श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४४४ || श्रीलिङ्गमहापुराण || [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भीमः सुषिरनाकेऽसौ भास्करे मण्डले स्थितः।<br>ईशानः सोमबिम्बे च महादेव इति स्मृतः॥ १३०<br>पुंसां पशुपतिर्देवश्चाष्टधाहं व्यवस्थितः। | अग्निमें और उग्र वायुमें प्रतिष्ठित हैं। भीम आकाशमें और ईशान सूर्यके मण्डलमें स्थित हैं। महादेवजी चन्द्रमण्डलमें स्थित कहे गये हैं। पुरुषोंमें भगवान् पशुपति विद्यमान हैं। इस प्रकार मैं आठ रूपोंमें व्यवस्थित हूँ॥ १२७—१३०१/२॥ |
| काठिन्यं यत्तनौ सर्वं पार्थिवं परिगीयते॥ १३१<br>आप्यं द्रवमिति प्रोक्तं वर्णाख्यो वह्निरुच्यते।<br>यत्सञ्चरति तद्वायुः सुषिरं यद् द्विजोत्तमाः॥ १३२<br>तदाकाशं च विज्ञानं शब्दजं व्योमसम्भवम्।<br>तथैव विप्रा विज्ञानं स्पर्शाख्यं वायुसम्भवम्॥ १३३<br>रूपं वाह्नेयमित्युक्तमाप्यं रसमयं द्विजाः।<br>गन्धाख्यं पार्थिवं भूयश्चिन्तयेद्भास्करं क्रमात्॥ १३४<br>नेत्रे च दक्षिणे वामे सोमं हृदि विभुं द्विजाः।<br>आजानु पृथिवीतत्त्वमानाभेर्वारिमण्डलम्॥ १३५<br>आकण्ठं वह्नितत्त्वं स्याल्ललाटान्तं द्विजोत्तमाः।<br>वायव्यं वै ललाटाद्यं व्योमाख्यं वा शिखाग्रकम्॥ १३६<br>हंसाख्यं च ततो ब्रह्म व्योम्नश्चोर्ध्वं ततः परम्।<br>व्योमाख्यो व्योममध्यस्थो ह्ययं प्राथमिकः स्मरेत्॥ १३७ | शरीरमें जो सम्पूर्ण कठोरता है, वह पृथ्वीतत्त्वमय कही जाती है, आप्य (तरल) पदार्थको जलतत्त्वसे सम्बन्धित कहा गया है। वर्ण (रंग)—को अग्निसे सम्बन्धित कहा जाता है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो शरीरमें संचरण करता है, वह वायुसे सम्बन्धित है। जो शरीरमें अवकाश (रिक्त स्थान) है, वह आकाशतत्त्व है। शब्दसे होनेवाला ज्ञान आकाशसे उत्पन्न होता है; उसी प्रकार हे विप्रो! स्पर्शसे होनेवाला ज्ञान वायुसे उत्पन्न होता है। हे द्विजो! रूपका ज्ञान अग्निसे और रसका ज्ञान जलसे उत्पन्न कहा गया है; गन्धका ज्ञान पृथ्वीसे उत्पन्न होता है। पुनः हे विप्रो! दाहिने नेत्रमें सूर्य, बायें नेत्रमें सोम तथा हृदयमें सर्वव्यापक पुरुषका चिन्तन करना चाहिये। हे द्विजोत्तमो! [देहमें] घुटनोंतक पृथ्वीतत्त्व, नाभिपर्यन्त जल-तत्त्व, कण्ठपर्यन्त वह्नितत्त्व, ललाटपर्यन्त वायुतत्त्व, ललाटाग्र अथवा शिखाग्रमें आकाशतत्त्व, तदनन्तर आकाशसे ऊपर हंससंज्ञक ब्रह्म और व्योमके मध्यमें व्योमसंज्ञक ये शिव स्थित हैं—प्राथमिक ध्याताको इनका ध्यान करना चाहिये॥ १३१—१३७॥ |
| न जीवः प्रकृतिः सत्त्वं रजश्चाथ तमः पुनः।<br>महांस्तथाभिमानश्च तन्मात्राणीन्द्रियाणि च॥ १३८<br>व्योमादीनि च भूतानि नैवेह परमार्थतः।<br>व्याप्य तिष्ठद्यतो विश्वं स्थाणुरित्यभिधीयते॥ १३९<br>उदेति सूर्यो भीतश्च पवते वात एव च।<br>द्योतते चन्द्रमा वह्निर्ज्वलत्यापो वहन्ति च॥ १४०<br>दधाति भूमिराकाशमवकाशं ददाति च।<br>तदाज्ञया ततं सर्वं तस्माद्वै चिन्तयेद् द्विजाः॥ १४१<br>तेनैवाधिष्ठितं तस्मादेतत्सर्वं द्विजोत्तमाः।<br>सर्वरूपमयः शर्व इति मत्वा स्मरेद्भवम्॥ १४२ | जीव, प्रकृति, सत्त्व, रज, तम, महान् (बुद्धि), अहंकार, पंच तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, आकाश आदि पंच भूत—ये सब यथार्थ रूपमें नहीं हैं। चूँकि विश्वको व्याप्त करके वे शिव स्थित हैं, अतः उन्हें स्थाणु कहा जाता है। उन्हींकी आज्ञासे डरकर सूर्य उगता है, हवा बहती है, चन्द्रमा प्रकाशित होता है, अग्नि जलती है, जल प्रवाहित होता है, भूमि [सबको] धारण करती है और आकाश स्थान देता है; सब कुछ उन्हींसे व्याप्त है, अतः हे द्विजो! उन्हींका चिन्तन करना चाहिये। हे द्विजोत्तमो! उन्हींसे यह सम्पूर्ण जगत् अधिष्ठित है, अतः शर्व सर्वरूपमय हैं—ऐसा मानकर [महेश्वर] भवका स्मरण करना चाहिये॥ १३८—१४२॥ |
अध्याय ८६ ] पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा ४४५
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| संसारविषतप्तानां ज्ञानध्यानामृतेन वै।<br>प्रतीकारः समाख्यातो नान्यथा द्विजसत्तमाः ॥ १४३<br>ज्ञानं धर्मोद्भवं साक्षाज्ज्ञानाद्वैराग्यसम्भवः।<br>वैराग्यात्परमं ज्ञानं परमार्थप्रकाशकम् ॥ १४४ | हे श्रेष्ठ द्विजो! ज्ञान-ध्यानरूपी अमृतसे ही संसाररूपी विषसे संतप्त लोगोंका प्रतीकार बताया गया है; अन्यथा नहीं। धर्मसे ज्ञान उत्पन्न होता है, साक्षात् ज्ञानसे वैराग्य उत्पन्न होता है और वैराग्यसे परमार्थप्रकाशक परम ज्ञान उत्पन्न होता है अर्थात् ज्ञानके अनुसार व्यवहारमें प्रवृत्ति होने लगती है॥ १४३-१४४॥ |
| ज्ञानवैराग्ययुक्तस्य योगसिद्धिर्द्विजोत्तमाः।<br>योगसिद्ध्या विमुक्तिः स्यात्सत्त्वनिष्ठस्य नान्यथा ॥ १४५<br>तमोविद्यापदच्छन्नं चित्रं यत्पदमव्ययम्।<br>सत्त्वशक्तिं समास्थाय शिवमभ्यर्चयेद् द्विजाः ॥ १४६ | हे श्रेष्ठ द्विजो! ज्ञान-वैराग्यसे युक्त [साधक]-को ही योगकी सिद्धि होती है, पुनः योगसिद्धिके द्वारा उस सत्त्वनिष्ठकी मुक्ति हो जाती है; अन्यथा नहीं। हे द्विजो! तम तथा अविद्या पदसे आच्छादित, अद्भुत एवं अविनाशी जो शिवपद है, सत्त्वशक्तिका आश्रय लेकर उसका अर्चन करना चाहिये॥ १४५-१४६॥ |
| यः सत्त्वनिष्ठो मद्भक्तो मदर्चनपरायणः।<br>सर्वतो धर्मनिष्ठश्च सदोत्साही समाहितः ॥ १४७<br>सर्वद्वन्द्वसहो धीरः सर्वभूतहिते रतः।<br>ऋजुस्वभावः सततं स्वस्थचित्तो मृदुः सदा ॥ १४८<br>अमानी बुद्धिमाञ्छान्तस्त्यक्तस्पर्धो द्विजोत्तमाः।<br>सदा मुमुक्षुर्धर्मज्ञः स्वात्मलक्षणलक्षणः ॥ १४९<br>ऋणत्रयविनिर्मुक्तः पूर्वजन्मनि पुण्यभाक्।<br>जरायुक्तो द्विजो भूत्वा श्रद्धया च गुरोः क्रमात् ॥ १५०<br>अन्यथा वापि शुश्रूषां कृत्वा कृत्रिमवर्जितः।<br>स्वर्गलोकमनुप्राप्य भुक्त्वा भोगाननुक्रमात् ॥ १५१<br>आसाद्य भारतं वर्षं ब्रह्मविज्जायते द्विजाः।<br>सम्पर्काज्ज्ञानमासाद्य ज्ञानिनो योगविद्भवेत् ॥ १५२<br>क्रमोऽयं मलपूर्णस्य ज्ञानप्राप्तेर्द्विजोत्तमाः।<br>तस्मादनेन मार्गेण त्यक्तसङ्गो दृढव्रतः ॥ १५३<br>संसारकालकूटाख्यान्मुच्यते मुनिपुङ्गवाः। | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो मेरा भक्त सत्त्वनिष्ठ, मेरी पूजामें लीन रहनेवाला, सब प्रकारसे धर्ममें निष्ठा रखनेवाला, सदा उत्साहसे सम्पन्न, एकाग्रचित्त, सभी द्वन्द्वोंको सहनेवाला, धैर्यशाली, सभी प्राणियोंके हितमें रत, सरल स्वभाववाला, सदा स्वस्थ मनवाला, कोमल चित्तवाला, मानरहित, बुद्धिमान्, शान्त, प्रतिद्वन्द्वितासे रहित, सदा मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला, धर्मज्ञ, आत्माके लक्षणोंको जाननेवाला, तीनों प्रकारके ऋणोंसे मुक्त तथा पूर्वजन्ममें पुण्यशाली होता है; वह द्विज श्रद्धाके साथ पाखण्डरहित होकर गुरुकी सेवा करके वृद्ध होनेपर स्वर्गलोक प्राप्त करके वहाँ क्रमसे सुखोंका भोग करके पुनः भारतवर्षमें जन्म लेकर ब्रह्मवेत्ता होता है और हे द्विजो! ज्ञानीके सम्पर्कसे ज्ञान प्राप्त करके योगवेत्ता होता है। हे श्रेष्ठ द्विजो! अज्ञानीके लिये ज्ञानप्राप्तिकी यही विधि है; अतः हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी मार्गके द्वारा आसक्तिरहित तथा दृढ़ व्रतवाला व्यक्ति संसाररूपी कालकूट (विष)-से मुक्त हो जाता है॥ १४७-१५३ १/२॥ |
| एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं मया युष्माकमच्युतम् ॥ १५४<br>ज्ञानस्यैवेह माहात्म्यं प्रसङ्गादिह शोभनम्।<br>एवं पाशुपतं योगं कथितं त्वीश्वरेण तु ॥ १५५<br>न देयं यस्य कस्यापि शिवोक्तं मुनिपुङ्गवाः।<br>दातव्यं योगिने नित्यं भस्मनिष्ठाय सुप्रियम् ॥ १५६ | इस प्रकार मैंने आप लोगोंको संक्षेपमें प्रसंगवश ज्ञानका अचल तथा उत्तम माहात्म्य बता दिया। इस पाशुपत योगको [स्वयं] महेश्वरने कहा है। हे श्रेष्ठ मुनियो! शिवके द्वारा कहे गये इस योगको जिस किसीको भी नहीं बताना चाहिये, अपितु भस्मनिष्ठ अर्थात् शिवतत्त्वनिष्ठ योगीको ही इस अत्यन्त प्रिय योगका |
८७- सनकादि मुनीश्वरोंको शिवज्ञानका उपदेश
| ४४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| यः पठेच्छृणुयाद्वापि संसारशमनं नरः।<br><br>स याति ब्रह्मसायुज्यं नात्र कार्या विचारणा ॥ १५७ | सदा उपदेश करना चाहिये। जो मनुष्य इस संसाररूपी विषका नाश करनेवाले आख्यानको पढ़ता अथवा सुनता है, वह ब्रह्मसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १५४-१५७॥॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे संसारविषकथनं नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'संसारविषकथन' नामक छियासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८६ ॥
सत्तासीवाँ अध्याय
सनकादि मुनीश्वरोंको शिवज्ञानका उपदेश
