भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| ४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| | तुल्य आभावाले उन-उन स्थानोंमें साधकको समाहितचित्त होकर परमेश्वरका चिन्तन करना चाहिये ॥ ९८-९९ ॥ | | वज्रकोटिप्रभे स्थाने पद्मरागनभेऽपि वा।<br>नीललोहितबिम्बे वा योगी ध्यानं समभ्यसेत्॥ १०० | करोड़ों वज्रकी प्रभाववाले अथवा पद्मरागके सादृश्यवाले अथवा नीललोहित बिम्ब (सूर्यबिम्ब)-तुल्य स्थानमें योगीको शिवध्यान करना चाहिये ॥ १०० ॥ | | महेश्वरं हृदि ध्यायेन्नाभिपद्मे सदाशिवम्।<br>चन्द्रचूडं ललाटे तु भ्रूमध्ये शङ्करं स्वयम्॥ १०१<br>दिव्ये च शाश्वतस्थाने शिवध्यानं समभ्यसेत्। | हृदयप्रदेशमें महेश्वरका, नाभिकमलमें सदाशिवका, ललाटमें चन्द्रचूडका, भ्रूमध्यमें साक्षात् शंकरका तथा दिव्य शाश्वत स्थान मूर्धमें शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ १०१ १/२ ॥ | | निर्मलं निष्कलं ब्रह्म सुशान्तं ज्ञानरूपिणम्॥ १०२<br>अलक्षणमनिर्देश्यमणोरल्पतरं शुभम्।<br>निरालम्बमतर्क्यं च विनाशोत्पत्तिवर्जितम्॥ १०३<br>कैवल्यं चैव निर्वाणं निःश्रेयसमनुपमम्।<br>अमृतं चाक्षरं ब्रह्म ह्यपुनर्भवमद्भुतम्॥ १०४<br>महानन्दं परानन्दं योगानन्दमनामयम्।<br>हेयोपादेयरहितं सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं शिवम्॥ १०५<br>स्वयं वेद्यमवेद्यं तच्छिवं ज्ञानमयं परम्।<br>अतीन्द्रियमनाभासं परं तत्त्वं परात्परम्॥ १०६<br>सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं ध्यानगम्यं विचारतः।<br>अद्वयं तमसश्चैव परस्तात्संस्थितं परम्॥ १०७<br>मनस्येवं महादेवं हृत्पद्मे वापि चिन्तयेत्।<br>नाभौ सदाशिवं चापि सर्वदेवात्मकं विभुम्॥ १०८ | वे शिव निर्मल हैं, कला अथवा अवयवसे रहित हैं, ब्रह्मरूप हैं, शान्त हैं, ज्ञानस्वरूप हैं, लक्षणोंसे रहित हैं, अनिर्देश्य हैं, अणुसे भी सूक्ष्म हैं, कल्याणकारी हैं, आश्रयरहित हैं, तर्कोंसे परे हैं, उत्पत्ति तथा विनाशसे रहित हैं, मोक्षरूप हैं, परम गति हैं, कल्याणरूप हैं, उपमारहित हैं, अमृतस्वरूप हैं, अविनाशी हैं, पुनर्भावरहित ब्रह्मस्वरूप हैं, अद्भुत हैं, महानन्द हैं, परानन्द हैं, योगानन्द हैं, व्याधिरहित हैं, त्याग तथा ग्रहणसे रहित हैं, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर हैं, कल्याणमय हैं, स्वयंवेद्य हैं, अवेद्य हैं, परम ज्ञानयुक्त हैं, इन्द्रियोंकी पहुँचसे परे हैं, आभाससे परे हैं, परम तत्त्व हैं, परात्पर हैं, सभी उपाधियोंसे मुक्त हैं, विचारणापूर्वक ध्यान करनेसे प्राप्त होनेवाले हैं, एकरूप हैं तथा तमसे भी बढ़कर परम रूपमें स्थित हैं। ऐसे महादेवका हृदयकमलमें ध्यान करना चाहिये तथा नाभिमें सर्वदेवात्मक प्रभु सदाशिवका ध्यान करना चाहिये ॥ १०२-१०८ ॥ | | देहमध्ये शिवं देवं शुद्धज्ञानमयं विभुम्।<br>कन्यसेनेव मार्गेण चोद्घातेनापि शङ्करम्॥ १०९<br>क्रमशः कन्यसेनैव मध्यमेनापि सुव्रतः।<br>उत्तमेनापि वै विद्वान् कुम्भकेन समभ्यसेत्॥ ११० | विद्वान् तथा सुव्रत साधकको चाहिये कि वह शरीरके भीतर सुषुम्णा मार्गसे क्रमशः बारह मात्रात्मक मन्द कुम्भक, चौबीस मात्रात्मक मध्यम कुम्भक तथा छत्तीस मात्रात्मक उत्तम कुम्भकके द्वारा कल्याणप्रद, शुद्ध, देवस्वरूप तथा ज्ञानसम्पन्न प्रभु शंकरका ध्यान करे ॥ १०९-११० ॥ | | द्वात्रिंशद्रेचयेद्धीमान् हृदि नाभौ समाहितः।<br>रेचकं पूरकं त्यक्त्वा कुम्भकं च द्विजोत्तमाः॥ १११<br>साक्षात्समरसेनैव देहमध्ये स्मरेच्छिवम्।<br>एकीभावं समेत्यैवं तत्र यद्रससम्भवम्॥ ११२ | हृदयकमल तथा नाभिकमलमें ध्यान केन्द्रित करके बुद्धिमान् साधकको बत्तीस मात्रात्मक रेचक करना चाहिये। अथवा हे उत्तम द्विजो! रेचक तथा पूरक छोड़कर केवल कुम्भकमें ही स्थिर रहकर समरसतापूर्वक अपने हृदयमें साक्षात् शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ १११ १/२ ॥ |