श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ४४२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कर्तव्यं नास्ति विप्रेन्द्रा अस्ति चेत्तत्त्वविन्न च।<br>इह लोके परे चापि कर्तव्यं नास्ति तस्य वै॥ १०६<br><br>जीवन्मुक्तो यतस्तस्माद् ब्रह्मवित्परमार्थतः।<br>ज्ञानाभ्यासरतो नित्यं ज्ञानतत्त्वार्थवित्स्वयम्॥ १०७ | अभ्यास करना चाहिये। हे श्रेष्ठ विप्रो! एकमात्र ज्ञानसे सन्तुष्ट मुक्तसंग (आसक्तिरहित) योगीके लिये कुछ भी करणीय नहीं रह जाता है; यदि है तो वह तत्त्वज्ञानी नहीं है। इस लोकमें तथा परलोकमें उसके लिये कुछ भी करनेयोग्य नहीं रहता है। चूँकि वह जीवन्मुक्त है, अतः वास्तविक रूपसे ब्रह्मवेत्ता है। ज्ञानके अभ्यासमें संलग्न तथा ज्ञानतत्त्वार्थविद् स्वयं कर्तव्योंके अभ्यासका त्याग करके ज्ञानको ही प्राप्त होता है॥ १०३–१०७ १/२ ॥ |
| कर्तव्याभ्यासमुत्सृज्य ज्ञानमेवाधिगच्छति।<br>वर्णाश्रमाभिमानी यस्त्यक्तक्रोधो द्विजोत्तमाः॥ १०८<br><br>अन्यत्र रमते मूढः सोऽज्ञानी नात्र संशयः।<br>संसारहेतुरज्ञानं संसारस्तनुसङ्ग्रहः॥ १०९ | हे श्रेष्ठ द्विजो! जो अपने वर्णाश्रमपर गर्व करनेवाला है तथा क्रोधका त्याग कर चुका है, किंतु मूढ़ होकर ज्ञानातिरिक्त अन्य साधनोंमें सुखका अनुभव करता है। वह अज्ञानी है; इसमें सन्देह नहीं है। अज्ञान ही संसारका कारण है; शरीर धारण करना ही संसार है। ज्ञान मोक्षका हेतु है; मुक्त [व्यक्ति] अपनेमें ही अवस्थित रहता है॥ १०८–१०९ १/२ ॥ |
| मोक्षहेतुस्तथा ज्ञानं मुक्तः स्वात्मन्यवस्थितः।<br>अज्ञाने सति विप्रेन्द्राः क्रोधाद्या नात्र संशयः॥ ११०<br><br>क्रोधो हर्षस्तथा लोभो मोहो दम्भो द्विजोत्तमाः।<br>धर्माधर्मौ हि तेषां च तद्वशात्तनुसङ्ग्रहः॥ १११<br><br>शरीरे सति वै क्लेशः सोऽविद्यां सन्त्यजेद् बुधः।<br>अविद्यां विद्यया हित्वा स्थितस्यैव च योगिनः॥ ११२<br><br>क्रोधाद्या नाशमायान्ति धर्माधर्मौ च वै द्विजाः।<br>तत्क्षयाच्च शरीरेण न पुनः सम्प्रयुज्यते॥ ११३ | हे श्रेष्ठ विप्रो! अज्ञान रहनेपर क्रोध आदि उत्पन्न होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। हे उत्तम द्विजो! क्रोध, हर्ष, लोभ, मोह, दम्भ, धर्म, अधर्म लोगोंको होता है और उनके कारण शरीर धारण करना पड़ता है और शरीर रहनेपर क्लेश अवश्य होता है, अतः बुद्धिमान्को चाहिये कि अज्ञानका त्याग कर दे। हे द्विजो! विद्या (ज्ञान)-के द्वारा अविद्या (अज्ञान)-को नष्ट करके स्थित हुए योगीके क्रोध आदि तथा धर्म-अधर्म [स्वयं] नष्ट हो जाते हैं। उनका नाश हो जानेसे पुनः शरीरसे प्राणीका संयोग नहीं होता है, वह संसारसे मुक्त हो जाता है और तीनों प्रकारके तापोंसे रहित हो जाता है॥ ११०–११३ १/२ ॥ |
| स एव मुक्तः संसाराद्दुःखत्रयविवर्जितः।<br>एवं ज्ञानं विना नास्ति ध्यानं ध्यातुर्द्विजर्षभाः॥ ११४<br><br>ज्ञानं गुरोर्हि सम्पर्कान्न वाचा परमार्थतः।<br>चतुर्व्यूहमिति ज्ञात्वा ध्याता ध्यानं समभ्यसेत्॥ ११५<br><br>सहजागन्तुकं पापमस्थिवागुद्भवं तथा।<br>ज्ञानाग्निर्दहते क्षिप्रं शुष्केन्धनमिवानलः॥ ११६ | हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार ज्ञानके बिना ध्यान करनेवालेका ध्यान सिद्ध नहीं होता है, वास्तवमें ज्ञान गुरुके सम्पर्कसे ही होता है, केवल शब्दसे नहीं। चतुर्व्यूह (तैजस, विश्व, प्राज्ञ, तुरीय)-का ज्ञान करके ध्यान करनेवालेको ध्यानका अभ्यास करना चाहिये। ज्ञानरूपी अग्नि सहज, आगन्तुक और अस्थि (शरीर) तथा वाणीसे होनेवाले पापको उसी प्रकार शीघ्र जला डालती है, जैसे |