श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 52, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 52
| ५० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इदं वेत्युभयस्पृक्तं विज्ञानं स्थानसंशयः।<br>अनवस्थितचित्तत्वमप्रतिष्ठा हि योगिनः॥ ५ | यह करूँ अथवा वह करूँ—इन दोनों स्थितियोंसे मिश्रित अनिश्चिततापूर्ण विज्ञानको स्थानसंशय कहा गया है। समाधि-अवस्थाको पाकर भी भवबन्धनके कारण योगीके चित्तका (लक्ष्यमें) न ठहर पाना अनवस्थित-चित्तत्व है॥ ५१/२ ॥ |
| लब्धायामपि भूमौ च चित्तस्य भवबन्धनात्।<br>अश्रद्धाभावरहिता वृत्तिर्वै साधनेषु च॥ ६ | योगके साधन, साध्य, गुरु, ज्ञान, आचार तथा भगवान् शिव आदिमें चित्तकी सद्भावरहित वृत्तिका नाम अश्रद्धा है॥ ६१/२॥ |
| साध्ये चित्तस्य हि गुरौ ज्ञानाचारशिवादिषु।<br>विपर्ययज्ञानमिति भ्रान्तिदर्शनमुच्यते॥ ७ | समाधिके समीप पहुँचकर अज्ञानताके कारण अनात्मपदार्थोंमें आत्मज्ञानरूप विपरीत ज्ञान रखना भ्रान्तिदर्शन कहा जाता है॥ ७१/२॥ |
| अनात्मन्यात्मविज्ञानमज्ञानात्तस्य सन्निधौ।<br>दुःखमाध्यात्मिकं प्रोक्तं तथा चैवाधिभौतिकम्॥ ८<br><br>आधिदैविकमित्युक्तं त्रिविधं सहजं पुनः।<br>इच्छाविघातात्सङ्क्षोभश्चेतसस्तदुदाहृतम् ॥ ९ | आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक—ये तीन प्रकारके सहज दुःख बताये गये हैं। इच्छा-विघातके कारण चित्तमें उत्पन्न विक्षोभ ही दुःख कहा गया है॥ ८-९॥ |
| दौर्मनस्यं निरोद्धव्यं वैराग्येण परेण तु।<br>तमसा रजसा चैव संस्पृष्टं दुर्मनः स्मृतम्॥ १० | परम वैराग्यके द्वारा दौर्मनस्यको नियन्त्रित करना चाहिये। तमोगुण तथा रजोगुणसे मिला हुआ यह मन दुर्मन कहा गया है। इसलिये ऐसे मनमें उत्पन्न होनेवाला दूषित भाव दौर्मनस्य कहा गया है॥ १०१/२॥ |
| तदा मनसि सञ्जातं दौर्मनस्यमिति स्मृतम्।<br>हठात्स्वीकरणं कृत्वा योग्यायोग्यविवेकतः॥ ११<br><br>विषयेषु विचित्रेषु जन्तोर्विषयलोलता।<br>अन्तराया इति ख्याता योगस्यैते हि योगिनाम्॥ १२ | योग्य तथा अयोग्य जानते हुए भी अयोग्य विषयोंके प्रति हठपूर्वक आसक्ति रखना ही विषय-लोलता है। योगियोंके योगसाधनमें इन्हें विघ्नरूप कहा गया है। अत्यन्त उत्साहसे युक्त होकर अभ्यास करनेवाले साधककी ये बाधाएँ दूर हो जाती हैं, इसमें संशय नहीं है॥ ११-१२१/२॥ |
| अत्यन्तोत्साहयुक्तस्य नश्यन्ति न च संशयः।<br>प्रनष्टेष्वन्तरायेषु द्विजाः पश्चाद्धि योगिनः॥ १३ | हे द्विजो! इन विघ्नोंके समाप्त हो जानेके उपरान्त योगीके योगसाधनमें नानाविध उपसर्ग (उपद्रव) उत्पन्न होते हैं। वे सभी उपसर्ग भी असिद्धिसूचक हैं॥ १३१/२॥ |
| उपसर्गाः प्रवर्तन्ते सर्वे तेऽसिद्धिसूचकाः।<br>प्रतिभा प्रथमा सिद्धिर्द्वितीया श्रवणा स्मृता॥ १४<br><br>वार्ता तृतीया विप्रेन्द्रास्तुरीया चेह दर्शना।<br>आस्वादा पञ्चमी प्रोक्ता वेदना षष्ठिका स्मृता॥ १५ | हे विप्रेन्द्रो! प्रतिभा पहली सिद्धि, श्रवणा दूसरी सिद्धि, वार्ता तीसरी सिद्धि, दर्शना चौथी सिद्धि, आस्वादा पाँचवीं सिद्धि तथा वेदना छठी सिद्धि कही गयी है॥ १४-१५॥ |
| स्वल्पषट्सिद्धिसन्त्यागात्सिद्धिदाः सिद्धयो मुने।<br>प्रतिभा प्रतिभावृत्तिः प्रतिभाव इति स्थितिः॥ १६ | इन प्रतिभा आदि स्वल्प षट् सिद्धियोंके आकर्षणसे मुक्त मुनिको अणिमादि सिद्धियाँ अभिलषित सिद्धि प्रदान करती हैं, प्रत्येक पदार्थविषयक अवबोधात्मक |