श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ४३२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रायश्चित्तं प्रवक्ष्यामि सर्वपापविशुद्धये।<br>पापशुद्ध्यर्था सम्यक् कर्तुमभ्युद्यतो नरः ॥ २११<br><br>पापशुद्ध्यर्थतः सम्यग् ज्ञानसम्पत्तिहेतुकी।<br>पापशुद्धिर्न चेत्पुंसः क्रियाः सर्वाश्च निष्फलाः ॥ २१२<br><br>ज्ञानं च हीयते तस्मात्कर्तव्यं पापशोधनम्। | रक्तसे या विषसे होम करना चाहिये; यह मनुष्योंके लिये विद्वेषणकारी है॥ २०७-२१०॥<br><br>[हे देवि!] अब मैं समस्त पापोंसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्तका वर्णन करूँगा। मनुष्यको पापशुद्धि करनेहेतु पूर्णरूपसे प्रयत्नशील होना चाहिये; क्योंकि सम्यक् पापशुद्धि ज्ञान-सम्पदाका मूल कारण होती है। यदि पापशुद्धि नहीं होती है, तो मनुष्यकी सभी क्रियाएँ व्यर्थ हो जाती हैं और उसका ज्ञान क्षीण होता रहता है, इसलिये पापका शोधन [अवश्य] करना चाहिये॥ २११-२१२ १/२ ॥ |
| विद्यालक्ष्मीविशुद्ध्यर्थं मां ध्यात्वाञ्जलिना शुभे ॥ २१३<br><br>शिवेनैकादशेनाद्भिर्भिषिञ्चेत्समन्ततः ।<br>अष्टोत्तरशतेनैव स्नायात्पापविशुद्धये ॥ २१४<br><br>सर्वतीर्थफलं तच्च सर्वपापहरं शुभम्।<br>सन्ध्योपासनविच्छेदे जपेदष्टशतं नरः ॥ २१५<br><br>विड्वराहैश्च चाण्डालैर्दुर्जनैः कुक्कुटैरपि।<br>स्पृष्टमन्नं न भुञ्जीत भुक्त्वा चाष्टशतं जपेत् ॥ २१६ | हे शुभे! विद्या तथा लक्ष्मीकी विशुद्धिके लिये अंजलिमें जल लेकर मेरा ध्यान करके ग्यारह बार शिव-मन्त्रका जप करके उस जलसे अभिषेक करना चाहिये। पाप-शोधनके लिये एक सौ आठ बार मन्त्रका जप करके स्नान करना चाहिये; यह सभी तीर्थोंका फल देनेवाला, सभी पापोंको दूर करनेवाला तथा कल्याणकारक है। सन्ध्योपासनके छूट जानेपर मनुष्यको एक सौ आठ बार मन्त्रका जप करना चाहिये। सुअर, चाण्डाल, दुर्जन तथा कुक्कुटका स्पर्श किया हुआ अन्न नहीं खाना चाहिये और खा लेनेपर एक सौ आठ बार मन्त्रका जप करना चाहिये॥ २१३-२१६॥ |
| ब्रह्महत्याविशुद्ध्यर्थं जपेल्लक्षायुतं नरः ।<br>पातकानां तदर्धं स्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥ २१७<br><br>उपपातकदुष्टानां तदर्धं परिकीर्तितम्।<br>शेषाणामपि पापानां जपेत्पञ्चसहस्रकम् ॥ २१८ | ब्रह्महत्याके शोधनके लिये मनुष्यको सौ हजार करोड़ बार मन्त्रका जप करना चाहिये, अन्य बड़े पापोंके शोधनके लिये उसका आधा जप होना चाहिये; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। उपपातक शोधनके लिये उसका आधा जप करना बताया गया है। शेष [छोटे] पापोंकी शुद्धिके लिये भी पाँच हजार बार मन्त्रको जपना चाहिये॥ २१७-२१८॥ |
| आत्मबोधपरं गुह्यं शिवबोधप्रकाशकम्।<br>शिवः स्यात्स जपेन्मन्त्रं पञ्चलक्षमनाकुलः ॥ २१९<br><br>पञ्चवायुजयं भद्रे प्राप्नोति मनुजः सुखम्।<br>जपेच्च पञ्चलक्षं तु विगृहीतेन्द्रियः शुचिः ॥ २२०<br><br>पञ्चेन्द्रियाणां विजयो भविष्यति वरानने।<br>ध्यानयुक्तो जपेद्यस्तु पञ्चलक्षमनाकुलः ॥ २२१ | जो शान्त होकर आत्मबोध करानेवाले, गोपनीय तथा शिवज्ञानको प्रकाशित करनेवाले इस मन्त्रका पाँच लाख जप करता है, वह [साक्षात्] शिव हो जाता है और हे भद्रे! वह मनुष्य सुखपूर्वक पाँचों वायुपर विजय प्राप्त कर लेता है। हे सुमुखि! जो शुद्ध होकर इन्द्रियोंको वशमें करके पाँच लाख मन्त्र जप करता है, वह पाँचों |