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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

अध्याय ९ ] योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न) ... पाशुपतयोगकी प्राप्ति ५१


श्लोकअर्थ
बुद्धिर्विवेचना वेद्यं बुद्ध्यते बुद्धिरुच्यते।<br>सूक्ष्मे व्यवहितेऽतीते विप्रकृष्टे त्वनागते॥ १७<br><br>सर्वत्र सर्वदा ज्ञानं प्रतिभाऽनुक्रमेण तु।<br>श्रवणात्सर्वशब्दानाम्प्रयत्नेन योगिनः॥ १८वृत्तिको प्रतिभा कहते हैं, विवेचनापूर्वक वेद्य वस्तुको जिससे जाना जाय, वह बुद्धि कही गयी है। अतीत (भूत), अनागत (भविष्य), सूक्ष्म, अदृष्ट, दूरस्थ, अत्यन्त समीप (वर्तमान) पदार्थोंका सर्वदा एवं सर्वत्र ज्ञान प्रदान करनेवाली प्रतिभासिका वृत्ति ही प्रतिभा है॥ १६-१७१/२॥
ह्रस्वदीर्घप्लुतादीनां गुह्यानां श्रवणादपि।<br>स्पर्शस्याधिगमो यस्तु वेदना तूपपादिता॥ १९सभी शब्दों, ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत आदि स्वरों तथा गुह्य ध्वनियोंका बिना किसी प्रयासके श्रवण होकर उनका यथार्थ ज्ञान हो जाना श्रवणसिद्धि है और स्पर्शकी जो अनुभूति है, वह वेदनासिद्धि कही गयी है॥ १८-१९॥
दर्शनाद्दिव्यरूपाणां दर्शनं चाप्रयत्नतः।<br>संविद्दिव्यरसे तस्मिन्नास्वादो ह्यप्रयत्नतः॥ २०बिना किसी प्रयत्नके दिव्य रूपोंका भी नेत्रेन्द्रियसे दिखायी पड़ना दर्शनासिद्धि है और दिव्य रसोंका सहज रूपमें बिना किसी प्रयत्नके ठीक-ठीक ज्ञान होना आस्वादसिद्धि है।
वार्ता च दिव्यगन्धानां तन्मात्रा बुद्धिसंविदा।<br>विन्दन्ते योगिनस्तस्मादाब्रह्मभवनं द्विजाः॥ २१इसी तरह बुद्धिके द्वारा दिव्य गन्धोंका भी ठीक-ठीक गन्धतन्मात्रके रूपमें अनुभव कर लेना वार्तासिद्धि है॥ २०१/२॥<br>हे द्विजो! इस योगजनित धर्मरूप संसर्गसे योगीलोग इस जगत्में ब्रह्मलोकपर्यन्त जो सब कुछ है, उसे अपने देहमें स्थित देखते हैं।
जगत्यस्मिन् हि देहस्थं चतुःषष्टिगुणं समम्।<br>औपसर्गिकमेतेषु गुणेषु गुणितं द्विजाः॥ २२हे द्विजो! आगे बताये जानेवाले आठ गुण वृद्धिक्रमसे गुणित होकर संख्यामें चौंसठ गुणोंके बराबर हो जाते हैं॥ २१-२२॥
सन्त्याज्यं सर्वथा सर्वमौपसर्गिकमात्मनः।<br>पैशाचे पार्थिवं चाप्यं राक्षसानां पुरे द्विजाः॥ २३हे द्विजो! साधकको अपने इन औपसर्गिक अर्थात् विघ्नकारी गुणोंका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये। पिशाचलोकमें पार्थिव गुण, राक्षसलोकमें जल-
याक्षे तु तैजसं प्रोक्तं गान्धर्वे श्वसनात्मकम्।<br>ऐन्द्रे व्योमात्मकं सर्वं सौम्ये चैव तु मानसम्॥ २४सम्बन्धी गुण, यक्षलोकमें तेजसम्बन्धी गुण, गन्धर्वलोकमें वायुसम्बन्धी गुण, इन्द्रलोकमें व्योमात्मक अर्थात् आकाशसम्बन्धी गुण, सोमलोकमें मनसम्बन्धी गुण,
प्राजापत्ये त्वहङ्कारं ब्राह्मे बोधमनुत्तमम्।<br>आद्ये चाष्टौ द्वितीये च तथा षोडशरूपकम्॥ २५प्रजापतिलोकमें अहंकारसम्बन्धी गुण तथा ब्रह्मलोकमें सर्वोत्तम बोधगुण कहे गये हैं॥ २३-२४१/२॥
चतुर्विंशत्तृतीये तु द्वात्रिंशच्च चतुर्थके।<br>चत्वारिंशत् पञ्चमे तु भूतमात्रात्मकं स्मृतम्॥ २६पहले पार्थिवमें आठ गुण, दूसरे जलमें सोलह गुण, तीसरे तेजमें चौबीस गुण, चौथे वायुमें बत्तीस गुण तथा पाँचवें आकाशमें चालीस गुणवाले ऐश्वर्य विद्यमान हैं।
गन्धो रसस्तथा रूपं शब्दः स्पर्शस्तथैव च।<br>प्रत्येकमष्टधा सिद्धं पञ्चमे तच्छतक्रतोः॥ २७गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द पूर्वोक्त पंचमहाभूतोंकी तन्मात्राएँ कही गयी हैं। इन्द्रसम्बन्धी व्योमात्मक गुणपर्यन्त
५२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
श्लोकअर्थ
तथाष्टचत्वारिंशच्च षट्पञ्चाशत्तथैव च।<br>चतुःषष्टिगुणं ब्राह्मं लभते द्विजसत्तमाः॥ २८॥इन पाँचोंमें प्रत्येक आठ-आठके वृद्धिक्रमसे बताये जा चुके हैं॥ २५-२७॥<br>हे उत्तम द्विजो! इसी प्रकार मनसम्बन्धी अड़तालीस गुण तथा अहंकारसम्बन्धी छप्पन गुण और अन्तमें चौंसठ गुणात्मक ब्राह्म अर्थात् बुद्धिसम्बन्धी ब्रह्मके ऐश्वर्यको साधक प्राप्त कर लेता है॥ २८॥
औपसर्गिकमाब्रह्मभुवनेषु परित्यजेत्।<br>लोकेष्वालोक्य योगेन योगवित्परमं सुखम्॥ २९॥जो योगी ब्रह्मलोकपर्यन्त सभी लोकोंमें औपसर्गिक अर्थात् योगविघ्नोंको विचारपूर्वक उनका परित्याग कर देता है, वह परम सुखी हो जाता है॥ २९॥
स्थूलता ह्रस्वता बाल्यं वार्धक्यं यौवनं तथा।<br>नानाजातिस्वरूपं च चतुर्भिर्देहधारणम्॥ ३०॥<br>पार्थिवांशं विना नित्यं सुरभिर्गन्धसंयुतः।<br>एतदष्टगुणं प्रोक्तमैश्वर्यं पार्थिवं महत्॥ ३१॥शरीरकी स्थूलता, ह्रस्वता, बालकपन, वृद्धता, यौवन, अनेकविध रूप धारण करना, बिना पार्थिव अंशके शेष चार तत्त्वोंसे देह धारण करना तथा नित्य सुगन्धिसे युक्त रहना—ये आठ प्रकारके महान् पार्थिव गुण कहे गये हैं॥ ३०-३१॥
जले निवसनं यद्वद्भूम्यामिव विनिर्गमः।<br>इच्छेच्छक्तः स्वयं पातुं समुद्रमपि नातुरः॥ ३२॥<br>यत्रेच्छति जगत्यस्मिंस्तत्रास्य जलदर्शनम्।<br>यद्यद्वस्तु समादाय भोक्तुमिच्छति कामतः॥ ३३॥<br>तत्तद्रसान्वितं तस्य त्रयाणां देहधारणम्।<br>भाण्डं विनाथ हस्तेन जलपिण्डस्य धारणम्॥ ३४॥<br>अव्रणत्वं शरीरस्य पार्थिवेन समन्वितम्।<br>एतत् षोडशकं प्रोक्तमाप्यमैश्वर्यमुत्तमम्॥ ३५॥पृथ्वीपर रहनेकी भाँति जलमें निवास करना, उससे बाहर आनेकी सामर्थ्य रखना, इच्छा होनेपर स्वयं सम्पूर्ण समुद्रका पान करनेमें समर्थ होना तथा उससे किसी प्रकारका प्रतिकूल प्रभाव न पड़ना, इस जगत्में जहाँ भी इच्छा करे, वहाँ जलका दर्शन कर लेना, जिस-जिस वस्तुका भक्षण किया जाय, उसे अपनी इच्छाके अनुसार रसयुक्त बना देना, तेज, वायु, आकाश—इन तीनोंसे देह धारण करना, बिना पात्रके हाथसे जलपिण्डका धारण करना तथा शरीरमें व्रण आदिका न होना—इन आठ तथा पूर्वोक्त पार्थिव गुणोंको मिलाकर—ये सोलह गुणात्मक आप्य (जलसम्बन्धी) उत्तम ऐश्वर्य कहे गये हैं॥ ३२-३५॥
देहादग्निविनिर्माणं तत्तापभयवर्जितम्।<br>लोकं दग्धमपीहान्यददग्धं स्वविधानतः॥ ३६॥<br>जलमध्ये हुतवहं चाधाय परिरक्षणम्।<br>अग्निन्निग्रहणं हस्ते स्मृतिमात्रेण चागमः॥ ३७॥<br>भस्मीभूतविनिर्माणं यथापूर्वं सकामतः।<br>द्वाभ्यां रूपविनिष्पत्तिर्विना तैस्त्रिभिरात्मनः॥ ३८॥<br>चतुर्विंशात्मकं ह्येतत्तैजसं मुनिपुङ्गवाः।<br>मनोगतित्वं भूतानामन्तर्निवासनं तथा॥ ३९॥हे श्रेष्ठ मुनियो! देहसे अग्निका निर्माण, अग्निके तापका भय न होना, दग्धलोकको भी अपने योगविधानसे अदग्धतुल्य अर्थात् पूर्ववत् कर देना, जलके भीतर अग्नि स्थापित करके उसे वैसे ही बनाये रखना, हाथसे आग पकड़ लेना, स्मरणमात्रसे अग्नि प्रकट कर देना, भस्म हुए पदार्थको इच्छापूर्वक पहलेकी भाँति कर देना तथा उन तीनों (पृथ्वी, जल, तेज)-के बिना दो तत्त्वों अर्थात् वायु और आकाशसे अपनी देह धारण करना—ये चौबीस गुणवाले तैजस ऐश्वर्य हैं॥ ३६-३८१/२॥
अध्याय ९ ]योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न) ... पाशुपतयोगकी प्राप्ति५३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पर्वतादिमहाभारस्कन्धेनोद्वहनं पुनः।<br>लघुत्वं च गुरुत्वं च पाणिभ्यां वायुधारणम्॥ ४०<br><br>अङ्गुल्यग्रनिघातेन भूमेः सर्वत्र कम्पनम्।<br>एकेन देहनिष्पत्तिर्वातैश्वर्यं स्मृतं बुधैः॥ ४१मनकी गति प्राप्त कर लेना अर्थात् जहाँ मनकी इच्छा हो वहाँ चले जाना, अन्य प्राणियोंके अन्तर्मनमें निवास करना, पर्वत आदि महाभार कंधेपर धारण करके चलना, हलका तथा भारी होनेकी सामर्थ्य रखना, हाथोंसे वायु पकड़ लेना, अंगुलिके अग्रभागसे आघात करके पृथ्वीमें सर्वत्र कम्पन उत्पन्न कर देना, केवल आकाश तत्त्वसे देह धारण करना—ये वातसम्बन्धी ऐश्वर्य विद्वानोंके द्वारा कहे गये हैं॥ ३९—४१॥
छायाविहीननिष्पत्तिरिन्द्रियाणां च दर्शनम्।<br>आकाशगमनं नित्यमिन्द्रियार्थैः समन्वितम्॥ ४२<br><br>दूरे च शब्दग्रहणं सर्वशब्दावगाहनम्।<br>तन्मात्रलिङ्गग्रहणं सर्वप्राणिनिदर्शनम्॥ ४३शरीरकी छाया न होना, इन्द्रियोंका प्रत्यक्ष दर्शन होना, आकाशमें गमन करना, इन्द्रियोंके अर्थका ज्ञान, दूरसे ही शब्दोंको सुननेकी क्षमता रखना, सभी शब्दोंके ज्ञानमें पारंगत होना, तन्मात्राओंके स्वरूपका ज्ञान तथा सभी प्राणियोंको साक्षात् देखनेमें समर्थ होना—ये ऐन्द्र ऐश्वर्य अर्थात् आकाशसम्बन्धी ऐश्वर्य हैं। इन समस्त पाँच प्रकारके ऐश्वर्योंसे युक्त साधक कायव्यूहसामर्थ्यवान् कहा जाता है॥ ४२-४३ १/२॥
ऐन्द्रमैश्वर्यमित्युक्तमेतैरुक्तः पुरातनः।<br>यथाकामोपलब्धिश्च यथाकामविनिर्गमः॥ ४४<br><br>सर्वत्राभिभवश्चैव सर्वगुह्यनिदर्शनम्।<br>कामानुरूपनिर्माणं वशित्वं प्रियदर्शनम्॥ ४५किसी भी अभिलषित वस्तुकी प्राप्ति, जहाँ भी जानेकी इच्छा हो, वहाँ पहुँच जाना, सभी जगह अपना शक्तिप्राबल्य प्रदर्शित करना अर्थात् अपने प्रभावसे सभीको पराभूत कर देना, सभी गुप्त पदार्थोंको देख लेना, अपनी इच्छाके अनुसार रूप धारण करना, सभीको अपने वशमें कर लेना, सभीको प्रिय लगना, सम्पूर्ण जगत्‌को देखनेकी सामर्थ्य रखना—ये सब मानस गुणोंके लक्षण हैं॥ ४४-४५ १/२॥
संसारदर्शनं चैव मानसं गुणलक्षणम्।<br>छेदनं ताडनं बन्धं संसारपरिवर्तनम्॥ ४६<br><br>सर्वभूतप्रसादश्च मृत्युकालजयस्तथा।<br>प्राजापत्यमिदं प्रोक्तमाहङ्कारिकमुत्तमम्॥ ४७छेदन, ताड़न, बन्ध, संसारपरिवर्तन, सर्वभूतप्रसाद, मृत्यु तथा कालका जय—ये प्रजापतिसम्बन्धी श्रेष्ठ आहंकारिक ऐश्वर्य कहे गये हैं॥ ४६-४७॥
अकारणजगत्सृष्टिस्थानुग्रह एव च।<br>प्रलयश्चाधिकारश्च लोकवृत्तप्रवर्तनम्॥ ४८<br><br>असादृश्यमिदं व्यक्तं निर्माणं च पृथक् पृथक्।<br>संसारस्य च कर्तृत्वं ब्राह्ममेतदनुत्तमम्॥ ४९बिना कारण जगत्की सृष्टि, अनुग्रह, प्रलय, अधिकार, लोकवृत्तका प्रवर्तन, असादृश्य, पृथक्-पृथक् व्यक्त निर्माण तथा संसारका कर्तृत्व—यह उत्तम ब्राह्म ऐश्वर्य है॥ ४८-४९॥
एतावत्तत्त्वमित्युक्तं प्राधान्यं वैष्णवं पदम्।<br>ब्रह्मणा तद्गुणं शक्यं वेत्तुमन्यैर्न शक्यते॥ ५०ये ब्राह्म ऐश्वर्यके तत्त्व कहे गये हैं और ये ही प्रधानसम्बन्धी वैष्णव पद हैं। ब्रह्माके बिना उस गुणको अन्य कोई नहीं जान सकता है॥ ५०॥
विद्यते तत्परं शैवं विष्णुना नावगम्यते।<br>असंख्येयगुणं शुद्धं को जानीयाच्छिवात्मकम्॥ ५१उस वैष्णवपदसे भी परे शैवपद है, जिसे विष्णु
५४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भी नहीं जानते हैं। असंख्य गुणोंवाले शुद्ध शिवात्मक तत्त्वको कौन जान सकता है अर्थात् कोई नहीं जान सकता॥ ५१॥
व्युत्थाने सिद्धयश्चैता ह्युपसर्गाश्च कीर्तिताः।<br>निरोद्धव्याः प्रयत्नेन वैराग्येण परेण तु॥ ५२।चौंसठ गुणात्मक ये ऐश्वर्य व्यवहारकालमें सिद्धि कहे जाते हैं, किंतु समाधिकालमें ये ही उपसर्ग अर्थात् विघ्न कहे गये हैं। इन्हें प्रयत्नपूर्वक परम वैराग्यसे रोकना चाहिये॥ ५२॥
नाशातिशयतां ज्ञात्वा विषयेषु भयेषु च।<br>अश्रद्धया त्यजेत्सर्वं विरक्त इति कीर्तितः॥ ५३भय उत्पन्न करनेवाले विषय-भोगोंकी अवश्यम्भावी नश्वरता जानकर सबका अश्रद्धासे त्याग कर देना चाहिये। ऐसा करनेवाला विरक्त कहा जाता है॥ ५३॥
वैतृष्ण्यं पुरुषे ख्यातं गुणवैतृष्ण्यमुच्यते।<br>वैराग्येणैव सन्त्याज्याः सिद्धयश्चौपसर्गिकाः॥ ५४पुरुषमें वितृष्णा नामसे प्रसिद्ध भावको ही गुणवैतृष्ण्य कहा जाता है। औपसर्गिक अर्थात् विघ्नरूप सिद्धियोंका वैराग्यके द्वारा परित्याग कर देना चाहिये॥ ५४॥
औपसर्गिकमाब्रह्मभुवनेषु परित्यजेत्।<br>निरुद्धयैव त्यजेत्सर्वं प्रसीदति महेश्वरः॥ ५५<br><br>प्रसन्ने विमला मुक्तिर्वैराग्येण परेण वै।<br>अथवानुग्रहार्थं च लीलार्थं वा तदा मुनिः॥ ५६चित्तको विषयभोगोंसे हटाकर भुवनोंमें समस्त विघ्नरूप ब्राह्म ऐश्वर्योंका परित्याग करनेसे महेश्वर प्रसन्न होते हैं और इस प्रकार साधकके परम वैराग्यसे शिवके प्रसन्न होनेपर उसे विमल मुक्ति प्राप्त होती है अथवा जो योगी सांसारिक प्राणियोंके कल्याणार्थ या लीलाके निमित्त इन सिद्धियोंका त्याग नहीं करता, वह भी सुखी ही रहता है॥ ५५-५६ १/२॥
अनिरुद्धय विचेष्टेतः सोऽप्येवं हि सुखी भवेत्।<br>क्वचिद्भूमिं परित्यज्य ह्याकाशे क्रीडते श्रिया॥ ५७कभी भूमि छोड़कर अपनी प्रबल शक्तिसे आकाशमें क्रीडा करता है और कभी सूक्ष्म अर्थात् सामान्य लोगोंके लिये अबोधगम्य वेदार्थोंको संक्षेपमें उच्चारित करता है॥ ५७ १/२॥
उद्गिरेच्च क्वचिद्वेदान् सूक्ष्मानर्थान् समासतः।<br>क्वचिच्छ्रुते तदर्थेन श्लोकबन्धं करोति सः॥ ५८वह कभी कोई प्रसंग सुनकर उसके अर्थसे श्लोक-रचना कर डालता है। कभी दण्डक छन्दमें और इसी प्रकार हजारों प्रकारके छन्दोंमें काव्यरचना करता है॥ ५८ १/२॥
क्वचिद्दण्डकबन्धं तु कुर्याद् बन्धं सहस्त्रशः।<br>मृगपक्षिसमूहस्य रुतज्ञानं च विन्दति॥ ५९उसे मृग तथा पक्षिवर्गकी ध्वनियोंका ज्ञान हो जाता है। यहाँतक कि ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समग्र संसार उस योगीके लिये हस्तामलकतुल्य हो जाता है॥ ५९ १/२॥
ब्रह्माद्यं स्थावरान्तं च हस्तामलकवद्भवेत्।<br>बहुनात्र किमुक्तेन विज्ञानानि सहस्रशः॥ ६०<br><br>उत्पद्यन्ते मुनिश्रेष्ठा मुनेस्तस्य महात्मनः।<br>अभ्यासेनैव विज्ञानं विशुद्धं च स्थिरं भवेत्॥ ६१हे श्रेष्ठ मुनियो! अधिक क्या कहा जाय; उस महात्मा योगीमें हजारों प्रकारके विज्ञान उत्पन्न हो जाते