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| निशम्य ते महाप्राज्ञाः कुमाराद्याः पिनाकिनम्।<br>प्रोचुः प्रणम्य वै भीताः प्रसन्नं परमेश्वरम्॥ १<br><br>एवं चेदनया देव्या हैमवत्या महेश्वर।<br>क्रीडसे विविधैर्भोगैः कथं वक्तुमिहार्हसि॥ २ | यह सुनकर कुमार आदि उन महाबुद्धिमान् मुनियोंने भयभीत होकर प्रसन्न पिनाकधारी परमेश्वरको प्रणाम करके उनसे कहा—'हे महेश्वर! यदि ऐसा है, तो आप इन देवी पार्वतीके साथ अनेकविध भोगोंके द्वारा क्रीड़ा क्यों करते हैं; कृपा करके यह बतायें' ॥ १-२ ॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| एवमुक्तः प्रहस्येशः पिनाकी नीललोहितः।<br>प्राह तामम्बिकां प्रेक्ष्य प्रणिपत्य स्थितान् द्विजान्॥ ३ | [हे ऋषियो!] ऐसा कहे जानेपर पिनाकधारी नीललोहित ईश्वरने हँसकर उन अम्बिकाकी ओर देखकर वहाँ स्थित द्विजोंने प्रणाम करके उनसे कहा— |
| बन्धमोक्षौ न चैवेह मम स्वेच्छाशरीरिणः।<br>अकर्ताज्ञः पशुर्जीवो विभुर्भोक्ता ह्यणुः पुमान्॥ ४ | 'अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाले मेरे लिये न बन्धन है, न मोक्ष है। मैं सर्वव्यापी, कर्तृत्वरहित तथा सर्वज्ञ हूँ; जबकि यह जीव अणुरूप, भोक्ता तथा अज्ञ है। |
| मायी च मायया बद्धः कर्मभिर्युज्यते तु सः।<br>ज्ञानं ध्यानं च बन्धश्च मोक्षो नास्त्यात्मनो द्विजाः॥ ५ | जो मायी है, वह मायासे सकाम कर्मद्वारा बँधा हुआ है और वह कर्मोंसे लिप्त है। हे द्विजो! आत्माके लिये ज्ञान, ध्यान, बन्धन तथा मोक्ष नहीं हैं। |
| यदैवं मयि विद्वान् यस्तस्यापि न च सर्वतः।<br>एषा विद्या ह्यहं वेद्यः प्रज्ञैषा च श्रुतिः स्मृतिः॥ ६ | जो विद्वान् मुझमें ऐसा अनुभव कर लेता है, उसके लिये भी ये सब नहीं होते हैं। ये [पार्वती] विद्या हैं और मैं वेद्य हूँ। ये प्रज्ञा, श्रुति तथा स्मृति हैं। |
| धृतिरेषा मया निष्ठा ज्ञानशक्तिः क्रिया तथा।<br>इच्छाख्या च तथा ह्याज्ञा द्वे विद्ये न च संशयः॥ ७ | ये मेरे द्वारा प्रतिष्ठित धृति, निष्ठा, ज्ञानशक्ति, क्रिया, इच्छा तथा आज्ञा हैं। ये (परा-अपरा) दोनों विद्याएँ हैं; इसमें सन्देह नहीं है। |
| न ह्येषा प्रकृतिर्जैवी विकृतिश्च विचारतः।<br>विकारो नैव मायैषा सदसद्व्यक्तिवर्जिता॥ ८ | ये जीवसम्बन्धी प्रकृति नहीं हैं। विचार किया जाय, तो ये विकृति भी नहीं हैं। विकार नहीं हैं; ये माया हैं, जो सत्-असत्से रहित अर्थात् अनिर्वचनीय हैं। |
| पुरा ममाज्ञा मद्द्वक्त्रात्समुत्पन्ना सनातनी।<br>पञ्चवक्त्रा महाभागा जगतामभयप्रदा॥ ९ | पूर्वकालमें लोगोंको अभय प्रदान करनेवाली, महाभाग्यवती तथा पाँच मुखवाली |
अध्याय ८७ ] सनकादि मुनीश्वरोंको शिवज्ञानका उपदेश ४४७
| तामाज्ञां सम्प्रविश्याहं चिन्तयञ्जगतां हितम्।<br>सप्तविंशत्प्रकारेण सर्वं व्याप्यानया शिवः ॥ १०<br>तदाप्रभृति वै मोक्षप्रवृत्तिर्द्विजसत्तमाः। | मेरी यह सनातनी आज्ञा मेरे मुखसे उत्पन्न हुई थी। तब जगत्के कल्याणका चिन्तन करता हुआ मैं शिव उस आज्ञामें प्रविष्ट होकर इनके साथ सत्ताईस तत्त्वोंसे सबको व्याप्त करके स्थित हुआ। हे श्रेष्ठ द्विजो! तभीसे मुक्ति प्रारम्भ हुई॥ ३-१०१/२॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा तदापश्यद्भवानिं परमेश्वरः॥ ११<br>भवानी च तमालोक्य मायामहरदव्यया।<br>ते मायामलनिर्मुक्ता मुनयः प्रेक्ष्य पार्वतीम्॥ १२<br>प्रीता बभूवुर्मुक्ताश्च तस्मादेषा परा गतिः।<br>उमाशङ्करयोर्भेदो नास्त्येव परमार्थतः॥ १३<br>द्विधासौ रूपमास्थाय स्थित एव न संशयः।<br>यदा विद्वानसङ्गः स्यादाज्ञया परमेष्ठिनः ॥ १४ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] ऐसा कहकर परमेश्वरने भवानीकी ओर देखा और सनातनी भवानीने उन [परमेश्वर]–को देखकर मायाको हटा लिया; तब मायाके मलसे मुक्त हुए वे मुनिगण पार्वतीको देखकर प्रसन्न होकर मुक्त हो गये। अतः ये [पार्वती] ही परागति हैं। वस्तुतः उमा तथा शंकरमें भेद नहीं है; वे [शिव] दो रूप धारण करके स्थित हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ ११-१३१/२॥ |
| तदा मुक्तिः क्षणादेव नान्यथा कर्मकोटिभिः।<br>क्रमोऽविवक्षितो भूतविवृद्धः परमेष्ठिनः ॥ १५<br>प्रसादेन क्षणान्मुक्तिः प्रतिज्ञैषा न संशयः।<br>गर्भस्थो जायमानो वा बालो वा तरुणोऽपि वा ॥ १६<br>वृद्धो वा मुच्यते जन्तुः प्रसादात्परमेष्ठिनः।<br>अण्डजश्चोद्भिज्जो वापि स्वेदजो वापि मुच्यते ॥ १७<br>प्रसादाद्देवदेवस्य नात्र कार्या विचारणा।<br>एष एव जगन्नाथो बन्धमोक्षकरः शिवः ॥ १८ | जब शिवकी मायासे विद्वान् अनासक्त हो जाता है, तब क्षणभरमें [उसकी] मुक्ति हो जाती है; अन्यथा करोड़ों कर्मोंसे भी मुक्ति नहीं होती। ऋषियोंके द्वारा बताया गया मुक्तिक्रम परमेष्ठी शिवके लिये विवक्षित नहीं है। परमेश्वरकी कृपासे क्षणभरमें मुक्ति हो जाती है, यह उनकी प्रतिज्ञा है; इसमें सन्देह नहीं है। परमेष्ठी शिवकी कृपासे जीव मुक्त हो जाता है, चाहे वह गर्भमें स्थित हो, उत्पन्न हो रहा हो, बालक हो, तरुण हो अथवा वृद्ध हो। देवोंके देव [महेश्वर]–के अनुग्रहसे अण्डज, उद्भिज्ज तथा स्वेदज [प्राणी] भी मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १४-१७१/२॥ |
| भूर्भुवःस्वर्महश्चैव जनः साक्षात्तपः स्वयम्।<br>सत्यलोकस्तथाण्डानां कोटिकोटिशतानि च ॥ १९<br>विग्रहं देवदेवस्य तथाण्डावरणाष्टकम्।<br>सप्तद्वीपेषु सर्वेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ २०<br>समुद्रेषु च सर्वेषु वायुस्कन्धेषु सर्वतः।<br>तथान्येषु च लोकेषु वसन्ति च चराचराः ॥ २१<br>सर्वे भवांशजा नूनं गतिस्तेषां स एव वै।<br>सर्वो रुद्रो नमस्तस्मै पुरुषाय महात्मने ॥ २२ | ये जगत्पति शिव ही बन्धन तथा मोक्ष करनेवाले हैं। भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः तथा सत्यम्—ये लोक और करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड तथा अण्डोंके आठों आवरण—ये सब उन देवदेव [महेश्वर]–के विग्रह (शरीर) हैं। सातों द्वीपोंमें, सभी पर्वतोंमें, वनोंमें, समुद्रोंमें, सभी वायुके स्कन्धोंमें तथा अन्य लोकोंमें जो चराचर जीव निवास करते हैं—वे सब शिवके अंशसे उत्पन्न हुए हैं; निश्चित रूपसे इनकी गति वे ही हैं। सब कुछ रुद्र ही हैं। उन महात्मा पुरुषको नमस्कार है॥ १८-२२॥ |
| विश्वं भूतं तथा जातं बहुधा रुद्र एव सः।<br>रुद्राज्ञैषा स्थिता देवी ह्यानया मुक्तिरम्बिका ॥ २३ | उन रुद्रने ही सम्पूर्ण जगत्को तथा सभी जीवोंको |
८८- पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोत्रका स्वरूप
| ४४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| इत्येवं खेचराः सिद्धा जजल्पुः प्रीतमानसाः।<br>यदावलोक्य तान् सर्वान् प्रसादादनयाम्बिका ॥ २४<br>तदा तिष्ठन्ति सायुज्यं प्राप्तास्ते खेचराः प्रभोः॥ २५ | उत्पन्न किया है। ये देवी अम्बिका रुद्रकी आज्ञाके रूपमें विराजमान हैं; मुक्ति इन्हींसे प्राप्त होती है—ऐसा आकाशचारी सिद्धोंने प्रसन्नचित्त होकर कहा है। जब वे [शिव] इन आज्ञारूपी अम्बिकाके साथ स्थित होकर उन सबको कृपापूर्वक देखते हैं, तब वे आकाशचारी सिद्धगण प्रभुका सायुज्य प्राप्त कर लेते हैं और सदाके लिये उसीमें स्थित हो जाते हैं॥ २३—२५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मुनिमोहशमनं नाम सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मुनिमोहशमन' नामक सत्तासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८७ ॥
अट्ठासीवाँ अध्याय
पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>केन योगेन वै सूत गुणप्राप्तिः सतामिह।<br>अणिमादिगुणोपेता भवन्त्येवेह योगिनः।<br>तत्सर्वं विस्तरात्सूत वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १ | **ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! किस योगसे सज्जनोंको इस लोकमें मोक्षकी प्राप्ति होती है और योगिजन अणिमा आदि गुणोंसे युक्त होते हैं? हे सूतजी! इस समय आप विस्तारपूर्वक यह सब बतायें॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि योगं परमदुर्लभम्।<br>पञ्चधा संस्मरेदादौ स्थाप्य चित्ते सनातनम्॥ २<br>कल्पयेच्चासनं पद्मं सोमसूर्याग्निसंयुतम्।<br>षड्विंशच्छक्तिसंयुक्तमष्टधा च द्विजोत्तमाः॥ ३<br>ततः षोडशधा चैव पुनर्द्वादशधा द्विजाः।<br>स्मरेच्च तत्तथा मध्ये देव्या देवमुमापतिम्॥ ४<br>अष्टशक्तिसमायुक्तमष्टमूर्तिमजं प्रभुम्।<br>ताभिश्चाष्टविधा रुद्राश्चतुःषष्टिविधाः पुनः॥ ५<br>शक्तयश्च तथा सर्वा गुणाष्टकसमन्विताः।<br>एवं स्मरेत्क्रमेणैव लब्ध्वा ज्ञानमनुत्तमम्॥ ६<br>एवं पाशुपतं योगं मोक्षसिद्धिप्रदायकम्।<br>तस्याणिमादयो विप्रा नान्यथा कर्मकोटिभिः॥ ७ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] अब मैं परम दुर्लभ योगका वर्णन करूँगा। सबसे पहले चित्तमें सनातन शिवको स्थापित करके उनके [सद्योजात आदि] पाँच रूपोंका स्मरण करना चाहिये और हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! चन्द्र-सूर्य-अग्निसे युक्त तथा छब्बीस शक्तियोंसे समन्वित अष्टदलकमल, उसके ऊपर षोडशदल-कमल, पुनः उसके ऊपर द्वादशदलकमलरूप आसनकी भावना करनी चाहिये। तदनन्तर हे द्विजो! उसके मध्यमें देवीके साथ आठ शक्तियोंसहित अष्टमूर्ति, अजन्मा, ऐश्वर्यमय भगवान् उमापतिका स्मरण करना चाहिये। उन शक्तियोंके साथ आठ रुद्र और आठों सिद्धियोंसे सम्पन्न सभी चौंसठ शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं—ऐसा क्रमसे स्मरण करना चाहिये। हे विप्रो! इस प्रकार उत्तम ज्ञान प्राप्त करके जो मोक्षसिद्धि प्रदान करनेवाले पाशुपतयोगको करता है, उसे अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं; अन्यथा करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं मिल सकतीं॥ २—७॥ |
