श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ८६ ] पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ४४३
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| अग्नि सूखे ईंधनको जला डालती है ॥ ११४-११६ ॥ | |
| ज्ञानात्परतरं नास्ति सर्वपापविनाशनम्।<br>अभ्यसेच्च सदा ज्ञानं सर्वसङ्गविवर्जितः ॥ ११७<br><br>ज्ञानिनः सर्वपापानि जीर्यन्ते नात्र संशयः।<br>क्रीडन्नपि न लिप्येत पापैर्नानाविधैरपि ॥ ११८ | ज्ञानसे बढ़कर पापका नाश करनेवाला अन्य कुछ भी नहीं है, अतः संसारसे आसक्तिरहित होकर ज्ञानका अभ्यास करना चाहिये। ज्ञानीके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। आमोद-प्रमोद करता हुआ भी ज्ञानी व्यक्ति नानाविध पापोंसे लिप्त नहीं होता है ॥ ११७-११८ ॥ |
| ज्ञानं यथा तथा ध्यानं तस्माद्ध्यानं समभ्यसेत्।<br>ध्यानं निर्विषयं प्रोक्तमादौ सविषयं तथा ॥ ११९<br><br>षट्प्रकारं समभ्यस्य चतुःषट्दशभिस्तथा।<br>तथा द्वादशधा चैव पुनः षोडशधा क्रमात् ॥ १२०<br><br>द्विधाभ्यस्य च योगीन्द्रो मुच्यते नात्र संशयः।<br>शुद्धजाम्बूनदाकारं विधूमाङ्गारसन्निभम् ॥ १२१<br><br>पीतं रक्तसितं विद्युत्कोटिकोटिसमप्रभम्।<br>अथवा ब्रह्मरन्ध्रस्थं चित्तं कृत्वा प्रयत्नतः ॥ १२२<br><br>न सितं वासितं पीतं न स्मरेद् ब्रह्मविद्भवेत्। | जैसा ज्ञान है, वैसा ही ध्यान भी है, अतः ध्यानका अभ्यास करना चाहिये। ध्यान निर्विषय बताया गया है; जो आदिमें सविषय होता है। चार, छः, दस, बारह तथा सोलह और पुनः दो प्रकारसे—इन छः रूपोंमें क्रमशः अभ्यास करके श्रेष्ठ योगी मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। साधकको विशुद्ध सुवर्णके आकारवाले, धूमरहित अंगारके सदृश, पीले-लाल या श्वेत वर्णवाले, करोड़ों विद्युत्के समान कान्तिवाले आकारमें ध्यान लगाना चाहिये, अथवा चित्तको प्रयत्नपूर्वक ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित करके श्वेत, कृष्ण अथवा पीतवर्णसे रहित ब्रह्मका स्मरण करे; ऐसा ध्यान करनेवाला ब्रह्मवेत्ता होता है ॥ ११९-१२२ १/२ ॥ |
| अहिंसकः सत्यवादी अस्तेयी सर्वयत्नतः ॥ १२३<br><br>परिग्रहविनिर्मुक्तो ब्रह्मचारी दृढव्रतः।<br>सन्तुष्टः शौचसम्पन्नः स्वाध्यायनिरतः सदा ॥ १२४<br><br>मद्भक्तश्चाभ्यसेद्ध्यानं गुरुसम्पर्कजं ध्रुवम्।<br>न बुध्यति तथा ध्याता स्थाप्य चित्तं द्विजोत्तमाः ॥ १२५<br><br>न चाभिमन्यते योगी न पश्यति समन्ततः।<br>न घ्राति न शृणोत्येव लीनः स्वात्मनि यः स्वयम् ॥ १२६<br><br>न च स्पर्शं विजानाति स वै समरसः स्मृतः। | पूर्ण प्रयत्नके साथ अहिंसक, सत्यवादी, चौरवृत्तिसे रहित, परिग्रहरहित, ब्रह्मचारी, दृढ़ व्रतवाला, सन्तुष्ट, शुद्धिसे युक्त, सर्वदा स्वाध्यायपरायण और मेरी भक्तिसे युक्त होकर गुरुके सान्निध्यमें ध्यानका अविचल अभ्यास करना चाहिये। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ध्यान-साधना करनेवाला योगी अपने चित्तको स्थिर करके किसी अन्य वस्तुका बोध नहीं करता, उसे कुछ भी भान नहीं होता, वह अपने चारों ओर कुछ नहीं देखता, वह न सूँघता है, न सुनता है और न स्पर्शका ही अनुभव करता है; जिसने स्वयंको पूर्णतः अपनी आत्मामें लीन कर दिया है, वह समरस कहा गया है ॥ १२३-१२६ १/२ ॥ |
| पार्थिवे पटले ब्रह्मा वारितत्त्वे हरिः स्वयम् ॥ १२७<br><br>वाह्नेये कालरुद्राख्यो वायुतत्त्वे महेश्वरः।<br>सुषिरे स शिवः साक्षात्क्रमादेवं विचिन्तयेत् ॥ १२८<br><br>क्षितौ शर्वः स्मृतो देवो ह्यपां भव इति स्मृतः।<br>रुद्र एव तथा वह्नौ उग्रो वायौ व्यवस्थितः ॥ १२९ | पार्थिव पटलमें ब्रह्मा, जलतत्त्वमें स्वयं विष्णु, अग्नितत्त्वमें कालरुद्र, वायुतत्त्वमें महेश्वर और आकाश तत्त्वमें वे साक्षात् शिव विद्यमान हैं—ऐसा क्रमसे चिन्तन करना चाहिये। शर्व पृथ्वीमें विद्यमान कहे गये हैं। भव देवता जलमें विद्यमान कहे गये हैं। रुद्र |