१०- योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण, साधुधर्मका स्वरूप, भगवान् शिवके साक्षात्कारके उपायोंका वर्णन तथा भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता

अध्याय १०] योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण... भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता ५५


हैं। सतत अभ्यासके द्वारा ही यह विशुद्ध विज्ञान सदा स्थिर रहता है॥ ६०-६१॥
तेजोरूपाणि सर्वाणि सर्वं पश्यति योगवित्।<br>देवबिम्बान्यनेकानि विमानानि सहस्रशः॥ ६२योगी सभी तेजसम्पन्न देवताओंके बिम्ब तथा हजारों प्रकारके विमानोंको देखनेकी सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है॥ ६२॥
पश्यति ब्रह्मविष्ण्वीन्द्रयमाग्निवरुणादिकान्।<br>ग्रहनक्षत्रताराश्च भुवनानि सहस्रशः॥ ६३वह ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, यम, अग्नि, वरुण आदि देवताओं, ग्रहों, नक्षत्रों, तारों तथा हजारों भुवनोंको देख लेता है॥ ६३॥
पातालतलसंस्थांश्च समाधिस्थः स पश्यति।<br>आत्मविद्याप्रदीपेन स्वस्थेनाचलनेन तु॥ ६४वह पातालके तलमें स्थित पदार्थोंको भी आत्मविद्यारूप स्वस्थ तथा अचल दीपकसे समाधिस्थ होकर देखता है॥ ६४॥
प्रसादामृतपूर्णेन सत्त्वपात्रस्थितेन तु।<br>तमो निहत्य पुरुषः पश्यति ह्यात्मनीश्वरम्॥ ६५वह साधक प्रसादरूप अमृतसे पूर्ण सत्त्वपात्रमें स्थित उस आत्मविद्यारूप प्रदीपसे अज्ञानान्धकारको नष्ट करके अपने भीतर साक्षात् ईश्वरका दर्शन करता है॥ ६५॥
तस्य प्रसादाद्धर्मश्च ऐश्वर्यं ज्ञानमेव च।<br>वैराग्यमपवर्गश्च नात्र कार्या विचारणा॥ ६६उसी परमेश्वरकी कृपासे धर्म, ऐश्वर्य, ज्ञान, वैराग्य तथा मोक्ष सुलभ हो जाते हैं; इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं करना चाहिये॥ ६६॥
न शक्यो विस्तरो वक्तुं वर्षाणामयुतैरपि।<br>योगे पाशुपते निष्ठा स्थातव्यं च मुनीश्वराः॥ ६७हे मुनीश्वरो! शिवकी महिमाका विस्तृत वर्णन हजारों वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता है। अतएव पाशुपतयोगमें निष्ठापूर्वक रहना चाहिये तथा उसीमें सदा मनको स्थिर रखना चाहिये॥ ६७॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे योगान्तरायकथनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'योगान्तरायकथन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९॥


दसवाँ अध्याय

योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण, साधुधर्मका स्वरूप, भगवान् शिवके साक्षात्कारके उपायोंका वर्णन तथा भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता

सूत उवाचसूतजी बोले—हे उत्तम ब्राह्मणो! संत, जितेन्द्रिय, साक्षात् द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य), धर्मज्ञ, साधु, आचार्य, शिवात्मा, दयावान्, तपस्वी, संन्यासी, वैराग्य-परायण, ज्ञानी, मनपर नियन्त्रण रखनेवाले, दानी, उदार, मनसा-वाचा-कर्मणा सत्यवादी, अलुब्ध,
सतां जितात्मनां साक्षाद् द्विजातीनां द्विजोत्तमाः।<br>धर्मज्ञानां च साधूनामाचार्याणां शिवात्मनाम्॥ १
दयावतां द्विजश्रेष्ठास्तथा चैव तपस्विनाम्।<br>संन्यासिनां विरक्तानां ज्ञानिनां वशगात्मनाम्॥ २
५६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
दानिनां चैव दान्तानां त्रयाणां सत्यवादिनाम्।<br>अलुब्धानां सयोगानां श्रुतिस्मृतिविदां द्विजाः॥ ३<br>श्रौतस्मार्ताविरुद्धानां प्रसीदति महेश्वरः।योगपरायण, श्रुतियों तथा स्मृतियोंके वेत्ता, श्रुतियों तथा स्मृतियोंका अनुकरण करनेवालोंका विरोध न करनेवाले लोगोंपर महेश्वर प्रसन्न रहते हैं॥ १-३ १/२ ॥
सदिति ब्रह्मणः शब्दस्तदन्ते ये लभन्त्युत॥ ४<br>सायुज्यं ब्रह्मणो यान्ति तेन सन्तः प्रचक्षते।सत् शब्दका अर्थ ब्रह्म होता है। जो अन्तमें उस ब्रह्मको पा लेते हैं, वे ब्रह्मसायुज्यको प्राप्त होते हैं, इसीलिये ऐसे महात्मा संत कहे जाते हैं॥ ४ १/२ ॥
दशात्मके ये विषये साधने चाष्टलक्षणे॥ ५<br>न क्रुध्यन्ति न हृष्यन्ति जितात्मानस्तु ते स्मृताः।दस इन्द्रियोंके विषयभोगोंमें तथा पूर्ववर्णित आठ प्रकारके ऐश्वर्यरूप साधनोंकी अप्राप्तिसे जो न तो क्रोध करते हैं और न उनकी प्राप्तिसे हर्षका अनुभव करते हैं, वे जितात्मा कहे गये हैं॥ ५ १/२ ॥
सामान्येषु च द्रव्येषु तथा वैशेषिकेषु च॥ ६<br>ब्रह्मक्षत्रविशो यस्माद्युक्तास्तस्माद् द्विजातयः।सामान्य तथा विशेष पदार्थोंके साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका सम्बन्धविशेष होनेसे ही ये द्विजाति कहे गये हैं॥ ६ १/२ ॥
वर्णाश्रमेषु युक्तस्य स्वर्गादिसुखकारिणः॥ ७<br>श्रौतस्मार्तस्य धर्मस्य ज्ञानाद्धर्मज्ञ उच्यते।स्वर्ग आदिका सुख प्रदान करनेवाले श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित वर्णाश्रम-धर्मका ज्ञान रखनेसे व्यक्ति धर्मज्ञ कहा जाता है॥ ७ १/२ ॥
विद्यायाः साधनातसाधुर्ब्रह्मचारी गुरोर्हितः॥ ८<br>क्रियाणां साधनाच्चैव गृहस्थः साधुरुच्यते।<br>साधनात्तपसोऽरण्ये साधुर्वैखानसः स्मृतः॥ ९<br>यतमानो यतिः साधुः स्मृतो योगस्य साधनात्।<br>एवमाश्रमधर्माणां साधनात्साधवः स्मृताः॥ १०<br>गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थो यतिस्तथा।विद्याकी साधना करनेके कारण गुरुका हित करनेवाला ब्रह्मचारी साधु तथा विहित कर्मोंकी साधना करनेवाला गृहस्थ साधु कहा जाता है। वनमें तपस्याकी साधना करनेसे वैखानस साधु एवं योगकी साधना करने तथा यतिधर्ममें परायण होनेसे व्यक्ति यति साधु कहा जाता है। इस प्रकार अपने-अपने आश्रमोंके धर्मोंका साधन करनेसे गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा यति—ये सभी साधु कहे गये हैं॥ ८-१० १/२ ॥
धर्मधर्माविह प्रोक्तौ शब्दावेत्तौ क्रियात्मकौ॥ ११<br>कुशलाकुशलं कर्म धर्माधर्माविति स्मृतौ।धर्म तथा अधर्म—ये दोनों शब्द क्रियाके वाचक कहे गये हैं। कुशल कर्मको धर्म तथा अकुशल कर्मको अधर्म कहा गया है॥ ११ १/२ ॥
धारणार्थे महान् ह्येष धर्मशब्दः प्रकीर्तितः॥ १२<br>अधारणे महत्त्वे च अधर्म इति चोच्यते।महत्तायुक्त यह धर्म शब्द धारणके अर्थमें कहा गया है तथा अधारण (धारण न करने)—को उद्देश्य करके कृत कर्म अधर्म कहा जाता है॥ १२ १/२ ॥
अत्रेष्टप्रापको धर्म आचार्यैरुपदिश्यते॥ १३<br>अधर्मश्चानिष्टफलो ह्याचार्यैरुपदिश्यते।जिससे अभीष्टकी प्राप्ति हो, उसे आचार्यलोग धर्म कहते हैं तथा जिससे अनिष्ट फलकी प्राप्ति हो, उसे आचार्यलोग अधर्म कहते हैं॥ १३ १/२ ॥
वृद्धाश्चालोलुपाश्चैव आत्मवन्तो ह्यदाम्भिकाः॥ १४<br>सम्यग्विनीता ऋजवस्तानाचार्यान् प्रचक्षते।वृद्ध, निर्लोभी, जितेन्द्रिय, दम्भ न करनेवाले, पूर्ण विनम्र, सरल स्वभाववाले लोगोंको आचार्य कहा जाता है॥ १४ १/२ ॥
स्वयमाचरते यस्मादाचारे स्थापयत्यपि॥ १५जो स्वयं आचरण करता है तथा सभीको आचारमें

अध्याय १०] योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण····भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता ५७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आचिनोति च शास्त्रार्थनाचार्यस्तेन चोच्यते।<br>विज्ञेयं श्रवणाच्छ्रौतं स्मरणात्स्मार्तमुच्यते॥ १६नियोजित करता है एवं शास्त्रोंके अर्थोंका परिशीलन करता है; वह आचार्य कहा जाता है॥ १५ १/२॥<br>वेदोंका श्रवण करनेसे श्रौत तथा शास्त्रोंके अर्थोंका स्मरण करनेसे स्मार्त कहा जाता है। वेदविहित यज्ञ आदि करनेवाला श्रौत तथा वर्णाश्रमसम्बन्धी नियमोंका पालन करनेवाला स्मार्त कहा जाता है॥ १६ १/२॥
इज्या वेदात्मकं श्रौतं स्मार्तं वर्णाश्रमात्मकम्।<br>दृष्ट्वानुरूपमर्थं यः पृष्टो नैवापि गूहति॥ १७किसीके द्वारा पूछनेपर देखे गये अनुरूप (कथनयोग्य) तथा अननुरूप (कथनके अयोग्य) विषयको बिना छिपाये अभिव्यक्त करनेको लिङ्गपुराणके अनुसार सत्य कहा गया है॥ १७ १/२॥
यथादृष्टप्रवादस्तु सत्यं लैङ्गेऽत्र पठ्यते।<br>ब्रह्मचर्यं तथा मौनं निराहारत्वमेव च॥ १८ब्रह्मचर्य, मौन, निराहार, अहिंसा तथा सर्वविध शान्तिको तप कहा गया है॥ १८ १/२॥
अहिंसा सर्वतः शान्तिस्तप इत्यभिधीयते।<br>आत्मवत्सर्वभूतेषु यो हितायाहिताय च॥ १९जो पुरुष सदा अपने ही हित तथा अहितकी भाँति सभी प्राणियोंके हिताहितका ध्यान रखता है; उसकी यह निरन्तर बनी रहनेवाली वृत्ति पूर्णतः दया कही गयी है॥ १९ १/२॥
वर्तते त्वसकृद्वृत्तिः कृत्स्ना ह्येषा दया स्मृता।<br>यद्यदिष्टतमं द्रव्यं न्यायेनैवागतं क्रमात्॥ २०<br><br>तत्तद्गुणवते देयं दातुस्तद्दानलक्षणम्।<br>दानं त्रिविधमित्येतत्कनिष्ठज्येष्ठमध्यमम्॥ २१<br><br>कारुण्यात्सर्वभूतेभ्यः संविभागस्तु मध्यमः।क्रमसे न्यायपूर्वक अर्जित अभीष्टतम द्रव्य गुणीको ही दिया जाना चाहिये। दाताके द्वारा प्रदत्त दानका यही लक्षण है। वह दान भी कनिष्ठ, मध्यम तथा श्रेष्ठ—तीन प्रकारका होता है। करुणापूर्वक सभी प्राणियोंके निमित्त धनका विभाग करना मध्यम दान है॥ २०-२१ १/२॥
श्रुतिस्मृतिभ्यां विहितो धर्मो वर्णाश्रमात्मकः॥ २२श्रुतियों तथा स्मृतियोंसे विहित वर्णाश्रमसम्बन्धी तथा शिष्टाचारके अनुकूल जो धर्म है, वह साधुधर्म कहा जाता है॥ २२ १/२॥
शिष्टाचाराविरुद्धश्च स धर्मः साधुरुच्यते।<br>मायाकर्मफलत्यागी शिवात्मा परिकीर्तितः॥ २३मायायुक्त कर्मफलका त्याग करनेवाला शिवात्मा कहा जाता है तथा सभी आसक्तियोंसे निवृत्त प्राणी युक्त-योगी कहा जाता है॥ २३ १/२॥
निवृत्तः सर्वसङ्गेभ्यो युक्तो योगी प्रकीर्तितः।<br>असक्तो भयतो यस्तु विषयेषु विचार्य च॥ २४अनासक्त तथा पुनः-पुनः जन्म-मृत्युके भयसे भीत होकर विषयभोगोंकी नश्वरतापर विचार करके सभी ओरसे प्रलोभन दिये जानेपर भी जो अलुब्ध बना रहता है, वह संयमी कहा जाता है॥ २४ १/२॥
अलुब्धः संयमी प्रोक्तः प्रार्थितोऽपि समन्ततः।<br>आत्मार्थं वा परार्थं वा इन्द्रियाणीह यस्य वै॥ २५अपने लिये अथवा दूसरेके लिये जिस व्यक्तिकी इन्द्रियाँ मिथ्या प्रवृत्त नहीं होतीं, वह शमके लक्षणोंवाला कहा जाता है॥ २५ १/२॥
न मिथ्या सम्प्रवर्तन्ते शमस्यैव तु लक्षणम्।<br>अनुद्विग्नो ह्यनिष्टेषु तथेष्टान्नाभिनन्दति॥ २६जो अनिष्ट अर्थात् प्रतिकूल विषयोंपर उद्विग्न
५८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
श्लोकअर्थ
प्रीतितापविषादेभ्यो विनिवृत्तिर्विरक्तता।<br>संन्यासः कर्मणां न्यासः कृतानामकृतैः सह॥ २७नहीं होता तथा अनुकूल विषयोंकी प्राप्तिपर हर्षित नहीं होता; वह प्रीति, संताप तथा विषादसे रहित हो जाता है। उसकी यह विनिवृत्ति ही विरक्तता (विराग) कही जाती है॥ २६१/२॥
कुशलाकुशलानां तु प्रहाणं न्यास उच्यते।<br>अव्यक्ताद्यविशेषान्ते विकारेऽस्मिन्नचेतने॥ २८निषिद्ध कर्मोंसहित विहित कर्मोंमें दोष-गुण बुद्धिका न्यास (त्याग) ही संन्यास है और इष्ट और अनिष्ट कर्मोंका भलीभाँति छोड़ना ही न्यास है॥ २७१/२॥
चेतनाचेतनान्यत्वविज्ञानं ज्ञानमुच्यते।<br>एवं तु ज्ञानयुक्तस्य श्रद्धायुक्तस्य शङ्करः॥ २९अव्यक्त अर्थात् प्रकृतिसे लेकर परमाणुपर्यन्त इस जड जगत्के सभी पदार्थोंसे ईश्वरको पृथक् जानना ही वास्तविक ज्ञान है॥ २८१/२॥
प्रसीदति न सन्देहो धर्मश्चायं द्विजोत्तमाः।<br>किं तु गुह्यतमं वक्ष्ये सर्वत्र परमेश्वरे॥ ३०हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकारके ज्ञान तथा भक्ति (श्रद्धा)-से सम्पन्न पुरुषके ऊपर भगवान् शंकर अवश्य प्रसन्न होते हैं; इसमें कोई संशय नहीं है और वास्तवमें यही धर्म है॥ २९१/२॥
भवे भक्तिर्न सन्देहस्तया युक्तो विमुच्यते।<br>अयोग्यस्यापि भगवान् भक्तस्य परमेश्वरः॥ ३१'परम गुह्य रहस्य क्या है' अब मैं आप लोगोंको वह बताता हूँ। सर्वव्यापी परमेश्वर शिवमें भक्ति रखनी चाहिये। उस भक्तिसे युक्त प्राणी निःसंदेह मुक्ति प्राप्त कर लेता है॥ ३०१/२॥
प्रसीदति न सन्देहो निगृह्य विविधं तमः।<br>ज्ञानमध्यापनं होमो ध्यानं यज्ञस्तपः श्रुतम्॥ ३२पात्रता न होनेपर भी उनकी परम भक्तिसे युक्त प्राणीके विविध अज्ञानरूप अन्धकारोंको दूर करके महेश्वर शिव उसपर प्रसन्न हो जाते हैं; इसमें संदेह नहीं है॥ ३११/२॥
दानमध्ययनं सर्वं भवभक्त्यै न संशयः।<br>चान्द्रायणसहस्रैश्च प्राजापत्यशतैस्तथा॥ ३३ज्ञान, अध्यापन, होम, ध्यान, यज्ञ, तप, वेद, दान, अध्ययन—ये सभी शिवकी भक्ति प्राप्त करनेके साधन हैं; इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है॥ ३२१/२॥
मासोपवासैश्चान्यैर्वा भक्तिर्मुनिवरोत्तमाः।<br>अभक्ता भगवत्यस्मिँल्लोके गिरिगुहाशये॥ ३४हे मुनीश्वरो! हजारों चान्द्रायण तथा सैकड़ों प्राजापत्यव्रतों, मासपर्यन्त किये गये उपवासों तथा अन्य अनुष्ठान आदिकी अपेक्षा शिवभक्ति ही श्रेष्ठ है॥ ३३१/२॥
पतन्ति चात्मभोगार्थं भक्तो भावेन मुच्यते।<br>भक्तानां दर्शनादेव नृणां स्वर्गादयो द्विजाः॥ ३५भगवान् शिवकी भक्तिसे हीन प्राणी स्वर्गादिकी प्राप्तिके लिये अनेकविध कर्मजालमें फँसकर गहन गिरि-गुहारूपी इस मृत्युलोकमें बार-बार गिरते रहते हैं, किंतु भक्तिभावसे युक्त प्राणी मुक्त हो जाता है॥ ३४१/२॥<br>हे द्विजो! भगवान् शिवके भक्तोंके दर्शनमात्रसे

