भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 49

अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप ४७


श्लोकअर्थ
समजानुस्तथा धीमानेकजानुरथापि वा।<br>समं दृढासनो भूत्वा संहृत्य चरणावुभौ ॥ ८७अर्ध पद्मासन (सिद्धासन) बाँधकर योगीको योग-साधनमें प्रवृत्त हो जाना चाहिये ॥ ८३–८६ ॥
संवृतास्योपबद्धाक्ष उरो विष्टभ्य चाग्रतः।<br>पार्ष्णिभ्यां वृषणौ रक्षंस्तथा प्रजननं पुनः ॥ ८८<br><br>किञ्चिदुन्नामितशिरा दन्तैर्दन्तान संस्पृशेत्।<br>सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ ८९<br><br>तमः प्रच्छाद्य रजसा रजः सत्त्वेन छादयेत्।<br>ततः सत्त्वस्थितो भूत्वा शिवध्यानं समभ्यसेत् ॥ ९०बुद्धिमान् योगीको इस प्रकार दोनों जानु बराबर करके अथवा एक जानुमें स्थित होकर वृषण तथा लिङ्गको दोनों पार्ष्णि (एड़ियों)-के बीच करके दृढ़ आसन लगाकर तथा मुखको बन्द करके सिरको कुछ ऊँचा उठाकर दाँतोंका परस्पर स्पर्श बचाते हुए, सभी ओरसे दृष्टिको रोककर, उन्मीलित नेत्रोंसे अपने नासिकाग्रपर दृष्टि केन्द्रित करके तथा वक्षःस्थलको आगेकी ओर उन्नतकर तमोगुणको रजोगुणसे तथा रजोगुणको सत्त्वगुणसे आच्छादित करना चाहिये। इस प्रकार केवल सत्त्वगुणमें स्थित होकर शिवध्यानका अभ्यास करना चाहिये ॥ ८७–९० ॥
ॐकारवाच्यं परमं शुद्धं दीपशिखाकृतिम्।<br>ध्यायेद्धृदि पुण्डरीकस्य कर्णिकायां समाहितः ॥ ९१<br><br>नाभेरधस्ताद्वा विद्वान् ध्यात्वा कमलमुत्तमम्।<br>त्र्यङ्गुले चाष्टकोणं वा पञ्चकोणमथापि वा ॥ ९२<br><br>त्रिकोणं च तथाग्नेयं सौम्यं सौरं स्वशक्तिभिः।<br>सौरं सौम्यं तथाग्नेयमथवानुक्रमेण तु ॥ ९३<br><br>आग्नेयं च ततः सौरं सौम्यमेवं विधानतः।<br>अग्नेरधः प्रकल्प्यैवं धर्मादीनां चतुष्टयम् ॥ ९४<br><br>गुणत्रयं क्रमेणैव मण्डलोपरि भावयेत्।<br>सत्त्वस्थं चिन्तयेद्रुद्रं स्वशक्त्या परिमण्डितम् ॥ ९५समाहितचित्त होकर साधकको परम शुद्ध दीपशिखाकी आकृतिवाले तथा ओंकार नामसे अभिहित उस परमात्माका अपने हृदयकमलकी कर्णिकामें ध्यान करना चाहिये अथवा विद्वान् साधकको नाभिसे तीन अंगुल नीचे अष्टकोणात्मक, पंचकोणात्मक अथवा त्रिकोणात्मक उत्तम कमलका ध्यान करके उसमें क्रमानुसार अपनी शक्तियोंसहित अग्निमण्डल, चन्द्रमण्डल, सूर्यमण्डल अथवा सूर्य-चन्द्र-अग्निमण्डल अथवा अग्नि, सूर्य, चन्द्रमण्डलका विधिवत् ध्यान करते हुए अग्निके नीचे धर्म आदि चतुष्टय (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य)-की कल्पना करके मण्डलोंके ऊपर सत्त्व, रज तथा तमकी भावना करते हुए पार्वतीसे सुशोभित सत्त्वस्थित रुद्रका चिन्तन करना चाहिये ॥ ९१–९५ ॥
नाभौ वाथ गले वापि भ्रूमध्ये वा यथाविधि।<br>ललाटफलिकायां वा मूर्ध्नि ध्यानं समाचरेत् ॥ ९६इसी प्रकार नाभि, कण्ठ, भ्रूमध्य, ललाटपट्ट अथवा मस्तकमें विधिके अनुसार शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ ९६ ॥
द्विदले षोडशारे वा द्वादशारे क्रमेण तु।<br>दशारे वा षडस्रे वा चतुरस्रे स्मरेच्छिवम् ॥ ९७क्रमानुसार द्विदल, षोडशदल, द्वादशदल, दशदल, षड्दल अथवा चतुर्दल कमलमें शंकरजीका ध्यान करना चाहिये ॥ ९७ ॥
कनकाभे तथाङ्गारसन्निभे सुसितेऽपि वा।<br>द्वादशादित्यसङ्काशे चन्द्रबिम्बसमेऽपि वा ॥ ९८<br><br>विद्युत्कोटिनिभे स्थाने चिन्तयेत्परमेश्वरम्।<br>अग्निवर्णेऽथ वा विद्युद्वलयाभे समाहितः ॥ ९९स्वर्णकी आभावाले तथा अंगारके सदृश, महाश्वेत, द्वादश सूर्यके समान दीप्त, चन्द्रबिम्बके सदृश, करोड़ों विद्युत्के समान प्रभाववाले, अग्निवर्णके सदृश, विद्युत्-वलयके