श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| न करना), ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह भी यमके आधार हैं। नियमका भी मूल यही यम है; इसमें कोई संदेह नहीं है॥ १०-११॥ | |
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| आत्मवत्सर्वभूतानां हितायैव प्रवर्तनम्।<br>अहिंसैषा समाख्याता या चात्मज्ञानसिद्धिदा॥ १२ | सभी प्राणियोंमें आत्मवत् दृष्टि रखकर उनके हितके लिये प्रवृत्त रहनेको अहिंसा कहा गया है। इस अहिंसासे आत्मज्ञानकी सिद्धि प्राप्त होती है॥ १२॥ |
| दृष्टं श्रुतं चानुमितं स्वानुभूतं यथार्थतः।<br>कथनं सत्यमित्युक्तं परपीडाविवर्जितम्॥ १३ | जैसा देखा गया हो, सुना गया हो, अनुमान किया गया हो तथा स्वयं अनुभव किया गया हो—उसे ठीक उसी तरहसे दूसरोंको कष्ट न पहुँचाते हुए कह देना ही 'सत्य' कहा जाता है॥ १३॥ |
| नाश्लीलं कीर्तयेदेवं ब्राह्मणानामिति श्रुतिः।<br>परदोषान् परिज्ञाय न वदेदिति चापरम्॥ १४ | ब्राह्मण तथा वेद ऐसा कहते हैं कि अश्लील बातें नहीं करनी चाहिये और दूसरोंके दोष जानकर भी उसे अन्य व्यक्तिसे नहीं कहना चाहिये॥ १४॥ |
| अनादानं परस्वानामापद्यपि विचारतः।<br>मनसा कर्मणा वाचा तदस्तेयं समासतः॥ १५ | विपत्तिकालमें भी विचारपूर्वक मन, वचन तथा कर्मसे दूसरोंका द्रव्य न लेना ही संक्षेपमें अस्तेय (चोरी न करना) कहा जाता है॥ १५॥ |
| मैथुनस्याप्रवृत्तिर्हि मनोवाक्कायकर्मणा।<br>ब्रह्मचर्यमिति प्रोक्तं यतीनां ब्रह्मचारिणाम्॥ १६<br><br>इह वैखानसानां च विदाराणां विशेषतः।<br>सदाराणां गृहस्थानां तथैव च वदामि वः॥ १७<br><br>स्वदारे विधिवत्कृत्वा निवृत्तिश्चान्यतः सदा।<br>मनसा कर्मणा वाचा ब्रह्मचर्यमिति स्मृतम्॥ १८ | यतियों, ब्रह्मचारियों तथा विशेष रूपसे पत्नीरहित संन्यासियोंके द्वारा मन, वचन तथा कर्मसे मैथुनमें प्रवृत्ति न रखना—उनके लिये ब्रह्मचर्य कहा गया है। पत्नीयुक्त गृहस्थोंके (ब्रह्मचर्यके) विषयमें मैं अब आपलोगोंको बताता हूँ। मन, वाणी तथा कर्मसे परनारीमें सदा भोगकी प्रवृत्ति न रखते हुए अपनी पत्नीके साथ उचित समयपर प्रसंग करना ब्रह्मचर्य कहा गया है॥ १६—१८॥ |
| मेध्या स्वनारी सम्भोगं कृत्वा स्नानं समाचरेत्।<br>एवं गृहस्थो युक्तात्मा ब्रह्मचारी न संशयः॥ १९ | यद्यपि अपनी स्त्री भोगकालमें पवित्र होती है, फिर भी उसके साथ संभोगके अनन्तर स्नान कर लेना चाहिये। ऐसा करनेवाला पवित्रात्मा गृहस्थ निःसंदेह ब्रह्मचारी ही कहा जाता है॥ १९॥ |
| अहिंसाप्येवमेवैषा द्विजगुरुवग्निपूजने।<br>विधिना तादृशी हिंसा सा त्वहिंसा इति स्मृता॥ २० | [जैसे शास्त्रविहित स्वदाराप्रवृत्त गृहस्थ ब्रह्मचारी ही है, ठीक वैसे ही] द्विज, गुरु, अग्नि (यज्ञ), पूजनके निमित्त शास्त्रविहित की गयी हिंसा भी अहिंसा ही मानी जाती है॥ २०॥ |
| स्त्रियः सदा परित्याज्याः सङ्गं नैव च कारयेत्।<br>कुणपेषु यथा चित्तं तथा कुर्याद्विचक्षणः॥ २१ | स्त्रियोंका सदैव त्याग करना चाहिये। उनके सान्निध्यसे बचना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको स्त्रियोंमें वही वृत्ति रखनी चाहिये, जैसी चित्तवृत्ति शवमें रखी जाती है॥ २१॥ |