अध्याय १०] योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण····भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता ५९


श्लोकहिन्दी अर्थ
न दुर्लभा न सन्देहो भक्तानां किं पुनस्तथा।<br>ब्रह्मविष्णुसुरेन्द्राणां तथान्येषामपि स्थितिः॥ ३६प्राणियोंको स्वर्ग आदि लोक सहज ही सुलभ हो जाते हैं तो फिर साक्षात् शिवभक्तोंके विषयमें क्या कहना! इस वास्तविकतामें कोई संदेह नहीं है॥ ३५¹/२॥
भक्त्या एव मुनीनां च बलसौभाग्यमेव च।<br>भवेन च तथा प्रोक्तं सम्प्रेक्ष्योमां पिनाकिना॥ ३७ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र तथा अन्य देवता शिवभक्तिके द्वारा ही उत्तम पदको प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार मुनियोंका भी बल तथा सौभाग्य शिवभक्तिके ही कारण है॥ ३६¹/२॥
देव्यै देवेन मधुरं वाराणस्यां पुरा द्विजाः।<br>अविमुक्ते समासीना रुद्रेण परमात्मना॥ ३८हे ऋषियो! प्राचीन कालमें देवाधिदेव पिनाकी शंकरने उमाको लक्ष्य करके वाराणसीमें उनसे जिस मधुर प्रसंगका वर्णन किया था, वही मैं भी आप लोगोंसे कह रहा हूँ॥ ३७¹/२॥
रुद्राणी रुद्रमाहेदं लब्ध्वा वाराणसीं पुरीम्।अविमुक्त क्षेत्र वाराणसीपुरीमें आकर भगवान् शिवके साथ विराजमान भगवती रुद्राणीने उन भगवान् रुद्रसे यह पूछा॥ ३८¹/२॥
श्रीदेव्युवाच<br>केन वश्यो महादेव पूज्यो दृश्यस्त्वमीश्वरः॥ ३९<br><br>तपसा विद्यया वापि योगेनेह वद प्रभो।देवी श्रीपार्वतीने कहा— हे महादेव! तप, विद्या, योग आदि किस साधनसे आप वशमें होते हैं, पूजित होते हैं तथा दर्शन देते हैं? हे प्रभो! मुझे बताइये॥ ३९¹/२॥
सूत उवाच<br>निशम्य वचनं तस्यास्तथा ह्यालोक्य पार्वतीम्॥ ४०सूतजी बोले— उन पार्वतीका वचन सुनकर बालचन्द्रमाको तिलकरूपमें धारण करनेवाले शिवने पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान मुखवाली पार्वतीकी ओर देखकर हँसते हुए उनसे कहा—॥ ४०¹/२॥
आह बालेन्दुतिलकः पूर्णेन्दुवदनां हसन्।<br>स्मृत्वाथ मेनया पत्या गिरेर्गां कथितां पुरा॥ ४१<br><br>चिरकालस्थितिं प्रेक्ष्य गिरौ देव्या महात्मनः।<br>देवि लब्धा पुरी रम्या त्वया यत्प्रष्टुमर्हसि॥ ४२पूर्वमें चिरकालतक कैलासपर पार्वतीसहित मुझे रहते हुए देखकर हिमालयकी पत्नी मेनाद्वारा [अपना स्थान होना चाहिये—इस प्रकार] कही गयी वाणीको स्मरणकर सदाशिव बोले—हे देवि! हे विलासिनि! क्या तुम स्थानहेतु अपनी माताके द्वारा कहे गये वचनोंको भूल गयी हो? अब तुमने परम रम्य काशीपुरीको पा लिया है, अतः निश्चिन्त होकर अब तुम प्रश्न करनेयोग्य हो॥ ४१-४२¹/२॥
स्थानार्थं कथितं मात्रा विस्मृतेह विलासिनि।<br>पुरा पितामहेनापि पृष्टः प्रश्नवतां वरे॥ ४३प्रश्न करनेवालोंमें श्रेष्ठ हे पार्वति! जिस प्रकार ब्रह्मात्मक तत्त्व जाननेके लिये इस समय तुमने मुझसे प्रश्न किया है, उसी प्रकार प्राचीन कालमें पितामह ब्रह्माने भी मुझसे पूछा था॥ ४३¹/२॥
यथा त्वयाद्य वै पृष्टो द्रष्टुं ब्रह्मात्मकं त्वहम्।<br>श्वेते श्वेतेन वर्णेन दृष्ट्वा कल्पे तु मां शुभे॥ ४४हे कल्याणि! श्वेतकल्पमें श्वेतवर्ण सद्योजात
६०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| सद्योजातं तथा रक्ते रक्तं वामं पितामहः।<br>पीते तत्पुरुषं पीतमघोरे कृष्णमीश्वरम्॥ ४५<br><br>ईशानं विश्वरूपाख्ये विश्वरूपं तदाह माम्। | नामवाले, रक्तकल्पमें रक्तवर्ण वामदेव नामवाले, पीत-कल्पमें पीतवर्ण तत्पुरुष नामवाले, कृष्णकल्पमें कृष्ण-वर्ण अघोर नामवाले तथा विश्वरूपकल्पमें विश्वरूप ईशान नामवाले मुझ ईश्वरको देखकर ब्रह्माजीने मुझसे कहा॥ ४४-४५ १/२॥ | | पितामह उवाच<br>वाम तत्पुरुषाघोर सद्योजात महेश्वर॥ ४६ | ब्रह्माजी बोले— हे वामदेव! हे तत्पुरुष! हे अघोर! हे सद्योजात! हे महेश्वर! हे देवदेव! महादेव! मैंने गायत्री-उपासनासे आपका दर्शन किया है॥ ४६ १/२॥ | | दृष्टो मया त्वं गायत्र्या देवदेव महेश्वर।<br>केन वश्यो महादेव ध्येयः कुत्र घृणानिधे॥ ४७<br><br>दृश्यः पूज्यस्तथा देव्या वक्तुमर्हसि शङ्कर। | हे महादेव! आप किस प्रकार वशमें होते हैं? हे दयानिधे! आपका ध्यान कहाँ करना चाहिये? आप देवी पार्वतीके द्वारा दृश्य तथा पूज्य हैं। हे शंकर! कृपा करके मुझे बताइये॥ ४७ १/२॥ | | श्रीभगवानुवाच<br>अवोचं श्रद्धयैवेति वश्यो वारिजसम्भव॥ ४८ | भगवान् श्रीशंकर [ पार्वतीसे ] बोले— तब मैंने ब्रह्माजीसे कहा कि हे कमलोद्भव पितामह! मैं केवल श्रद्धासे वशमें किया जा सकता हूँ और आपने तथा विष्णुने समुद्रमें जिस लिङ्गका दर्शन किया था, उसीमें सबको मेरा ध्यान करना चाहिये॥ ४८ १/२॥ | | ध्येयो लिङ्गे त्वया दृष्टे विष्णुना पयसां निधौ।<br>पूज्यः पञ्चास्यरूपेण पवित्रैः पञ्चभिर्द्विजैः॥ ४९ | द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य)-को पवित्र सद्योजात आदि पाँच मन्त्रोंसे मेरे पंचमुखरूपकी पूजा करनी चाहिये। हे अण्डज! हे जगद्गुरो! आज आपने उसी भक्तिसे ही मेरा दर्शन प्राप्त किया है॥ ४९ १/२॥ | | भवभक्त्याद्य दृष्टोऽहं त्वयाण्डज जगद्गुरो।<br>सोऽपि मामाह भावार्थं दत्तं तस्मै मया पुरा॥ ५०<br><br>भावं भावेन देवेशि दृष्टवान् मां हृदीश्वरम्।<br>तस्मात्तु श्रद्धया वश्यो दृश्यः श्रेष्ठगिरेः सुते॥ ५१ | हे देवेशि! उन पितामहने भावपूर्वक मुझ ईश्वरको अपने हृदयमें देखा और जब उन्होंने मुझसे यह कहा कि आपमें मेरी अचल भक्ति हो, तब मैंने पूर्व-कालमें उन्हें वह भक्तिभाव प्रदान कर दिया। अतः हे श्रेष्ठ पर्वतकी पुत्री पार्वती! मात्र श्रद्धासे ही भक्त मुझे वशमें कर सकता है तथा मेरा दर्शन कर सकता है॥ ५०-५१॥ | | पूज्यो लिङ्गे न सन्देहः सर्वदा श्रद्धया द्विजैः।<br>श्रद्धा धर्मः परः सूक्ष्मः श्रद्धा ज्ञानं हुतं तपः॥ ५२<br><br>श्रद्धा स्वर्गश्च मोक्षश्च दृश्योऽहं श्रद्धया सदा॥ ५३ | द्विजोंको लिङ्गमें ही श्रद्धापूर्वक सदा मेरी पूजा करनी चाहिये और इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं होना चाहिये। श्रद्धा ही परम सूक्ष्म धर्म है। श्रद्धा ही ज्ञान, हवन, तप, स्वर्ग तथा मोक्ष आदिका फल प्रदान करती है और इसी श्रद्धासे भक्त सदा मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त कर सकते हैं॥ ५२-५३॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भक्तिभावकथनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भक्तिभावकथन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०॥

