श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप [ ४३
| तस्याः स्वास्थ्येन ध्यानं च समाधिश्च विचारतः।<br>तत्रैकचित्तता ध्यानं प्रत्ययान्तरवर्जितम्॥ ४३ | स्वस्थचित्ततासे उसी धारणाकी स्थिरता ही ध्यान है, जो विचारणापूर्वक समाधिमें परिणत हो जाता है। ध्येय विषयमें चित्तकी एकाग्रता ही ध्यान है और इस स्थितिमें चित्त अन्य वृत्तियोंसे रहित हो जाता है॥ ४३॥ |
| चिद्भासमर्थमात्रस्य देहशून्यमिव स्थितम्।<br>समाधिः सर्वहेतुश्च प्राणायाम इति स्मृतः॥ ४४ | चैतन्यस्वरूप ध्येयमात्रसे भासित होनेवाला और इस प्रकार देहशून्यताकी स्थितिको प्राप्त वह ध्यान ही समाधि है और प्राणायामको इन समस्त ध्यान-समाधि आदिका हेतु कहा गया है॥ ४४॥ |
| प्राणः स्वदेहजो वायुर्यमस्तस्य निरोधनम्।<br>त्रिधा द्विजैर्यमः प्रोक्तो मन्दो मध्योत्तमस्तथा॥ ४५ | अपने शरीरसे जायमान वायु ही प्राण है और उसे रोकनेको यम कहते हैं। द्विजोंने मन्द, मध्य तथा उत्तम—ये तीन प्रकारके यम बतलाये हैं॥ ४५॥ |
| प्राणापाननिरोधस्तु प्राणायामः प्रकीर्तितः।<br>प्राणायामस्य मानं तु मात्राद्वादशकं स्मृतम्॥ ४६<br><br>नीचो द्वादशमात्रस्तु उद्घातो द्वादशः स्मृतः।<br>मध्यमस्तु द्विरुद्घातश्चतुर्विंशतिमात्रकः॥ ४७<br><br>मुख्यस्तु यस्त्रिरुद्घातः षट्त्रिंशन्मात्र उच्यते।<br>प्रस्वेदकम्पनोत्थानजनकश्च यथाक्रमम्॥ ४८ | प्राण और अपान वायुका निरोध ही प्राणायाम कहलाता है। मन्द प्राणायामका मान बारह मात्राओंका कहा गया है। बारह लघु अक्षरोंके उच्चारणकालतक प्राणवायुको रोकना मन्द प्राणायाम या द्वादशमात्रात्मक प्राणायाम बताया गया है। उसके दुगुने उच्चारणकाल अर्थात् चौबीस मात्राओंके समयतक प्राणवायुके निरोधनको मध्यम प्राणायाम कहते हैं। इसी प्रकार तीन गुने उच्चारणकाल अर्थात् छत्तीस मात्राओंके उच्चारणकालतक प्राणवायुको रोकनेको उत्तम प्राणायाम कहा जाता है। मन्द, मध्य तथा उत्तम प्राणायाम शरीरमें क्रमशः प्रस्वेद (पसीना), कम्पन तथा उत्थान (ऊपर उठनेकी क्रिया) उत्पन्न करनेवाले हैं॥ ४६-४८॥ |
| आनन्दोद्भवयोगार्थं निद्राघूर्णिस्तथैव च।<br>रोमाञ्चध्वनिसंविद्धस्वाङ्गमोटनकम्पनम् ॥ ४९ | आनन्दकी उत्पत्ति करनेवाले योगकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले प्राणायामसे निद्रा, घूर्णन, रोमांच तथा ध्वनिसे व्याप्त कम्पन शरीरके अंगोंमें उत्पन्न हो जाता है॥ ४९॥ |
| भ्रमणं स्वेदजन्या सा संविन्मूर्च्छा भवेद्यदा।<br>तदोत्तमोत्तमः प्रोक्तः प्राणायामः सुशोभनः॥ ५० | जब निरन्तर प्राणायामके अभ्याससे [उत्पन्न उष्णतावश] स्वेदबिन्दु [पसीना] झलकने लगे, संविन्मूर्च्छा—ज्ञानमयी उन्मनी अवस्था आने लगे, सहसा शरीर हलका होकर प्लवन [जलमें तैरने-जैसी स्थिति]-जैसी अवस्थाका अनुभव करे, तब इस सुशोभन अवस्थाको उत्तमोत्तम प्राणायाम कहा गया है॥ ५०॥ |
| सगर्भोऽगर्भ इत्युक्तः सजपो विजपः क्रमात्।<br>इभो वा शरभो वापि दुराधर्षोऽथ केसरी॥ ५१ | सगर्भ तथा अगर्भ—यह दो प्रकारका होता है। जपसहित प्राणायाम सगर्भ तथा जपरहित प्राणायाम अगर्भ कहा जाता है। हाथी, शरभ* तथा सिंह अत्यन्त |
* आठ पैरवाला जीव, जो सिंहसे भी बलवान् होता है—‘अष्टपादः शरभः सिंहघाती।'