भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 42
४०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
न करना), ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह भी यमके आधार हैं। नियमका भी मूल यही यम है; इसमें कोई संदेह नहीं है॥ १०-११॥
आत्मवत्सर्वभूतानां हितायैव प्रवर्तनम्।<br>अहिंसैषा समाख्याता या चात्मज्ञानसिद्धिदा॥ १२सभी प्राणियोंमें आत्मवत् दृष्टि रखकर उनके हितके लिये प्रवृत्त रहनेको अहिंसा कहा गया है। इस अहिंसासे आत्मज्ञानकी सिद्धि प्राप्त होती है॥ १२॥
दृष्टं श्रुतं चानुमितं स्वानुभूतं यथार्थतः।<br>कथनं सत्यमित्युक्तं परपीडाविवर्जितम्॥ १३जैसा देखा गया हो, सुना गया हो, अनुमान किया गया हो तथा स्वयं अनुभव किया गया हो—उसे ठीक उसी तरहसे दूसरोंको कष्ट न पहुँचाते हुए कह देना ही 'सत्य' कहा जाता है॥ १३॥
नाश्लीलं कीर्तयेदेवं ब्राह्मणानामिति श्रुतिः।<br>परदोषान् परिज्ञाय न वदेदिति चापरम्॥ १४ब्राह्मण तथा वेद ऐसा कहते हैं कि अश्लील बातें नहीं करनी चाहिये और दूसरोंके दोष जानकर भी उसे अन्य व्यक्तिसे नहीं कहना चाहिये॥ १४॥
अनादानं परस्वानामापद्यपि विचारतः।<br>मनसा कर्मणा वाचा तदस्तेयं समासतः॥ १५विपत्तिकालमें भी विचारपूर्वक मन, वचन तथा कर्मसे दूसरोंका द्रव्य न लेना ही संक्षेपमें अस्तेय (चोरी न करना) कहा जाता है॥ १५॥
मैथुनस्याप्रवृत्तिर्हि मनोवाक्कायकर्मणा।<br>ब्रह्मचर्यमिति प्रोक्तं यतीनां ब्रह्मचारिणाम्॥ १६<br><br>इह वैखानसानां च विदाराणां विशेषतः।<br>सदाराणां गृहस्थानां तथैव च वदामि वः॥ १७<br><br>स्वदारे विधिवत्कृत्वा निवृत्तिश्चान्यतः सदा।<br>मनसा कर्मणा वाचा ब्रह्मचर्यमिति स्मृतम्॥ १८यतियों, ब्रह्मचारियों तथा विशेष रूपसे पत्नीरहित संन्यासियोंके द्वारा मन, वचन तथा कर्मसे मैथुनमें प्रवृत्ति न रखना—उनके लिये ब्रह्मचर्य कहा गया है। पत्नीयुक्त गृहस्थोंके (ब्रह्मचर्यके) विषयमें मैं अब आपलोगोंको बताता हूँ। मन, वाणी तथा कर्मसे परनारीमें सदा भोगकी प्रवृत्ति न रखते हुए अपनी पत्नीके साथ उचित समयपर प्रसंग करना ब्रह्मचर्य कहा गया है॥ १६—१८॥
मेध्या स्वनारी सम्भोगं कृत्वा स्नानं समाचरेत्।<br>एवं गृहस्थो युक्तात्मा ब्रह्मचारी न संशयः॥ १९यद्यपि अपनी स्त्री भोगकालमें पवित्र होती है, फिर भी उसके साथ संभोगके अनन्तर स्नान कर लेना चाहिये। ऐसा करनेवाला पवित्रात्मा गृहस्थ निःसंदेह ब्रह्मचारी ही कहा जाता है॥ १९॥
अहिंसाप्येवमेवैषा द्विजगुरुवग्निपूजने।<br>विधिना तादृशी हिंसा सा त्वहिंसा इति स्मृता॥ २०[जैसे शास्त्रविहित स्वदाराप्रवृत्त गृहस्थ ब्रह्मचारी ही है, ठीक वैसे ही] द्विज, गुरु, अग्नि (यज्ञ), पूजनके निमित्त शास्त्रविहित की गयी हिंसा भी अहिंसा ही मानी जाती है॥ २०॥
स्त्रियः सदा परित्याज्याः सङ्गं नैव च कारयेत्।<br>कुणपेषु यथा चित्तं तथा कुर्याद्विचक्षणः॥ २१स्त्रियोंका सदैव त्याग करना चाहिये। उनके सान्निध्यसे बचना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको स्त्रियोंमें वही वृत्ति रखनी चाहिये, जैसी चित्तवृत्ति शवमें रखी जाती है॥ २१॥