भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 43

अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों ( चक्रों )-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप ४१


विण्मूत्रोत्सर्गकालेषु बहिर्भूमौ यथामतिः।<br>तथा कार्या रतौ चापि स्वदारे चान्यतः कुतः॥ २२जमीनपर मल तथा मूत्रके त्यागके समय जैसी मनःस्थिति होती है, वैसी ही मनोदशा अपनी पत्नीके साथ संभोगकालमें बनानी चाहिये, फिर अन्यकी तो बात ही क्या!॥ २२॥
अङ्गारसदृशी नारी घृतकुम्भसमः पुमान्।<br>तस्मान्नारीषु संसर्गं दूरतः परिवर्जयेत्॥ २३स्त्री प्रज्वलित अंगारके समान तथा पुरुष घीके घड़ेके समान होता है, अतएव दूरसे ही नारियोंका संसर्ग छोड़ देना चाहिये॥ २३॥
भोगेन तृप्तिर्नैवास्ति विषयाणां विचारतः।<br>तस्माद्विरागः कर्तव्यो मनसा कर्मणा गिरा॥ २४विषयोंके भोगसे इन्द्रियोंकी तृप्ति नहीं होती, अतएव विचारपूर्वक मन, वाणी तथा कर्मसे भोगोंके प्रति विरक्तिका भाव रखना चाहिये॥ २४॥
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।<br>हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥ २५विषयोंके उपभोगसे कामनाओंकी शान्ति कभी भी नहीं होती है। यह कामना आहुति डालनेपर अग्निकी भाँति पुनः बढ़ती ही जाती है॥ २५॥
तस्मात्त्यागः सदा कार्यस्त्वमृतत्वाय योगिना।<br>अविरक्तो यतो मर्त्यो नानायोनिषु वर्तते॥ २६अतः योगीको अमृतत्व-प्राप्तिके निमित्त भोगोंका सदाके लिये त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि मनुष्य वैराग्य-वृत्ति न रखनेके कारण अनेक योनियोंमें जन्म लेता रहता है॥ २६॥
त्यागेनैवामृतत्वं हि श्रुतिस्मृतिविदां वराः।<br>कर्मणा प्रजया नास्ति द्रव्येण द्विजसत्तमाः॥ २७श्रुतियों तथा स्मृतियोंके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ हे मुनीश्वरो! त्यागसे ही अमृतत्वकी प्राप्ति सम्भव है। कर्मसे, सन्तानसे तथा द्रव्य आदि किसी भी साधनसे अमृतत्वकी प्राप्ति नहीं हो सकती॥ २७॥
तस्माद्विरागः कर्तव्यो मनोवाक्कायकर्मणा।<br>ऋतौ ऋतौ निवृत्तिस्तु ब्रह्मचर्यमिति स्मृतम्॥ २८इसीलिये सद्गृहस्थ प्राणीको चाहिये कि वह मनसा, वाचा, कर्मणा विषयोंसे राग-निवृत्ति करें; क्योंकि ऋतुकालको छोड़कर समागमकी अनाकांक्षाको भी ब्रह्मचर्य कहा गया है॥ २८॥
यमाः सङ्क्षेपतः प्रोक्ता नियमांश्च वदामि वः।<br>शौचमिज्या तपो दानं स्वाध्यायोपस्थनिग्रहः॥ २९[हे मुनियो!] मैंने संक्षेपमें यमोंके विषयमें बता दिया और अब आपलोगोंसे नियमोंका वर्णन करता हूँ। शौच, यज्ञ, तप, दान, स्वाध्याय, इन्द्रियनिग्रह, व्रत, उपवास, मौन तथा स्नान—ये दस प्रकारके नियम हैं॥ २९ १/२॥
व्रतोपवासमौनं च स्नानं च नियमा दश।<br>नियमः स्यादनीहा च शौचं तुष्टिस्तपस्तथा॥ ३०आकांक्षाराहित्य, शुचिता, सन्तुष्टि, तप, जप एवं भगवान् शिवसे सम्बन्ध स्थापित करना तथा पद्मासन आदि—ये नियम हैं॥ ३० १/२॥
जपः शिवप्रणीधानं पद्मकाद्यं तथासनम्।<br>बाह्यामाभ्यन्तरं प्रोक्तं शौचमाभ्यन्तरं वरम्॥ ३१