भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४३३


श्लोकअर्थ
विषयाणां च पञ्चानां जयं प्राप्नोति मानवः।<br>चतुर्थं पञ्चलक्षं तु यो जपेद्भक्तिसंयुतः॥ २२२इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर लेता है। जो शान्त होकर ध्यानमग्न हो पाँच लाख बार मन्त्रका जप करता है, वह पाँचों विषयोंपर विजय प्राप्त करता है। जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर चौथी बार इस मन्त्रको पाँच लाख बार जपता है, वह इस लोकमें [पृथ्वी आदि] पंचभूतोंपर विजय प्राप्त कर लेता है॥ २१९—२२२ १/२ ॥
भूतानामिह पञ्चानां विजयं मनुजो लभेत्।<br>चतुर्लक्षं जपेद्यास्तु मनः संयम्य यत्नतः॥ २२३<br><br>सम्यग्विजयमाप्नोति करणानां वरानने।<br>पञ्चविंशतिलक्षाणां जपेन कमलानने॥ २२४<br><br>पञ्चविंशतितत्त्वानां विजयं मनुजो लभेत्।<br>मध्यरात्रेति निर्वाते जपेदयुतमादरात्॥ २२५<br><br>ब्रह्मसिद्धिमवाप्नोति व्रतेनानेन सुन्दरि।<br>जपेल्लक्षमनालस्यो निर्वाते ध्वनिवर्जिते॥ २२६<br><br>मध्यरात्रे च शिवयोः पश्यत्येव न संशयः।<br>अन्धकारविनाशश्च दीपस्येव प्रकाशनम्॥ २२७<br><br>हृदयान्तर्बहिर्वापि भविष्यति न संशयः।<br>सर्वसम्पत्समुद्ध्यर्थं जपेदयुतमात्मवान्॥ २२८<br><br>सबीजसम्पुटं मन्त्रं शतलक्षं जपेच्छुचिः।<br>मत्सायुज्यमवाप्नोति भक्तिमान् किमतः परम्॥ २२९हे वरानने! जो [अपने] मनको नियन्त्रित करके प्रयत्नपूर्वक चार लाख बार मन्त्रका जप करता है, वह [मन, बुद्धि आदि] अन्तःकरणोंपर पूर्णरूपसे विजय प्राप्त कर लेता है। हे कमलमुखि! पचीस लाख बार मन्त्रके जपसे मनुष्य पचीस तत्त्वोंपर विजय प्राप्त कर लेता है। हे सुन्दरि! जो मध्यरात्रिमें वातरहित स्थानमें आदरपूर्वक दस हजार जप करता है, वह इस व्रतके द्वारा ब्रह्मसिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो [मनुष्य] आलस्यरहित होकर मध्यरात्रिमें वातशून्य तथा ध्वनिरहित स्थानमें एक लाख बार जप करता है, वह शिव तथा पार्वतीका दर्शन कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है। उस समय अन्धकारका विनाश हो जाता है और हृदयके बाहर तथा भीतर दीपककी भाँति प्रकाश हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। आत्मज्ञको सभी प्रकारकी सम्पदा तथा समृद्धिके लिये मन्त्रका दस हजार जप करना चाहिये। [हे देवि!] जो पवित्र तथा भक्तियुक्त होकर बीजके सम्पुटसहित मन्त्रका सौ लाख (एक करोड़) जप करता है, वह मेरा सायुज्य प्राप्त कर लेता है; इससे बढ़कर [फल] क्या हो सकता है!॥ २२३—२२९॥
इति ते सर्वमाख्यातं पञ्चाक्षरविधिक्रमम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि स याति परमां गतिम्॥ २३०<br><br>श्रावयेच्च द्विजाञ्छुद्धान् पञ्चाक्षरविधिक्रमम्।<br>दैवे कर्मणि पित्र्ये वा शिवलोके महीयते॥ २३१[हे देवि!] मैंने तुम्हें पंचाक्षरमन्त्रके जपकी सम्पूर्ण विधि बता दी। जो इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह परम गति प्राप्त करता है। जो देवकर्म अथवा पितृकर्ममें शुद्ध ब्राह्मणोंको पंचाक्षर विधिके क्रमका श्रवण कराता है, वह शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ २३०-२३१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चाक्षरमाहात्म्यं नाम पञ्चाशीतितमोऽध्यायः॥ ८५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पंचाक्षरमाहात्म्य' नामक पचासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८५॥