११- श्वेतलोहितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् सद्योजातका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा

अध्याय ११] श्वेतलोहितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् सद्योजातका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा ६१


ग्यारहवाँ अध्याय

श्वेतलोहितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् सद्योजातका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा

ऋषय ऊचुःऋषिगण बोले—
कथं वै दृष्टवान् ब्रह्मा सद्योजातं महेश्वरम्।<br>वामदेवं महात्मानं पुराणपुरुषोत्तमम्॥ १<br>अघोरं च तथेशानं यथावद्वक्तुमर्हसि।[हे सूतजी!] ब्रह्माजीने सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर तथा ईशानसंज्ञक सनातन पुरुषोत्तम महेश्वर शिवको किस प्रकार देखा? आप हमें यथावत् रूपसे यह बतानेकी कृपा कीजिये॥ १ १/२॥
सूत उवाचसूतजी बोले—
एकोनत्रिंशकः कल्पो विज्ञेयः श्वेतलोहितः॥ २<br>तस्मिंस्तत्परमं ध्यानं ध्यायतो ब्रह्मणस्तदा।<br>उत्पन्नस्तु शिखायुक्तः कुमारः श्वेतलोहितः॥ ३उनतीसवाँ कल्प श्वेतलोहित नामसे जाना जाता है। उस कल्पमें जब ब्रह्माजी समाधिस्थ होकर परमेश्वरका ध्यान कर रहे थे, उसी समय शिखाधारी श्वेतलोहित वर्णवाला एक कुमार प्रकट हुआ॥ २-३॥
तं दृष्ट्वा पुरुषं श्रीमान् ब्रह्मा वै विश्वतोमुखः।<br>हृदि कृत्वा महात्मानं ब्रह्मरूपिणमीश्वरम्॥ ४<br>सद्योजातं ततो ब्रह्मा ध्यानयोगपरोऽभवत्।<br>ध्यानयोगात्परं ज्ञात्वा ववन्दे देवमीश्वरम्॥ ५उन सद्योजात कुमारको देखकर सर्वतोमुख श्रीमान् ब्रह्माजी उन्हीं ब्रह्मरूपी महात्मा परमेश्वरको हृदयमें धारण करके ध्यानयोगमें तत्पर हो गये। पुनः ध्यान-योगसे उन्हें साक्षात् परमेश्वर जानकर प्रणाम किया। ब्रह्माजीने उन सद्योजात कुमारको परात्पर ब्रह्म कल्पित कर लिया॥ ४-५ १/२॥
सद्योजातं ततो ब्रह्मा ब्रह्म वै समचिन्तयत्।<br>ततोऽस्य पार्श्वतः श्वेताः प्रादुर्भूता महायशाः॥ ६<br>सुनन्दो नन्दनश्चैव विश्वनन्दोपनन्दनौ।<br>शिष्यास्ते वै महात्मानो यैस्तद् ब्रह्म सदावृतम्॥ ७तत्पश्चात् उन सद्योजात ब्रह्मके समीप ही सुनन्द, नन्दन, विश्वनन्द तथा उपनन्दन नामक श्वेतवर्णवाले चार महायशस्वी शिष्य प्रकट हुए। वे महात्मा शिष्य उन सद्योजात ब्रह्मकी सेवामें सर्वदा तत्पर रहते थे॥ ६-७॥
तस्याग्रे श्वेतवर्णाभः श्वेतो नाम महामुनिः।<br>विजज्ञेऽथ महातेजास्तस्माजज्ञे हरस्त्वसौ॥ ८उनके आगे श्वेत वर्णकी आभावाले श्वेत नामक एक महातेजस्वी मुनि उत्पन्न हुए। उन सद्योजातसे उत्पन्न होनेके कारण उस मुनिका नाम हर भी है॥ ८॥
तत्र ते मुनयः सर्वे सद्योजातं महेश्वरम्।<br>प्रपन्नाः परया भक्त्या गृणन्तो ब्रह्म शाश्वतम्॥ ९वहाँपर वे सभी मुनि परम भक्तिसे शाश्वत ब्रह्मरूप उन सद्योजात महेश्वरकी स्तुति करते हुए उनके शरणागत हुए॥ ९॥
तस्माद्विश्वेश्वरं देवं ये प्रपद्यन्ति वै द्विजाः।<br>प्राणायामपरा भूत्वा ब्रह्मतत्परमानसाः॥ १०<br>ते सर्वे पापनिर्मुक्ता विमला ब्रह्मवर्चसः।<br>विष्णुलोकमतिक्रम्य रुद्रलोकं व्रजन्ति ते॥ ११अतएव हे द्विजो! जो प्राणी प्राणायामपरायण होकर ब्रह्मतत्परचित्तसे उन विश्वेश्वरदेवके शरणागत होते हैं; वे सभी पापोंसे मुक्त, विमल आत्मावाले तथा ब्रह्मज्ञानी हो जाते हैं और अन्तमें विष्णुलोकको भी पार करके रुद्रलोकको जाते हैं॥ १०-११॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सद्योजातमाहात्म्यं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सद्योजातमाहात्म्य' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥

१२- रक्तकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् वामदेवका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा

श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग ६२

बारहवाँ अध्याय

रक्तकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् वामदेवका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा

सूत उवाच
ततस्त्रिंशत्तमः कल्पो रक्तो नाम प्रकीर्तितः ।<br>ब्रह्मा यत्र महातेजा रक्तवर्णमधारयत् ॥ १**सूतजी बोले—**तीसवाँ कल्प रक्तकल्पके नामसे प्रसिद्ध है। महान् तेजस्वी ब्रह्माने उस कल्पमें रक्तवर्ण धारण किया था॥ १ ॥
ध्यायतः पुत्रकामस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।<br>प्रादुर्भूतो महातेजाः कुमारो रक्तभूषणः ॥ २पुत्रकी कामनासे ध्यानरत परमेष्ठी ब्रह्माजीके समक्ष एक महातेजस्वी तथा प्रतापी कुमार प्रकट हुआ। वह रक्तवर्णके भूषण, रक्तवर्णकी माला तथा रक्तवर्णके वस्त्र धारण किये हुए था तथा उसके नेत्र भी रक्तवर्णके थे ॥ २\frac{१}{२} ॥
रक्तमाल्याम्बरधरो रक्तनेत्रः प्रतापवान् ।<br>स तं दृष्ट्वा महात्मानं कुमारं रक्तवाससम् ॥ ३
परं ध्यानं समाश्रित्य बुबुधे देवमीश्वरम् ।<br>स तं प्रणम्य भगवान् ब्रह्मा परमयन्त्रितः ॥ ४लाल वस्त्र धारण किये उस महात्मा कुमारको देखकर ब्रह्माजीने परम ध्यानयोगसे यह जान लिया कि यह कुमार तो साक्षात् देवेश्वर है॥ ३\frac{१}{२} ॥
वामदेवं ततो ब्रह्मा ब्रह्म वै समचिन्तयत् ।<br>तथा स्तुतो महादेवो ब्रह्मणा परमेश्वरः ॥ ५उन्हें प्रणाम करके आत्मजित् भगवान् ब्रह्माने वामदेवसंज्ञक उन परमेश्वरको साक्षात् ब्रह्मस्वरूप कल्पित किया॥ ४\frac{१}{२} ॥
प्रतीतहृदयः सर्व इदमाह पितामहम् ।<br>ध्यायता पुत्रकामेन यस्मात्तेऽहं पितामह ॥ ६तत्पश्चात् ब्रह्माजीके द्वारा अनेकविध स्तुति किये जानेपर प्रसन्नहृदय परमेश्वर महादेवने उन पितामहसे यह कहा॥ ५\frac{१}{२} ॥
दृष्टः परमया भक्त्या स्तुतश्च ब्रह्मपूर्वकम् ।<br>तस्माद् ध्यानबलं प्राप्य कल्पे कल्पे प्रयत्नतः ॥ ७हे पितामह! पुत्रकी कामनासे ध्यानपरायण आपने मेरा दर्शन प्राप्त किया और परम भक्तिसे ब्रह्म अर्थात् 'वामदेवाय' मन्त्र पूर्वमें लगाकर अनेक स्तुतियोंसे मेरा स्तवन किया। अतएव आप प्रयत्नपूर्वक ध्यानबलका आश्रय लेकर कल्प-कल्पमें मुझ सर्वश्रेष्ठ तथा लोकके आधारस्वरूप परमेश्वरको भलीभाँति जानेंगे॥ ६-७\frac{१}{२} ॥
वेत्स्यसे मां प्रसंख्यातं लोकधातारमीश्वरम् ।<br>ततस्तस्य महात्मानश्चत्वारस्ते कुमारकाः ॥ ८
सम्बभूवुर्महात्मानो विशुद्धा ब्रह्मवर्चसः ।<br>विरजाश्च विबाहुश्च विशोको विश्वभावनः ॥ ९इसके अनन्तर ब्रह्माजीके विरजा, विबाहु, विशोक तथा विश्वभावन नामवाले चार और कुमार उत्पन्न हुए। वे सभी कुमार महान्, विशुद्ध आत्मावाले तथा ब्रह्मतेजसे सम्पन्न थे॥ ८-९॥
ब्रह्मण्या ब्रह्मणस्तुल्या वीरा अध्यवसायिनः ।<br>रक्ताम्बरधराः सर्वे रक्तमाल्यानुलेपनाः ॥ १०वे सभी कुमार ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मतुल्य, वीर तथा अध्यवसायी थे। वे रक्तवर्णके वस्त्र तथा रक्तवर्णकी मालासे विभूषित थे। उनके शरीरमें लाल कुमकुम तथा लाल भस्म लगा हुआ था॥ १०\frac{१}{२} ॥
रक्तकुङ्कुमिलप्ताङ्गा रक्तभस्मानुलेपनाः ।<br>ततो वर्षसहस्रान्ते ब्रह्मत्वेऽध्यवसायिनः ॥ ११तत्पश्चात् एक हजार वर्षके अनन्तर ब्रह्मभावमें

१३- पीतवासाकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् तत्पुरुषका प्रादुर्भाव तथा उनका माहात्म्य

अध्याय १३] पीतवासाकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् तत्पुरुषका प्रादुर्भाव तथा उनका माहात्म्य ६३

गृणन्तश्च महात्मानो ब्रह्म तद्धामदैविकम्।<br>अनुग्रहार्थं लोकानां शिष्याणां हितकाम्यया॥ १२<br><br>धर्मोपदेशमखिलं कृत्वा ते ब्रह्मणः प्रियाः।<br>पुनरेव महादेवं प्रविष्टा रुद्रमव्ययम्॥ १३<br><br>येऽपि चान्ये द्विजश्रेष्ठा युञ्जाना वाममीश्वरम्।<br>प्रपश्यन्ति महादेवं तद्भक्तास्तत्परायणाः॥ १४<br><br>ते सर्वे पापनिर्मुक्ता विमला ब्रह्मचारिणः।<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ १५लीन वे सभी ब्रह्मप्रिय महात्मा कुमार उस वामदेवरूप ब्रह्मका चिन्तन करते हुए लोकके अनुग्रह तथा शिष्योंके कल्याणकी कामनासे सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश करके पुनः शाश्वत महादेव रुद्रमें समाविष्ट हो गये॥ ११—१३॥<br><br>हे श्रेष्ठ द्विजो! इसी प्रकार परमेश्वरपरायण अन्य जो भी भक्त समाधिसे ध्यान करके ब्रह्मरूप परमेश्वर वामदेवका दर्शन करेंगे; विमल आत्मावाले ब्रह्मनिष्ठ वे सभी भक्त पापसे छूटकर उस रुद्रलोकको प्राप्त होंगे, जहाँसे जीवका पुनः संसारमें आगमन नहीं होता॥ १४-१५॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वामदेवमाहात्म्यं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वामदेवमाहात्म्य' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १२॥


