श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप [ ३९
आठवाँ अध्याय
शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन, योगका स्वरूप, अष्टांगयोगका वर्णन, विषयभोगोंकी निस्सारता, प्राणायामकी महिमा, सदाशिवके ध्यानका स्वरूप
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>सङ्क्षेपतः प्रवक्ष्यामि योगस्थानानि साम्प्रतम्।<br>कल्पितानि शिवेनैव हिताय जगतां द्विजाः॥ १॥ | **सूतजी बोले—**हे द्विजो! अब मैं भगवान् शंकरके द्वारा जगत्के हितार्थ कल्पित किये गये योगस्थानोंका संक्षेपमें वर्णन करूँगा॥ १॥ |
| गलादधो वितस्त्या यन्नाभेरुपरि चोत्तमम्।<br>योगस्थानमधो नाभेरावर्तं मध्यमं भ्रुवोः॥ २॥ | गलेसे नीचे तथा नाभिसे ऊपरका वितस्ति (बारह अँगल) परिमाणवाला [हृत्कमल नामक] स्थान योगके लिये उत्तम स्थान है। इसी प्रकार नाभिसे नीचे मूलाधार नामक तथा दोनों भृकुटियोंके मध्यमें आवर्त [आज्ञाचक्र] नामक स्थान भी योगस्थान है॥ २॥ |
| सर्वार्थज्ञाननिष्पत्तिरात्मनो योग उच्यते।<br>एकाग्रता भवेच्चैव सर्वदा तत्प्रसादतः॥ ३॥ | जीवको परमार्थ तत्त्वका ज्ञान प्राप्त होना ही योग कहा जाता है और चित्तकी एकाग्रता सर्वदा उन्हीं शिवके अनुग्रहसे होती है॥ ३॥ |
| प्रसादस्य स्वरूपं यत्स्वसंवेद्यं द्विजोत्तमाः।<br>वक्तुं न शक्यं ब्रह्माद्यैः क्रमशो जायते नृणाम्॥ ४॥ | हे श्रेष्ठ द्विजो! उस अनुग्रहका स्वरूप स्वसंवेद्य है अर्थात् स्वानुभूतिका विषय है। ब्रह्मा आदि भी उस स्वरूपका वर्णन नहीं कर सकते। मनुष्य धीरे-धीरे उस स्वरूपको योगके माध्यमसे जान लेता है॥ ४॥ |
| योगशब्देन निर्वाणं माहेशं पदमुच्यते।<br>तस्य हेतुर्ऋषेर्ज्ञानं ज्ञानं तस्य प्रसादतः॥ ५॥ | योगसाधनासे प्राप्त निर्वाण माहेश्वर पद कहा जाता है। उस निर्वाणका हेतु रुद्रका ज्ञान हो जाना ही है और वह ज्ञान उन्हींकी कृपासे होता है॥ ५॥ |
| ज्ञानेन निर्दहेत्पापं निरुध्य विषयान् सदा।<br>निरुद्धेन्द्रियवृत्तेस्तु योगसिद्धिर्भविष्यति॥ ६॥ | जो सभी इन्द्रियोंको नियन्त्रित करके उस ज्ञानसे पापोंको जला डालता है, इन्द्रियोंकी वृत्तियोंपर नियन्त्रण रखनेवाले उस प्राणीको योगकी सिद्धि अवश्य होती है॥ ६॥ |
| योगो निरोधो वृत्तेषु चित्तस्य द्विजसत्तमाः।<br>साधनान्यष्टधा चास्य कथितानीह सिद्धये॥ ७॥ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! चित्तकी वृत्तियोंपर नियन्त्रण करना ही योग है। सिद्धिप्राप्तिके लिये इस योगके आठ प्रकारके साधन यहाँ बताये गये हैं॥ ७॥ |
| यमस्तु प्रथमः प्रोक्तो द्वितीयो नियमस्तथा।<br>तृतीयमासनं प्रोक्तं प्राणायामस्ततः परम्॥ ८॥<br><br>प्रत्याहारः पञ्चमो वै धारणा च ततः परा।<br>ध्यानं सप्तममित्युक्तं समाधिस्त्वष्टमः स्मृतः॥ ९॥ | पहला साधन यम, दूसरा नियम, तीसरा आसन, चौथा प्राणायाम, पाँचवाँ प्रत्याहार, छठाँ धारणा, सातवाँ ध्यान तथा आठवाँ साधन समाधि कहा गया है॥ ८-९॥ |
| तपस्युपरमश्चैव यम इत्यभिधीयते।<br>अहिंसा प्रथमो हेतुर्यमस्य यमिनां वराः॥ १०॥<br><br>सत्यमस्तेयमपरं ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ।<br>नियमस्यापि वै मूलं यम एव न संशयः॥ ११॥ | तपमें प्रवृत्ति तथा विषय-भोगोंसे निवृत्तिको यम कहते हैं। यमकी साधना करनेवालोंमें श्रेष्ठ हे मुनियो! यमका प्रथम हेतु अहिंसा है। पुनः सत्य, अस्तेय (चोरी |