भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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५०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इदं वेत्युभयस्पृक्तं विज्ञानं स्थानसंशयः।<br>अनवस्थितचित्तत्वमप्रतिष्ठा हि योगिनः॥ ५यह करूँ अथवा वह करूँ—इन दोनों स्थितियोंसे मिश्रित अनिश्चिततापूर्ण विज्ञानको स्थानसंशय कहा गया है। समाधि-अवस्थाको पाकर भी भवबन्धनके कारण योगीके चित्तका (लक्ष्यमें) न ठहर पाना अनवस्थित-चित्तत्व है॥ ५१/२ ॥
लब्धायामपि भूमौ च चित्तस्य भवबन्धनात्।<br>अश्रद्धाभावरहिता वृत्तिर्वै साधनेषु च॥ ६योगके साधन, साध्य, गुरु, ज्ञान, आचार तथा भगवान् शिव आदिमें चित्तकी सद्भावरहित वृत्तिका नाम अश्रद्धा है॥ ६१/२॥
साध्ये चित्तस्य हि गुरौ ज्ञानाचारशिवादिषु।<br>विपर्ययज्ञानमिति भ्रान्तिदर्शनमुच्यते॥ ७समाधिके समीप पहुँचकर अज्ञानताके कारण अनात्मपदार्थोंमें आत्मज्ञानरूप विपरीत ज्ञान रखना भ्रान्तिदर्शन कहा जाता है॥ ७१/२॥
अनात्मन्यात्मविज्ञानमज्ञानात्तस्य सन्निधौ।<br>दुःखमाध्यात्मिकं प्रोक्तं तथा चैवाधिभौतिकम्॥ ८<br><br>आधिदैविकमित्युक्तं त्रिविधं सहजं पुनः।<br>इच्छाविघातात्सङ्क्षोभश्चेतसस्तदुदाहृतम् ॥ ९आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक—ये तीन प्रकारके सहज दुःख बताये गये हैं। इच्छा-विघातके कारण चित्तमें उत्पन्न विक्षोभ ही दुःख कहा गया है॥ ८-९॥
दौर्मनस्यं निरोद्धव्यं वैराग्येण परेण तु।<br>तमसा रजसा चैव संस्पृष्टं दुर्मनः स्मृतम्॥ १०परम वैराग्यके द्वारा दौर्मनस्यको नियन्त्रित करना चाहिये। तमोगुण तथा रजोगुणसे मिला हुआ यह मन दुर्मन कहा गया है। इसलिये ऐसे मनमें उत्पन्न होनेवाला दूषित भाव दौर्मनस्य कहा गया है॥ १०१/२॥
तदा मनसि सञ्जातं दौर्मनस्यमिति स्मृतम्।<br>हठात्स्वीकरणं कृत्वा योग्यायोग्यविवेकतः॥ ११<br><br>विषयेषु विचित्रेषु जन्तोर्विषयलोलता।<br>अन्तराया इति ख्याता योगस्यैते हि योगिनाम्॥ १२योग्य तथा अयोग्य जानते हुए भी अयोग्य विषयोंके प्रति हठपूर्वक आसक्ति रखना ही विषय-लोलता है। योगियोंके योगसाधनमें इन्हें विघ्नरूप कहा गया है। अत्यन्त उत्साहसे युक्त होकर अभ्यास करनेवाले साधककी ये बाधाएँ दूर हो जाती हैं, इसमें संशय नहीं है॥ ११-१२१/२॥
अत्यन्तोत्साहयुक्तस्य नश्यन्ति न च संशयः।<br>प्रनष्टेष्वन्तरायेषु द्विजाः पश्चाद्धि योगिनः॥ १३हे द्विजो! इन विघ्नोंके समाप्त हो जानेके उपरान्त योगीके योगसाधनमें नानाविध उपसर्ग (उपद्रव) उत्पन्न होते हैं। वे सभी उपसर्ग भी असिद्धिसूचक हैं॥ १३१/२॥
उपसर्गाः प्रवर्तन्ते सर्वे तेऽसिद्धिसूचकाः।<br>प्रतिभा प्रथमा सिद्धिर्द्वितीया श्रवणा स्मृता॥ १४<br><br>वार्ता तृतीया विप्रेन्द्रास्तुरीया चेह दर्शना।<br>आस्वादा पञ्चमी प्रोक्ता वेदना षष्ठिका स्मृता॥ १५हे विप्रेन्द्रो! प्रतिभा पहली सिद्धि, श्रवणा दूसरी सिद्धि, वार्ता तीसरी सिद्धि, दर्शना चौथी सिद्धि, आस्वादा पाँचवीं सिद्धि तथा वेदना छठी सिद्धि कही गयी है॥ १४-१५॥
स्वल्पषट्सिद्धिसन्त्यागात्सिद्धिदाः सिद्धयो मुने।<br>प्रतिभा प्रतिभावृत्तिः प्रतिभाव इति स्थितिः॥ १६इन प्रतिभा आदि स्वल्प षट् सिद्धियोंके आकर्षणसे मुक्त मुनिको अणिमादि सिद्धियाँ अभिलषित सिद्धि प्रदान करती हैं, प्रत्येक पदार्थविषयक अवबोधात्मक