भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 47

अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप ४५


नागः कूर्मस्तु कृकलो देवदत्तो धनञ्जयः।<br>एतेषां यः प्रसादस्तु मरुतामिति संस्मृतः॥ ६२देवदत्त तथा धनंजय—इनकी जो प्रसन्नता है, उसे मरुतोंका प्रसाद कहा गया है॥ ६०—६२॥
प्रयाणं कुरुते तस्माद्वायुः प्राण इति स्मृतः।<br>अपानयत्यपानस्तु आहारादीन् क्रमेण च॥ ६३<br><br>व्यानो व्यानामयत्यङ्गं व्याध्यादीनां प्रकोपकः।<br>उद्वेजयति मर्माणि उदानोऽयं प्रकीर्तितः॥ ६४<br><br>समं नयति गात्राणि समानः पञ्च वायवः।<br>उद्गारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने तु सः॥ ६५<br><br>कृकलः क्षुत्कायैव देवदत्तो विजृम्भणे।<br>धनञ्जयो महाघोषः सर्वगः स मृतेऽपि हि॥ ६६जो वायु प्रयाण करता है, इसी कारण उस वायुको प्राणवायु कहा गया है। जो वायु आहार आदिको नीचेकी ओर क्रमसे ले जाता है, उसे अपान, सभी अंगोंमें जो वायु व्याप्त रहता है उसे व्यान तथा व्याधि आदिका प्रकोप जो वायु मर्मोंमें उद्वेजन पैदा करता है उसे उदान एवं जो वायु गात्रोंमें समता करता है, उसे समान वायु कहा गया है। इस प्रकार ये पाँच वायु हुए। इसी तरह उद्गार (डकार आदि)-के समय क्रियाशील वायुको नाग, उन्मीलन-अवस्थामें क्रियाशील वायुको कूर्म, छींक आदिमें आनेवाली वायुको कृकल, जम्हाईमें क्रियाशील वायु देवदत्त तथा महाघोष करनेवाले वायुका नाम धनंजय है, वह मरनेपर भी सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त रहता है॥ ६३—६६॥
इति यो दशवायूनां प्राणायामेन सिध्यति।<br>प्रसादोऽस्य तुरीया तु संज्ञा विप्राश्चतुष्टये॥ ६७हे विप्रो! जो इन दस वायुओंको प्राणायामसे सिद्ध कर लेता है, वह शान्ति आदि चतुष्टयके प्रसादकी प्राप्ति कर लेता है। इन वायुओंका प्रसाद ही (शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति तथा प्रसाद नामक सिद्धियोंमें चतुर्थ प्रसाद नामक सिद्धिको) 'तुरीया' सिद्धि कहा जाता है॥ ६७॥
विस्वरस्तु महान् प्रज्ञा मनो ब्रह्मा चितिः स्मृतिः।<br>ख्यातिः संवित्ततः पश्चादीश्वरो मतिरेव च॥ ६८<br><br>बुद्धेरेताः द्विजाः संज्ञा महतः परिकीर्तिताः।<br>अस्या बुद्धेः प्रसादस्तु प्राणायामेन सिद्ध्यति॥ ६९विस्वर, महान्, प्रज्ञा, मन, ब्रह्मा, चिति, स्मृति, ख्याति, संवित्, ईश्वर तथा मति—ये सब महत्तत्त्वस्वरूप बुद्धिके नाम हैं। हे विप्रो! इस बुद्धिका प्रसाद प्राणायामसे ही सिद्ध होता है॥ ६८-६९॥
विस्वरो विस्वरीभावो द्वन्द्वानां मुनिसत्तमाः।<br>अग्रजः सर्वतत्त्वानां महान् यः परिमाणतः॥ ७०<br><br>यत्प्रमाणगुहा प्रज्ञा मनस्तु मनुते यतः।<br>बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च ब्रह्मा ब्रह्मविदां वराः॥ ७१हे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनियो! यह बुद्धि शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंका उपतापन न होनेसे विस्वर, सभी तत्त्वोंके पहले उत्पन्न होनेसे महान्, प्रमाणोंका आश्रय होनेसे प्रज्ञा, मनन करनेसे मन तथा बृहत् होने एवं वृद्धि करनेसे ब्रह्मा—ऐसी कही गयी है॥ ७०-७१॥
सर्वकर्माणि भोगार्थं यच्चिनोति चितिः स्मृता।<br>स्मरते यत्स्मृतिः सर्वं संविद्वै विन्दते यतः॥ ७२जो भोगोंके लिये समस्त कर्मोंका चयन करती है, उसे चिति कहा गया है। जो स्मरण करती है, उसे स्मृति तथा जो जानती है, उसे संवित् कहा गया है॥ ७२॥
ख्यायते यत्त्विति ख्यातिर्ज्ञानादिभिरनेकशः।<br>सर्वतत्त्वाधिपः सर्वं विजानाति यदीश्वरः॥ ७३ज्ञान आदि अनेक उपायोंसे प्रतिष्ठित करनेसे ख्यातिसंज्ञक तथा सभी तत्त्वोंका स्वामी एवं सब कुछ