शिवकी पूजा करनी चाहिये, इसके बाद उनकी तीन बार प्रदक्षिणा करके वह शुद्ध हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ७–१०॥
आतिथ्यश्राद्धयज्ञेषु न गच्छेदद्योगवित्क्वचित्।<br>एवं ह्यहिंसको योगी भवेदिति विचारितम्॥ ११<br>वह्नौ विधूमेऽत्यङ्गारे सर्वस्मिन् भुक्तवज्जने।<br>चरेत्तु मतिमान् भैक्ष्यं न तु तेष्वेव नित्यशः॥ १२योगवेत्ताको आतिथ्य, श्राद्ध तथा [सोम आदि] यज्ञमें कहीं नहीं जाना चाहिये; इस प्रकार योगी अहिंसक हो सकता है—यह भलीभाँति निर्णीत बात है। बुद्धिमान्‌को चाहिये कि अग्निके धूमरहित तथा