| तत्राष्टगुणमैश्वर्यं योगिनां समुदाहृतम्।<br>तत्सर्वं क्रमयोगेन ह्युच्यमानं निबोधत॥ ८ | हे मुनियो! योगियोंका आठ गुणोंसे युक्त ऐश्वर्य |
अध्याय ८८ ] पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप ४४९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अणिमा लघिमा चैव महिमा प्राप्तिरेव च।<br>प्राकाम्यं चैव सर्वत्र ईशित्वं चैव सर्वतः॥ ९<br><br>वशित्वमथ सर्वत्र यत्र कामावसायिता।<br>तच्चापि त्रिविधं ज्ञेयमैश्वर्यं सार्वकामिकम्॥ १०<br><br>सावद्यं निरवद्यं च सूक्ष्मं चैव प्रवर्तते।<br>सावद्यं नाम यत्तत्र पञ्चभूतात्मकं स्मृतम्॥ ११<br><br>इन्द्रियाणि मनश्चैव अहङ्कारश्च यः स्मृतः।<br>तत्र सूक्ष्मप्रवृत्तिस्तु पञ्चभूतात्मिका पुनः॥ १२<br><br>इन्द्रियाणि मनश्चित्तबुद्ध्यहङ्कारसंज्ञितम्।<br>तथा सर्वमयं चैव आत्मस्था ख्यातिरेव च॥ १३<br><br>संयोग एव त्रिविधः सूक्ष्मेष्वेव प्रवर्तते।<br>पुनरष्टगुणश्चापि सूक्ष्मेष्वेव विधीयते॥ १४<br><br>तस्य रूपं प्रवक्ष्यामि यथाह भगवान् प्रभुः।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतेषु यथास्य नियमः स्मृतः॥ १५<br><br>अणिमाद्यं तथाव्यक्तं सर्वत्रैव प्रतिष्ठितम्।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतानां दुष्प्राप्यं समुदाहृतम्॥ १६<br><br>तत्तस्य भवति प्राप्यं प्रथमं योगिनां बलम्।<br>लङ्घनं प्लवनं लोके रूपमस्य सदा भवेत्॥ १७ | कहा गया है। उन सबको क्रमसे बता रहा हूँ; [आपलोग] सुनिये। अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व तथा कामावसायिता—ये आठ सिद्धियाँ हैं। सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले उस ऐश्वर्यको भी तीन प्रकारका जानना चाहिये; सावद्य, निरवद्य तथा सूक्ष्म—ये तीन प्रकार होते हैं। उनमें जो सावद्य है, वह पंचभूतात्मक कहा गया है। इन्द्रियाँ, मन तथा जो अहंकार कहा गया है—ये निरवद्य ऐश्वर्य हैं। आत्मामें पंचभूतोंकी तन्मात्रारूपा सूक्ष्म प्रवृत्ति ही सूक्ष्म ऐश्वर्य है। इस प्रकार इन्द्रियाँ, मन, चित्त, बुद्धि तथा अहंकार निरवद्य ऐश्वर्य हैं; पंचभूतमय ऐश्वर्य सावद्य नामवाला है और शब्द आदि विषयरूप ऐश्वर्य सूक्ष्म है। तीन प्रकारका यह भेद [अणिमा आदि] सूक्ष्म ऐश्वर्योंमें प्रवृत्त होता है। पुनः आठ गुणोंका भेद भी सूक्ष्म ऐश्वर्योंमें होता है। तीनों लोकोंके सभी प्राणियोंमें सर्वत्र यह अणिमादि अव्यक्त ऐश्वर्य जिस प्रकारसे प्रतिष्ठित है और जैसा इसका नियम बताया गया है—भगवान् प्रभुने इस विषयमें जैसा कहा है, उसके स्वरूपको मैं बताऊँगा। जो ऐश्वर्य त्रिलोकीमें सभी प्राणियोंके लिये दुर्लभ बताया गया है, वह योगियोंके लिये प्राप्त होनेवाला अणिमारूप पहला बल होता है; इसका स्वरूप संसारमें कहीं भी, कभी भी लंघन तथा प्लवन करनेका होता है॥ ८—१७॥ |
| शीघ्रत्वं सर्वभूतेषु द्वितीयं तु पदं स्मृतम्।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतानां महिम्ना चैव वन्दितम्॥ १८<br><br>महित्वं चापि लोकेऽस्मिंस्तृतीयो योग उच्यते।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतेषु यथेष्टगमनं स्मृतम्॥ १९ | सभी प्राणियोंकी अपेक्षा शीघ्रत्व गुणसे सम्पन्न होना लघिमा नामक दूसरी सिद्धि कही गयी है। तीनों लोकोंमें सभी प्राणियोंमें माहात्म्यबलसे वन्दित तथा पूजित होना इस लोकमें महिमारूप तीसरी सिद्धि कही जाती है। त्रिलोकीमें सभी प्राणियोंके भीतर स्वेच्छासे प्रवेश करना प्राप्ति नामक सिद्धि कही गयी है॥ १८-१९॥ |
| प्राकामान् विषयान् भुङ्क्ते तथाप्रतिहतः क्वचित्।<br>त्रैलोक्ये सर्वभूतानां सुखदुःखं प्रवर्तते॥ २०<br><br>ईशो भवति सर्वत्र प्रविभागेन योगवित्।<br>वश्यानि चास्य भूतानि त्रैलोक्ये सचराचरे॥ २१ | प्राकाम्य ऐश्वर्यसे युक्त व्यक्ति तीनों लोकोंमें कहीं भी बाधारहित होकर विषयोंका भोग करता है और सभी प्राणियोंको सुख-दुःखमें प्रवृत्त कर सकता है। ईशित्व ऐश्वर्यके द्वारा वह योगवेत्ता यथेष्ट देहधारणके द्वारा सभी जगह स्वामी बन जाता है। वशित्वसे |
| ४५० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| इच्छया तस्य रूपाणि भवन्ति न भवन्ति च।<br>यत्र कामावसायित्वं त्रैलोक्ये सचराचरे॥ २२<br><br>शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चैव मनस्तथा।<br>प्रवर्तन्तेऽस्य चेच्छातो न भवन्ति यथेच्छया॥ २३<br><br>न जायते न म्रियते छिद्यते न च भिद्यते।<br>न दह्यते न मुह्येत लीयते न च लिप्यते॥ २४<br><br>न क्षीयते न क्षरति खिद्यते न कदाचन।<br>क्रियते वा न सर्वत्र तथा विक्रीयते न च॥ २५<br><br>अगन्धरसरूपस्तु अस्पर्शः शब्दवर्जितः।<br>अवर्णो ह्रास्वरश्चैव असवर्णस्तु कर्हिचित्॥ २६<br><br>स भुङ्क्ते विषयांश्चैव विषयैर्न च युज्यते।<br>अणुत्वात्तु परः सूक्ष्मः सूक्ष्मत्वादपवर्गिकः॥ २७ | चराचरसहित त्रिलोकीमें सभी प्राणी उसके वशमें हो जाते हैं। जिसके पास कामावसित्त्व [ऐश्वर्य] होता है, चराचरसहित तीनों लोकोंमें उसके रूप इच्छाके अनुसार बन सकते हैं और नहीं भी बन सकते हैं। शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध, रूप तथा मन उसकी इच्छासे होते हैं और उसकी इच्छाके अनुसार नहीं भी होते हैं। वह कभी भी न उत्पन्न होता है, न मरता है, न कट सकता है, न भेदा जा सकता है, न जलाया जा सकता है, न मूर्च्छित होता है, न आकर्षित होता है, न लिप्त (आसक्त) होता है, न उसका क्षय होता है, वह नष्ट नहीं होता है और न तो खिन्न होता है। वह सर्वत्र न तो कुछ करता है और न तो विकृत ही होता है। वह शब्द, स्पर्श, गन्ध, रस तथा रूपसे रहित होता है। वह सदा अवर्ण, स्वररहित तथा असवर्ण होता है। वह विषयोंका भोग करता है, किन्तु उनसे लिप्त नहीं होता है॥ २०—२६॥ | | व्यापकस्त्वपवर्गाच्च व्यापकात्पुरुषः स्मृतः।<br>पुरुषः सूक्ष्मभावात्तु ऐश्वर्ये परमे स्थितः॥ २८<br><br>गुणोत्तरमथैश्वर्ये सर्वतः सूक्ष्ममुच्यते।<br>ऐश्वर्यं चाप्रतीघातं प्राप्य योगमनुत्तमम्॥ २९<br><br>अपवर्गं ततो गच्छेत्सूक्ष्मं तत्परमं पदम्।<br>एवं पाशुपतं योगं ज्ञातव्यं मुनिपुङ्गवाः॥ ३० | अणुभाववाला होनेके कारण जीव सूक्ष्म है और सूक्ष्म होनेके कारण मुक्तिके योग्य है। मुक्त होनेके कारण व्यापक है और व्यापक होनेके कारण वह पुरुष कहा गया है। सूक्ष्म भाव होनेके कारण वह पुरुष परम ऐश्वर्यमें स्थित होता है। ऐश्वर्योंका गुण क्रमशः सूक्ष्म होता जाता है—ऐसा कहा गया है। अबाधित ऐश्वर्य तथा उत्तम योग प्राप्त करके साधक मुक्ति प्राप्त करता है; वही सूक्ष्म परम पद है॥ २७—२९ १/२॥ | | स्वर्गापवर्गफलदं शिवसायुज्यकारणम्।<br>अथवा गतविज्ञानो रागात्कर्म समाचरेत्॥ ३१<br><br>राजसं तामसं वापि भुक्त्वा तत्रैव मुच्यते।<br>तथा सुकृतकर्मा तु फलं स्वर्गे समश्नुते॥ ३२<br><br>तस्मात्स्थानात्पुनः श्रेष्ठो मानुष्यमुपपद्यते।<br>तस्माद् ब्रह्म परं सौख्यं ब्रह्म शाश्वतमुत्तमम्॥ ३३<br><br>ब्रह्म एव हि सेवेत ब्रह्मैव हि परं सुखम्।<br>परिश्रमो हि यज्ञानां महतार्थेन वर्तते॥ ३४ | हे श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार पाशुपतयोगको जानना चाहिये, जो स्वर्ग तथा मोक्षका फल प्रदान करनेवाला और शिव-सायुज्यका कारण है। विज्ञानरहित व्यक्ति रागके कारण कर्म करता है और राजस अथवा तामस भोग करके वहींपर मुक्त हो जाता है। पुण्यकर्म करनेवाला स्वर्गमें फल प्राप्त करता है; तत्पश्चात् वह श्रेष्ठ प्राणी [पुण्यके क्षीण होनेपर] पुनः मनुष्यलोकमें वापस आता है। अतः ब्रह्म ही परम सुख है और ब्रह्म ही परम शाश्वत है। ब्रह्मकी ही उपासना करनी चाहिये; क्योंकि ब्रह्म ही परम आनन्दस्वरूप है॥ ३०—३३ १/२॥ |
अध्याय ८८] पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप ४५१
| भूयो मृत्युवशं याति तस्मान्मोक्षः परं सुखम्।<br>अथवा ध्यानसंयुक्तो ब्रह्मतत्त्वपरायणः॥ ३५<br>न तु च्यावयितुं शक्यो मन्वन्तरशतैरपि।<br>दृष्ट्वा तु पुरुषं दिव्यं विश्वाख्यं विश्वतोमुखम्॥ ३६<br>विश्वपादशिरोग्रीवं विश्वेशं विश्वरूपिणम्।<br>विश्वगन्धं विश्वमाल्यं विश्वाम्बरधरं प्रभुम्॥ ३७ | यज्ञोंमें बहुत धनके व्ययके साथ ही परिश्रम होता है; उसके बाद भी मनुष्यको मृत्युके वशमें होना पड़ता है, अतः मोक्ष ही परम आनन्द है। विश्व नामवाले, सभी ओर मुख-पैर-सिर-ग्रीवावाले, विश्वके स्वामी, सभी रूपोंवाले, सभी गन्धोंसे युक्त, सम्पूर्ण विश्वको माला तथा वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले (सर्वव्यापक) भगवान् दिव्य पुरुषका दर्शन करके ध्यानयुक्त तथा ब्रह्मतत्त्वपरायण व्यक्तिको सैकड़ों मन्वन्तरोंमें भी [उसके पदसे] च्युत नहीं किया जा सकता है॥ ३४—३७॥ |
