भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा [४३१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यावद्ग्रहणमोक्षं तु तावन्नद्यां समाहितः।<br>जपेत्समुद्रगामिन्यां विमोक्षे ग्रहणस्य तु॥ १९९<br><br>अष्टोत्तरसहस्रेण पिबेद् ब्राह्मीरसं द्विजाः।<br>ऐहिकां लभते मेधां सर्वशास्त्रधरां शुभाम्॥ २००ही पलाश-समिधाओंसे हवन करनेसे [व्यक्ति] आरोग्य प्राप्त करता है। चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहणके अवसरपर पवित्र होकर विधिपूर्वक उपवास करके जबतक ग्रहणका मोक्ष हो, तबतक किसी समुद्रगामिनी नदीमें एकाग्रचित्त होकर जप करना चाहिये और हे द्विजो! ग्रहणके समाप्त होनेपर एक हजार आठ मन्त्रका जप करके ब्राह्मीरसका पान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला सभी शास्त्रोंको धारण करनेवाली कल्याणमयी लौकिक प्रतिभा प्राप्त करता है और उसकी वाणी अतिमानुषी होकर देवी सरस्वतीकी वाणीके तुल्य हो जाती है॥ १९७-२०० १/२॥
सारस्वती भवेद्देवी तस्य वागतिमानुषी।<br>ग्रहनक्षत्रपीडासु जपेद्भक्त्यायुतं नरः॥ २०१<br><br>हुत्वा चाष्टसहस्रं तु ग्रहपीडां व्यपोहति।<br>दुःस्वप्नदर्शने स्नात्वा जपेद्वै चायुतं नरः॥ २०२ग्रह तथा नक्षत्रके कारण कष्ट होनेपर मनुष्य भक्तिपूर्वक दस हजार जप करके तथा आठ हजार आहुति देकर ग्रहपीडासे मुक्त हो जाता है। दुःस्वप्न देखनेपर स्नान करके मनुष्यको दस हजार जप करना चाहिये; इसके बाद घृतकी एक सौ आठ आहुति देनेसे उसे शीघ्र ही शान्ति प्राप्त होगी॥ २०१-२०२ १/२॥
घृतेनाष्टशतं हुत्वा सद्यः शान्तिर्भविष्यति।<br>चन्द्रसूर्यग्रहे लिङ्गं समभ्यर्च्य यथाविधि॥ २०३<br><br>यत्किञ्चित्प्रार्थयेद्देवि जपेदयुतमादरात्।<br>सन्निधावस्य देवस्य शुचिः संयतमानसः॥ २०४चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहणके समय विधिपूर्वक लिङ्गका पूजन करके शुद्ध तथा एकाग्रचित्त होकर इन महादेवके समीप आदरपूर्वक दस हजार जप करना चाहिये; हे देवि! वह मनुष्य जो कुछ भी माँगता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २०३-२०४ १/२॥
सर्वान् कामानवाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः।<br>गजानां तुरगाणां तु गोजातीनां विशेषतः॥ २०५<br><br>व्याध्यागमे शुचिर्भूत्वा जुहुयात्समिधाहुतिम्।<br>मासमभ्यर्च्य विधिनायुतं भक्तिसमन्वितः॥ २०६हाथियों, घोड़ों तथा विशेषकर गोजातिके पशुओंमें रोग उत्पन्न होनेपर शुद्ध होकर तथा भक्तियुक्त होकर विधिपूर्वक महीनेभर पूजन करके समिधाकी दस हजार आहुति देनेसे उन पशुओंके रोगकी शान्ति तथा उनकी वृद्धि होती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २०५-२०६ १/२॥
तेषामृद्धिश्च शान्तिश्च भविष्यति न संशयः।<br>उत्पाते शत्रुबाधायां जुहुयादयुतं शुचिः॥ २०७<br><br>पालाशसमिधैर्देवि तस्य शान्तिर्भविष्यति।<br>आभिचारिकबाधायामेतद्देवि समाचरेत्॥ २०८हे देवि! उपद्रव तथा शत्रुबाधा उत्पन्न होनेपर जो [व्यक्ति] पवित्र होकर पलाशकी समिधाओंसे दस हजार होम करता है; उसकी शान्ति होती है। हे देवि! आभिचारिक बाधामें भी ऐसा ही करना चाहिये; ऐसा करनेसे उसकी शक्ति प्रकट होती है और शत्रुको पीड़ा उत्पन्न होती है।
प्रत्यग् भवति तच्छक्तिः शत्रोः पीडा भविष्यति।<br>विद्वेषणार्थं जुहुयाद् वैभीतसमिधाष्टकम्॥ २०९<br><br>अक्षरप्रातिलोम्येन आर्द्रेण रुधिरेण वा।<br>विषेण रुधिराभ्यक्तो विद्वेषणकरं नृणाम्॥ २१०विद्वेषणके लिये बहेड़ेकी समिधाओंसे आठ आहुति डालनी चाहिये; अथवा रुधिरसे स्नान करके विपरीत अक्षरसे मन्त्रका जप करते हुए गीले
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