भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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४३०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्नाने च सन्ध्ययोश्चैव कुर्यादेकादशेन वै।<br>शुचिः पर्वतमारुह्य जपेल्लक्षमन्द्वितः॥ १८७<br><br>महानद्यां द्विलक्षं तु दीर्घमायुरवाप्नुयात्।<br>दूर्वाङ्कुरास्तिला वाणी गुडूची घुटिका तथा॥ १८८प्राप्त होते हैं॥ १८३-१८४ १/२॥<br><br>स्नानमें तथा [प्रातः-सायं] दोनों सन्ध्याओंमें ग्यारह बार पंचाक्षरमन्त्रसे प्रोक्षण, अभिषेक तथा अघमर्षण करना चाहिए। जो शुद्ध होकर पर्वतपर चढ़कर आलस्यरहित हो एक लाख बार मन्त्रका जप करता है अथवा किसी महानदीके तटपर दो लाख बार जप करता है, वह दीर्घ आयु प्राप्त करता है॥ १८६-१८७ १/२॥
तेषां तु दशसाहस्रं होममायुष्यवर्धनम्।<br>अश्वत्थवृक्षमाश्रित्य जपेल्लक्षद्वयं सुधीः॥ १८९<br><br>शनैश्चरदिने स्पृष्ट्वा दीर्घायुष्यं लभेन्नरः।<br>शनैश्चरदिनेऽश्वत्थं पाणिभ्यां संस्पृशेत्सुधीः॥ १९०दूर्वांकुर, तिल, वाणी, गुरुच और घुटिका—इनका दस हजार होम आयुकी वृद्धि करनेवाला होता है। बुद्धिमान्‌को चाहिये कि पीपलके वृक्षका आश्रय लेकर दो लाख जप करे। शनिवारको पीपल वृक्षका स्पर्श करके मनुष्य दीर्घ आयु प्राप्त करता है। बुद्धिमान्‌को शनैश्चरके दिन [अपने] दोनों हाथोंसे पीपलके वृक्षका स्पर्श करना चाहिये और एक सौ आठ बार [मन्त्रका] जप करना चाहिये; यह भी अकाल मृत्युको दूर करनेवाला होता है॥ १८८-१९० १/२॥
जपेदष्टोत्तरशतं सोऽपमृत्युहरो भवेत्।<br>आदित्याभिमुखो भूत्वा जपेल्लक्षमनन्यधीः॥ १९१<br><br>अर्कैरष्टशतं नित्यं जुह्वन् व्याधेर्विमुच्यते।<br>समस्तव्याधिशान्त्यर्थं पलाशसमिधैर्नरः॥ १९२<br><br>हुत्वा दशसहस्रं तु निरोगी मनुजो भवेत्।<br>नित्यमष्टशतं जप्त्वा पिबेदम्भोऽर्कसन्निधौ॥ १९३सूर्यकी ओर मुख करके एकाग्रचित्त होकर एक लाख जप करना चाहिये; अर्ककी समिधाओंसे प्रतिदिन एक सौ आठ होम करनेवाला [व्यक्ति] रोगसे मुक्त हो जाता है। मनुष्यको समस्त रोगोंके शमनके लिये पलाश-समिधाओंसे होम करना चाहिये; इससे दस हजार होम करके मनुष्य रोगरहित हो जाता है। प्रतिदिन एक सौ आठ बार जप करके सूर्यके समक्ष जल पीना चाहिये; ऐसा करनेवाला एक महीनेमें ही सभी उदर-सम्बन्धी रोगोंसे मुक्त हो जाता है॥ १९१-१९३ १/२॥
औदर्यैर्व्याधिभिः सर्वैर्मासैनेकेन मुच्यते।<br>एकादशेन भुञ्जीयादन्नं चैवाभिमन्त्रितम्॥ १९४<br><br>भक्ष्यं चान्यत्तथा पेयं विषमप्यमृतं भवेत्।<br>जपेल्लक्षं तु पूर्वाह्ने हुत्वा चाष्टशतेन वै॥ १९५<br><br>सूर्यं नित्यमुपस्थाय सम्यगारोग्यमाप्नुयात्।<br>नदीतोयेन सम्पूर्णं घटं संस्पृश्य शोभनम्॥ १९६<br><br>जप्त्वायुतं च तत्स्नानाद्रोगाणां भेषजं भवेत्।ग्यारह बार मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके अन्न तथा अन्य भक्ष्य-पेय पदार्थ ग्रहण करना चाहिये; इससे विष भी अमृत हो जाता है। प्रतिदिन पूर्वाह्नमें एक सौ आठ आहुति देकर तथा सूर्योपस्थान करके एक लाख जप करना चाहिये; ऐसा करनेवाला पूर्ण आरोग्य प्राप्त करता है। नदीके जलसे भरे हुए सुन्दर घड़ेको स्पर्श करते हुए दस हजार जप करनेसे तथा उसी जलसे स्नान करनेसे सभी रोगोंकी चिकित्सा हो जाती है॥ १९४-१९६ १/२॥
अष्टाविंशज्जपित्वान्नमश्नीयादन्वहं शुचिः॥ १९७<br><br>हुत्वा च तावत्पालाशैरेवं वारोग्यमश्नुते।<br>चन्द्रसूर्यग्रहे पूर्वमुपोष्य विधिना शुचिः॥ १९८पवित्र होकर प्रतिदिन अट्ठाईस बार [मन्त्रका] जप करके अन्न ग्रहण करना चाहिये और बादमें उतनी