श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गुरुस्तुष्टो दहत्येवं पापं तन्मन्त्रतेजसा।<br>ब्रह्मा हरस्तथा रुद्रो देवाश्च मुनयस्तथा॥ १७३ | हुए गुरु अपने मन्त्रके तेजसे [शिष्यके] पापको भस्म कर देते हैं॥ १६८–१७२ १/२॥ |
| कुर्वन्त्यनुग्रहं तुष्टा गुरौ तुष्टे न संशयः।<br>कर्मणा मनसा वाचा गुरोः क्रोधं न कारयेत्॥ १७४ | गुरुके प्रसन्न रहनेपर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सभी देवता तथा मुनि भी [उस व्यक्तिपर] प्रसन्न होकर कृपा करते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। मन, वचन तथा कर्मसे गुरुको क्रोधित नहीं करना चाहिये; उनके क्रोधसे आयु, लक्ष्मी (वैभव), ज्ञान और सत्कर्म दग्ध हो जाते हैं। जो लोग उन्हें कुपित करते हैं, उनके यज्ञ, जप तथा अन्य अनुष्ठान व्यर्थ हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १७३–१७५ १/२॥ |
| तस्य क्रोधेन दह्यन्ते आयुः श्रीर्ज्ञानसत्क्रियाः।<br>तत्क्रोधं ये करिष्यन्ति तेषां यज्ञाश्च निष्फलाः॥ १७५ | |
| जपान्द्यनियमश्चैव नात्र कार्या विचारणा।<br>गुरोर्विरुद्धं यद्वाक्यं न वदेत्सर्वयत्नतः॥ १७६ | पूर्ण प्रयत्नपूर्वक गुरुके विरुद्ध कुछ भी वचन नहीं बोलना चाहिये; यदि कोई अज्ञानवश ऐसा बोलता है, तो वह रौरव नरकमें पड़ता है। हे देवि! मन, धन, वचन तथा कर्मसे गुरुको कभी झूठा सिद्ध नहीं करना चाहिये। उनका दुर्गुण कहनेपर व्यक्ति सौ दुर्गुणोंसे युक्त हो जाता है और उनका गुण कहनेपर सभी गुणोंका फल मिलता है। गुरुने आदेश दिया हो अथवा नहीं, सर्वदा उनका हित तथा प्रिय करना चाहिये; गुरु सामने हों अथवा परोक्षमें हों, उनका कार्य करना चाहिये। मन, वचन, शरीर तथा कर्मसे गुरुका हित तथा प्रिय करना चाहिये। ऐसा न करनेवाला नरकमें गिरता है और वहाँ जाकर वहींपर विचरण करता रहता है। अतः सर्वदा उनकी उपासना तथा वन्दना करनी चाहिये। पास रहते हुए भी गुरुसे आज्ञा लेकर तथा उनकी ओर मुख न करके बोलना चाहिये। ऐसा आचारवान्, भक्ति-सम्पन्न, नित्य जप करनेवाला तथा गुरुका प्रिय करनेवाला [शिष्य] इस मन्त्रका विनियोग करनेके योग्य होता है॥ १७६–१८२ १/२॥ |
| वदेद्यदि महामोहाद्रौरवं नरकं व्रजेत्।<br>चित्तेनैव च वित्तेन तथा वाचा च सुव्रताः*॥ १७७ | |
| मिथ्या न कारयेद्देवि क्रियया च गुरोः सदा।<br>दुर्गुणे ख्यापिते तस्य नैर्गुण्यशतभागभवेत्॥ १७८ | |
| गुणे तु ख्यापिते तस्य सार्वगुण्यफलं भवेत्।<br>गुरोर्हितं प्रियं कुर्यादादिष्टो वा न वा सदा॥ १७९ | |
| असमक्षं समक्षं वा गुरोः कार्यं समाचरेत्।<br>गुरोर्हितं प्रियं कुर्यान्मनोवाक्कायकर्मभिः॥ १८० | |
| कुर्वन् पतत्यधो गत्वा तत्रैव परिवर्तते।<br>तस्मात्स सर्वदोपास्यो वन्दनीयश्च सर्वदा॥ १८१ | |
| समीपस्थोऽप्यनुज्ञाप्य वदेत्तद्विमुखो गुरुम्।<br>एवमाचारवान् भक्तो नित्यं जपपरायणः॥ १८२ | |
| गुरुप्रियकरो मन्त्रं विनियोक्तुं ततोऽर्हति।<br>विनियोगं प्रवक्ष्यामि सिद्धमन्त्रप्रयोजनम्॥ १८३ | [हे देवि!] अब मैं सिद्धमन्त्रके प्रयोजनस्वरूप विनियोगको बताऊँगा; विनियोग न जाननेवालेका वह मन्त्र प्रभावहीन हो जाता है। जिसका जिस कार्यके साथ विशेष रूपसे संयोजन किया जाय, उसे विनियोग कहा गया है। यह इस लोकमें तथा परलोकमें फल प्रदान करता है। विनियोगसे आयु, आरोग्य, शरीरकी नित्यता, राज्य, ऐश्वर्य, उत्तम ज्ञान, स्वर्ग तथा मोक्ष—ये सब |
| दौर्बल्यं याति तन्मन्त्रं विनियोगमजानतः।<br>यस्य येन वियुञ्जीत कार्येण तु विशेषतः॥ १८४ | |
| विनियोगः स विज्ञेय ऐहिकामुष्मिकं फलम्।<br>विनियोगजमायुष्यमारोग्यं तनुनित्यता॥ १८५ | |
| राज्यैश्वर्यं च विज्ञानं स्वर्गो निर्वाण एव च।<br>प्रोक्षणं चाभिषेकं च अघमर्षणमेव च॥ १८६ |
* सुव्रताः—यह सम्बोधन सूतजीद्वारा ऋषियोंके लिये प्रयुक्त है।