भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 438
४३६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| गर्भे दुःखान्यनेकानि योनिमार्गे च भूतले।<br>कौमारे यौवने चैव वार्धके मरणेऽपि वा॥ २२<br><br>विचारतः सतां दुःखं स्त्रीसंसर्गादिभिर्द्विजाः।<br>दुःखेनैकेन वै दुःखं प्रशाम्यन्तीह दुःखिनः॥ २३<br><br>न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।<br>हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्धते॥ २४ | कर्मोंके वशीभूत होनेके कारण यह जीव छः कोशों (स्नायु, अस्थि, मज्जा, त्वचा, मांस, रक्त)-से निर्मित इस शरीरको धारण करता है॥ २०-२१॥<br><br>गर्भमें, योनिमार्गमें, पृथ्वीतलपर, कुमारावस्थामें, युवावस्थामें, वृद्धावस्थामें और मृत्युके समय प्राणीको अनेक दुःख होते हैं। हे द्विजो! विचारपूर्वक देखा जाय तो स्त्रीसंसर्ग आदिसे ही सज्जनोंको दुःख उत्पन्न होता है; वे एक दुःखसे दूसरे दुःखको शान्त करना चाहते हैं और दुःखी होते रहते हैं। विषयोंके उपभोगसे कामकी शान्ति कभी नहीं होती है; जैसे हविसे अग्नि बढ़ती है, वैसे ही वह [वासना] निरन्तर बढ़ती ही जाती है॥ २२-२४॥ | | तस्माद्विचारतो नास्ति संयोगादपि वै नृणाम्।<br>अर्थानामर्जनेऽप्येवं पालने च व्यये तथा॥ २५<br><br>पैशाचे राक्षसे दुःखं याक्षे चैव विचारतः।<br>गान्धर्वे च तथा चान्द्रे सौम्यलोके द्विजोत्तमाः॥ २६<br><br>प्राजापत्ये तथा ब्राह्मे प्राकृते पौरुषे तथा।<br>क्षयसातिशयाद्यैस्तु दुःखैर्दुःखानि सुव्रताः॥ २७<br><br>तानि भाग्यान्यशुद्धानि सन्त्यजेच्च धनानि च।<br>तस्मादष्टगुणं भोगं तथा षोडशधा स्थितम्॥ २८<br><br>चतुर्विंशत्प्रकारेण संस्थितं चापि सुव्रताः।<br>द्वात्रिंशद्भेदमनघाश्चत्वारिंशद्गुणं पुनः॥ २९<br><br>तथाष्टचत्वारिंशच्च षट्पञ्चाशत्प्रकारतः।<br>चतुःषष्टिविधं चैव दुःखमेव विवेकिनः॥ ३० | अतः विचार किया जाय तो मनुष्योंको विषयोंके प्राप्त होनेपर भी सुख नहीं प्राप्त होता है। धनके अर्जनमें, उसकी सुरक्षा करनेमें तथा व्ययमें भी दुःख है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! विचार करनेपर देखा जाय, तो पिशाचलोक, राक्षसलोक, यक्षलोक, गन्धर्वलोक, चन्द्रलोक, बुधलोक, प्रजापतिलोक, ब्राह्मलोक और प्रकृतिलोक तथा पुरुषलोकमें भी भोगोंके नाशकी सम्भावनासे तथा एक-दूसरेसे श्रेष्ठ होनेके कारण ईर्ष्याजन्य दुःखोंसे वे भी दुःखी ही रहते हैं। अतः हे सुव्रतो! भाग्यसे प्राप्त अशुद्ध भोगों तथा अशुद्ध धनोंका त्याग कर देना चाहिये; हे सुव्रतो! चाहे वह भोग (सुख) आठ प्रकारका हो, अथवा सोलह प्रकारका हो, अथवा चौबीस प्रकारका हो, अथवा बत्तीस प्रकारका हो, अथवा चालीस प्रकारका हो, अथवा अड़तालीस प्रकारका हो, अथवा छप्पन प्रकारका हो अथवा चौंसठ प्रकारका हो, * विवेकयुक्त व्यक्तिके लिये भोग दुःखरूप ही होता है॥ २५-३०॥ | | पार्थिवं च तथाप्यं च तैजसं च विचारतः।<br>वायव्यं च तथा व्योम मानसं च यथाक्रमम्॥ ३१<br><br>आभिमानिकमप्येवं बौद्धं प्राकृतमेव च।<br>दुःखमेव न सन्देहो योगिनां ब्रह्मवादिनाम्॥ ३२<br><br>गौणं गणेश्वराणां च दुःखमेव विचारतः।<br>आदौ मध्ये तथा चान्ते सर्वलोकेषु सर्वदा॥ ३३ | विचार किया जाय तो पृथ्वीसम्बन्धी, जलसम्बन्धी, अग्निसम्बन्धी, वायुसम्बन्धी, आकाशसम्बन्धी, मनसम्बन्धी, अहंकारसम्बन्धी, बुद्धिसम्बन्धी तथा प्रकृतिसम्बन्धी भोग भी ब्रह्मवादी योगियोंके लिये दुःख ही हैं; इसमें सन्देह नहीं है। विचारपूर्वक देखा जाय, तो गणेश्वरोंके गुण |


* अष्टगुणयुक्त पार्थिव आदि सुखभोग (ऐश्वर्य)-से लेकर चौंसठ प्रकारके सुखभोग (ऐश्वर्य) इसी लिङ्गपुराणके पूर्वभाग अध्याय ९ में विस्तारसे बताये गये हैं।

श्रीलिंगमहापुराण · पृष्ठ 438, कुल 834 में से · BharatKosha