श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ९ ] योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न)...'पाशुपतयोगकी प्राप्ति ४९
| आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् साक्षात्समरसे स्थितः ।<br>धारणा द्वादशायामा ध्यानं द्वादश धारणम् ॥ ११३<br><br>ध्यानं द्वादशकं यावत्समाधिरभिधीयते ।<br>अथवा ज्ञानिनां विप्राः सम्पर्कादेव जायते ॥ ११४<br><br>प्रयत्नाद्वा तयोस्तुल्यं चिराद्वा ह्याचिराद् द्विजाः ।<br>योगान्तरायास्तस्याथ जायन्ते युञ्जतः पुनः ॥ ११५<br><br>नश्यन्त्यभ्यासत्तस्तेऽपि प्रणिधानेन वै गुरोः ॥ ११६ | इस प्रकार समरसमें स्थित विद्वान् साधक ईश्वर तथा जीवके ऐक्यको प्राप्त होकर उस रसजनित ब्रह्मानन्दकी प्राप्ति कर लेता है॥ ११२ १/२ ॥<br>बारह प्राणायामोंकी एक धारणा होती है, बारह धारणाओंका एक ध्यान होता है तथा बारह ध्यानोंकी एक समाधि कही जाती है॥ ११३ १/२ ॥<br>हे विप्रो! यह योगसिद्धि ज्ञानियोंके समागमसे अथवा प्रयत्न करनेसे प्राप्त होती है। वे दोनों साधन समान ही हैं। यह सिद्धि पूर्वजन्मके योगाभ्यासी साधकको शीघ्र तथा नवीनाभ्यासी साधकको विलम्बसे प्राप्त होती है। हे द्विजो! योगसाधनकी अवधिमें बार-बार विघ्न भी उत्पन्न होते हैं, किंतु वे विघ्न निरन्तर अभ्यास करनेसे तथा गुरुके सान्निध्यसे नष्ट भी हो जाते हैं॥ ११४-११६ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽष्टाङ्गयोगनिरूपणं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अष्टांगयोगनिरूपण' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥
नौवाँ अध्याय
योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न), योगसे प्राप्त होनेवाली विघ्नरूप विभिन्न सिद्धियाँ तथा ऐश्वर्य, गुणवैतृष्ण्य तथा वैराग्यसे पाशुपतयोगकी प्राप्ति
| सूत उवाच<br>आलस्यं प्रथमं पश्चाद् व्याधिपीडा प्रजायते ।<br>प्रमादः संशयस्थाने चित्तस्येहानवस्थितिः ॥ १<br><br>अश्रद्धादर्शनं भ्रान्तिर्दुःखं च त्रिविधं ततः ।<br>दौर्मनस्यमयोग्येषु विषयेषु च योगता ॥ २<br><br>दशधाभिप्रजायन्ते मुनेर्योगान्तरायकाः ।<br>आलस्यं चाप्रवृत्तिश्च गुरुत्वात्कायचित्तयोः ॥ ३<br><br>व्याधयो धातुवैषम्यात् कर्मजा दोषजास्तथा ।<br>प्रमादस्तु समाधेस्तु साधनानामभावनम् ॥ ४ | सूतजी बोले—[हे मुनीश्वरो!] योगसाधनके कालमें पहले आलस्य तथा बादमें व्याधिपीड़ा उत्पन्न होती है, इसी प्रकार प्रमाद, संशय, चित्तकी अनवस्थिति, अश्रद्धादर्शन, भ्रान्ति, त्रिविध दुःख, दौर्मनस्य (मनमें असत्संकल्प-विकल्पका होना), निषिद्ध विषयोंमें मनका लगना—ये कुल दस प्रकारके विघ्न* साधकके योगाभ्यासमें उत्पन्न होते हैं॥ १-२ १/२ ॥<br>शरीर तथा चित्तके भारीपनके कारण योगमें प्रवृत्त न होना ही आलस्य है। धातुवैषम्य (न्यूनाधिक्य)-के कारण क्रियासे होनेवाले तथा वात-पित्त आदि दोषोंसे होनेवाले विकार ही व्याधियाँ हैं। समाधिके साधनोंका अनुष्ठान न करना प्रमाद है॥ ३-४॥ |
* पातंजलयोगसूत्रमें योगके अन्तराय इस प्रकार बताये गये हैं—व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः। (पातंजलयोगप्रदीप समाधिपाद ३०) अर्थात् व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, अनवस्थितत्व—ये चित्तके नौ विक्षेप [योगके विघ्न] हैं।