तेरहवाँ अध्याय

पीतवासाकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् तत्पुरुषका प्रादुर्भाव तथा उनका माहात्म्य

सूत उवाच<br>एकत्रिंशत्तमः कल्पः पीतवासा इति स्मृतः।<br>ब्रह्मा यत्र महाभागः पीतवासा बभूव ह॥ १**सूतजी बोले—**इकतीसवाँ कल्प 'पीतवासा' कल्प नामवाला कहा गया है, जिसमें महाभाग ब्रह्माने पीला वस्त्र धारण किया था॥ १॥
ध्यायतः पुत्रकामस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।<br>प्रादुर्भूतो महातेजाः कुमारः पीतवस्त्रधृक्॥ २<br><br>पीतगन्धानुलिप्ताङ्गः पीतमाल्याम्बरो युवा।<br>हेमयज्ञोपवीतश्च पीतोष्णीषो महाभुजः॥ ३पुत्रप्राप्तिकी कामनासे परमेश्वरके ध्यानमें रत परमेष्ठी ब्रह्माजीके समक्ष पीतवस्त्रधारी एक महातेजस्वी कुमार प्रकट हुआ। वह कुमार पीतवर्णकी माला तथा पीत परिधान धारण किये हुए था। उस महान् भुजाओंवाले कुमारके अंगोंमें पीत वर्णका गन्ध लिप्त था तथा वह पीले वर्णकी पगड़ी और हेमवर्णके यज्ञोपवीतसे सुशोभित था॥ २-३॥
तं दृष्ट्वा ध्यानसंयुक्तो ब्रह्मा लोकमहेश्वरम्।<br>मनसा लोकधातारं प्रपेदे शरणं विभुम्॥ ४ध्यानयुक्त होकर ब्रह्माजीने जब यह जान लिया कि ये जगत्के परमेश्वर हैं, तब वे हृदयसे लोकके आधाररूप प्रभु महेश्वरके शरणागत हो गये॥ ४॥
ततो ध्यानगतस्तत्र ब्रह्मा माहेश्वरीं वराम्।<br>गां विश्वरूपां ददृशे महेश्वरमुखाच्च्युताम्॥ ५<br><br>चतुष्पदां चतुर्वक्त्रां चतुर्हस्तां चतुःस्तनीम्।<br>चतुर्नेत्रां चतुःशृङ्गीं चतुर्दंष्ट्रां चतुर्मुखीम्॥ ६<br><br>द्वात्रिंशद्गुणसंयुक्तामीश्वरीं सर्वतोमुखाम्।उसी समय ध्यानगत ब्रह्माजीने महेश्वरके मुखसे निकली हुई, चार पैरोंवाली, चार वक्त्रोंवाली, चार हाथोंवाली, चार स्तनोंवाली, चार नेत्रोंवाली, चार सींगोंवाली, चार दाढ़ोंवाली, चार मुखोंवाली, बत्तीस गुणोंसे युक्त, सभी दिशाओंमें मुखवाली, ईश्वररूपिणी विश्वरूपा श्रेष्ठ महेश्वरस्वरूपिणी गाय देखी॥ ५-६ १/२॥
स तां दृष्ट्वा महातेजा महादेवीं महेश्वरीम्॥ ७तब उस महादेवी महेश्वरी गायको देखकर सभी
६४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
पुनराह महादेवः सर्वदेवनमस्कृतः।<br>मतिः स्मृतिर्बुद्धिरिति गायमानः पुनः पुनः॥ ८<br><br>एहोहीति महादेवि सातिष्ठत्प्राञ्जलिर्विभुम्।<br>विश्वमावृत्य योगेन जगत्सर्वं वशीकुरु॥ ९देवताओंके वन्दनीय महातेजस्वी महादेवने 'तुम मति हो, बुद्धि हो तथा स्मृति हो'—इस रूपमें उस धेनुकी महिमाका बार-बार गान करते हुए कहा—हे महादेवि! आओ, आओ; और सम्पूर्ण जगत्‌को योगके द्वारा आवृत करके अपने वशमें करो। इस प्रकार कहनेपर वह धेनु हाथ जोड़कर सर्वसमर्थ महादेवके सम्मुख खड़ी हो गयी॥ ७-९॥
अथ तामाह देवेशो रुद्राणी त्वं भविष्यसि।<br>ब्राह्मणानां हितार्थाय परमार्था भविष्यसि॥ १०इसके अनन्तर देवेश्वर महादेवने उससे कहा—तुम रुद्राणी होओगी और ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये परमार्थसाधिका बनोगी॥ १०॥
तथैनां पुत्रकामस्य ध्यायतः परमेष्ठिनः।<br>प्रददौ देवदेवेशः चतुष्पादां जगद्गुरुः॥ ११<br><br>ततस्तां ध्यानयोगेन विदित्वा परमेश्वरीम्।<br>ब्रह्मा लोकगुरोः सोऽथ प्रतिपेदे महेश्वरीम्॥ १२ऐसा कहकर देवाधिदेव जगद्गुरु महादेवने पुत्रकी कामनासे ध्यानरत ब्रह्माजीको वह चतुष्पाद गाय दे दी। तदनन्तर ध्यानयोगसे उस धेनुको परमेश्वरी जानकर ब्रह्माजीने जगद्गुरु महादेवसे वह माहेश्वर धेनु प्राप्त कर ली॥ ११-१२॥
गायत्रीं तु ततो रौद्रीं ध्यात्वा ब्रह्मानुयन्त्रितः।<br>इत्येतां वैदिकीं विद्यां रौद्रीं गायत्रीमीरिताम्॥ १३<br><br>जपित्वा तु महादेवीं ब्रह्मा लोकनमस्कृताम्।<br>प्रपन्नस्तु महादेवं ध्यानयुक्तेन चेतसा॥ १४ब्रह्माजी एकाग्रचित्त होकर रौद्री गायत्रीका ध्यान करके और रौद्री गायत्रीके रूपमें कथित इस वेदप्रतिपादित, ज्ञानदायिनी, विद्यास्वरूपिणी तथा लोकवन्द्या महादेवी (धेनु)-का ध्यानयुक्त मनसे जप करके महादेवके शरणागत हुए॥ १३-१४॥
ततस्तस्य महादेवो दिव्ययोगं बहुश्रुतम्।<br>ऐश्वर्यं ज्ञानसम्पत्तिं वैराग्यं च ददौ प्रभुः॥ १५तत्पश्चात् परमेश्वर महादेवने उन ब्रह्माजीको दिव्य योग, महान् कीर्ति, ऐश्वर्य, ज्ञानसम्पदा तथा वैराग्य प्रदान किया॥ १५॥
ततोऽस्य पार्श्वतो दिव्याः प्रादुर्भूताः कुमारकाः।<br>पीतमाल्याम्बरधराः पीतस्रगनुलेपनाः॥ १६<br><br>पीताभोष्णीषशिरसः पीतास्याः पीतमूर्धजाः।<br>ततो वर्षसहस्रान्त उषित्वा विमलौजसः॥ १७इसके बाद तत्पुरुषसंज्ञक उन महादेवके समीप दिव्य कुमार प्रकट हुए, जो पीले रंगकी माला तथा वस्त्र धारण किये हुए थे और पीले रंगके गन्धका अनुलेपन किये हुए थे। उनके सिरपर पीले रंगकी पगड़ी थी। उनके मुख तथा बाल भी पीतवर्णके थे॥ १६ १/२॥
योगात्मानस्तपोह्लादाः ब्राह्मणानां हितैषिणः।<br>धर्मयोगबलोपेता मुनीनां दीर्घसत्रिणाम्॥ १८<br><br>उपदिश्य महायोगं प्रविष्टास्ते महेश्वरम्।<br>एवमेतेन विधिना ये प्रपन्ना महेश्वरम्॥ १९तदनन्तर विमल ओजसे युक्त, योगात्मा, तपस्यामें ही आह्लादित रहनेवाले, ब्राह्मणोंके हितैषी तथा धर्म एवं योगबलसे सम्पन्न वे कुमार एक हजार वर्षतक उन तत्पुरुष महादेवके समीप निवास करके यज्ञ करनेवाले मुनियोंको महायोगका उपदेश प्रदानकर महेश्वरमें समाविष्ट हो गये॥ १७-१८ १/२॥<br>इसी विधिसे अन्य जो भी लोग नियतात्मा,

१४- असितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् अघोरका प्राकट्य और उनका माहात्म्य

अध्याय १४ ] असितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् अघोरका प्राकट्य और उनका माहात्म्य ६५


| अन्येऽपि नियतात्मानो ध्यानयुक्ता जितेन्द्रियाः।<br>ते सर्वे पापमुत्सृज्य विमला ब्रह्मवर्चसः॥ २०<br><br>प्रविशन्ति महादेवं रुद्रं ते त्वपुनर्भवाः॥ २१ | ध्यानपरायण तथा जितेन्द्रिय होकर महेश्वरके शरणागत होते हैं, वे समस्त पापोंसे मुक्त होकर शुद्धात्मा तथा ब्रह्मतेजसम्पन्न हो जाते हैं और अन्तमें महादेवमें प्रविष्ट हो जाते हैं तथा पुनर्भवके बन्धनसे छूट जाते हैं॥ १९—२१॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे तत्पुरुषमाहात्म्यं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'तत्पुरुषमाहात्म्य' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १३॥


चौदहवाँ अध्याय

असितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् अघोरका प्राकट्य और उनका माहात्म्य

सूत उवाच
ततस्तस्मिन् गते कल्पे पीतवर्णे स्वयम्भुवः।<br>पुनरन्यः प्रवृत्तस्तु कल्पो नाम्नासितस्तु सः॥ १सूतजी बोले— इसके बाद उस पीतकल्पके बीत जानेपर ब्रह्माका दूसरा कल्प प्रवृत्त हुआ। वह असित कल्प नामवाला था॥ १॥
एकार्णवे तदा वृत्ते दिव्ये वर्षसहस्रके।<br>स्रष्टुकामः प्रजा ब्रह्मा चिन्तयामास दुःखितः॥ २एक हजार दिव्य वर्षोंतक जब सर्वत्र जल-ही-जल व्याप्त रहा, तब ब्रह्माजी अत्यन्त दुःखित होकर प्रजासृष्टिकी इच्छासे विचारमग्न हो गये॥ २॥
तस्य चिन्तयमानस्य पुत्रकामस्य वै प्रभोः।<br>कृष्णः समभवद्वर्णो ध्यायतः परमेष्ठिनः॥ ३इस प्रकार चिन्तनमग्न होकर पुत्रकी कामनासे ध्यान कर रहे प्रभु ब्रह्माका वर्ण काला हो गया॥ ३॥
अथापश्यन्महातेजाः प्रादुर्भूतं कुमारकम्।<br>कृष्णवर्णं महावीर्यं दीप्यमानं स्वतेजसा॥ ४<br><br>कृष्णाम्बरधरोष्णीषं कृष्णयज्ञोपवीतिनम्।<br>कृष्णेन मौलिना युक्तं कृष्णास्रगनुलेपनम्॥ ५इसी बीच महातेजस्वी ब्रह्माने कृष्णवर्णवाले, महान् वीर्यसम्पन्न, अपने तेजसे देदीप्यमान, कृष्णवर्णका वस्त्र-पगड़ी तथा यज्ञोपवीत धारण किये हुए, कृष्णमुकुटसे सुशोभित, कृष्णमाला धारण किये हुए तथा कृष्ण अंगरागसे अनुलिप्त अंगोंवाले एक कुमारको वहाँ प्रकट हुआ देखा॥ ४-५॥
स तं दृष्ट्वा महात्मानमघोरं घोरविक्रमम्।<br>ववन्दे देवदेवेशमद्भुतं कृष्णपिङ्गलम्॥ ६उन घोर पराक्रमवाले महात्माको अघोरसंज्ञक महादेव जानकर ब्रह्माजीने अद्भुत कृष्ण-पिंगल वर्णकी आभासे युक्त उन देवदेवेशको प्रणाम किया॥ ६॥
प्राणायामपरः श्रीमान् हृदि कृत्वा महेश्वरम्।<br>मनसा ध्यानयुक्तेन प्रपन्नस्तु तमीश्वरम्॥ ७<br><br>अघोरं तु ततो ब्रह्मा ब्रह्मरूपं व्यचिन्तयत्।<br>तथा वै ध्यायमानस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ ८<br><br>प्रददौ दर्शनं देवो ह्यघोरो घोरविक्रमः।तत्पश्चात् ध्यानयुक्त मनसे प्राणायामपरायण होकर तथा महेश्वरको हृदयमें धारणकर श्रीमान् ब्रह्माजी उन अघोररूप परमेश्वरके शरणागत हो गये और उन अघोरको ब्रह्मस्वरूप मानकर उनका ध्यान करने लगे। तदनन्तर घोर पराक्रमवाले अघोर महादेवने उन ध्यानपरायण परमेष्ठी ब्रह्माको साक्षात् दर्शन दिया॥ ७-८ १/२॥
अथास्य पार्श्वतः कृष्णाः कृष्णास्रगनुलेपनाः॥ ९तदनन्तर उन अघोरके समीप कृष्ण, कृष्णशिख,