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| गोभिर्महीं सम्पत्तते पतत्रिणो<br>नैवं भूयो जनयत्येवमेव।<br>कविं पुराणमनुशासितारं<br>सूक्ष्माच्च सूक्ष्मं महतो महान्तम्॥ ३८<br>योगेन पश्येन्न च चक्षुषा पुन-<br>र्निरेन्द्रियं पुरुषं रुक्मवर्णम्।<br>आलिङ्गिनं निर्गुणं चेतनं च<br>नित्यं सदा सर्वगं सर्वसारम्॥ ३९<br>पश्यन्ति युक्त्या ह्यचलप्रकाशं<br>तद्भावितास्तेजसा दीप्यमानम्।<br>अपाणिपादोदरपार्श्वजिह्वो<br>ह्यतीन्द्रियो वापि सुसूक्ष्म एकः॥ ४०<br>पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णो<br>न चास्त्यबुद्धं न च बुद्धिरस्ति।<br>स वेद सर्वं न च सर्ववेद्यं<br>तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥ ४१ | पुरुषरूप ईश्वर सूर्यकी किरणोंके माध्यमसे पृथ्वीपर पहुँचता है और निरन्तर ही पूर्वसदृश जगत्को उत्पन्न करता है; किंतु प्रलयकालमें उत्पन्न नहीं करता। योगी उस कवि, पुरातन, सभीपर शासन करनेवाले, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, महान्से भी महान्, इन्द्रियोंसे रहित, स्वर्णके रंगवाले, सर्वरूपमय, निर्गुण, चैतन्यस्वरूप, नित्य सर्वत्र गमन करनेवाले (सर्वव्यापी) तथा सर्वसारस्वरूप पुरुषको योगसे देख सकता है न कि चक्षुसे। उसी ब्रह्ममें लीन रहनेवाले साधक उस अचल प्रकाशवाले तथा अपने तेजसे प्रकाशित प्रभुको योगसे देखते हैं। वह [ब्रह्म] हाथ-पैर-उदर-पार्श्व-जिह्वासे रहित है, इन्द्रियोंसे अतीत है, अत्यन्त सूक्ष्म है तथा अद्वितीय है। वह नेत्ररहित होता हुआ भी देखता है, कानोंसे रहित होता हुआ भी सुनता है और बुद्धिरहित होता हुआ भी सब कुछ जानता है। वह सबको जानता है, किंतु सबके द्वारा वेद्य नहीं है। उसे आदि महान् पुरुष कहा गया है॥ ३८—४१॥ |
| अचेतनां सर्वगतां सूक्ष्मां प्रसवधर्मिणीम्।<br>प्रकृतिं सर्वभूतानां युक्ताः पश्यन्ति योगिनः॥ ४२ | उनसे युक्त योगिजन सभी प्राणियोंकी प्रकृतिको अचेतन, सर्वव्यापिनी, सूक्ष्म तथा प्रसवधर्मिणी (सृष्टि-उत्पादनकर्त्री)-के रूपमें देखते हैं॥ ४२॥ |
| सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।<br>सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ ४३ | वह [ब्रह्म] सभी ओर हाथ तथा पैरवाला है। वह सभी ओर नेत्र, सिर तथा मुखवाला है। वह सभी ओर कानवाला है तथा संसारमें सभीको व्याप्त करके स्थित है। |
| युक्तो योगेन चेशानं सर्वतश्च सनातनम्।<br>पुरुषं सर्वभूतानां तं विद्वान्न विमुह्यति॥ ४४ | योगसे युक्त विद्वान् [व्यक्ति] ईशान, सनातन तथा सभी प्राणियोंके परम पुरुष उन ब्रह्मके विषयमें मोहित नहीं होता |
| भूतात्मानं महात्मानं परमात्मानमव्ययम्।<br>सर्वात्मानं परं ब्रह्म तद्वै ध्याता न मुह्यति॥ ४५ | है। जो व्यक्ति सभी प्राणियोंकी आत्मा, महात्मा, परमात्मा, |
| ४५२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| पवनो हि यथाग्राह्यो विचरन् सर्वमूर्तिषु।<br>पुरि शेते सुदुर्ग्राह्यस्तस्मात्पुरुष उच्यते॥ ४६ | अविनाशी तथा सर्वात्मा परब्रह्मका ध्यान करनेवाला है, वह मोहको प्राप्त नहीं होता है॥ ४३-४५॥<br>जिस प्रकार सभी प्राणियोंके भीतर विचरण करता हुआ भी वायु अग्राह्य है, ठीक उसी तरह देहमें स्थित होते हुए भी परमात्मा सुदुर्ग्राह्य है। वह देहरूपी पुरमें शयन करता है, अतः पुरुष कहा जाता है॥ ४६॥ | | अथ चेल्लुप्तधर्मा तु सावशेषैः स्वकर्मभिः।<br>ततस्तु ब्रह्मगर्भे वै शुक्रशोणितसंयुते॥ ४७<br><br>स्त्रीपुंसोः सम्प्रयोगे हि जायते हि ततः प्रभुः।<br>ततस्तु गर्भकालेन कललं नाम जायते॥ ४८<br><br>कालेन कललं चापि बुद्बुदं सम्प्रजायते।<br>मृत्पिण्डस्तु यथा चक्रे चक्रावर्तेन पीडितः॥ ४९<br><br>हस्ताभ्यां क्रियमाणस्तु बिम्बत्वमनुगच्छति।<br>एवमाध्यात्मिकैर्युक्तो वायुना सम्प्रपूरितः॥ ५० | पुण्यफलके भोगके अनन्तर लुप्त धर्मवाला जीव अपने अवशिष्ट कर्मोंके साथ पुनः ब्राह्मणयोनिमें जन्म लेता है। स्त्री-पुरुषके संयोग होनेके अनन्तर शुक्र तथा रक्तके मिलनेपर गर्भकी उत्पत्ति होती है, पुनः वह कललके रूपमें हो जाता है और कुछ समय बाद वह कलल भी बुलबुला बन जाता है। जिस प्रकार मिट्टीका पिण्ड घूमते हुए चाकपर कुम्हारके हाथोंसे आकार प्राप्त करता है, वैसे ही यह जीव पंचमहाभूतोंसे युक्त होकर तथा वायुसे पूरित होकर आकार प्राप्त करता है॥ ४७-५०॥ | | यदि योनिं विमुञ्चामि तत्प्रपद्ये महेश्वरम्।<br>यावद्धि वैष्णवो वायुर्जातमात्रं न संस्पृशेत्॥ ५१<br><br>तावत्कालं महादेवमर्चयामीति चिन्तयेत्।<br>जायते मानुषस्तत्र यथारूपं यथावयः॥ ५२ | गर्भमें जीव सोचता है कि यदि मैं गर्भसे निकलूँगा, तो महेश्वरकी शरणमें जाऊँगा और उत्पन्न होनेपर जबतक वैष्णव वायु अर्थात् माया मेरा स्पर्श नहीं करेगी, तबतक मैं महादेवका अर्चन करूँगा। इस प्रकार जीव अपने रूप तथा वयके अनुसार अर्थात् अपने प्रारब्धके अनुसार मनुष्य बनता है॥ ५१-५२॥ | | वायुः सम्भवते खात्तु वाताद्भवति वै जलम्।<br>जलात्सम्भवति प्राणः प्राणाच्छुक्रं विवर्धते॥ ५३<br><br>रक्तभागास्त्रयस्त्रिंशद्रेतोभागाश्चतुर्दश ।<br>भागतोऽर्धफलं कृत्वा ततो गर्भो निषिच्यते॥ ५४<br><br>ततस्तु गर्भसंयुक्तः पञ्चभिर्वायुभिर्वृतः।<br>पितुः शरीरात्प्रत्यङ्गं रूपमस्योपजायते॥ ५५<br><br>ततोऽस्य मातुराहारात्पीतलीढप्रवेशनात्।<br>नाभिदेशेन वै प्राणास्ते ह्याधारा हि देहिनाम्॥ ५६ | आकाशसे वायु उत्पन्न होता है, वायुसे जल उत्पन्न होता है, जलसे प्राण होता है और प्राणसे शुक्र बढ़ता है। रक्तके तैंतीस भाग तथा शुक्रके चौदह भाग मिश्रित होते हैं; उन दोनोंके भागसे आधे जातीफलके सदृश देह प्राप्त करके गर्भकी वृद्धि होती है। तत्पश्चात् गर्भसे युक्त जीव पाँच वायुओंसे घिर जाता है। पिताके शरीरसे इसके अंग-प्रत्यंग तथा रूपका विकास होता है और माताके आहारसे नाभिदेशसे पीये गये तथा चूसे गये रस आदिके प्रवेशसे जीवका पोषण होता है। वे प्राण (वायु) देहधारियोंके आधार हैं॥ ५३-५६॥ | | नवमासात्परिक्लिष्टः संवेष्टितशिरोधरः।<br>वेष्टितः सर्वगात्रैश्च अपर्याप्तप्रवेशनः॥ ५७ | नौ महीनेतक शिशु बहुत कष्टमें रहता है, उसकी गर्दन नाभिनालसे लिपटी रहती है, उसका सम्पूर्ण शरीर संकुचित रहता है, वह गर्भमें अपर्याप्त (सीमित) |
| अध्याय ८८ ] पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप | ४५३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नवमासोषितश्चापि योनिच्छिद्रादवाङ्मुखः।<br>ततः स्वकर्मभिः पापैर्निरयं सम्प्रपद्यते॥ ५८<br><br>असिपत्रवनं चैव शाल्मलिच्छेदनं तथा।<br>ताडनं भक्षणं चैव पूयशोणितभक्षणम्॥ ५९<br><br>यथा ह्यापस्तु संछिन्नाः संश्लेषमुपयान्ति वै।<br>तथा छिन्नाश्च भिन्नाश्च यातनास्थानमागताः॥ ६०<br><br>एवं जीवास्तु तैः पापैस्तप्यमानाः स्वयंकृतैः।<br>प्राप्नुयुः कर्मभिः शेषैर्दुःखं वा यदि वेतरत्॥ ६१ | स्थानमें पड़ा रहता है। नौ महीनेतक गर्भमें रहनेके बाद वह शिशु नीचेकी ओर मुख किये हुए योनिमार्गसे बाहर निकलता है। इसके पश्चात् अपने पापमय कर्मोंके कारण नरकमें गिरता है; असिपत्रवन तथा शाल्मलिछेदन नामक नरकमें उसका ताड़न तथा भक्षण किया जाता है और उसे पीव तथा रक्तका भक्षण करना पड़ता है। जैसे गर्म किये जानेपर जल श्लेष्मायुक्त (बुलबुलायुक्त) हो जाता है, वैसे ही जीव यातनास्थानको प्राप्त करके छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। इस प्रकार जीव अपने द्वारा किये गये उन पापोंसे तप्त होते हैं; वे अपने अवशिष्ट कर्मोंके अनुसार दुःख या सुख प्राप्त करते हैं॥ ५७-६१॥ |
| एकेनैव तु गन्तव्यं सर्वमुत्सृज्य वै जनम्।<br>एकेनैव तु भोक्तव्यं तस्मात्सुकृतमाचरेत्॥ ६२<br><br>न ह्येनं प्रस्थितं कश्चिद् गच्छन्तमनुगच्छति।<br>यदनेन कृतं कर्म तदेनमनुगच्छति॥ ६३ | सभीलोगोंको छोड़कर जीवको अकेला ही जाना पड़ता है और अकेला ही भोगना पड़ता है; अतः उत्तम आचरण करना चाहिये। [मृत्युके पश्चात्] प्रस्थान करनेवाले इस जीवके पीछे-पीछे कोई भी नहीं जाता है; इस जीवके द्वारा जो कर्म किया गया होता है, वही इसके साथ जाता है॥ ६२-६३॥ |
| ते नित्यं यमविषयेषु सम्प्रवृत्ताः<br>क्रोशन्तः सततमनिष्टसम्प्रयोगैः।<br>शुष्यन्ते परिगतवेदनाशरीरा<br>बह्वीभिः सुभृशमनन्तयातनाभिः॥ ६४ | वे जीव [यमलोकमें] निरन्तर अनिष्ट दण्डोंके द्वारा कराहते हुए नित्य यमविषयोंमें प्रवृत्त रहते हैं; अनेक प्रकारकी बड़ी-बड़ी अनन्त यातनाओंके द्वारा वेदनाओंसे घिरे हुए शरीरवाले वे जीव शोकसन्तप्त रहते हैं॥ ६४॥ |
| कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते।<br>तदभ्यासो हरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत्॥ ६५<br><br>अनादिमान् प्रबन्धः स्यात्पूर्वकर्मणि देहिनः।<br>संसारं तामसं घोरं षड्विधं प्रतिपद्यते॥ ६६<br><br>मानुष्यात्पशुभावश्च पशुभावान्मृगो भवेत्।<br>मृगत्वात्पक्षिभावश्च तस्माच्चैव सरीसृपः॥ ६७<br><br>सरीसृपत्वाद् गच्छेद्वै स्थावरत्वं न संशयः।<br>स्थावरत्वे पुनः प्राप्ते यावदुन्मिषते जनः॥ ६८<br><br>कुलालचक्रवद् भ्रान्तस्तत्रैव परिवर्तते।<br>इत्येवं हि मनुष्यादिः संसारस्थावरान्तिकः॥ ६९ | व्यक्ति मन, वाणी तथा कर्मद्वारा बार-बार जो भी आचरण करता है, वही अभ्यास बनकर इसे उधर ही ले जाता है, अतः [सर्वदा] शुभाचरण करना चाहिये। जीवात्माका पूर्वकर्ममें अनादि दृढ़बन्धन है, उसीसे जीव घोर तामसिक षड्विध संसारको प्राप्त होता है। जीव मनुष्ययोनिसे पशुभावको प्राप्त होता है और पशुभावसे वह मृग होता है, पुनः वह मृगजन्मसे पक्षीका जन्म और पक्षीसे सरीसृप (रेंगनेवाला जन्तु) होता है, इसके बाद वह सरीसृपसे स्थावरत्वको प्राप्त होता है; इसमें सन्देह नहीं है। पुनः स्थावररूप प्राप्त होनेपर जबतक जीव पुनः मनुष्ययोनि नहीं प्राप्त कर |
| ४५४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| विज्ञेयस्तामसो नाम तत्रैव परिवर्तते।<br>सात्त्विकश्चापि संसारो ब्रह्मादिः परिकीर्तितः॥ ७०<br><br>पिशाचान्तः स विज्ञेयः स्वर्गस्थानेषु देहिनाम्।<br>ब्राह्मे तु केवलं सत्त्वं स्थावरे केवलं तमः॥ ७१<br><br>चतुर्दशानां स्थानानां मध्ये विष्टम्भकं रजः।<br>मर्मसु च्छिद्यमानेषु वेदनार्तस्य देहिनः॥ ७२<br><br>ततस्तत्परमं ब्रह्म कथं विप्रः स्मरिष्यति।<br>संसारः पूर्वधर्मस्य भावनाभिः प्रणोदितः॥ ७३<br><br>मानुषं भजते नित्यं तस्माद्ध्यानं समाचरेत्।<br>चतुर्दशविधं ह्येतद् बुद्ध्वा संसारमण्डलम्॥ ७४ | लेता, तबतक कुम्हारके चाककी भाँति वह एक ही स्थानपर चक्कर लगाता रहता है। इस प्रकार मनुष्ययोनिसें प्रारम्भ होकर स्थावरयोनितकके इस संसारको तामस जानना चाहिये। ब्रह्मासे प्रारम्भ करके पिशाचतकके संसारको सात्त्विक कहा गया है; इसे देहधारियोंके लिये स्वर्गस्थानमें जानना चाहिये। ब्राह्म जीवनमें केवल सत्त्व, स्थावरमें केवल तम और चौदह स्थानोंके मध्यमें वेदनासे व्याकुल प्राणीके मर्मस्थानोंका वेधन करनेवाला रज विद्यमान है। ऐसी स्थितिमें विप्र उस परम ब्रह्मको कैसे याद कर सकेगा। पूर्व धर्मकी भावनाओंसे प्रेरित होकर यह संसार सदा मनुष्य-योनिसे युक्त रहता है; अतः ध्यान [अवश्य] करना चाहिये॥ ६५-७३ १/२॥ | | नित्यं समारभेद्वर्मं संसारभयपीडितः।<br>ततस्तरति संसारं क्रमेण परिवर्तितः॥ ७५<br><br>तस्माच्च सततं युक्तो ध्यानतत्परयुञ्जकः।<br>तथा समारभेदद्योगं यथात्मानं स पश्यति॥ ७६ | इस संसारमण्डलको चौदह भुवनस्वरूप जानकर संसारभयसे पीड़ित प्राणीको सदा धर्मका आचरण करना चाहिये; तब वह क्रमसे परिवर्तित होकर इस संसारको पार कर लेता है। अतएव निरन्तर ध्यानमग्न होकर योगीको योगका आचरण करना चाहिये, जिससे वह आत्म-साक्षात्कार कर ले॥ ७४-७६॥ | | एष आपः परं ज्योतिरेष सेतुरनुत्तमः।<br>विवृत्या ह्येष सम्भेदाद्भूतानां चैव शाश्वतः॥ ७७<br><br>तदेनं सेतुमात्मानमग्निं वै विश्वतोमुखम्।<br>हृदिस्थं सर्वभूतानामुपासीत महेश्वरम्॥ ७८<br><br>तथान्तःसंस्थितं देवं स्वशक्त्या परिमण्डितम्।<br>अष्टधा चाष्टधा चैव तथा चाष्टविधेन च॥ ७९<br><br>सृष्ट्यर्थं संस्थितं वह्निं सङ्क्षिप्य च हृदि स्थितम्।<br>ध्यात्वा यथावद्देवेशं रुद्रं भुवननायकम्॥ ८०<br><br>हुत्वा पञ्चाहुतीः सम्यक् तच्चिन्तागतमानसः।<br>वैश्वानरं हृदिस्थं तु यथावदनुपूर्वशः॥ ८१<br><br>आपः पूताः सकृत्प्राश्य तूष्णीं हुत्वा ह्युपाविशन्।<br>प्राणायेति ततस्तस्य प्रथमा ह्याहुतिः स्मृता॥ ८२ | सभी जीवोंमें सम्भेद तथा पार्थक्य होनेपर भी ये [शिव] परम ज्योति (सर्वात्मस्वरूप) हैं, ये ही संसारसागरके जलस्वरूप हैं और ये ही उत्तम तथा शाश्वत सेतु भी हैं। अतः सभी प्राणियोंके हृदयमें स्थित इन आत्मस्वरूप, सेतुस्वरूप तथा सभी ओर मुखवाले अग्निस্বরূপ महेश्वरकी उपासना करनी चाहिये। अपनी शक्तिके साथ अन्तःकरणमें स्थित, [पृथ्वी आदि] आठ प्रकारसे, [भव आदि] आठ रूपोंमें तथा वामदेव आदि आठ विग्रहोंके रूपमें विद्यमान रहनेवाले और सृष्टिके लिये अग्निको संक्षिप्त करके हृदयमें विराजमान देवदेवेश लोकनायक भगवान् रुद्रका ध्यान करके उनके चित्तमें मनको लगाकर हृदयमें स्थित वैश्वानरको भली-भाँति क्रमशः पाँच आहुतियाँ देनी चाहिये। शान्तचित्त होकर बैठ करके एक बार पवित्र जलसे आचमन करके आहुति देनी चाहिये। 'प्राणाय स्वाहा' |
| अध्याय ८८] पाशुपतयोगसे प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धियोंका वर्णन तथा प्राणाग्निहोमका स्वरूप | ४५५ |
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| अपानाय द्वितीया च व्यानायेति तथा परा।<br>उदानाय चतुर्थी स्यात्समानायेति पञ्चमी ॥ ८३<br><br>स्वाहाकारैः पृथग् हुत्वा शेषं भुञ्जीत कामतः।<br>अपः पुनः सकृत्प्राश्य आचम्य हृदयं स्पृशेत् ॥ ८४ | पहली आहुति कही गयी है। दूसरी आहुति 'अपानाय स्वाहा', तीसरी 'व्यानाय स्वाहा', चौथी 'उदानाय स्वाहा' और पाँचवीं आहुति 'समानाय स्वाहा' है। इस प्रकार स्वाहाकारके द्वारा पृथक्-पृथक् आहुति देकर शेषान्नको यथेष्ट ग्रहण करना चाहिये, तत्पश्चात् एक बार जलसे प्राशन तथा पुनः आचमन करके हृदयका स्पर्श करना चाहिये ॥ ८३-८४ ॥ |
| प्राणानां ग्रन्थिरस्यात्मा रुद्रो ह्यात्मा विशान्तकः।<br>रुद्रो वै ह्यात्मनः प्राण एवमाप्याययेत्स्वयम् ॥ ८५<br><br>प्राणे निविष्टो वै रुद्रस्तस्मात्प्राणमयः स्वयम्।<br>प्राणाय चैव रुद्राय जुहोत्यमृतमुत्तमम् ॥ ८६<br><br>शिवाविशेह मामीश स्वाहा ब्रह्मात्मने स्वयम्।<br>एवं पञ्चाहुतीश्चैव श्राद्धे कुर्वीत शासनात् ॥ ८७ | आप रुद्र ही प्राणोंकी ग्रन्थि हैं, रुद्र ही आत्मा हैं, अहंकार-देवतारूप आप ही दुःखका नाश करनेवाले हैं और रुद्र ही जीवके प्राण हैं—इस प्रकार [कहकर] स्वयंको तृप्त करना चाहिये। रुद्र प्राणमें निविष्ट हैं, अतः रुद्र स्वयं प्राणस्वरूप हैं। प्राणको तथा रुद्रको उत्तम अमृत समर्पित करना चाहिये; हे शिव! हे ईश! आप मुझमें प्रवेश करें, साक्षात् ब्रह्मात्माको स्वाहा—इस प्रकार श्राद्धके अवसरपर शास्त्रानुसार पाँच आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये ॥ ८५-८७ ॥ |
| पुरुषोऽसि पुरे शेषे त्वमङ्गुष्ठप्रमाणतः।<br>आश्रितश्चैव चाङ्गुष्ठमीशः परमकारणम् ॥ ८८<br><br>सर्वस्य जगतश्चैव प्रभुः प्रीणातु शाश्वतः।<br>त्वं देवानामसि ज्येष्ठो रुद्रस्त्वं च पुरो वृषा ॥ ८९<br><br>मृदुस्त्वमन्नमस्मभ्यमेतदस्तु हुतं तव।<br>इत्येवं कथितं सर्वं गुणप्राप्तिविशेषतः ॥ ९० | आप पुरुष हैं; आप शरीरमें अँगूठेके परिमाणमें विराजमान हैं। अँगूठेके बराबर होते हुए भी आप ईश्वर परम कारणस्वरूप हैं। सम्पूर्ण जगत्के स्वामी तथा सनातन प्रभु प्रसन्न हों। आप देवताओंमें ज्येष्ठ हैं, आप रुद्र हैं, आप प्रथम इन्द्र थे, आप हमारे लिये कल्याणकारी हों और [हमारे द्वारा] ग्रहण किया गया यह अन्न आपके लिये आहुतिस्वरूप हो ॥ ८८-८९½ ॥ |
| योगाचारः स्वयं तेन ब्रह्मणा कथितः पुरा।<br>एवं पाशुपतं ज्ञानं ज्ञातव्यं च प्रयत्नतः ॥ ९१<br><br>भस्मस्नायी भवेन्नित्यं भस्मलिप्तः सदा भवेत्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान् ॥ ९२<br><br>दैवे कर्मणि पित्र्ये वा स याति परमां गतिम् ॥ ९३ | [हे ऋषियो!] इस प्रकार मैंने विशेषरूपसे अणिमादि-गुणप्राप्ति-सम्बन्धी सबकुछ कह दिया। पूर्वकालमें स्वयं ब्रह्माने इस योगविद्याको कहा था। इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक पाशुपतविद्याका ज्ञान करना चाहिये, नित्य भस्म-स्नान करना चाहिये और सदा भस्म लगाना चाहिये। जो [व्यक्ति] देवपूजन या पितृकर्म (श्राद्ध)-के अवसरपर इसे पढ़ता है या सुनता है या श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह परमगति प्राप्त करता है ॥ ९०-९३ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽणिमाद्यष्टसिद्धिद्विगुणसंसारप्राणाग्नौ होमादिवर्णनं नामाष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अणिमा आदि आठ सिद्धि-त्रिगुणसंसारप्राणाग्निमें होमादिका वर्णन' नामक अट्ठासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८८ ॥
८९- सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन
४५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
नवासीवाँ अध्याय
सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि शौचाचारस्य लक्षणम्।<br>यदनुष्ठाय शुद्धात्मा प्रेत्य गतिमाप्नुयात्॥ १<br>ब्रह्मणा कथितं पूर्वं सर्वभूतहिताय वै।<br>सङ्क्षेपात्सर्ववेदार्थं सञ्चयं ब्रह्मवादिनाम्॥ २<br>उदयार्थं तु शौचानां मुनीनामुत्तमं पदम्।<br>यस्तत्राथाप्रमत्तः स्यात्स मुनिर्नार्वासीदति॥ ३ | [हे ऋषियो!] अब मैं इसके बाद शौचाचारका लक्षण बताऊँगा, जिसे करके शुद्ध अन्तःकरणवाला [व्यक्ति] परलोकमें जाकर [उत्तम] गति प्राप्त करता है। पूर्वकालमें ब्रह्माने सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये इसे कहा था। यह संक्षिप्त रूपमें सभी वेदोंका सार है, ब्रह्मवादियोंकी निधि है, आचरणके उत्थानके लिये उपयोगी है और मुनियोंका उत्तम पद है। जो इसे करनेमें सदा सावधान रहता है, वह मुनि है और वह दुःखित नहीं होता है॥ १–३॥ |
