श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४३४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग ]
छियासीवाँ अध्याय
पाशुपतयोगज्ञानका स्वरूप तथा उसकी महिमा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>जपाच्छ्रेष्ठतमं प्राहुर्ब्राह्मणा दग्धकिल्बिषाः।<br>विरक्तानां प्रबुद्धानां ध्यानयज्ञं सुशोभनम्॥ १<br><br>तस्माद्वदस्व सूताद्य ध्यानयज्ञमशेषतः।<br>विस्तरात्सर्वयत्नेन विरक्तानां महात्मनाम्॥ २ | **ऋषिगण बोले—**दग्ध पापवाले ब्राह्मणोंने विरक्त ज्ञानियोंके उत्तम ध्यानयज्ञको जपसे श्रेष्ठ कहा है; अतः हे सूतजी! अब आप विरक्त महात्माओंके ध्यानयज्ञके विषयमें पूर्णरूपसे विस्तारपूर्वक पूर्णप्रयत्नके साथ [हमलोगोंको] बताइये॥ १-२॥ |
| तेषां तद्वचनं श्रुत्वा मुनीनां दीर्घसत्रिणाम्।<br>रुद्रेण कथितं प्राह गुहां प्राप्य महात्मनाम्॥ ३<br><br>संहृत्य कालकूटाख्यं विषं वै विश्वकर्मणा। | दीर्घ कालतक यज्ञ करनेवाले उन ऋषियोंका वचन सुनकर सूतजीने वह सारा वृत्तान्त कहा, जिसे विश्वकी रचना करनेवाले रुद्रने कालकूट नामक विषको निष्क्रिय करके [मेरुपर्वतकी] गुफामें आकर महात्माओंको बताया था॥ ३ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>गुहां प्राप्य सुखासीनं भवान्या सह शङ्करम्॥ ४<br><br>मुनयः संशितात्मानः प्रणेमुस्तं गुहाश्रयम्।<br>अस्तुवंश्च ततः सर्वे नीलकण्ठमुमापतिम्॥ ५<br><br>अत्युग्रं कालकूटाख्यं संहृतं भगवंस्त्वया।<br>अतः प्रतिष्ठितं सर्वं त्वया देव वृषध्वज॥ ६ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] गुफामें पहुँचकर पार्वतीके साथ सुखपूर्वक बैठे हुए उन शंकरको महात्मा मुनियोंने प्रणाम किया। उसके बाद उन सभीने गुफामें विराजमान उमापति [भगवान्] नीलकण्ठकी स्तुति की और कहा—हे भगवन्! आपने अति भयंकर कालकूट नामक विषको निष्क्रिय कर दिया; अतः हे देव! हे वृषध्वज! आपके द्वारा ही सब कुछ प्रतिष्ठित है॥ ४-६॥ |
| तेषां तद्वचनं श्रुत्वा भगवान्नीललोहितः।<br>प्रहसन् प्राह विश्वात्मा सनन्दनपुरोगमान्॥ ७<br><br>किमनेन द्विजश्रेष्ठा विषं वक्ष्ये सुदारुणम्।<br>संहरेत्तद्विषं यस्तु स समर्थो ह्यनेन किम्॥ ८<br><br>न विषं कालकूटाख्यं संसारो विषमुच्यते।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन संहरेत सुदारुणम्॥ ९ | उनका वह वचन सुनकर विश्वात्मा भगवान् नीललोहित सनन्दन आदि [मुनियों]-से हँसते हुए कहने लगे—हे श्रेष्ठ द्विजो! यह [विष] क्या है! मैं अति भयंकर विषके विषयमें बताऊँगा, जो इस [कालकूट] विषको भी निष्क्रिय कर देता है, वह [परम] समर्थ है; यह कालकूट विष कौन-सी चीज है। कालकूट नामक विष [वास्तवमें] विष नहीं है, बल्कि संसार ही विष कहा जाता है। अतः पूर्ण प्रयत्नसे इस संसाररूपी अत्यन्त भीषण विषको नष्ट करना चाहिये अर्थात् संसारमें मिथ्यात्वका भाव रखना चाहिये॥ ७-९॥ |
| संसारो द्विविधः प्रोक्तः स्वाधिकारानुरूपतः।<br>पुंसां सम्मूढचित्तानामसङ्क्षीणः सुदारुणः॥ १० | अपने अधिकारके अनुसार यह संसार दो प्रकारका कहा गया है; मूढ़चित्तवाले मनुष्योंके लिये यह असंक्षीण (क्षय न होनेवाला) तथा अत्यन्त भयंकर है। हे सुव्रतो! |
| ईषणारागदोषेण सर्गो ज्ञानेन सुव्रताः।<br>तद्वशादेव सर्वेषां धर्माधर्मौ न संशयः॥ ११ | यह सृष्टि इच्छा तथा रागजनित दोषके कारण है; इसका |