१५- अघोरेशमाहात्म्य तथा अघोरमन्त्रके जपसे विविध पातकोंका विनाश

श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
६६
चत्वारस्तु महात्मानः सम्बभूवुः कुमारकाः।<br>कृष्णः कृष्णशिखश्चैव कृष्णास्यः कृष्णवस्त्रधृक्॥ १०कृष्णास्य तथा कृष्णवस्त्रधृक् नामवाले चार महात्मा कुमार प्रादुर्भूत हुए, जो कृष्णवर्णके थे, कृष्णमालासे विभूषित थे और कृष्ण अंगरागसे अनुलिप्त थे॥ ९-१०॥
ततो वर्षसहस्रं तु योगतः परमेश्वरम्।<br>उपासित्वा महायोगं शिष्येभ्यः प्रददुः पुनः॥ ११एक हजार वर्षोंतक योगपरायण होकर उन अघोर परमेश्वरकी उपासना करके उन कुमारोंने पुनः अपने शिष्योंको महायोगका उपदेश प्रदान किया॥ ११॥
योगेन योगसम्पन्नाः प्रविश्य मनसा शिवम्।<br>अमलं निर्गुणं स्थानं प्रविष्टा विश्वमीश्वरम्॥ १२योगसम्पन्न वे सभी महात्मा मनसे शिवका ध्यानयोग करके महेश्वरके निर्विकार, निर्गुण, विश्वरूप तथा ऐश्वर्यमय स्थानमें प्रविष्ट हुए॥ १२॥
एवमेतेन योगेन येऽपि चान्ये मनीषिणः।<br>चिन्तयन्ति महादेवं गन्तारो रुद्रमव्ययम्॥ १३इसी प्रकार और भी अन्य जो मनीषी इस योगके द्वारा महादेवका ध्यान करते हैं, वे अविनाशी भगवान् रुद्रके दिव्य लोकको प्राप्त होते हैं॥ १३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अघोरोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अघोरोत्पत्तिवर्णन' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४॥


पन्द्रहवाँ अध्याय

अघोरेशमाहात्म्य तथा अघोरमन्त्रके जपसे विविध पातकोंका विनाश

सूत उवाच<br>ततस्तस्मिन् गते कल्पे कृष्णवर्णे भयानके।<br>तुष्टाव देवदेवेशं ब्रह्मा तं ब्रह्मरूपिणम्॥ १सूतजी बोले— [हे मुनियो!] उस भयावह कृष्ण कल्पके बीत जानेपर ब्रह्माजी उन ब्रह्मस्वरूप देवदेवेश अघोरकी स्तुति करने लगे॥ १॥
अनुगृह्य ततस्तुष्टो ब्रह्माणमवदद्धरः।<br>अनेनैव तु रूपेण संहरामि न संशयः॥ २<br><br>ब्रह्महत्यादिकान् घोरांस्तथान्यानपि पातकान्।<br>हीनांश्चैव महाभाग तथैव विविधान्यपि॥ ३उस स्तुतिसे प्रसन्न होकर महादेवने अनुग्रह करके ब्रह्मासे कहा—हे महाभाग! ब्रह्महत्या आदि महापातकों, अन्य पातकों तथा अनेकविध पापोंको मैं अपने इसी अघोर रूपसे दूर करता हूँ; इसमें कोई संदेह नहीं है॥ २-३॥
उपपातकम्प्येवं तथा पापानि सुव्रत।<br>मानसानि सुतीक्ष्णानि वाचिकानि पितामह॥ ४<br><br>कायिकानि सुमिश्राणि तथा प्रासङ्गिकानि च।<br>बुद्धिपूर्वं कृतान्येव सहजागन्तुकानि च॥ ५<br><br>मातृदेहोत्थितान्येवं पितृदेहे च पातकम्।<br>संहरामि न सन्देहः सर्वं पातकजं विभो॥ ६हे सुव्रत! हे पितामह! इसी प्रकार सभी उपपातकों, मानसिक पापों, सुतीक्ष्ण वाचिक पापों, कायिक पापों, मिश्रित पापों, प्रासंगिक पापों, जानबूझकर किये गये पापों, सहज रूपमें आगन्तुक पापों तथा पितृ-मातृदेहजन्य पापोंको दूर कर देता हूँ और हे विभो! समस्त प्रकारके पातकजनित दुःखोंका नाश कर देता हूँ; इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है॥ ४-६॥
लक्षं जप्त्वा ह्यघोरेभ्यो ब्रह्महा मुच्यते प्रभो।<br>तदर्थं वाचिके वत्स तदर्थं मानसे पुनः॥ ७हे प्रभो! एक लाख बार अघोर मन्त्र (अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यः०) जपकर ब्रह्महत्यारा भी मुक्त हो जाता है।
अध्याय १५ ]अघोरेशमाहात्म्य तथा अघोरमन्त्रके जपसे विविध पातकोंका विनाश६७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चतुर्गुणं बुद्धिपूर्वे क्रोधादष्टगुणं स्मृतम्।<br>वीरहा लक्षमात्रेण भ्रूणहा कोटिमभ्यसेत्॥ ८हे वत्स! उससे आधा जप करनेसे वाचिक पाप तथा उससे भी आधे जपसे मानसिक पाप, चार गुना जप करनेसे बुद्धिपूर्वक अर्थात् जानबूझकर किये गये पाप तथा आठ गुना जप करनेसे क्रोधपूर्वक किये गये पाप दूर होते हैं॥ ७ १/२॥
मातृहा नियुतं जप्त्वा शुद्ध्यते नात्र संशयः।<br>गोघ्नश्चैव कृतघ्नश्च स्त्रीघ्नः पापयुतो नरः॥ ९वीरोंकी हत्या करनेवालेको एक लाख जप तथा भ्रूण-हत्या करनेवालेको एक करोड़ जप करना चाहिये। माताका हत्यारा दस लाख जप करनेसे शुद्ध होता है; इसमें संशय नहीं है॥ ८ १/२॥
अयुताघोरमभ्यस्य मुच्यते नात्र संशयः।<br>सुरापो लक्षमात्रेण बुद्ध्याबुद्ध्यापि वै प्रभो॥ १०गायकी हत्या करनेवाला, कृतघ्न तथा स्त्रीका हत्यारा—ऐसा पापी मनुष्य दस हजार बार अघोरमन्त्र जपकर पापमुक्त हो जाता है; इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है॥ ९ १/२॥
मुच्यते नात्र सन्देहस्तदर्धेन च वारुणीम्।<br>अस्नाताशी सहस्रेण अजपी च तथा द्विजः॥ ११हे प्रभो! जानकर अथवा बिना जाने सुरापान करनेवाला एक लाख जपसे तथा वारुणी (मद्य) पीनेवाला उसके आधे अर्थात् पचास हजार जपसे पापमुक्त हो जाता है; इसमें किसी प्रकारका संशय नहीं है॥ १० १/२॥
अहुताशी सहस्रेण अदाता च विशुद्ध्यति।<br>ब्राह्मणस्वापहर्ता च स्वर्णस्तेयी नराधमः॥ १२बिना स्नान किये भोजन करनेवाला, गायत्री-जप तथा अग्निहोत्र किये बिना और देवताओं एवं अतिथियों आदिको भोजन कराये बिना भोजन करनेवाला द्विज एक हजार जप करनेसे शुद्ध होता है॥ ११ १/२॥
नियुतं मानसं जप्त्वा मुच्यते नात्र संशयः।<br>गुरुतल्परो वापि मातृघ्नो वा नराधमः॥ १३ब्राह्मणका धन हरण करनेवाला तथा स्वर्णकी चोरी करनेवाला अधम व्यक्ति दस लाख अघोर मन्त्र जपकर पापसे मुक्त होता है, इसमें संदेह नहीं है। इसी प्रकार
ब्रह्मघ्नश्च जपेदेवं मानसं वै पितामह।<br>सम्पर्कात्पापिनां पापं तत्समं परिभाषितम्॥ १४हे पितामह! गुरुपत्नीमें आसक्ति रखनेवाले, माताका वध करनेवाले तथा ब्रह्महत्यारे नराधमको भी [पापमुक्तिहेतु] दस लाख मानस जप करना चाहिये॥ १२-१३ १/२॥
तथाप्ययुतमात्रेण पातकाद्वै प्रमुच्यते<br>संसर्गात्पातकी लक्षं जपेद्वै मानसं धिया॥ १५पापियोंके सम्पर्कमात्रसे लगनेवाला पाप उन पापियोंके पापके ही समान कहा गया है, फिर भी मात्र दस हजार जपसे ही सम्पर्कमें रहनेवाला प्राणी उस पापसे मुक्त हो जाता है॥ १४ १/२॥
उपांशु यच्चतुर्धा वै वाचिकं चाष्टधा जपेत्।<br>पातकादर्धमेव स्यादुपपातकिनां स्मृतम्॥ १६संसर्गसे होनेवाले पाप-शमनके लिये पातकीको एक लाख मानस जप अथवा उसका चार गुना उपांशु जप अथवा आठ गुना वाचिक जप बुद्धिपूर्वक करना

