भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 441
[ अध्याय ८६ ]पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा४३१
श्लोकअर्थ
आत्मामें ही देखना चाहिये; आत्मामें ही सब कुछ देखनेवाला [साधक] अपने मनको बाह्य जगत्‌में आसक्त नहीं करता है॥ ५९—६१॥
अधोदृष्ट्या वितस्त्यां तु नाभ्यामुपरि तिष्ठति।<br>हृदयं तद्विजानीयाद्विश्वस्यायतनं महत्॥ ६२<br><br>हृदयस्यास्य मध्ये तु पुण्डरीकमवस्थितम्।<br>धर्मकन्दसमुद्भूतं ज्ञाननालं सुशोभनम्॥ ६३<br><br>ऐश्वर्याष्टदलं श्वेतं परं वैराग्यकर्णिकम्।<br>छिद्राणि च दिशो यस्य प्राणाद्याश्च प्रतिष्ठिताः॥ ६४नाभिसे बारह अंगुल ऊपर अधोमुख हृत्कमल-स्थित है; उसे विश्वका महान् गृह समझना चाहिये। इस हृदयके मध्यमें कमल विराजमान है; जो धर्मरूपी कन्दसे उत्पन्न, ज्ञानरूपी नालवाला, अत्यन्त सुन्दर, आठ सिद्धिरूप अष्ट दलसे युक्त और श्वेत तथा उत्तम वैराग्यरूपी कर्णिकावाला है एवं जिसके छिद्र प्राणवायुरूपी दिशाओंके रूपमें प्रतिष्ठित हैं॥ ६२—६४॥
प्राणाद्यैश्चैव संयुक्तः पश्यते बहुधा क्रमात्।<br>दशप्राणवहा नाड्यः प्रत्येकं मुनिपुङ्गवाः॥ ६५<br><br>द्विसप्ततिसहस्त्राणि नाड्यः सम्परिकीर्तिताः।<br>नेत्रस्थं जाग्रतं विद्यात्कण्ठे स्वप्नं समादिशेत्॥ ६६<br><br>सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्धनि स्थितम्।<br>जाग्रे ब्रह्मा च विष्णुश्च स्वप्ने चैव यथाक्रमात्॥ ६७<br><br>ईश्वरस्तु सुषुप्ते तु तुरीये च महेश्वरः।<br>वदन्त्येवमथान्येऽपि समस्तकरणैः पुमान्॥ ६८<br><br>वर्तमानस्तदा तस्य जाग्रदित्यभिधीयते।<br>मनोबुद्धिरहङ्कारं चित्तं चेति चतुष्टयम्॥ ६९<br><br>यदा व्यवस्थितस्त्वेतैः स्वप्न इत्यभिधीयते।<br>करणानि विलीनानि यदा स्वात्मनि सुव्रताः॥ ७०<br><br>सुषुप्तः करणैर्भिन्नस्तुरीयः परिकीर्त्यते।<br>परस्तुरीयातीतोऽसौ शिवः परमकारणम्॥ ७१प्राण आदिसे युक्त होनेपर साधक बहुत रूपोंमें इसे क्रमसे देख सकता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! प्रत्येक नाड़ी दस प्राणोंका वहन करती है; कुल बहत्तर हजार नाड़ियाँ बतायी गयी हैं। जाग्रत् [अवस्था]-को नेत्रमें स्थित जानना चाहिये और स्वप्नको कण्ठमें स्थित जानना चाहिये। इसी प्रकार सुषुप्तको हृदयमें स्थित तथा तुरीयको सिरमें स्थित जानना चाहिये। क्रमके अनुसार जाग्रत्-अवस्थामें ब्रह्मा, स्वप्नावस्थामें विष्णु, सुषुप्तावस्थामें ईश्वर (शिव) तथा तुरीयावस्थामें महेश्वर प्रतिष्ठित रहते हैं। अन्य लोग ऐसा भी कहते हैं कि जब मनुष्य सभी इन्द्रियोंके द्वारा संयमित रहता है, तब उसकी जाग्रत्-अवस्था कही जाती है। मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त—यह अन्तःकरणचतुष्टय है; इनके द्वारा जब मनुष्य व्यवस्थित रहता है, तब उसकी स्वप्नावस्था कही जाती है। हे सुव्रतो! जब मनुष्यकी इन्द्रियाँ उसकी आत्मामें विलीन हो जाती हैं, तब उसकी सुषुप्तावस्था कही जाती है। इन्द्रियोंसे अतीत मनुष्य तुरीय-अवस्थावाला कहा जाता है। [जगत्‌के] परम कारण तथा परस्वरूप ये शिव तुरीयसे भी अतीत हैं॥ ६५—७१॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिश्च तुरीयं चाधिभौतिकम्।<br>आध्यात्मिकं च विप्रेन्द्राश्चाधिदैविकमुच्यते॥ ७२<br><br>तत्सर्वमहमेवेति वेदितव्यं विजानता।<br>बुद्धीन्द्रियाणि विप्रेन्द्रास्तथा कर्मेन्द्रियाणि च॥ ७३<br><br>मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेति चतुष्टयम्।<br>अध्यात्मं पृथगेवेदं चतुर्दशविधं स्मृतम्॥ ७४हे विप्रेन्द्रो! जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीयके पश्चात् अब मैं आधिभौतिक, आध्यात्मिक तथा आधिदैविक स्वरूपका वर्णन करूँगा; यह सब मैं ही हूँ—ऐसा बुद्धिमान्‌को जानना चाहिये। मन-बुद्धि-अहंकार-चित्त—यह चतुर्वर्ग, [पाँच] ज्ञानेन्द्रियाँ और [पाँच] कर्मेन्द्रियाँ—ये पृथक् रूपसे चौदह आध्यात्मिक पदार्थ