भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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४४०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
द्रष्टव्यं चैव श्रोतव्यं घ्रातव्यं च यथाक्रमम्।<br>रसितव्यं मुनिश्रेष्ठाः स्पर्शितव्यं तथैव च॥ ७५<br>मन्तव्यं चैव बोद्धव्यमहङ्कर्तव्यमेव च।<br>तथा चेतयितव्यं च वक्तव्यं मुनिपुङ्गवाः॥ ७६<br>आदातव्यं च गन्तव्यं विसर्गायितमेव च।<br>आनन्दितव्यमित्येते ह्याधिभूतमनुक्रमात्॥ ७७<br>आदित्योऽपि दिशश्चैव पृथिवी वरुणस्तथा।<br>वायुश्चन्द्रस्तथा ब्रह्मा रुद्रः क्षेत्रज्ञ एव च॥ ७८<br>अग्निरिन्द्रस्तथा विष्णुर्मित्रो देवः प्रजापतिः।<br>आधिदैविकमेवं हि चतुर्दशविधं क्रमात्॥ ७९कहे गये हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! हे मुनिपुंगवो! जो भी देखनेयोग्य, सुननेयोग्य, सूँघनेयोग्य, स्वाद लेनेयोग्य, स्पर्श करनेयोग्य, चिन्तन करनेयोग्य, जाननेयोग्य, गर्व करनेयोग्य, चेतनाके योग्य, बोलनेयोग्य, ग्रहण करनेयोग्य, गमन करनेयोग्य, छोड़नेयोग्य तथा आनन्दके योग्य हैं—ये सब क्रमसे आधिभौतिक हैं। सूर्य, दिशाएँ, पृथ्वी, वरुण, वायु, चन्द्र, ब्रह्मा, रुद्र, क्षेत्रज्ञ, अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र और देव प्रजापति—ये चौदह क्रमसे आधिदैविक हैं॥ ७२—७९॥
राज्ञी सुदर्शना चैव जिता सौम्या यथाक्रमम्।<br>मोघा रुद्रामृता सत्या मध्यमा च द्विजोत्तमाः॥ ८०<br>नाडी राशिशुका चैव असुरा चैव कृत्तिका।<br>भास्वती नाड्यश्चैताश्चतुर्दश निबन्धनाः॥ ८१<br>वायवो नाडिमध्यस्था वाहकाश्च चतुर्दश।<br>प्राणो व्यानस्त्वपानश्च उदानश्च समानकः॥ ८२<br>वैरम्भश्च तथा मुख्यो ह्यन्तर्यामः प्रभञ्जनः।<br>कूर्मकश्च तथा श्येनः श्वेतः कृष्णस्तथानिलः॥ ८३<br>नाग इत्येव कथिता वायवश्च चतुर्दश।हे श्रेष्ठ द्विजो! राज्ञी, सुदर्शना, जिता, सौम्या, मोघा, रुद्रा, अमृता, सत्या, मध्यमा, नाड़ी, राशिशुका, असुरा, कृत्तिका और भास्वती—ये चौदह निबन्धन नाड़ियाँ हैं। नाड़ियोंके मध्य चौदह वाहक वायु स्थित हैं। प्राण, व्यान, अपान, उदान, समान, वैरम्भ, मुख्य अन्तर्याम, प्रभंजन, कूर्म, श्येन, श्वेत, कृष्ण, अनिल तथा नाग—ये चौदह वायु कहे गये हैं॥ ८०—८३ १/२॥
यश्चक्षुष्वथ द्रष्टव्ये तथादित्ये च सुव्रताः॥ ८४<br>नाड्यां प्राणे च विज्ञाने त्वानन्दे च यथाक्रमम्।<br>हृद्याकाशे य एतस्मिन् सर्वस्मिन्नन्तरे परः॥ ८५<br>आत्मा एकश्च चरति तमुपासीत मां प्रभुम्।<br>अजरं तमनन्तं च अशोकममृतं ध्रुवम्॥ ८६<br>चतुर्दशविधेष्स्वेव सञ्चरत्येक एव सः।<br>लीयन्ते तानि तत्रैव यदन्यं नास्ति वै द्विजाः॥ ८७<br>एक एव हि सर्वज्ञः सर्वेशस्त्वेक एव सः।<br>एष सर्वाधिपो देवस्त्वन्तर्यामी महाद्युतिः॥ ८८<br>उपास्यमानः सर्वस्य सर्वसौख्यः सनातनः।<br>उपास्यति न चैवेह सर्वसौख्यं द्विजोत्तमाः॥ ८९<br>उपास्यमानो वेदैश्च शास्त्रैर्नानाविधैरपि।<br>न वैष वेदशास्त्राणि सर्वज्ञो यास्यति प्रभुः॥ ९०हे सुव्रतो! नेत्रोंमें, द्रष्टव्य पदार्थोंमें, सूर्यमें, नाड़ीमें, प्राणमें, विज्ञानमें, आनन्दमें, हृदयाकाशमें तथा इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें जो एकमात्र आत्माके रूपमें संचरण करता है, उस मुझ अजर, अनन्त, शोकरहित, अमृतस्वरूप तथा अटल प्रभुकी उपासना करनी चाहिये। एकमात्र वह ही चौदहों प्रकारकी नाड़ियोंमें संचरण करता है और हे द्विजो! वे सब उसीमें लीन हो जाते हैं; क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। एकमात्र वह ही सर्वज्ञ है और एकमात्र वह ही सर्वेश्वर है। वह सबका स्वामी, देवता, अन्तर्यामी तथा महाज्योतिसे युक्त है। हे उत्तम द्विजो! सभी प्रकारका सुख देनेवाले सनातन परमात्मा सभीके द्वारा उपासना किये जानेपर स्वयं सर्वसौख्यकी अपेक्षा नहीं करते। वेदों तथा नानाविध शास्त्रोंसे उपासित होकर उन सर्वज्ञ प्रभुको वेद-शास्त्र आदिकी अपेक्षा नहीं रहती॥ ८४—९०॥
अस्यैवान्नमिदं सर्वं न सोऽन्नं भवति स्वयं।<br>स्वात्मना रक्षितं चाद्यादन्नभूतं न कुत्रचित्॥ ९१<br>सर्वत्र प्राणिनामन्नं प्राणिनां ग्रन्थिरस्म्यहम्।<br>प्रशास्ता नयनश्चैव पञ्चात्मा स विभागशः॥ ९२यह सारा जगत् इस आत्माका भोग्य है और वह आत्मा स्वयं भोग्य नहीं होता है अर्थात् वह भोक्ता है। अपने द्वारा रक्षित अन्न (भोग)-को वह भोगता है और जीवोंके भोग्यको कभी नहीं भोगता। मैं सभी प्राणियोंका अन्न हूँ, मैं प्राणियोंकी [प्राणापानरूप] ग्रन्थि हूँ, मैं ही