भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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| ४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनुते मन्यते यस्मान्मतिर्मतिमतां वराः।<br>अर्थं बोधयते यच्च बुद्ध्यते बुद्धिरुच्यते॥ ७४जाननेके कारण ईश्वर संज्ञावाली बुद्धि कही गयी है। हे मतिमानोंमें श्रेष्ठ मुनियो ! माननेके कारण मति कही गयी है एवं अर्थको जानने तथा बोध करानेसे बुद्धि कही गयी है॥ ७३-७४॥
अस्या बुद्धेः प्रसादस्तु प्राणायामेन सिद्ध्यति।<br>दोषान् विनिर्दहेत्सर्वान् प्राणायामादसौ यमी॥ ७५इस बुद्धिका भी प्रसाद प्राणायामसे सिद्ध होता है। योगीको प्राणायामके द्वारा सभी दोषोंको दग्ध कर डालना चाहिये॥ ७५॥
पातकं धारणाभिस्तु प्रत्याहारेण निर्दहेत्।<br>विषयान् विषवद् ध्यात्वा ध्यानेनानीश्वरान् गुणान्॥ ७६<br><br>समाधिना यतिश्रेष्ठाः प्रज्ञावृद्धिं विवर्धयेत्।<br>स्थानं लब्ध्वैव कुर्वीत योगाष्टाङ्गानि वै क्रमात्॥ ७७<br><br>लब्ध्वासनानि विविधद्योगसिद्ध्यर्थमात्मवित्।<br>अदेशकाले योगस्य दर्शनं हि न विद्यते॥ ७८हे यतिश्रेष्ठ विप्रो! योगीको चाहिये कि वह धारणासे पापोंको तथा प्रत्याहारसे विषयोंको विष समझकर दग्ध कर डाले। ध्यानके द्वारा [काम-क्रोधादि] अनीश्वर गुणोंको जला डाले तथा समाधिसे बुद्धिकी वृद्धि करे। उत्तम स्थान प्राप्त करके तथा उचित आसनोंमें होकर आत्मवित् योगीको विधिपूर्वक योगके आठों अंगोंका क्रमसे अभ्यास करना चाहिये। समुचित स्थान तथा समयके बिना योगसिद्धि नहीं होती है॥ ७६-७८॥
अग्न्यभ्यासे जले वापि शुष्कपर्णचये तथा।<br>जन्तुव्याप्ते श्मशाने च जीर्णगोष्ठे चतुष्पथे॥ ७९<br><br>सशब्दे सभये वापि चैत्यवल्मीकसञ्चये।<br>अशुभे दुर्जनाक्रान्ते मशकादिसमन्विते॥ ८०<br><br>नाचरेद्देहबाधायां दौर्मनस्यादिसम्भवे।<br>सुगुप्ते तु शुभे रम्ये गुहायां पर्वतस्य तु॥ ८१<br><br>भवक्षेत्रे सुगुप्ते वा भवारामे वनेऽपि वा।<br>गृहे तु सुशुभे देशे विजने जन्तुवर्जिते॥ ८२<br><br>अत्यन्तनिर्मले सम्यक् सुप्रलिप्ते विचित्रिते।<br>दर्पणोदरसङ्काशे कृष्णागुरुसुधूपिते॥ ८३अग्निके समीप, जलमें, सूखे पत्तोंके ढेरवाले स्थानोंमें, जन्तुओंसे व्याप्त जगहपर, श्मशानपर, जीर्ण गोशालामें, चौराहेपर, शोरगुलवाले स्थानमें, डरावने स्थानमें, पत्थरों तथा वल्मीक मिट्टीके ढेरपर, अपवित्र स्थानपर, दुष्टोंके आतंकवाले स्थानपर, मच्छर आदिसे युक्त स्थानपर तथा देहबाधा और दौर्मनस्य (मानसिक कष्ट) उत्पन्न करनेवाले स्थानपर योगका अभ्यास नहीं करना चाहिये। अपितु अत्यन्त गुप्त (एकान्त), पवित्र तथा रमणीक स्थानपर, पर्वतकी गुफामें, शिवक्षेत्रमें, एकान्तमें, शिव-उद्यानमें, वनमें, पवित्र घरमें, जन्तुओंसे रहित तथा निर्जन स्थानमें योग-साधन करना चाहिये॥ ७९-८२॥
नानापुष्पसमाकीर्णे वितानोपरि शोभिते।<br>फलपल्लवमूलाढ्ये कुशपुष्पसमन्विते॥ ८४<br><br>समासनस्थो योगाङ्गान्यभ्यसेद्धृषितः स्वयम्।<br>प्रणिपत्य गुरुं पश्चाद्भवं देवीं विनायकम्॥ ८५<br><br>योगीश्वरान् सशिष्यांश्च योगं युञ्जीत योगवित्।<br>आसनं स्वस्तिकं बद्ध्वा पद्ममर्धासनं तु वा॥ ८६अत्यन्त स्वच्छ, भलीभाँति लिपे हुए, विशेष रूपसे चित्रित, दर्पणके समान स्वच्छ, कृष्ण अगरुके धूपसे सुगन्धित, अनेक प्रकारके पुष्पोंसे मण्डित, ऊपरसे चँदोवा आदिसे अलंकृत, फल-पल्लवोंसे सुशोभित तथा कुश और फूलसे युक्त दिव्य स्थानमें ठीक आसनसे बैठकर प्रसन्नतापूर्वक योगके अंगोंका अभ्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् गुरु, शिव, पार्वती, गणेश तथा शिष्योंसहित योगीश्वरोंको प्रणाम करके स्वस्तिक अथवा