श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ८६ ] पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ४४१
| श्लोक | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| अन्नमयोऽसौ भूतात्मा चाद्यते ह्यन्नमुच्यते।<br>प्राणमयश्चेन्द्रियात्मा सङ्कल्पात्मा मनोमयः ॥ ९३<br><br>कालात्मा सोम एवेह विज्ञानमय उच्यते।<br>सदानन्दमयो भूत्वा महेशः परमेश्वरः॥ ९४<br><br>सोऽहमेवं जगत्सर्वं मय्येव सकलं स्थितम्।<br>परतन्त्रं स्वतन्त्रेऽपि तदभावाद्विचारतः॥ ९५ | सबपर शासन करनेवाला, सबको ले जानेवाला और विभागपूर्वक [पंचकोशरूप] पंचातमा हूँ। जो ग्रहण किया जाता है, वह अन्न कहा जाता है। वह भूतात्मा अन्नमयकोश है, इन्द्रियात्मा प्राणमयकोश है, संकल्पात्मा मनोमयकोश है और सोमस्वरूप कालात्मा विज्ञानमयकोश कहा जाता है। सर्वदा आनन्दमग्न होकर महेश परमेश्वर आनन्दमयकोशके रूपमें विद्यमान हैं। वह पंचकोश मैं ही हूँ; विचारपूर्वक देखा जाय, तो उस जगत्के अभावके कारण परतन्त्ररूप सम्पूर्ण जगत् मुझ स्वतन्त्रमें ही स्थित है॥ ९१—९५॥ |
| एकत्वमपि नास्त्येव द्वैतं तत्र कुतस्त्वहो।<br>एवं नास्त्यथ मर्त्यं च कुतोऽमृतमजोद्भवः ॥ ९६<br><br>नान्तःप्रज्ञो बहिःप्रज्ञो न चोभयगतस्तथा।<br>न प्रज्ञानघनस्त्वेवं न प्राज्ञो ज्ञानपूर्वकः ॥ ९७<br><br>विदितं नास्ति वेद्यं च निर्वाणं परमार्थतः।<br>निर्वाणं चैव कैवल्यं निःश्रेयसमनामयम्॥ ९८<br><br>अमृतं चाक्षरं ब्रह्म परमात्मा परापरम्।<br>निर्विकल्पं निराभासं ज्ञानं पर्यायवाचकम्॥ ९९<br><br>प्रसन्नं च यदेकाग्रं तदा ज्ञानमिति स्मृतम्।<br>अज्ञानमितरत्सर्वं नात्र कार्या विचारणा॥ १०० | एकत्व भी नहीं है, तब द्वैत कैसे हो सकता है? इसी प्रकार कोई मर्त्य नहीं है। तब वे अजोद्भव भी अमर कैसे होंगे? इस प्रकार वह न अन्तःप्रज्ञ है, न बहिःप्रज्ञ है, न दोनों प्रकारकी प्रज्ञावाला है, न प्रज्ञानघन है और न तो ज्ञानसम्पन्न प्राज्ञ ही है। वस्तुतः वह ब्रह्म न विदित है, न वेद्य (जाननेयोग्य) है और न तो निर्वाणस्वरूप है। निर्वाण, कैवल्य, निःश्रेयस, अनामय, अमृत, अक्षर, ब्रह्म, परमात्मा, परापर, निर्विकल्प, निराभास और ज्ञान—ये पर्यायवाची हैं। जिसके अन्तःकरणमें एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म स्थित है तथा जो समरस है, जब वह प्रसन्न तथा एकाग्र होता है, वह ज्ञानस्वरूप कहा जाता है, इसके अतिरिक्त सब कुछ अज्ञान है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ९६—१००॥ |
| इत्थं प्रसन्नं विज्ञानं गुरुसम्पर्कजं ध्रुवम्।<br>रागद्वेषानृतक्रोधं कामतृष्णादिभिः सदा॥ १०१<br><br>अपरामृष्टमद्यैव विज्ञेयं मुक्तिदं त्विदम्।<br>अज्ञानमलपूर्वात्वात्पुरुषो मलिनः स्मृतः॥ १०२ | इस प्रकार पूर्ण ज्ञान निश्चित रूपसे गुरुके सान्निध्यसे उत्पन्न होता है। यह राग, द्वेष, मिथ्या, क्रोध, काम, तृष्णा आदिसे सदा रहित होता है; इसे मुक्ति देनेवाला जानना चाहिये। अज्ञान-मलसे युक्त रहनेके कारण पुरुष मलिन कहा गया है; उस [अज्ञानमल]-के नाशसे ही मुक्ति होती है, अन्यथा करोड़ों जन्मोंमें भी मुक्ति नहीं मिल सकती॥ १०१-१०२ १/२॥ |
| तत्क्षयाद्धि भवेन्मुक्तिर्नान्यथा जन्मकोटिभिः।<br>ज्ञानमेकं विना नास्ति पुण्यपापपरिक्षयः॥ १०३<br><br>ज्ञानमेवाभ्यसेत्तस्मान्मुक्त्यर्थं ब्रह्मवित्तमाः।<br>ज्ञानाभ्यासाद्धि वै पुंसां बुद्धिर्भवति निर्मला॥ १०४<br><br>तस्मात्सदाभ्यसेज्ज्ञानं तन्निष्ठस्तत्परायणः।<br>ज्ञानेनैकेन तृप्तस्य त्यक्तसङ्गस्य योगिनः॥ १०५ | एकमात्र ज्ञानके बिना पाप तथा पुण्यका क्षय नहीं होता है, अतः हे श्रेष्ठ ब्रह्मवादियो! मुक्तिके लिये ज्ञानका [निरन्तर] अभ्यास करना चाहिये। ज्ञानके अभ्याससे ही मनुष्योंकी बुद्धि निर्मल होती है, अतः उसके प्रति निष्ठावान् तथा तत्पर होकर सदा ज्ञानका |