६८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

तदधं केवले पापे नात्र कार्या विचारणा।<br>ब्रह्महत्या सुरापानं सुवर्णस्तेयमेव च ॥ १७चाहिये। उपपातकीजनोंके लिये पापीजनोंके लिये निर्धारित जपका आधा जप करना बताया गया है तथा सामान्य पापोंसे मुक्तिहेतु उससे भी आधे जपका विधान है; इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिये॥ १५-१६१/२॥
कृत्वा च गुरुतल्पं च पापकृद् ब्राह्मणो यदि।<br>रुद्रगायत्रिया ग्राह्यं गोमूत्रं कापिलं द्विजाः ॥ १८<br><br>गन्धद्वारेति तस्य वै गोमयं स्वस्थमाहरेत्।<br>तेजोऽसिशुक्रमित्याज्यं कापिलं संहरेद् बुधः ॥ १९<br><br>आप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णोति चाहरेत् ।<br>गव्यं दधि नवं साक्षात्कापिलं वै पितामह ॥ २०<br><br>देवस्य त्वेति मन्त्रेण सङ्ग्रहेद्वै कुशोदकम्।<br>एकस्थं हेमपात्रे वा कृत्वाघोरेण राजते ॥ २१<br><br>ताम्रे वा पद्मपत्रे वा पालाशे वा दले शुभे ।<br>सकूर्चं सर्वरत्नाढ्यं क्षिप्त्वा तत्रैव काञ्चनम् ॥ २२हे द्विजो! ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्णकी चोरी, गुरुपत्नीगमन आदि महापातक करनेवाले ब्राह्मणको चाहिये कि वह रुद्रगायत्री¹ मन्त्रके द्वारा कपिला (किंचित् पीतवर्ण) गायका मूत्र, ‘गन्धद्वारा०’² इस मन्त्रसे उसी गायका पृथ्वीके सम्पर्कसे रहित गोबर, ‘तेजोऽसि शुक्रं’³ इस मन्त्रसे कपिला गायका घी, ‘आप्यायस्व’⁴ इस मन्त्रसे दूध, ‘दधिक्राव्ण’⁵ इस मन्त्रसे साक्षात् कपिला गायका ताजा दही और हे पितामह! ‘देवस्य त्वा’⁶ इस मन्त्रसे कुशाका जल इकट्ठा करे। तत्पश्चात् इन सबको स्वर्ण, चाँदी या ताँबेके पात्रमें अथवा कमल या पलाशपत्रमें एकत्र करके अघोरमन्त्र⁷से अभिमन्त्रित करना चाहिये। पुनः उसमें ब्रह्मकूर्च तथा सभी रत्नोंसहित सोना डाल देना चाहिये॥ १७-२२॥
जपेल्लक्षमघोराख्यं हुत्वा चैव घृतादिभिः।<br>घृतेन चरुणा चैव समिद्भिश्च तिलैस्तथा ॥ २३<br><br>यवैश्च व्रीहिभिश्चैव जुहुयाद्वै पृथक्पृथक् ।<br>प्रत्येकं सप्तवारं तु द्रव्यालाभे घृतेन तु ॥ २४<br><br>हुत्वाघोरेण देवेशं स्नात्वाघोरेण वै द्विजाः ।<br>अष्टद्रोणघृतेनैव स्नाप्य पश्चाद्विशोध्य च ॥ २५तत्पश्चात् अघोर मन्त्रका जप करके घी आदिसे हवन करना चाहिये। घी, चरु, समिध, तिल, यव, धान्यसे अलग-अलग आहुति देनी चाहिये। प्रत्येककी सात-सात बार आहुति देनेका विधान है। इन द्रव्योंके अभावमें अघोरमन्त्रसे केवल घीसे ही हवन किया जा सकता है। हे द्विजो! इसके बाद अघोर मन्त्रका जप करते हुए आठ द्रोण घीसे देवेश शिवको स्नान कराकर बादमें शुद्धोदक स्नान कराना चाहिये॥ २३-२५॥
अहोरात्रोषितः स्नातः पिबेत्कूर्चं शिवाग्रतः।<br>ब्राह्मं ब्रह्मजपं कुर्यादाचम्य च यथाविधि ॥ २६पुनः दिन-रात उपवास करके दूसरे दिन प्रातः-काल स्नानकर ब्रह्मकूर्चविधिसे बनाये गये पंचगव्यका पान करना चाहिये। तत्पश्चात् आचमन करके शिवके

१. ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
२. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥
३. तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि धाम नामासि प्रियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसि ॥ (शु०यजु० १।३१)
४. आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम्। भवा वाजस्य सङ्गथे॥ (शु०यजु० १२।११२)
५. दधिक्राव्णोऽअकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः। सुरभि नो मुखा करत्प्र ण आयूंषि तारिषत्॥ (शु०यजु० २३।३२)
६. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्।
७. अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥

१६- विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव, ब्रह्माजीद्वारा ईशानकी स्तुति

अध्याय १६ ] विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव [ ६१


एवं कृत्वा कृतघ्नोऽपि ब्रह्महा भ्रूणहा तथा।<br>वीरहा गुरुघाती च मित्रविश्वासघातकः ॥ २७<br><br>स्तेयी सुवर्णस्तेयी च गुरुतल्पेरतः सदा।<br>मद्यपो वृषलीसक्तः परदारविधर्षकः ॥ २८<br><br>ब्रह्मस्वहा तथा गोघ्नो मातृहा पितृहा तथा।<br>देवप्रच्यावकश्चैव लिङ्गप्रध्वंसकस्तथा ॥ २९<br><br>तथ अन्यानि च पापानि मानसानि द्विजो यदि।<br>वाचिकानि तथान्यानि कायिकानि सहस्रशः ॥ ३०<br><br>कृत्वा विमुच्यते सद्यो जन्मान्तरशतैरपि।<br>एतद्रहस्यं कथितमघोरेशप्रसङ्गतः ॥ ३१<br><br>तस्माज्जपेद् द्विजो नित्यं सर्वपापविशुद्धये ॥ ३२आगे विधिपूर्वक ब्रह्मसम्बन्धी गायत्री मन्त्रका जप करना चाहिये ॥ २६ ॥<br><br>ऐसा करके कृतघ्न, ब्रह्महत्यारा, भ्रूणहत्या करनेवाला, वीरघाती, गुरुकी हत्या करनेवाला, मित्रके साथ विश्वासघात करनेवाला, चौर-वृत्तिवाला, स्वर्णचोर, गुरुकी पत्नीमें सदा आसक्ति रखनेवाला, मद्यपान करनेवाला, शूद्र-स्त्रीमें आसक्त, परायी स्त्रीके साथ व्यभिचार करनेवाला, ब्राह्मणका धन हरण करनेवाला, गोहत्यारा, माता-पिताकी हत्या करनेवाला, देवताओंकी मूर्ति खण्डित करनेवाला, शिवलिङ्ग ध्वस्त करनेवाला तथा हजारों प्रकारके अन्य मानसिक-वाचिक-शारीरिक पाप करनेवाला द्विज शीघ्र ही पापमुक्त हो जाता है। इतना ही नहीं, इस विधिके करनेसे सैकड़ों जन्म-जन्मान्तरके पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। मैंने अघोरेश्वर भगवान् शिवके प्रसंगसे इस रहस्यका वर्णन किया है। अतएव द्विज अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यको सभी पापोंसे मुक्तिहेतु इस अघोर मन्त्रका जप नित्य करना चाहिये ॥ २७—३२ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽघोरेशमाहात्म्यं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अघोरेशमाहात्म्य' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥


सोलहवाँ अध्याय

विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव, ब्रह्माजीद्वारा ईशानकी स्तुति

सूत उवाचसूतजी बोले—
अथान्यो ब्रह्मणः कल्पो वर्तते मुनिपुङ्गवाः।<br>विश्वरूप इति ख्यातो नामतः परमाद्भुतः ॥ १हे मुनिश्रेष्ठो! असित कल्पके अनन्तर 'विश्वरूप' नामसे विख्यात ब्रह्माजीका दूसरा अत्यन्त अद्भुत कल्प आरम्भ हुआ ॥ १ ॥
विनिवृत्ते तु संहारे पुनः सृष्टे चराचरे।<br>ब्रह्मणः पुत्रकामस्य ध्यायतः परमेष्ठिनः ॥ २<br><br>प्रादुर्भूता महानादा विश्वरूपा सरस्वती।<br>विश्वमाल्याम्बरधरा विश्वयज्ञोपवीतिनी ॥ ३<br><br>विश्वोष्णीषा विश्वगन्धा विश्वमाता महोष्ठिका।<br>तथाविधं स भगवानीशानं परमेश्वरम् ॥ ४समस्त जगत्के संहारके अनन्तर चराचर संसारकी पुनः सृष्टिके निमित्त पुत्र-कामनासे ध्यानरत परमेष्ठी ब्रह्माजीके समक्ष महान् नाद करती हुई विश्वरूपा सरस्वती गौ प्रकट हुई। वह विश्वरूप माला, वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा शिरोभूषण (पगड़ी) धारण की हुई थी। उन महोष्ठिका विश्वमाताके सभी अंग विश्वगन्धसे अनुलिप्त थे ॥ २-३ १/२ ॥
शुद्धस्फटिकसङ्काशं सर्वाभरणभूषितम्।<br>अथ तं मनसा ध्यात्वा युक्तात्मा वै पितामहः ॥ ५तदनन्तर वे युक्तात्मा भगवान् ब्रह्मा उसी प्रकारके विश्वरूपवाले, शुद्ध स्फटिकमणिके तुल्य आभायुक्त
७०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| ववन्दे देवमीशानं सर्वेशं सर्वगं प्रभुम्।<br>ओमीशान नमस्तेऽस्तु महादेव नमोऽस्तु ते॥ ६ | तथा सभी आभूषणोंसे शोभायमान, सर्वेश्वर, सर्वव्यापी, सर्वसमर्थ परमात्मा ईशानदेवका मनसे ध्यान करके उनकी वन्दना करने लगे॥ ४-५ १/२ ॥ | | नमोऽस्तु सर्वविद्यानामीशान परमेश्वर।<br>नमोऽस्तु सर्वभूतानामीशान वृषवाहन॥ ७<br><br>ब्रह्मणोऽधिपते तुभ्यं ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे।<br>नमो ब्रह्माधिपतये शिवं मेऽस्तु सदाशिव॥ ८ | हे ओम्स्वरूप ईशान! आपको नमस्कार है। हे महादेव! आपको नमस्कार है। हे समस्त विद्याओंके ईशान (स्वामी) परमेश्वर! आपको नमस्कार है। हे सभी प्राणियोंके अधिपति वृषवाहन! आपको नमस्कार है। हे ब्रह्माधिपते! आप ब्रह्मरूप तथा साक्षात् ब्रह्मको नमस्कार है। आप ब्रह्माधिपतिको नमस्कार है। हे सदाशिव! मेरा कल्याण हो॥ ६-८॥ | | ओङ्कारमूर्ते देवेश सद्योजात नमो नमः।<br>प्रपद्ये त्वां प्रपन्नोऽस्मि सद्योजाताय वै नमः॥ ९ | हे ओंकारमूर्ते! हे देवेश! हे सद्योजात! आपको बार-बार नमस्कार है। मैं कष्टसे पीड़ित होकर आपके शरणागत हूँ। सद्योजातको नमस्कार है। | | अभवे च भवे तुभ्यं तथा नातिभवे नमः।<br>भवोद्भव भवेशान मां भजस्व महाद्युते॥ १० | अजन्मा होनेपर भी आप लोकाभ्युदयार्थ ही जन्मादिको स्वीकार करनेवाले हैं, हे शिव! आपको नमस्कार है। हे विश्वोत्पादक! हे विश्वके ईशान (विश्वेश)! हे महाद्युते! मेरी रक्षा करो॥ ९-१०॥ | | वामदेव नमस्तुभ्यं ज्येष्ठाय वरदाय च।<br>नमो रुद्राय कालाय कलनाय नमो नमः॥ ११<br><br>नमो विकरणायैव कालवर्णाय वर्णिने।<br>बलाय बलिनां नित्यं सदा विकरणाय ते॥ १२ | हे वामदेव! आपको नमस्कार है। ज्येष्ठको नमस्कार है। वरदको नमस्कार है। रुद्रको, कालको तथा कलन (संख्यारूप)-को बार-बार नमस्कार है। वर्णी, कालवर्ण, विकरणको नित्य नमस्कार है। बलियोंके बली, विकरण (मनोरूप) आपको सर्वदा नमस्कार है॥ ११-१२॥ | | बलप्रमथनायैव बलिने ब्रह्मरूपिणे।<br>सर्वभूतेश्वरेशाय भूतानां दमनाय च॥ १३<br><br>मनोन्मनाय देवाय नमस्तुभ्यं महाद्युते।<br>वामदेवाय वामाय नमस्तुभ्यं महात्मने॥ १४<br><br>ज्येष्ठाय चैव श्रेष्ठाय रुद्राय वरदाय च।<br>कालहन्त्रे नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं महात्मने॥ १५ | बलशाली तथा ब्रह्मरूप बलप्रमथनको नमस्कार है। सभी प्राणियोंका दमन करनेवाले सर्वभूतेश्वरेशको नमस्कार है। मनोन्मनको नमस्कार है। देवको नमस्कार है। हे महाद्युते! आपको नमस्कार है। वामदेवको नमस्कार है, वामको नमस्कार है, आप महात्माको नमस्कार है। ज्येष्ठको नमस्कार है, श्रेष्ठको नमस्कार है, रुद्रको नमस्कार है, वरदको नमस्कार है, महात्मा कालहन्ताको नमस्कार है। आपको नमस्कार है। आपको नमस्कार है॥ १३-१५॥ | | इति स्तवेन देवेशं ननाम वृषभध्वजम्।<br>यः पठेत्सकृद्देवेह ब्रह्मलोकं गमिष्यति॥ १६ | इस स्तवनसे ब्रह्माजीने वृषभध्वज ईशानको नमस्कार किया। जो पुरुष एक बार श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त करता |