| मानावमानौ द्वावेतौ तावेवाहुर्विषामृते।<br>अवमानोऽमृतं तत्र सन्मानो विषमुच्यते॥ ४<br>गुरोरपि हिते युक्तः स तु संवत्सरं वसेत्।<br>नियमेष्वप्रमत्तस्तु यमेषु च सदा भवेत्॥ ५<br>प्राप्यानुज्ञां ततश्चैव ज्ञानयोगमनुत्तमम्।<br>अविरोधेन धर्मस्य चरेत पृथिवीमिमाम्॥ ६ | मान तथा अपमान—ये विष तथा अमृत कहे गये हैं। उनमें अपमान अमृत तथा सम्मान विष कहा जाता है। शिष्यको चाहिये कि गुरुके हितमें संलग्न रहकर एक वर्षतक उनके पास निवास करे, नियमों तथा यमोंमें सदा सावधान रहे और उनसे उत्तम ज्ञानयोग ग्रहण करके पुनः आज्ञा लेकर धर्मका विरोध न करते हुए इस पृथ्वीपर विचरण करे॥ ४–६॥ |
| चक्षुःपूतं चरेन्मार्गं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।<br>सत्यपूतं वदेद्वाक्यं मनःपूतं समाचरेत्॥ ७<br>मत्स्यगृह्यस्य यत्पापं षण्मासाभ्यन्तरे भवेत्।<br>एकाहं तत्समं ज्ञेयमपूतं यज्जलं भवेत्॥ ८<br>अपूतोदकपाने तु जपेच्च शतपञ्चकम्।<br>अघोरलक्षणं मन्त्रं ततः शुद्धिमवाप्नुयात्॥ ९<br>अथवा पूजयेच्छम्भुं घृतस्नानादिविस्तरैः।<br>त्रिधा प्रदक्षिणीकृत्य शुद्ध्यते नात्र संशयः॥ १० | भलीभाँति नेत्रसे देखकर मार्गपर चलना चाहिये, वस्त्रसे पवित्र किये गये अर्थात् छाने हुए जलको पीना चाहिये, सत्यसे पवित्र वचन बोलना चाहिये और मनसे पवित्र प्रतीत होनेवाले आचरणको करना चाहिये। मत्स्य ग्रहण करनेवालेको छः महीनोंमें जो पाप लगता है, उसे एक दिन अपवित्र जलके पानसे होनेवाले पापके बराबर जानना चाहिये। अपवित्र जलका पान कर लेनेपर पाँच सौ बार अघोर मन्त्रका जप करना चाहिये; उससे व्यक्ति शुद्धि प्राप्त कर लेता है; अथवा घृतस्नान आदि विस्तृत उपचारोंसे शिवकी पूजा करनी चाहिये, इसके बाद उनकी तीन बार प्रदक्षिणा करके वह शुद्ध हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ७–१०॥ |
| आतिथ्यश्राद्धयज्ञेषु न गच्छेदद्योगवित्क्वचित्।<br>एवं ह्यहिंसको योगी भवेदिति विचारितम्॥ ११<br>वह्नौ विधूमेऽत्यङ्गारे सर्वस्मिन् भुक्तवज्जने।<br>चरेत्तु मतिमान् भैक्ष्यं न तु तेष्वेव नित्यशः॥ १२ | योगवेत्ताको आतिथ्य, श्राद्ध तथा [सोम आदि] यज्ञमें कहीं नहीं जाना चाहिये; इस प्रकार योगी अहिंसक हो सकता है—यह भलीभाँति निर्णीत बात है। बुद्धिमान्को चाहिये कि अग्निके धूमरहित तथा |
अध्याय ८९ ] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथैनमवमन्यन्ते परे परिभवन्ति च।<br>तथा युक्तं चरेद्भैक्ष्यं सतां धर्ममदूषयन् ॥ १३ | अंगाररहित हो जानेपर अर्थात् अग्निके शीतल हो जानेपर और सभीलोगोंके भोजन कर चुकनेपर [उस घरमें] भिक्षा प्राप्त करे एवं उन घरोंमें प्रतिदिन भिक्षा ग्रहण न करे, अन्यथा दूसरे लोग अपमान करेंगे तथा निन्दा करेंगे। अतः सज्जनोंके धर्मको दूषित न करते हुए उचित भिक्षा प्राप्त करनी चाहिये॥ ११-१३॥ |
| भैक्ष्यं चरेद्वनस्थेषु यायावरगृहेषु च।<br>श्रेष्ठा तु प्रथमा हीयं वृत्तिरस्योपजायते ॥ १४<br><br>अत ऊर्ध्वं गृहस्थेषु शीलीनेषु चरेद् द्विजाः।<br>श्रद्दधानेषु दान्तेषु श्रोत्रियेषु महात्मसु ॥ १५<br><br>अत ऊर्ध्वं पुनश्चापि अदुष्टापतितेषु च।<br>भैक्ष्यचर्या हि वर्णेषु जघन्या वृत्तिरुच्यते ॥ १६ | वनमें रहनेवालोंके यहाँ तथा यायावरोंके घरोंमें भिक्षा माँगनी चाहिये। यह योगीकी सर्वश्रेष्ठ वृत्ति होती है। हे ब्राह्मणो! इसके बाद श्रेष्ठ आचारवाले, दानशील, श्रद्धालु, श्रोत्रिय तथा महात्मा गृहस्थोंके यहाँ भिक्षा प्राप्त करनी चाहिये। इसके बाद दुष्टतारहित तथा अपतित लोगोंके यहाँ भी भिक्षा ग्रहण करे, किंतु सभी वर्णोंके यहाँ भिक्षा माँगना जघन्य वृत्ति कही जाती है॥ १४-१६॥ |
| भैक्ष्यं यवागूस्तक्रं वा पयो यावकमेव च।<br>फलमूलादि पक्वं वा कणपिण्याकसक्तवः ॥ १७<br><br>इत्येते वै मया प्रोक्ता योगिनां सिद्धिवर्धनाः।<br>आहारास्तेषु सिद्धेषु श्रेष्ठं भैक्ष्यमिति स्मृतम् ॥ १८ | यवागू, मट्ठा, दूध, यावक (जौसे बना भोजन), पके हुए फल-मूल, टूटे हुए अनाज, तिल और सत्तू भिक्षामें ग्रहण करना चाहिये। [हे ऋषियो!] मैंने योगियोंकी सिद्धिकी वृद्धि करनेवाले उन आहारोंको बता दिया; उनके प्राप्त हो जानेपर इसे श्रेष्ठ भिक्षा कहा गया है॥ १७-१८॥ |
| अब्बिन्दुं यः कुशाग्रेण मासि मासि समश्नुते।<br>न्यायतो यश्चरेद्भैक्ष्यं पूर्वोक्तात्स विशिष्यते ॥ १९<br><br>जरामरणगर्भेभ्यो भीतस्य नरकादिषु।<br>एवं दाययते तस्मात्तद्भैक्ष्यमिति संस्मृतम् ॥ २० | जो [व्यक्ति] प्रत्येक महीनेमें कुशाके अग्र भागसे जलबिन्दु ग्रहण करता है और न्यायपूर्वक भिक्षाटन करता है; वह पूर्वमें कहे गये [भिक्षार्थी]-से श्रेष्ठ होता है। वृद्धावस्था, मृत्यु, गर्भवास तथा नरक आदिसे भयभीत संन्यासीकी भिक्षा दायभागके समान है, इसीलिये इसे भैक्ष्य कहा जाता है॥ १९-२०॥ |
| दधिभक्षाः पयोभक्षा ये चान्ये जीवक्षीणाकाः।<br>सर्वे ते भैक्ष्यभक्षस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २१<br><br>भस्मशायी भवेन्नित्यं भिक्षाचारी जितेन्द्रियः।<br>य इच्छेत्परमं स्थानं व्रतं पाशुपतं चरेत् ॥ २२ | जो दही तथा दूधका सेवन करनेवाले हैं और जो अन्य लोग [कृच्छ्र आदि व्रतोंके द्वारा] शरीरको क्षीण करनेवाले हैं; वे सब भिक्षावृत्तिवालेकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। जो परम पद चाहता है, उसे नित्य भस्ममें शयन करना चाहिये, भिक्षाटन करना चाहिये, इन्द्रियोंको वशमें रखना चाहिये और पाशुपतव्रत करना चाहिये॥ २१-२२॥ |
| योगिनां चैव सर्वेषां श्रेष्ठं चान्द्रायणं भवेत्।<br>एकं द्वे त्रीणि चत्वारि शक्तितो वा समाचरेत् ॥ २३ | चान्द्रायणव्रत सभी योगियोंके लिये उत्तम होता है। [अपनी] शक्तिके अनुसार इसे एक, दो, तीन |
४५८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अस्तेयं ब्रह्मचर्यं च अलोभस्त्याग एव च।<br>व्रतानि पञ्च भिक्षूणामहिंसा परमा त्विह॥ २४<br><br>अक्रोधो गुरुशुश्रूषा शौचमाहारलाघवम्।<br>नित्यं स्वाध्याय इत्येते नियमाः परिकीर्तिताः॥ २५ | अथवा चार बार करना चाहिये। भिक्षुओंके लिये ये पाँच व्रत हैं—अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अलोभ, त्याग और परम अहिंसा। क्रोध न करना, गुरुकी सेवा, शुद्धता, आहारकी अल्पता और प्रतिदिन स्वाध्याय—ये नियम बताये गये हैं॥ २३–२५॥ |
| बीजयोनिगुणा वस्तुबन्धः कर्मभिरेव च।<br>यथा द्विप इवारण्ये मनुष्याणां विधीयते॥ २६ | माता-पितासे प्राप्त संस्कार, अपने स्वभाव, धन आदि तथा संचितकर्म—इन सबसे देवताओंके द्वारा मनुष्य वनमें दुर्ग्रह हाथीकी भाँति बन्धनग्रस्त हो जाता है॥ २६॥ |
| देवैस्तुल्याः सर्वयज्ञक्रियास्तु<br>यज्ञाज्जाप्यं ज्ञानमाहुश्च जाप्यात।<br>ज्ञानाद्ध्यानं सङ्गरागादपेतं<br>तस्मिन् प्राप्ते शाश्वतस्योपलम्भः॥ २७ | सभी यज्ञ-क्रियाएँ देवतुल्य (स्वर्ग प्राप्त करानेवाली) हैं। यज्ञसे श्रेष्ठ जपको तथा जपसे श्रेष्ठ ज्ञानको बताया गया है; किंतु आसक्ति तथा रागसे रहित ध्यान ज्ञानसे भी श्रेष्ठ है; उसके प्राप्त हो जानेसे शाश्वत पदकी प्राप्ति हो जाती है॥ २७॥ |
| दमः शमः सत्यमकल्मषत्वं<br>मौनं च भूतेष्वखिलेषु चार्जवम्।<br>अतीन्द्रियं ज्ञानमिदं तथा शिवं<br>प्राहुस्तथा ज्ञानविशुद्धबुद्धयः॥ २८ | ज्ञानसे विशुद्ध बुद्धिवाले लोगोंने इन्द्रियोंके दमन, मनपर नियन्त्रण, सत्य, पापहीनता, मौन, समस्त प्राणियोंके प्रति सरलता और अतीन्द्रिय ज्ञानको शिवस्वरूप बताया है॥ २८॥ |
| समाहितो ब्रह्मपरोऽप्रमादी<br>शुचिस्तथैकान्तरतिर्जितेन्द्रियः।<br>समाप्नुयाद्योगमिमं महात्मा<br>महर्षयश्चैवमनिन्दितामलाः॥ २९ | एकाग्रचित्तवाला, ब्रह्मपरायण, प्रमादरहित, शुद्ध, एकान्तका सेवन करनेवाला तथा जितेन्द्रिय महात्मा ही इस [पाशुपत] योगको प्राप्त कर सकता है—ऐसा निष्कलंक तथा निष्पाप महर्षिगण कहते हैं॥ २९॥ |
| प्राप्यतेऽभिमतान् देशानङ्कुशेन निवारितः।<br>एतन्मार्गेण शुद्धेन दग्धबीजो ह्यकल्मषः॥ ३० | इस शुद्ध योगमार्गरूपी अंकुशसे नियन्त्रित व्यक्ति दग्धबीजवाला तथा पापरहित होकर अभीष्ट फलोंको प्राप्त करता है॥ ३०॥ |
| सदाचाररताः शान्ताः स्वधर्मपरिपालकाः।<br>सर्वान् लोकान् विनिर्जित्य ब्रह्मलोकं व्रजन्ति ते॥ ३१ | जो सदाचारपरायण, शान्त (अन्तःकरणकी वृत्तियोंको निगृहीत कर लेनेवाले) तथा अपने धर्मका पालन करनेवाले हैं, वे सभी लोकोंको जीतकर ब्रह्मलोक चले जाते हैं॥ ३१॥ |
| पितामहेनोपदिष्टो धर्मः साक्षात्सनातनः।<br>सर्वलोकोपकारार्थं शृणुध्वं प्रवदामि वः॥ ३२ | साक्षात् पितामहने सभी लोकोंके उपकारके लिये सनातनधर्मका उपदेश किया था; मैं आपलोगोंको बता रहा हूँ, उसे सुनिये॥ ३२॥ |
