श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ९ ] योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न) ... पाशुपतयोगकी प्राप्ति ५१
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| बुद्धिर्विवेचना वेद्यं बुद्ध्यते बुद्धिरुच्यते।<br>सूक्ष्मे व्यवहितेऽतीते विप्रकृष्टे त्वनागते॥ १७<br><br>सर्वत्र सर्वदा ज्ञानं प्रतिभाऽनुक्रमेण तु।<br>श्रवणात्सर्वशब्दानाम्प्रयत्नेन योगिनः॥ १८ | वृत्तिको प्रतिभा कहते हैं, विवेचनापूर्वक वेद्य वस्तुको जिससे जाना जाय, वह बुद्धि कही गयी है। अतीत (भूत), अनागत (भविष्य), सूक्ष्म, अदृष्ट, दूरस्थ, अत्यन्त समीप (वर्तमान) पदार्थोंका सर्वदा एवं सर्वत्र ज्ञान प्रदान करनेवाली प्रतिभासिका वृत्ति ही प्रतिभा है॥ १६-१७१/२॥ |
| ह्रस्वदीर्घप्लुतादीनां गुह्यानां श्रवणादपि।<br>स्पर्शस्याधिगमो यस्तु वेदना तूपपादिता॥ १९ | सभी शब्दों, ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत आदि स्वरों तथा गुह्य ध्वनियोंका बिना किसी प्रयासके श्रवण होकर उनका यथार्थ ज्ञान हो जाना श्रवणसिद्धि है और स्पर्शकी जो अनुभूति है, वह वेदनासिद्धि कही गयी है॥ १८-१९॥ |
| दर्शनाद्दिव्यरूपाणां दर्शनं चाप्रयत्नतः।<br>संविद्दिव्यरसे तस्मिन्नास्वादो ह्यप्रयत्नतः॥ २० | बिना किसी प्रयत्नके दिव्य रूपोंका भी नेत्रेन्द्रियसे दिखायी पड़ना दर्शनासिद्धि है और दिव्य रसोंका सहज रूपमें बिना किसी प्रयत्नके ठीक-ठीक ज्ञान होना आस्वादसिद्धि है। |
| वार्ता च दिव्यगन्धानां तन्मात्रा बुद्धिसंविदा।<br>विन्दन्ते योगिनस्तस्मादाब्रह्मभवनं द्विजाः॥ २१ | इसी तरह बुद्धिके द्वारा दिव्य गन्धोंका भी ठीक-ठीक गन्धतन्मात्रके रूपमें अनुभव कर लेना वार्तासिद्धि है॥ २०१/२॥<br>हे द्विजो! इस योगजनित धर्मरूप संसर्गसे योगीलोग इस जगत्में ब्रह्मलोकपर्यन्त जो सब कुछ है, उसे अपने देहमें स्थित देखते हैं। |
| जगत्यस्मिन् हि देहस्थं चतुःषष्टिगुणं समम्।<br>औपसर्गिकमेतेषु गुणेषु गुणितं द्विजाः॥ २२ | हे द्विजो! आगे बताये जानेवाले आठ गुण वृद्धिक्रमसे गुणित होकर संख्यामें चौंसठ गुणोंके बराबर हो जाते हैं॥ २१-२२॥ |
| सन्त्याज्यं सर्वथा सर्वमौपसर्गिकमात्मनः।<br>पैशाचे पार्थिवं चाप्यं राक्षसानां पुरे द्विजाः॥ २३ | हे द्विजो! साधकको अपने इन औपसर्गिक अर्थात् विघ्नकारी गुणोंका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये। पिशाचलोकमें पार्थिव गुण, राक्षसलोकमें जल- |
| याक्षे तु तैजसं प्रोक्तं गान्धर्वे श्वसनात्मकम्।<br>ऐन्द्रे व्योमात्मकं सर्वं सौम्ये चैव तु मानसम्॥ २४ | सम्बन्धी गुण, यक्षलोकमें तेजसम्बन्धी गुण, गन्धर्वलोकमें वायुसम्बन्धी गुण, इन्द्रलोकमें व्योमात्मक अर्थात् आकाशसम्बन्धी गुण, सोमलोकमें मनसम्बन्धी गुण, |
| प्राजापत्ये त्वहङ्कारं ब्राह्मे बोधमनुत्तमम्।<br>आद्ये चाष्टौ द्वितीये च तथा षोडशरूपकम्॥ २५ | प्रजापतिलोकमें अहंकारसम्बन्धी गुण तथा ब्रह्मलोकमें सर्वोत्तम बोधगुण कहे गये हैं॥ २३-२४१/२॥ |
| चतुर्विंशत्तृतीये तु द्वात्रिंशच्च चतुर्थके।<br>चत्वारिंशत् पञ्चमे तु भूतमात्रात्मकं स्मृतम्॥ २६ | पहले पार्थिवमें आठ गुण, दूसरे जलमें सोलह गुण, तीसरे तेजमें चौबीस गुण, चौथे वायुमें बत्तीस गुण तथा पाँचवें आकाशमें चालीस गुणवाले ऐश्वर्य विद्यमान हैं। |
| गन्धो रसस्तथा रूपं शब्दः स्पर्शस्तथैव च।<br>प्रत्येकमष्टधा सिद्धं पञ्चमे तच्छतक्रतोः॥ २७ | गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द पूर्वोक्त पंचमहाभूतोंकी तन्मात्राएँ कही गयी हैं। इन्द्रसम्बन्धी व्योमात्मक गुणपर्यन्त |