श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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४४४ || श्रीलिङ्गमहापुराण || [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भीमः सुषिरनाकेऽसौ भास्करे मण्डले स्थितः।<br>ईशानः सोमबिम्बे च महादेव इति स्मृतः॥ १३०<br>पुंसां पशुपतिर्देवश्चाष्टधाहं व्यवस्थितः। | अग्निमें और उग्र वायुमें प्रतिष्ठित हैं। भीम आकाशमें और ईशान सूर्यके मण्डलमें स्थित हैं। महादेवजी चन्द्रमण्डलमें स्थित कहे गये हैं। पुरुषोंमें भगवान् पशुपति विद्यमान हैं। इस प्रकार मैं आठ रूपोंमें व्यवस्थित हूँ॥ १२७—१३०१/२॥ |
| काठिन्यं यत्तनौ सर्वं पार्थिवं परिगीयते॥ १३१<br>आप्यं द्रवमिति प्रोक्तं वर्णाख्यो वह्निरुच्यते।<br>यत्सञ्चरति तद्वायुः सुषिरं यद् द्विजोत्तमाः॥ १३२<br>तदाकाशं च विज्ञानं शब्दजं व्योमसम्भवम्।<br>तथैव विप्रा विज्ञानं स्पर्शाख्यं वायुसम्भवम्॥ १३३<br>रूपं वाह्नेयमित्युक्तमाप्यं रसमयं द्विजाः।<br>गन्धाख्यं पार्थिवं भूयश्चिन्तयेद्भास्करं क्रमात्॥ १३४<br>नेत्रे च दक्षिणे वामे सोमं हृदि विभुं द्विजाः।<br>आजानु पृथिवीतत्त्वमानाभेर्वारिमण्डलम्॥ १३५<br>आकण्ठं वह्नितत्त्वं स्याल्ललाटान्तं द्विजोत्तमाः।<br>वायव्यं वै ललाटाद्यं व्योमाख्यं वा शिखाग्रकम्॥ १३६<br>हंसाख्यं च ततो ब्रह्म व्योम्नश्चोर्ध्वं ततः परम्।<br>व्योमाख्यो व्योममध्यस्थो ह्ययं प्राथमिकः स्मरेत्॥ १३७ | शरीरमें जो सम्पूर्ण कठोरता है, वह पृथ्वीतत्त्वमय कही जाती है, आप्य (तरल) पदार्थको जलतत्त्वसे सम्बन्धित कहा गया है। वर्ण (रंग)—को अग्निसे सम्बन्धित कहा जाता है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो शरीरमें संचरण करता है, वह वायुसे सम्बन्धित है। जो शरीरमें अवकाश (रिक्त स्थान) है, वह आकाशतत्त्व है। शब्दसे होनेवाला ज्ञान आकाशसे उत्पन्न होता है; उसी प्रकार हे विप्रो! स्पर्शसे होनेवाला ज्ञान वायुसे उत्पन्न होता है। हे द्विजो! रूपका ज्ञान अग्निसे और रसका ज्ञान जलसे उत्पन्न कहा गया है; गन्धका ज्ञान पृथ्वीसे उत्पन्न होता है। पुनः हे विप्रो! दाहिने नेत्रमें सूर्य, बायें नेत्रमें सोम तथा हृदयमें सर्वव्यापक पुरुषका चिन्तन करना चाहिये। हे द्विजोत्तमो! [देहमें] घुटनोंतक पृथ्वीतत्त्व, नाभिपर्यन्त जल-तत्त्व, कण्ठपर्यन्त वह्नितत्त्व, ललाटपर्यन्त वायुतत्त्व, ललाटाग्र अथवा शिखाग्रमें आकाशतत्त्व, तदनन्तर आकाशसे ऊपर हंससंज्ञक ब्रह्म और व्योमके मध्यमें व्योमसंज्ञक ये शिव स्थित हैं—प्राथमिक ध्याताको इनका ध्यान करना चाहिये॥ १३१—१३७॥ |
| न जीवः प्रकृतिः सत्त्वं रजश्चाथ तमः पुनः।<br>महांस्तथाभिमानश्च तन्मात्राणीन्द्रियाणि च॥ १३८<br>व्योमादीनि च भूतानि नैवेह परमार्थतः।<br>व्याप्य तिष्ठद्यतो विश्वं स्थाणुरित्यभिधीयते॥ १३९<br>उदेति सूर्यो भीतश्च पवते वात एव च।<br>द्योतते चन्द्रमा वह्निर्ज्वलत्यापो वहन्ति च॥ १४०<br>दधाति भूमिराकाशमवकाशं ददाति च।<br>तदाज्ञया ततं सर्वं तस्माद्वै चिन्तयेद् द्विजाः॥ १४१<br>तेनैवाधिष्ठितं तस्मादेतत्सर्वं द्विजोत्तमाः।<br>सर्वरूपमयः शर्व इति मत्वा स्मरेद्भवम्॥ १४२ | जीव, प्रकृति, सत्त्व, रज, तम, महान् (बुद्धि), अहंकार, पंच तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, आकाश आदि पंच भूत—ये सब यथार्थ रूपमें नहीं हैं। चूँकि विश्वको व्याप्त करके वे शिव स्थित हैं, अतः उन्हें स्थाणु कहा जाता है। उन्हींकी आज्ञासे डरकर सूर्य उगता है, हवा बहती है, चन्द्रमा प्रकाशित होता है, अग्नि जलती है, जल प्रवाहित होता है, भूमि [सबको] धारण करती है और आकाश स्थान देता है; सब कुछ उन्हींसे व्याप्त है, अतः हे द्विजो! उन्हींका चिन्तन करना चाहिये। हे द्विजोत्तमो! उन्हींसे यह सम्पूर्ण जगत् अधिष्ठित है, अतः शर्व सर्वरूपमय हैं—ऐसा मानकर [महेश्वर] भवका स्मरण करना चाहिये॥ १३८—१४२॥ |