| गुरूपदेशयुक्तानां वृद्धानां क्रमवर्तिनाम्।<br>अभ्युत्थानादिकं सर्वं प्रणामं चैव कारयेत्॥ ३३ | गुरुके उपदेशसे युक्त तथा नियमोंका पालन करनेवाले वृद्धजनोंका स्वागत आदि तथा प्रणाम—यह सब करना चाहिये। हे सुव्रतो! तीन बार प्रदक्षिणा करके |
| अष्टाङ्गप्रणिपातेन त्रिधा न्यस्तेन सुव्रताः।<br>त्रिःप्रदक्षिणयोगेन वन्द्यो वै ब्राह्मणो गुरुः॥ ३४ |
अध्याय ८९ ] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ज्येष्ठान्येऽपि च ते सर्वे वन्दनीया विजानता।<br>आज्ञाभङ्गं न कुर्वीत यदीच्छेत्सिद्धिमुत्तमाम्॥ ३५ | आठों अंगोंको पृथ्वीसे स्पर्श करके तीन बार ब्राह्मण गुरुको प्रणाम करना चाहिये। बुद्धिमन्को चाहिये कि जो अन्य ज्येष्ठ लोग हैं, उन सबको प्रणाम करे। यदि कोई उत्तम सिद्धिकी कामना करता है, तो उनकी आज्ञाका उल्लंघन न करे॥ ३३—३५॥ |
| धातुशून्यबिलक्षेत्रक्षुद्रमन्त्रोपजीवनम् ।<br>विषग्रहविडम्बादीन् वर्जयेत्सर्वयत्नतः॥ ३६<br><br>कैतवं वित्तशाठ्यं च पैशुन्यं वर्जयेत्सदा।<br>अतिहासमवष्टम्भं लीलास्वेच्छाप्रवर्तनम्॥ ३७<br><br>वर्जयेत्सर्वयत्नेन गुरूणामपि सन्निधौ।<br>तद्वाक्यप्रतिकूलं च अयुक्तं वै गुरोर्वचः॥ ३८<br><br>न वदेत्सर्वयत्नेन अनिष्टं न स्मरेत्सदा। | धातुवाद, नास्तिकवाद, ऊसर स्थानमें निवास, क्षुद्र-मन्त्रोंका उपयोग, सर्पोंको पकड़ना आदि निन्दनीय कार्योंका पूर्ण प्रयत्नसे परित्याग करना चाहिये। धूर्तता, धनकी कृपणता तथा पिशुनता (परनिन्दा)-का सदा त्याग करना चाहिये। गुरुजनोंके सान्निध्यमें अत्यधिक हँसना, अशिष्टता तथा मनमाना कार्य करना—इन सबका पूर्ण प्रयत्नसे परित्याग करना चाहिये। गुरुकी आज्ञाके प्रतिकूल आचरण नहीं करना चाहिये और पूर्ण प्रयत्नपूर्वक कभी भी उनका अनिष्ट (बुरा) नहीं सोचना चाहिये॥ ३६—३८ १/२॥ |
| यतीनामासनं वस्त्रं दण्डाद्यं पादुके तथा॥ ३९<br><br>माल्यं च शयनस्थानं पात्रं छायां च यत्नतः।<br>यज्ञोपकरणाङ्गं च न स्पृशेद्वै पदेन च॥ ४०<br><br>देवद्रोहं गुरुद्रोहं न कुर्यात्सर्वयत्नतः।<br>कृत्वा प्रमादतो विप्राः प्रणवस्यायुतं जपेत्॥ ४१<br><br>देवद्रोहेगुरुद्रोहात्कोटिमात्रेण शुध्यति।<br>महापातकशुद्ध्यर्थं तथैव च यथाविधि॥ ४२<br><br>पातकी च तदर्धेन शुध्यते वृत्तवान् यदि।<br>उपपातकिनः सर्वे तदर्धेनैव सुव्रताः॥ ४३ | यतियों (संन्यासियों)-के आसन, वस्त्र, दण्ड, खड़ाऊँ, माला, शयनस्थान, पात्र, छाया तथा यज्ञके उपकरणोंको पैरसे कभी नहीं छूना चाहिये। हे विप्रो! देवताओं तथा गुरुजनोंसे द्रोह न हो, इसका पूर्ण प्रयास करना चाहिये; प्रमादवश द्रोह कर लेनेपर प्रणवका दस हजार जप करना चाहिये। [जानबूझकर] गुरुद्रोह तथा देवद्रोह करनेपर एक करोड़ जपके द्वारा [व्यक्ति] शुद्ध होता है। महापातकोंसे शुद्धिके लिये भी वही विधि है, जो इसके लिये है। पातकी यदि चरित्रवान् है, तो वह उसके आधे जपसे शुद्ध हो जाता है। हे सुव्रतो! सभी उपपातकी उसके भी आधे जपसे शुद्ध हो जाते हैं॥ ३९—४३॥ |
| सन्ध्यालोपे कृते विप्रः त्रिरावृत्त्यैव शुद्ध्यति।<br>आह्निकच्छेदने जाते शतमेकमुदाहृतम्॥ ४४ | सन्ध्यावन्दनका लोप करनेपर विप्र इसकी तीन आवृत्ति करके शुद्ध हो जाता है और दैनिक कृत्यका उल्लंघन होनेपर एक सौ बार जप करना बताया गया है॥ ४४॥ |
| लङ्घने समयानां तु अभक्ष्यस्य च भक्षणे।<br>अवाच्यवाचने चैव सहस्राच्छुद्धिरुच्यते॥ ४५ | [नियत] समयका उल्लंघन करनेपर, अभक्ष्य [पदार्थ]-का भक्षण करनेपर और न बोलनेयोग्य वचन बोलनेपर एक हजार जपसे शुद्धि कही जाती है॥ ४५॥ |
| काकोलूककपोतानां पक्षिणामपि घातने।<br>शतमष्टोत्तरं जप्त्वा मुच्यते नात्र संशयः॥ ४६ | कौआ, उल्लू तथा कबूतर पक्षियोंका वध करनेपर |
| ४६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| यः पुनस्तत्त्ववेत्ता च ब्रह्मविद् ब्राह्मणोत्तमः ।<br>स्मरणाच्छुद्धिमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ४७<br><br>नैवमात्मविदामस्ति प्रायश्चित्तानि चोदना ।<br>विश्वस्यैव हि ते शुद्धा ब्रह्मविद्याविदो जनाः ॥ ४८<br><br>योगध्यानैकनिष्ठाश्च निर्लेपाः काञ्चनं यथा ।<br>शुद्धानां शोधनं नास्ति विशुद्धा ब्रह्मविद्यया ॥ ४९<br><br>उद्धृतानुष्णफेनाभिः पूताभिर्वस्त्रचक्षुषा ।<br>अद्भिः समाचरेत्सर्वं वर्जयेत्कलुषोदकम् ॥ ५०<br><br>गन्धवर्णरसैर्दुष्टमशुचिस्थानसंस्थितम् ।<br>पङ्काश्मदूषितं चैव सामुद्रं पल्वलोदकम् ॥ ५१<br><br>सशैवालं तथान्यैर्वा दोषैर्दुष्टं विवर्जयेत् ।<br>वस्त्रशौचान्वितः कुर्यात्सर्वकार्याणि वै द्विजाः ॥ ५२<br><br>नमस्कारादिकं सर्वं गुरुशुश्रूषणादिकम् ।<br>वस्त्रशौचविहीनात्मा ह्यशुचिर्नात्र संशयः ॥ ५३<br><br>देवकार्योपयुक्तानां प्रत्यहं शौचमिष्यते ।<br>इतरेषां हि वस्त्राणां शौचं कार्यं मलागमे ॥ ५४<br><br>वर्जयेत्सर्वयत्नेन वासोऽन्यैर्विधृतं द्विजाः ।<br>कौशेयाविकयो रूक्षैः क्षौमाणां गौरसर्षपैः ॥ ५५<br><br>श्रीफलैरंशुप्ट्टानां कुतपानामरिष्टकैः ।<br>चर्मणां विदलानां च वेत्राणां वस्त्रवन्मतम् ॥ ५६<br><br>वल्कलानां तु सर्वेषां छत्रचामरयोरपि ।<br>चैलवच्छौचमाख्यातं ब्रह्मविद्भिर्मुनीश्वरैः ॥ ५७<br><br>भस्मना शुद्ध्यते कांस्यं क्षारेणायसमुच्यते ।<br>ताम्रमम्लेन वै विप्रास्त्रपुसीसकयोरपि ॥ ५८ | एक सौ आठ बार जप करनेसे [पापसे] मुक्ति हो जाती है; इसमें सन्देह नहीं है। जो तत्त्वज्ञानी, ब्रह्मवेत्ता तथा उत्तम ब्राह्मण है, वह तो केवल [प्रणवके] स्मरणसे शुद्धि प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ४६-४७ ॥<br><br>आत्मज्ञानियोंके लिये प्रायश्चित्त होते ही नहीं हैं; ब्रह्मविद्याको जाननेवाले लोग विश्वके कल्याणके प्रेरक होते हैं, अतः वे [स्वतः] शुद्ध हैं। योगध्यानमें एकनिष्ठ वे लोग निर्लेप (शुद्ध) होते हैं, जैसे सुवर्ण शुद्ध होता है। शुद्ध लोगोंका शोधन नहीं होता है; वे तो ब्रह्मविद्याके द्वारा [पहले ही] शुद्ध होते हैं ॥ ४८-४९ ॥<br><br>नदी आदिसे ग्रहण किये गये, वस्त्र तथा नेत्रसे [भलीभाँति] पवित्र, शीतल तथा फेनरहित जलसे सभी अनुष्ठान करना चाहिये; अशुद्ध जलका प्रयोग नहीं करना चाहिये। गन्ध-रंग-रससे दूषित जल, अपवित्र स्थानमें रखे हुए जल, कीचड़ तथा कंकड़से दूषित जल, समुद्री जल, तालाबके जल, शैवालयुक्त जल और अन्य दोषोंसे विकृत जलका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये ॥ ५०-५१ १/२ ॥<br><br>हे द्विजो! वस्त्रकी शुद्धिसे युक्त होकर नमस्कार आदि तथा गुरुसेवा आदि समस्त कार्य करने चाहिये; वस्त्रशुद्धिसे रहित व्यक्ति निश्चित रूपसे अपवित्र रहता है; इसमें सन्देह नहीं है। देवकार्यमें उपयोग किये जानेवाले वस्त्रोंकी शुद्धि प्रतिदिन आवश्यक है; मैले हो जानेपर अन्य वस्त्रोंकी शुद्धि करनी चाहिये। हे द्विजो! दूसरोंके द्वारा धारण किये गये वस्त्रका पूर्ण प्रयत्नसे त्याग करना चाहिये ॥ ५२-५४ १/२ ॥<br><br>रेशमी तथा ऊनी वस्त्रोंकी शुद्धि [रीठे आदि] रूक्ष पदार्थोंसे, क्षौम (दुकूल) वस्त्रोंकी शुद्धि श्वेत सरसोंसे, स्वर्णकिरणयुक्त वस्त्रोंकी शुद्धि बिल्व फलोंसे, कुशास्तरणों या छाग-कम्बलोंकी शुद्धि मट्ठेके सेचनसे और चमड़े-शणवस्त्रों-बेंतसे बनी वस्तुओंकी शुद्धि सामान्य वस्त्रोंकी भाँति कही गयी है। ब्रह्मवेत्ता मुनीश्वरोंने समस्त वल्कल वस्त्रोंकी तथा छत्र-चामरकी शुद्धि वस्त्रशुद्धिकी भाँति बतायी है। हे विप्रो! कांस्यपात्रकी |
अध्याय ८९] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हैममद्भिः शुभं पात्रं रौप्यपात्रं द्विजोत्तमाः।<br>मण्यश्मशङ्खमुक्तानां शौचं तैजसवत्स्मृतम्॥ ५९<br><br>अग्नेरपां च संयोगादत्यन्तोपहतस्य च।<br>रसानामिह सर्वेषां शुद्धिरुत्प्लवनं स्मृतम्॥ ६० | शुद्धि भस्मसे होती है, लौहपात्रकी शुद्धि क्षारसे, ताँबा-राँगा-सीसेके पात्रकी शुद्धि अम्लसे कही जाती है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! सोने तथा चाँदीके पवित्र पात्र जलसे शुद्ध होते हैं; मणि, पत्थर, शंख तथा मोतीकी शुद्धि भी सुवर्णपात्रकी भाँति कही गयी है। अत्यधिक दूषित पदार्थकी शुद्धि अग्नि तथा जलके संयोगसे होती है। सभी रसोंकी शुद्धि उत्प्लवन-क्रियाद्वारा बतायी गयी है॥ ५५-६०॥ |
| तृणकाष्ठादिवस्तूनां शुभेनाभ्युक्षणं स्मृतम्।<br>उष्णेन वारिणा शुद्धिस्तथा स्रुक्स्रुवयोरपि॥ ६१<br><br>तथैव यज्ञपात्राणां मुशलोलूखलस्य च।<br>शृङ्गास्थिदारुदन्तानां तक्षणेनैव शोधनम्॥ ६२<br><br>संहतानां महाभागा द्रव्याणां प्रोक्षणं स्मृतम्।<br>असंहतानां द्रव्याणां प्रत्येकं शौचमुच्यते॥ ६३ | तृण, काष्ठ आदि वस्तुओंकी शुद्धिहेतु पवित्र जलसे अभ्युक्षण (छिड़काव) बताया गया है और स्रुक्-स्रुवाकी शुद्धि उष्ण जलसे होती है। उसी प्रकार यज्ञपात्रों, मूसल, उलूखल (ओखली), सींग-अस्थि-काष्ठ तथा हाथीदाँतकी बनी वस्तुओंकी शुद्धि तक्षण (छीलने)-से होती है। हे महाभागो! संहत (मिली-जुली) वस्तुओंकी शुद्धिहेतु प्रोक्षण बताया गया है और असंहत (पृथक्) वस्तुओंको अलग-अलग शुद्ध करना बताया गया है॥ ६१-६३॥ |
