श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| सद्योजातं तथा रक्ते रक्तं वामं पितामहः।<br>पीते तत्पुरुषं पीतमघोरे कृष्णमीश्वरम्॥ ४५<br><br>ईशानं विश्वरूपाख्ये विश्वरूपं तदाह माम्। | नामवाले, रक्तकल्पमें रक्तवर्ण वामदेव नामवाले, पीत-कल्पमें पीतवर्ण तत्पुरुष नामवाले, कृष्णकल्पमें कृष्ण-वर्ण अघोर नामवाले तथा विश्वरूपकल्पमें विश्वरूप ईशान नामवाले मुझ ईश्वरको देखकर ब्रह्माजीने मुझसे कहा॥ ४४-४५ १/२॥ | | पितामह उवाच<br>वाम तत्पुरुषाघोर सद्योजात महेश्वर॥ ४६ | ब्रह्माजी बोले— हे वामदेव! हे तत्पुरुष! हे अघोर! हे सद्योजात! हे महेश्वर! हे देवदेव! महादेव! मैंने गायत्री-उपासनासे आपका दर्शन किया है॥ ४६ १/२॥ | | दृष्टो मया त्वं गायत्र्या देवदेव महेश्वर।<br>केन वश्यो महादेव ध्येयः कुत्र घृणानिधे॥ ४७<br><br>दृश्यः पूज्यस्तथा देव्या वक्तुमर्हसि शङ्कर। | हे महादेव! आप किस प्रकार वशमें होते हैं? हे दयानिधे! आपका ध्यान कहाँ करना चाहिये? आप देवी पार्वतीके द्वारा दृश्य तथा पूज्य हैं। हे शंकर! कृपा करके मुझे बताइये॥ ४७ १/२॥ | | श्रीभगवानुवाच<br>अवोचं श्रद्धयैवेति वश्यो वारिजसम्भव॥ ४८ | भगवान् श्रीशंकर [ पार्वतीसे ] बोले— तब मैंने ब्रह्माजीसे कहा कि हे कमलोद्भव पितामह! मैं केवल श्रद्धासे वशमें किया जा सकता हूँ और आपने तथा विष्णुने समुद्रमें जिस लिङ्गका दर्शन किया था, उसीमें सबको मेरा ध्यान करना चाहिये॥ ४८ १/२॥ | | ध्येयो लिङ्गे त्वया दृष्टे विष्णुना पयसां निधौ।<br>पूज्यः पञ्चास्यरूपेण पवित्रैः पञ्चभिर्द्विजैः॥ ४९ | द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य)-को पवित्र सद्योजात आदि पाँच मन्त्रोंसे मेरे पंचमुखरूपकी पूजा करनी चाहिये। हे अण्डज! हे जगद्गुरो! आज आपने उसी भक्तिसे ही मेरा दर्शन प्राप्त किया है॥ ४९ १/२॥ | | भवभक्त्याद्य दृष्टोऽहं त्वयाण्डज जगद्गुरो।<br>सोऽपि मामाह भावार्थं दत्तं तस्मै मया पुरा॥ ५०<br><br>भावं भावेन देवेशि दृष्टवान् मां हृदीश्वरम्।<br>तस्मात्तु श्रद्धया वश्यो दृश्यः श्रेष्ठगिरेः सुते॥ ५१ | हे देवेशि! उन पितामहने भावपूर्वक मुझ ईश्वरको अपने हृदयमें देखा और जब उन्होंने मुझसे यह कहा कि आपमें मेरी अचल भक्ति हो, तब मैंने पूर्व-कालमें उन्हें वह भक्तिभाव प्रदान कर दिया। अतः हे श्रेष्ठ पर्वतकी पुत्री पार्वती! मात्र श्रद्धासे ही भक्त मुझे वशमें कर सकता है तथा मेरा दर्शन कर सकता है॥ ५०-५१॥ | | पूज्यो लिङ्गे न सन्देहः सर्वदा श्रद्धया द्विजैः।<br>श्रद्धा धर्मः परः सूक्ष्मः श्रद्धा ज्ञानं हुतं तपः॥ ५२<br><br>श्रद्धा स्वर्गश्च मोक्षश्च दृश्योऽहं श्रद्धया सदा॥ ५३ | द्विजोंको लिङ्गमें ही श्रद्धापूर्वक सदा मेरी पूजा करनी चाहिये और इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं होना चाहिये। श्रद्धा ही परम सूक्ष्म धर्म है। श्रद्धा ही ज्ञान, हवन, तप, स्वर्ग तथा मोक्ष आदिका फल प्रदान करती है और इसी श्रद्धासे भक्त सदा मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त कर सकते हैं॥ ५२-५३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भक्तिभावकथनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भक्तिभावकथन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०॥