श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ८६ ] | पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा | ४३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| असन्निकृष्टे त्वर्थेऽपि शास्त्रं तच्छ्रवणात्सताम्।<br>बुद्धिमुत्पादयत्येव संसारे विदुषां द्विजाः॥ १२<br><br>तस्माद् दृष्टानुश्रविकं दुष्टमित्युभयात्मकम्।<br>सन्त्यजेत्सर्वयत्नेन विरक्तः सोऽभिधीयते॥ १३ | ज्ञान होनेपर संसार बाधित हो जाता है। उन्हीं (ईषणा और ज्ञान)-के वशमें होनेसे ही सभी लोगोंकी धर्म तथा अधर्ममें प्रवृत्ति होती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ १०-११॥<br><br>हे ब्राह्मणो! पारलौकिक पदार्थके प्रत्यक्ष न रहनेपर भी शास्त्रके द्वारा उसके विषयमें श्रवण कर लेनेसे उसमें सज्जनों तथा विद्वानोंकी प्रवृत्ति हो जाती है। अतः जो इहलौकिक तथा पारलौकिक—इन दोनों पदार्थोंको हेय समझकर पूर्ण प्रयत्नसे इनका परित्याग कर देता है; वह विरक्त कहा जाता है॥ १२-१३॥ |
| शास्त्रमित्युच्यतेऽभागं श्रुतेः कर्मसु तद् द्विजाः।<br>मूर्धानं ब्रह्मणः सारं ऋषीणां कर्मणः फलम्॥ १४ | हे द्विजो! श्रुतिप्रतिपादित सकाम कर्मोंमें, जिसमें सबकी प्रवृत्ति है तथा वेदके मस्तकस्वरूप एवं मन्त्र-द्रष्टा ऋषियोंके सारस्वरूप निष्कामकर्मफलको प्रतिपादित करनेवाला जो अध्यात्मशास्त्र है, वही शास्त्र कहा जाता है॥ १४॥ |
| ननु स्वभावः सर्वेषां कामो दृष्टो न चान्यथा।<br>श्रुतिः प्रवर्तिका तेषामिति कर्मण्यतद्विदः॥ १५ | जो श्रुतिके रहस्यको नहीं जानते हैं, वे ही ऐसा कहते हैं कि चूँकि सभी लोगोंका स्वभाव कामनामूलक दिखायी देता है, अतः श्रुति सकामकर्मकी ही प्रवर्तिका है॥ १५॥ |
| निवृत्तिलक्षणो धर्मः समर्थनामिहोच्यते।<br>तस्मादज्ञानमूलो हि संसारः सर्वदेहिनाम्॥ १६<br><br>कला संशोषमायाति कर्मणान्यस्वभावतः।<br>सकलस्त्रिविधो जीवो ज्ञानहीनस्त्वविद्यया॥ १७ | वास्तविक रूपमें विरक्त जनोंके लिये निष्कामकर्मका प्रतिपादन करनेमें ही श्रुतिका तात्पर्य है, अतः सभी देहधारियोंके लिये संसार अज्ञानमूलक है। वेदोक्त निष्कामकर्मके द्वारा जीवभाव क्षीण होता है। अविद्यासे उत्पन्न जो अज्ञान है, उसके कारण सकामकर्मके वशीभूत तीन प्रकारका जीवभाव दृढ़ होता है॥ १६-१७॥ |
| नारकी पापकृत्स्वर्गी पुण्यकृत्पुण्यगौरवात्।<br>व्यतिमिश्रेण वै जीवश्चतुर्धा संव्यवस्थितः॥ १८<br><br>उद्बिज्जः स्वेदजश्चैव अण्डजो वै जरायुजः।<br>एवं व्यवस्थितो देही कर्मणाज्ञो ह्यनिर्वृतः॥ १९ | पापकर्म करनेवाला नारकी होता है, पुण्यकर्म करनेवाला अपने पुण्यकी महिमाके कारण स्वर्गी होता है और पाप-पुण्यकर्मके मिश्रणवाला जीव उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज तथा जरायुज—इन चार रूपोंमें व्यवस्थित होता है। इस प्रकारसे व्यवस्थित वह अज्ञानी जीव अपने कर्मके कारण [संसारचक्रसे] मुक्त नहीं हो पाता है॥ १८-१९॥ |
| प्रजया कर्मणा मुक्तिर्धनेन च सतां न हि।<br>त्यागेनैकेन मुक्तिः स्यात्तदभावाद् भ्रमत्यसौ॥ २० | सन्तान, कर्म तथा धनसे सज्जनोंकी मुक्ति नहीं होती है; एकमात्र त्यागके द्वारा ही मुक्ति प्राप्त होती है और उसके अभावके कारण यह जीव भ्रमण करता रहता है। इस प्रकार अज्ञानके दोषके कारण तथा अनेक |
| एवमज्ञानदोषेण नानाकर्मवशेन च।<br>षट्कौशिकं समुद्भूतं भजत्येष कलेवरम्॥ २१ |