श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| बाह्यशौचेन युक्तः संस्थथा चाभ्यन्तरं चरेत्।<br>आग्नेयं वारुणं ब्राह्मं कर्तव्यं शिवपूजकैः॥ ३२ | शुचिता बाह्य तथा आभ्यन्तर-भेदसे दो प्रकारकी कही गयी है, उसमें भी आन्तरिक शुचिता श्रेष्ठ है। साधकको बाह्य पवित्रतासे युक्त होकर आन्तरिक पवित्रताके लिये प्रयास करना चाहिये॥ ३११/२॥ |
| स्नानं विधानतः सम्यक् पश्चादाभ्यन्तरं चरेत्।<br>आदेहान्तं मृदालिप्य तीर्थतोयेषु सर्वदा॥ ३३<br><br>अवगाह्यापि मलिनो ह्यन्तश्शौचविवर्जितः।<br>शैवला झषका मत्स्याः सत्त्वा मत्स्योपजीविनः॥ ३४ | शिवपूजकोंको चाहिये कि वे विधिपूर्वक भस्मस्नान, जलस्नान तथा मन्त्रस्नान सम्पन्न करनेके पश्चात् आभ्यन्तर शुचिताका सम्पादन करें; क्योंकि सम्पूर्ण शरीरमें पवित्र मृत्तिकाका लेपन करके सर्वदा पवित्र तीर्थके जलमें अवगाहन करनेवाला भी अन्तःशौचके बिना मलिन ही रहता है॥ ३२-३३१/२॥ |
| सदावगाह्यः सलिले विशुद्धाः किं द्विजोत्तमाः।<br>तस्मादाभ्यन्तरं शौचं सदा कार्यं विधानतः॥ ३५ | हे द्विजोत्तमो! सदा जलमें रहनेपर भी शैवाल, झषक (मगरमच्छ), मत्स्य और मत्स्यजीवी (मछुआरे) क्या कभी पवित्र हुए हैं? इसीलिये सदा विधिपूर्वक आन्तरिक पवित्रताका सम्पादन करना चाहिये॥ ३४-३५॥ |
| आत्मज्ञानाम्भसि स्नात्वा सकृदालिप्य भावतः।<br>सुवैराग्यमृदा शुद्धः शौचमेवं प्रकीर्तितम्॥ ३६ | शरीरपर एक बार श्रद्धापूर्वक वैराग्यरूपी मृत्तिकाका लेपन करके आत्म-ज्ञानरूपी जलमें स्नान करके शुद्ध हो जानेको अन्तःशौच कहा गया है। शुद्ध पुरुषको ही सिद्धियाँ मिलती हैं, अशुद्ध पुरुषको कभी नहीं मिलतीं॥ ३६१/२॥ |
| शुद्धस्य सिद्धयो दृष्टा नैवाशुद्धस्य सिद्धयः।<br>न्यायेनागतया वृत्त्या सन्तुष्टो यस्तु सुव्रतः॥ ३७<br><br>सन्तोषस्तस्य सततमतीतार्थस्य चास्मृतिः।<br>चान्द्रायणादिनिपुणस्तपांसि सुशुभानि च॥ ३८ | जो व्रती पुरुष न्यायपूर्वक अर्जित किये गये धनसे संतुष्ट रहता है और गये धनके विषयमें चिन्तन नहीं करता, वह सन्तोषी कहा जाता है। चान्द्रायण आदि व्रतोंका निपुणतापूर्वक आचरण करना शुभ तप कहा गया है॥ ३७-३८॥ |
| स्वाध्यायस्तु जपः प्रोक्तः प्रणवस्य त्रिधा स्मृतः।<br>वाचिकश्चाधमो मुख्य उपांशुश्चोत्तमोत्तमः॥ ३९<br><br>मानसो विस्तरेणैव कल्पे पञ्चाक्षरे स्मृतः।<br>तथा शिवप्रणीधानं मनोवाक्कायकर्मणा॥ ४०<br><br>शिवज्ञानं गुरोर्भक्तिरचला सुप्रतिष्ठिता।<br>निग्रहो ह्यपहृत्याशु प्रसक्तानीन्द्रियाणि च॥ ४१<br><br>विषयेषु समासेन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः।<br>चित्तस्य धारणा प्रोक्ता स्थानबन्धः समासतः॥ ४२ | प्रणवका जप स्वाध्याय कहा जाता है और वह जप तीन प्रकारका कहा गया है। वाचिक जप अधम, उपांशु (मन्द स्वरात्मक) जप मुख्य (उत्तम) तथा मानस जप उत्तमोत्तम है, जो पंचाक्षर कल्पमें विस्तारसे बताये गये हैं। इस प्रकार मन, वचन तथा शारीरिक क्रियाओंसे शिवका प्रणीधान और गुरुके प्रति निश्चल तथा प्रतिष्ठित भक्तिको शिव-ज्ञान कहा गया है। विषयोंमें आसक्त इन्द्रियोंको शीघ्र ही उनसे हटाकर इन्द्रियोंपर नियन्त्रण करनेको संक्षेपमें प्रत्याहार कहा गया है और हृदय आदि स्थानोंमें चित्तको रोकनेकी क्रिया संक्षेपमें धारणा कही गयी है॥ ३९-४२॥ |