| अभुक्तराशिधान्यानामेकदेशस्य दूषणे।<br>तावन्मात्रं समुद्धृत्य प्रोक्षयेद्वै कुशाम्भसा॥ ६४<br><br>शाकमूलफलादीनां धान्यवच्छुद्धिरिष्यते।<br>मार्जनोन्मार्जनैर्वेश्म पुनःपाकेन मृन्मयम्॥ ६५<br><br>उल्लेखनेनाञ्जनेन तथा सम्मार्जनेन च।<br>गोनिवासेन वै शुद्धा सेचनेन धरा स्मृता॥ ६६<br><br>भूमिस्थमुदकं शुद्धं वैतृष्ण्यं यत्र गौर्व्रजेत्।<br>अव्याप्तं यदमेध्येन गन्धवर्णरसान्वितम्॥ ६७<br><br>वत्सः शुचिः प्रस्त्रवणे शकुनिः फलपातने।<br>स्वदारास्यं गृहस्थानां रतौ भार्याभिकाङ्क्षया॥ ६८<br><br>हस्ताभ्यां क्षालितं वस्त्रं कारुणा च यथाविधि।<br>कुशाम्बुना सुसम्प्रोक्ष्य गृह्णीयाद्धर्मवित्तमः॥ ६९ | भोजनहेतु अनाजकी राशिके एक भागके दूषित हो जानेपर उतने भागको निकालकर शेष भागका कुशके जलसे प्रोक्षण करना चाहिये। शाक, मूल, फल आदिकी शुद्धि धान्य (अनाज)-की शुद्धिकी भाँति कही जाती है। घरकी शुद्धि मार्जन (जलसेचन) तथा गोबरसे लीपनेसे होती है। मिट्टीका पात्र अग्निमें गर्म करनेसे शुद्ध होता है। भूमिकी शुद्धि खनन (खोदने)-से, गायके गोबरसे लीपनेसे, मलापकरणसे, गायके निवाससे तथा जलके द्वारा सेचनसे बतायी गयी है। भूमिपर ठहरा हुआ जल जो अपवित्र पदार्थसे युक्त न हो तथा गन्ध, वर्ण, रससे युक्त हो, वह गायके द्वारा प्यास बुझनेतक पी लिये जानेपर शुद्ध हो जाता है। बछड़ा गोदोहनके समय शुद्ध होता है और पक्षी [चोंचद्वारा] फल गिरानेके समय शुद्ध होता है। भार्याकी आकांक्षासे रतिके समय गृहस्थोंके लिये पत्नी शुद्ध होती है। धर्मवेत्ताको चाहिये कि धोबीके द्वारा हाथसे धोये गये वस्त्रको विधिपूर्वक कुशके जलसे प्रोक्षित करके धारण करे॥ ६४-६९॥ |
४६२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| श्लोक | अर्थ |
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| पण्यं प्रसारितं चैव वर्णाश्रमविभागशः।<br>शुचिराकरजं तेषां श्वा मृगग्रहणे शुचिः ॥ ७० | खानसे निकालकर विक्रयहेतु फैलायी गयी वस्तुओंमें वर्णाश्रमविभागके अनुसार शुद्धता होती है और [मृगयामें] हरिण आदि पशुओंको पकड़ते समय श्वान शुद्ध होता है॥ ७० ॥ |
| छाया च विप्लुषो विप्रा मक्षिकाद्या द्विजोत्तमाः।<br>रजोभूर्वायुरग्निश्च मेध्यानि स्पर्शने सदा ॥ ७१ | हे द्विजश्रेष्ठो! अनिषिद्ध छाया, वेदपाठके समय मुखसे निकली बूँदें, विप्र, मक्खियाँ, धूल, भूमि, वायु, अग्नि—ये सब स्पर्शके लिये सदा शुद्ध होते हैं। हे विप्रो! सोकर उठनेपर, भोजनके अनन्तर, छींक आनेपर, जल आदि पीनेपर, थूकनेपर और अध्ययनके आदिमें पवित्र होते हुए भी फिरसे आचमन करना चाहिये। अन्य लोगोंके द्वारा किये गये आचमनकी जो बूँदें पैरोंपर पड़ जायें, उन्हें धूलके समान समझना चाहिये; उनसे कोई अशुद्ध नहीं होता है॥ ७१—७३॥ |
| सुप्त्वा भुक्त्वा च वै विप्राः क्षुत्त्वा पीत्वा च वै तथा।<br>ष्ठीवित्वाध्ययनादौ च शुचिरप्याचमेत्पुनः ॥ ७२ | |
| पादौ स्पृशन्ति ये चापि पराचमनबिन्दवः।<br>ते पार्थिवैः समा ज्ञेया न तैरप्रयतो भवेत् ॥ ७३ | |
| कृत्वा च मैथुनं स्पृष्ट्वा पतितं कुक्कुटादिकम्।<br>सूकरं चैव काकादि श्वानमुष्ट्रं खरं तथा ॥ ७४ | मैथुनके अनन्तर, पतितका स्पर्श करके, मुर्गा-सूअर-कौवा-कुत्ता-ऊँट-गधा-यूप, चाण्डाल आदिका स्पर्श करके व्यक्ति स्नानके द्वारा शुद्ध होता है। रजस्वला, प्रसूता तथा शूद्रा स्त्रीका स्पर्श नहीं करना चाहिये। जननाशौच तथा मरणाशौचसे युक्त व्यक्तिको चाहिये कि अपने सम्बन्धियोंकी स्त्रियोंमें रजस्वला स्त्रीको न छुए और छू लेनेपर वह स्नान करके ही शुद्ध होता है॥ ७४—७६॥ |
| यूपं चाण्डालकाद्यांश्च स्पृष्ट्वा स्नानेन शुध्यति।<br>रजस्वलां सूतिकां च न स्पृशेदन्त्यजामपि ॥ ७५ | |
| सूतिकाशौचसंयुक्तः शावाशौचसमन्वितः।<br>संस्पृशेन रजस्तासां स्पृष्ट्वा स्नात्वैव शुध्यति ॥ ७६ | |
| नैवाशौचं यतीनां च वनस्थब्रह्मचारिणाम्।<br>नैष्ठिकानां नृपाणां च मण्डलीनां च सुव्रताः ॥ ७७ | हे सुव्रतो! संन्यासियों, वानप्रस्थियों, नैष्ठिक ब्रह्मचारियों, राजाओं तथा [उनके] मन्त्रियोंको अशौच नहीं लगता है। कार्यमें अवरोध न हो, इसलिये राजाओंको, भ्रमणशील संन्यासियों और ब्राह्मणोंको तथा पतितजनोंके लिये सम्भव न होनेके कारण अशौच नहीं होता है। कुछ भी संचय न करनेवाले ब्राह्मणों, यज्ञके लिये दीक्षित यजमान तथा जिन्हें अशौचकालमें उसकी जानकारी न हुई हो—ऐसे लोगोंकी स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है। |
| ततः कार्यविरोधाद्धि नृपाणां नान्यथा भवेत्।<br>वैखानसानां विप्राणां पतितानामसम्भवात् ॥ ७८ | |
| असञ्चयद्विजानां च स्नानमात्रेण नान्यथा।<br>तथासन्निहितानां च यज्ञार्थं दीक्षितस्य च ॥ ७९ | |
| एकाहाद्यज्ञयाजीनां शुद्धिरुक्ता स्वयम्भुवा।<br>ततस्त्वधीतशाखानां चतुर्भिः सर्वदेहिनाम् ॥ ८० | यज्ञमें दीक्षित ऋत्विजों तथा उनकी वैदिक शाखाका अध्ययन करनेवालोंका अशौच ब्रह्माजीने एक दिनका बताया है। अपने गोत्रसे भिन्न जनोंकी शुद्धि चार दिनोंमें हो जाती है; क्योंकि उनके लिये जननाशौच तथा मरणाशौच तीन दिनोंसे अधिक नहीं होता है। |
| सूतकं प्रेतकं नास्ति त्र्यहादूर्ध्वममुत्र वै।<br>अर्वागेकादशाहान्तं बान्धवानां द्विजोत्तमाः ॥ ८१ | [परिवारमें] मृत्यु हो जानेपर बान्धवोंकी दस दिनोंमें शुद्धि हो जाती |
अध्याय ८९] सदाचार तथा शौचाचारका निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्मविवेचन ४६३
| श्लोक | अर्थ |
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| स्नानमात्रेण वै शुद्धिर्मरणे समुपस्थिते।<br>तत ऋतुत्रयादर्वागेकाहः परगीयते॥ ८२ | है। जन्मके दस दिनके बाद छः मासके भीतर बालककी मृत्यु होनेपर एक दिनका अशौच होता है। |
| सप्तवर्षात्ततश्चार्वाक् त्रिरात्रं हि ततः परम्।<br>दशाहं ब्राह्मणानां वै प्रथमेऽहनि वा पितुः॥ ८३ | तत्पश्चात् सात वर्षसे छोटे बालककी मृत्यु होनेपर तीन रातका अशौच होता है। सात वर्षसे बड़े उपनीत ब्राह्मण-बालककी मृत्युपर दस दिनका अशौच होता है, किंतु विकल्पसे पिताके लिये एक दिनका भी अशौच बताया गया है, |
| दशाहं सूतिकाशौचं मातुरप्येवमव्ययाः।<br>अर्वाक् त्रिवर्षात्स्नानेन बान्धवानां पितुः सदा॥ ८४ | माताके लिये तो दस दिनका अशौच रहता ही है। तीन वर्षसे कमके बालककी मृत्युपर बान्धवोंकी शुद्धि स्नानमात्रसे हो जाती है, किंतु पिताकी शुद्धि सदा ही तीन रात्रिके उपरान्त ही होती है। |
| अष्टाब्दादेकरात्रेण शुद्धिः स्याद् बान्धवस्य तु।<br>द्वादशाब्दात्ततश्चार्वाक् त्रिरात्रं स्त्रीषु सुव्रताः॥ ८५ | आठ वर्षसे अधिकके सम्बन्धीकी मृत्यु होनेपर बान्धवोंकी शुद्धि एक दिनमें हो जाती है। हे सुव्रतो! आठ वर्षके बाद बारह वर्षके पहलेतक स्त्रियोंको तीन रातका अशौच होता है। |
| सपिण्डता च पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते।<br>अतिक्रान्ते दशाहे तु त्रिरात्रमशुचिर्भवेत्॥ ८६ | सातवीं पीढ़ीके बाद सपिण्डता समाप्त हो जाती है। दस दिन बीत जानेपर अशौचका ज्ञान होनेपर तीन रातका अशौच होता है। |
| ततः सन्निहितो विप्रश्चार्वाक् पूर्वं तदेव वै।<br>संवत्सरे व्यतीते तु स्नानमात्रेण शुद्ध्यति॥ ८७ | हे विप्रो! छः मासके पहले मृत्युकी जानकारी होनेपर पक्षिणी (दो रात-एक दिन)-का अशौच होता है और उसके बाद एक वर्षसे पहले एक दिनका अशौच होता है। वर्ष व्यतीत हो जानेपर स्नानमात्रसे सपिण्डोंकी शुद्धि हो जाती है॥ ७७–८७॥ |
| स्पृष्ट्वा प्रेतं त्रिरात्रेण धर्मार्थं स्नानमुच्यते।<br>दाहकानां च नेतॄणां स्नानमात्रमबान्धवे॥ ८८ | शवका स्पर्श कर लेनेपर तीन रातमें शुद्धि होती है। धर्मके लिये स्नान ही शुद्धिहेतु कहा जाता है। बान्धव न होनेपर शवका दाह करनेवाले तथा उसे ले जानेवालोंके लिये स्नानमात्र ही विहित है। |
| अनुगम्य च वै स्नात्वा घृतं प्राश्य विशुद्ध्यति।<br>आचार्यमरणे चैव त्रिरात्रं श्रोत्रिये मृते॥ ८९ | शवके साथ [यात्रामें] जानेपर स्नान करके तथा घृतका प्राशन करनेपर व्यक्ति शुद्ध होता है। हे द्विजो! आचार्य तथा श्रोत्रियके मरणमें तीन रातका अशौच होता है। |
| पक्षिणी मातुलानां च सोदराणां च वा द्विजाः।<br>भूपानां मण्डलीनां च सद्यो नीराष्ट्रवासिनाम्॥ ९० | माताके भाइयोंके मरणमें पक्षिणी अशौच होता है और उपकारी जनोंके मरणमें तीन रातका अशौच होता है। राजाओं, सामन्तों तथा देशान्तरवासियोंके मरणमें स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है। |
| केवलं द्वादशाहेन क्षत्रियाणां द्विजोत्तमाः।<br>नाभिषिक्तस्य चाशौचं सम्प्रमादेषु वै रणे॥ ९१ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! क्षत्रियोंका अशौच बारह दिनका होता है। अभिषिक्त राजाके रणमें मरनेपर बान्धवोंको अशौच नहीं होता है। |
| वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्ध्यति।<br>इति सङ्क्षेपतः प्रोक्ता द्रव्यशुद्धिरनुत्तमा॥ ९२ | वैश्य पन्द्रह दिनोंमें और शूद्र एक महीनेमें शुद्ध होता है। [हे विप्रो!] इस |